Friday, May 8, 2009

मैं कबीर तू लोई !

तू जाने या मैं जानूं यह और न जाने कोई ।
होते होते हो ही गए हम , मैं कबीर तू लोई !

खुद ने खुद को धोया-पोंछा , खुद सिंगार किया है ।
जो भी जैसा सामने आया , फल स्वीकार किया है ।
रोने को मन किया मगर हम किसके आगे रोते ?
हमने संयम नहीं वरन् खुद पर अधिकार किया है ।।
अपनी पूनम ने कितनी रातों की कालिख धोई !
तू जाने या मैं जानूं यह और न जाने कोई !

कष्टों के कांटों की सूई लेकर सिलते पल-छिन !
हम अपने मन को बहलाने ,चलते कंकर गिन-गिन !
हुई हथेली लाल समय के बंजर खनते खनते,
मेंहदी कितनी रची देखते रहे हमीं तुम दिन-दिन !!
क्या ग्लानी ,क्या क्षोभ हमें , क्यों करे कोई दिलजोई ?
तू जाने या मै जानूं ,यह और न जाने कोई !!

बड़े मजे से उड़े जा रहे , पंछी हैं दिन अपने ।
हवा ,मेघ ,आकाश ,प्रकृति, सच है या हैं सपने ?
धरती-सागर ,आंगन-बाड़ी ,पार-द्वार हैं अद्भुत ,
खट्टे-मीठे ,रस-नीरस सब स्वाद मिल गए चखने ।।
मुक्ति-युक्ति की ,तुष्टि-तृप्ति की उपज हमीं ने बोई !
होते होते हो ही गए हम ,मैं कबीर तू लोई !!





9 मई ,2009, बुद्ध-पूर्णिमा ,शनिवार ,
वैवाहिक-वर्षगांठ पर पत्नी को
उपहार-स्वरूप
गीत.

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