Tuesday, May 26, 2009

साहित्य में अफ़सरवाद

उद्योग-नगरी के साहित्य क्लब में तब अध्यक्ष कोई बड़ा अधिकारी होता था और सचिव भी एक छोटा अफसर होता था। ये अफसर प्रायः प्रबंधक-वर्गीय होते थे। डाॅक्टर और इंजीनियर कार्यकारिणी में रखे जाते थे। टीचर्स ,इस्टेट और सैफ्टी इंस्पेक्टर वगैरह सदस्य हुआ करते थे। अध्यक्ष और सचिव पद पर बैठे पदाधिकारी अपनी शक्ति लगााकर महाप्रबंक जैसी मूल्यवान हस्तियों को तलुवों से पकड़कर ले आते थे और तालियां बजाकर अपने हाथ साफ कर लेते थे। उन दिनों मैं प्रबंधन में नया था और अफसर नहीं था। मेरे जैसांे की रचनाएं सराही तो जाती थीं मगर ’अधिकारी-सम्मान’ नहीं दिया जाता था।
एक दिन मैं प्रशासनिक सेवा के लिए चुन लिया गया। अचानक जैसे सब कुछ बदल गया। मैं अब उपेक्षणीय से सम्माननीय हो गया। मेरी रचनाओं में वज़न आ गया। जबकि राजधानी की प्रशासनिक अकादमी के लिए मुझे उद्योग-नगरी से विदा होना था , तब मेरे सम्मान में साहित्य क्लब में विशेष आयोजन किया गया। अध्यक्ष , सचिव और कार्यकारिधी के पदाधिकारीगण फूलमालाओं की तरह बात बात में गले लगने लगे।विदाई में जो रचनाएं मुझे पढ़नी थीं , उसे रिकार्ड करने का इंतज़ाम स्वयं अध्यक्षरूपी अधिकारी ने की थी। ये वही अधिकारी थे जो मेरी रचना पाठ के समय माथे पर यूं हाथ रखकर बैठे होते थे मानो उनकी इज्जत लूटी जा रही हो।
तभी मुझे साहित्य में अफसर होने का अर्थ बेहद नज़दीक से समझ में आया। निरंतर नीचा दिखाने का प्रयास करनेवाली तोपें सलामियां दे रहीं थीं। ये साहित्य को सलाम नहीं था बल्कि अफ़सर को कोर्निशें थीं। मुझे जैसे दिव्य-दृष्टि मिल गई। साहित्य का इतिहास मुझे आर पार दिखाई देने लगा। किसी मित्र ने मेरी समीक्षा-दृष्टि को कभी ‘एक्स-रे‘ कहा था। अफ्सरों द्वारा की गई उपेक्षाओं की मार से पीड़ित और कुंठित मुझ ‘ज्ञानीनाम अग्रगण्यम्‘ हनुमान को तब वह बात व्यंग्य की कालीमाता का खूनी-खडग प्रतीत हुई थी। वर्ना आज मैं नामवर होता। ‘हुए नामवर बेनिशां कैसे कैसे‘ के निराशावादी गानों के बावजूद मैं आलोचनावादी खेमे का सिपहसालार होता। खैर ,जो हुआ सो हुआ , ऐसी असफलता में तुलसी सहायता करते हैं कि ‘होहिहे वही जो राम रचि राखा‘।
आज लगा कि अफ़सर होना ब्रह्म-देव का सर्वोत्कृष्ट वरदान है। जिन रवीन्द्रनाथ टैगोर , रामचंद्र शुक्ल , महावीर प्रसाद द्विवेदी , सूर्यकांत त्रिपाठी , जयशंकर प्रसाद ,मुंशी प्रेमचंद , सुमित्रा नंदन पंत वगैरह के नामों को दुहराते दलराते मैं नहीं थका करता था ,अचानक वहां आई.सी.एस अधिकारी विलियम थैकरे , आर. व्ही. रसैल. मैकाले मेरे आदर्श बन गए. भारतीय आई.ए.एस. अध् िाकारियों में स्थापित कवि अशोक वाजपेयी, श्रीकांत वर्मा , सुदीप बैनर्जी , भारतीय आई.ए.एस. अधिकारियों में स्थापित व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल, रामावतार त्यागी ,अजात शत्रु ,डाॅ.देवेन्द्र वर्मा ,भारतीय आई.ए.एस. अधिकारियों में स्थापित जनसंपर्क एवं साक्षरता लेखक डाॅ. सुशील त्रिवेदी , रघुराज सिंह , नए भारत के प्रमुख दलित-विमर्श में स्थापित दलित आई.ए.एस. कवि और लेखक ओमप्रकाश मेहरा ,रमेश थेटे , डाॅ. धर्मवीर , राम मेश्राम आदि अनेक प्रशानिक अधिकारी स्थापित हो गए। इनमें कुछ बैंक अधिकारी ,कुछ प्रसिद्ध राजनेताओं के भतीजे भांजे और रिश्तेदार आ गए। जिन डायरियों में राजधानी के गलियारों में जगमगाते साहित्यकारों के पते थे ,जो सचिवालय के अवर सचिवों को ‘श्रद्धेय‘ कहकर चिरौरियां करते थे और वांछित लाभ प्राप्त करते थे , उनके स्थान पर उन साहित्यकारों के नाम आ गये जिन्हें पदेन श्रद्धेय होने का गौरव हासिल था।
‘‘ आपका भविष्य बहुत ब्राइट है साहब। आप तो संस्कृति विभाग के लिए ट्राई मारना। से।कड़ों टुटपुंजिए साहित्यकार और साहित्यिक संस्थाएं आपकी कृपा पाने के लिए लाइन लगाएंगी। सैंकड़ोंप्रकाशक आपकी रचनाओं के संकलन छापकर धन्य हो जाएंगे। कमीशनों की बाढ़ आ जाएगी और वे समीक्षक जो गैर-अफ़सरों के संकलनों को हाथ भी नहीं लगाते ,अब आपके घर के बाहर हाथ बांधे और कलम खोले दांत निपोरते खड़े रहेंगे। कहेंगे:‘ सर , लाइए ..समीक्षा कर दूं।...कुछ रेडीमेड समीक्षाएं भी आपको सौंपे जाते हैं..जब जहां जैसी जरूरत हो , इस्तेमाल कर लीजिएगा।‘‘ मेरे एक परमशुभचिंतक टाइप साहित्यकार ने मुझे सलाह दी। वे इसी प्रकार की सलाहें दे देकर प्रमोट हुए थे। अपने से बड़े अधिकारियों को ऐसी सलाहें देकर खुष रखने का उनको वर्षों का अनुभव था।सरकारी अकादमी के खाते से उन्होंने सैकड़ों अधिकारियों की किताबें छपती देखी थीं।
शिक्षक से जन-संपर्क अधिकारी बने एक अस्पष्ट कवि के दो-चार कविता संग्रह उन्होंने मुझे दिखाए। उनकी समीक्षा ऐसे साहित्यकारों ने की थीं जो प्रतिबद्ध किस्म के खड़ूस माने जाते थे।क्लर्क से प्रबंधक हुए एक उपन्यासकार और कवि की किताबों की समीक्षा लिखनेवाले अवकाशप्राप्त शिक्षक तथा बैंक के एक खजांची साहित्यकार का परिचय कराते हुए वे मुस्कुराए:‘‘सर ये स्थापित समीक्षक हैं। एक अनियतकालीन लघुपत्रिका के संपादक हैं और सचिवालय में उदीयमान प्रशासनिक साहित्यकारों की तलाश हेतु राजधानी में प्रायः प्रवासित रहते हैं। इनकी लघुपत्रिका का वर्तमान और भविष्य सचिवालय के दान पर टिका हुआ है।‘‘ फिर धीरे से बोले:‘‘ बहुत से प्रशासनिक अधिकारियों के लिए तो ये छद्मलेखन भी करते हैं।‘‘
‘‘ अच्छा !‘‘ अफसर बनने के बाद मुझे साहित्य में अवसर ही अवसर दिखाई देने लगे।साहित्य में अफ़सरवाद देखकर मेरे अंदर सुप्त हो गया साहित्य का कीड़ा कुलबुलाने लगा।मेरे हाथ में वषों से वह कलम थी जिसे ताकतवर होने का यश प्राप्त था ,किन्तु जिसे वास्तव में साहित्य की ताक़त कहते हैं , उसकी वास्तविकता आज मेरे समक्ष खुली थी।

150309,रविवार ,रात 10 बजे .

2 comments:

AlbelaKhatri.com said...

bahut hi khoooooob
MAZA AAGAYA

Dr.R.Ramkumar said...

aap ki baat albeli bhi hai ,nirali bhi.
bas ab is dor ko jor se thame rahein yhi abhilasha hai.
dr.r.ramkumar.