Skip to main content

Posts

मोर संग चलव रे उर्फ संगच्छध्वम् ...

  मोर संग चलव रे उर्फ संगच्छध्वम् किसी भी शहर की सुंदरता, सुगढ़ता और जीवंतता की रीढ़ उस शहर के मजदूर हुआ करते हैं जो अनेक भेष में हमें मिल जाते हैं। कोई रिक्शा खींच रहा है, कोई हाथ ठेला पर भरे हुए बारदाने ढो रहा है। कोई गड्ढे खोद रहा है, घास खरपतवार उखाड़ रहा है, बगीचे साफ़ कर रहा है। मजदूरों को काम करते हुए देखकर ही लगता था कि शहर के फेफड़े कैसे और किनसे धड़कते हैं। एक तरह से जीवन की धड़कने सुनने मैं उस राह से गुज़रता था जहां मजदूर दिखाई पड़ते थे।  राजनांदगांव में उस समय बंगाल नागपुर कॉटन मिल (कपड़े का कारखाना) हुआ करती थी। इस कारखाने में ही जगत्प्रसिद्ध मच्छरदानियाँ बना करती थीं। शाम को साढ़े पांच - छः के आसपास कारखाने के सामने कतारों में बैठे हुए मजदूर, अपने सामने बैठी हुई अपनी पत्नियों द्वारा लाया हुआ भोजन या कलेवा करते थे। मेरे लिए यह दृश्य दुख, पीड़ा और सुख की द्वंद्वात्मक अनुभूति कराया करते थे।  फिर भी, मैं प्रायः रोज़ उसी रास्ते का उपयोग करता था, जो आगे चलकर रानी सागर के सामने से गुज़रते राष्ट्रीय राजमार्ग 7 उर्फ़ गांधी नेहरू रोड पर खुलता था। उस दिन भी मैं इसी रास्ते गुज़र रहा...

झूठा है शांतिपाठ?

झूठा है शांतिपाठ? सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत।।                               ऊँ शांतिः शांतिः शांतिः।। यह मंत्र तैत्तिरीय उपनिषद् से लिया गया है, जो आज भी शांतिपाठ के रूप में प्रचलित है। कुछ लोग इसकी विषयवस्तु के आधार पर मृत्यु के समय पाठ किये जानेवाले गरुण-पुराण से इसे उद्धृत  मानते हैं। इस श्लोक का अर्थ है  कि सभी (प्राणि-मात्र) सुखी हों, सभी रोगमुक्त रहें, सब लोग सभी में भद्रता (सज्जनता) देखें, जिससे कोई दुःख के भागी न बन सके।" मंत्र श्रुति और परम्परा से वेद, उपनिषद और पुराणों का आधार रहे हैं। मंत्र या श्लोक स्मृतियों की वो नींव हैं जिस पर हमारे विचारों और आचरणों के भवन खड़े हैं। आश्चर्य की बात है कि ये समस्त श्लोक, ऋषि-मुनियों द्वारा समाज छोड़कर वनों में जाकर, तपस्या और ध्यान से मस्तिष्क को एकाग्र करके सृजित किये गए हैं। मौखिक-वाचिक परम्परा से इनको शिष्य या ज...

सहज, सरल, सहृदय भाई रामेश्वर वैष्णव

सहज_सरल_सहृदय_भाई_रामेश्वर_वैष्णव  राजनांदगांव की स्वर्णमयी यादों में, फुर्सत और लगाव के वो क्षण याद हैं, जब कंपनी विशेष के ट्रांज़िस्टर में विविध-भारती और आकाशवाणी के विविध कार्यक्रम सुनते थे, उनमें भाग लेते थे। कविता, आलेख, परिचर्चा, गीत आदि प्रस्तुत करते थे।  आकाशवाणी भोपाल के लिए भी तब छत्तीगढ़ ( तब मध्यप्रदेश) में निवास करनेवाले रचनाकारों की रेकॉर्डिंग रायपुर में ही हो जाती थी। रायपुर में अपनी पहली कहानी की रिकॉर्डिंग के लिए जब पहली बार रायपुर गया तो सायकल रिक्शावाला मुझे शहर से बाहर ले गया। वहीं भाई मिर्ज़ा मसूद से पहली मुलाकात हुई जो मुझे काली चौक के पास रिकॉर्डिंग स्टूडियो ले आये और रिकॉर्डिंग करवाई। फिर तो बाद के 15-20 साल विविध कार्यक्रमों की रिकॉर्डिंग का सिलसिला वहीं चलता रहा। बहरहाल, उन्हीं दिनों में किसी दिन, एक शाम को, रायपुर आकाशवाणी से प्रसारित एक गीत सुना तो उसकी प्रस्तुति, लय, भाषा, विषय, शिल्प आदि मन को लुभा ले गए। गीतकार का नाम सुनने की जिज्ञासा स्वाभाविक थी। गीत समाप्त होने के बाद गीतकार का नाम उद्घोषित हुआ.. "अभी आप रामेश्वर वैष्णव से उनका गीत सुन रहे थे....

बिना शीर्षक

 छील रहे कंधे दीवारों के अंदर का खालीपन छैनी हथोड़ा है।  सुब्ह फिर दराती सी आयी है हैं उसके हाथों में अंकुड़े सवालों के। खींच रही है सबकी पीठों से भरे हुए बोरे सब पिछले उजालों के।  भगदड़ में दहशत धकेली है राहत के हर पल को छेड़ा, झंझोड़ा है।  पढ़े लिखे होने के दम्भों को, खुलेआम नोंच रही नथुने के बालों सा।  खुजलाती घूम रही औरों को, अपनी ही कुंठा के टीस रहे छालों सा।  क्रांति-भ्रांत अधकचरी पगलट ने अपने ही फोड़ों को खुलकर नकोड़ा है।  सपनीली आंखें अपराधी हैं, बाज़ों ने चिड़ियों पर बंदिश लगाई है।  घोंसलों के अंदर उड़ानें हों सांपों ने पंखों पर उंगली उठाई है।  चौकड़ियाँ वर्जित हैं जंगल में शेरों की नज़रों में हर हिरण भगोड़ा है। @कुमार, 

हर कृति अनुकृति है (?)

हर कृति अनुकृति है (?)         अरस्तू ने अपने अनुकरण के सिद्धांत   में कहा है कि कोई भी काव्य या कलाकृति, रचना या चित्र, गीत या ग़ज़ल कभी मौलिक रचना नहीं होती, उसमें कहीं न कहीं अनुकरण ही होता है।   कुछ दार्शनिक कहते हैं कि प्रकृति में समस्त कृतियां पूर्वात्य हैं। कलाकार जब भी कोई शिल्प गढ़ता है तो वह मात्र धूल अलग करता है। भारत में भी जिन्हें सांस्कृतिक कवि या कलाकार कहा जाता है उनकी काव्य-कृति या चित्र या शिल्प भारतीय पुराणों में वर्णित है। गीता को ऐसा ग्रंथ माना जाता है जो मनोवैज्ञानिक प्रेरणाओं का मूल स्रोत है।      इसी प्रसंग में कालिदास उज्जयिनी के जिस राजदरबार के नवरत्न थे वह राजा भर्तृहरि का ही दरबार था। भर्तृहरि के छोटे भाई  विक्रमादित्य  के  राजदरबार के कालिदास सहित अन्य नौ रत्न थे। स्वयं भर्तृहरि संस्कृत के समर्थ कवि थे। उन्होंने शतक त्रय के ‘नीतिशतक’  में नीचे लिखा प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मुक्तक रचा जो प्रकारांतर से पश्चातवर्ती कवियों की प्रेरणा बनता रहा। वह श्लोक यह रहा... यां चिन्तयामि सततं मयि सा विर...

आस्था और अर्थतंत्र का बीजगणित : लोचदऊँ

आस्था और अर्थतंत्र का बीजगणित : लोचदऊँ ''लॉक डाउन' में अर्थव्यवस्था चरमरा गई है', ऐसे हृदय विदारक समाचार मिलते रहते थे। चारों ओर उत्पादन और व्यापार के द्वार पर सन्नाटा छाया हुआ था। अर्थोपार्जन के हर माध्यम पर ताले पड़ गए थे। निर्माण की मजदूर इकाइयां उजड़े हुए घरों में लौटकर दम तोड़ रही थीं।  देश महामारी और प्राकृतिक आपदाओं के टिड्डी दलों से घिर चुका था। केवल मुसीबतों की चर्चा ही ज़ोर- ज़ोर से बात कर रही थी बाक़ी सारी बातें सहमी और घिघियायी हुई थीं। कानाफूसी होने लगी थी कि ग़रीब देश और कितना ग़रीब हो जाएगा। अब पुलिस और सेना का क्या होगा? सरकारी अधिकारी और मंत्रियों का क्या होगा? पूंजीपतियों और उद्योगपतियों का क्या होगा? बैंक में करोड़ों मध्यम वर्गी साधारण लोगों का जो पैसा जमा है उसका क्या होगा? क्या जान और माल देश की अस्मिता को बचाने के लिए राजसात हो जाएगा? तरह तरह की चिंताओं से चिंतनशील प्राणियों का स्वास्थ्य खराब हो रहा था। इम्मुनिटी क्षीण हो रही थी और कमज़ोर होती दीवारों को तोड़कर कोविड शरीरों में प्रवेश कर रहा था। मृतदेहें आंकड़ें बना रहीं थीं।  धीरे-धीरे दस महीने बीते। नया सा...

कोविड 19 : अभिशाप या वरदान

  कोविड 19 : अभिशाप या वरदान यह शीर्षक हमारा जाना पहचाना है। कोविड19 को भी पिछले 10 महीनों में जान पहचान लिया। वैक्सीन विहीन से को-वैक्सीन के वितरण और विश्व निर्यात किये जाने तक उसकी भयावहता और नियंत्रण तक के चक्र को हमने देखा। हमको जब गर्भ-ग्रहों में रहते या हमारे बजट को चरमरा कर, मास्क और सैनीटाईजर खरीदती  ज़िन्दगी, इन हालातों की आदत हो गयी थी, तब इस ' को-वैक्सीन ' के जन्म की विशेष या बिल्कुल भी खुशी नहीं हुई। हम परम्परावादी  भारतियों के घर जैसे बेटी जन्मी हो। भले हम बेटी बचाओ फैशन के चलते ऊपर से ख़ुशी ज़ाहिर करते फिरें, अंदर से हम मध्यमवर्गी मानसिकता के शिकार अब भी हैं। इसका कारण हमारा दिन ब दिन बेक़ाबू होता अर्थतंत्र है।   बहरहाल, इस कोविड-19 के चलते लॉक डाउन की सार्वजनिक स्वीकृति के साथ हमने अपने ही घरेलू ज्ञात अज्ञातवास में, कोपभवन में या गर्भ-गृह में कैसे बिताया, यह बहुत मायने रखता है। लॉक डाउन बहुतों के लिए बहुत पीड़ा दायक रहा। नुकसानदेह रहा। बहुतों की नौकरी चली गयी। लेकिन ज़्यादातर के लिये लाभदायी  भी रहा। मैं सेवा निवृत्त था। मुझे क्या रोज़गार और क्या बेरो...