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कैरम्बोला के फूल

कैरम्बोला के फूल 

  एक  

      आज मेरी गैलरी में पीले गुड़हल में एक अधखुली बोंड़ी यानी कली और एक सुप्त बोंड़ी देखकर मैं खिल उठा। लाल और गुलाबी गुड़हल यानी जासौन की अपेक्षा पीला गुड़हल एक अलग ही अनुभूति देता है।  उसके बगल में लगे पौधे पर मेरा बाग़बान पुत्र काम कर रहा था। काम यानी वही कटिंग-सटिंग, खाद-मिट्टी, तराई-गुड़ाई। 
       गुड़हल में कलियां देखकर मेरे मुंह से निकला -'वाह! जासौन में कलियां निकल आईं।'
     'स्टार फ्रूट में भी कलियाँ निकल आयी है।' उसने मेरी ख़ुशी के गुलदस्ते में एक फूल और खोंप दिया। मैं सचमुच चकराया - 'हें! यह स्टार फ्रूट का पौधा है। मैं तो शो प्लांट समझ रहा था।'
'आपको बताया तो था, जब लेकर आए थे।' लड़का थोड़ा खिन्न होकर बोला। 
       'अरे अब इतना कहां याद रहता है। सामने है तो साक्षात, वरना सब प्रच्छन्न।' कहकर मैं हंस पड़ा। फिर विषयगत प्रसन्नता की तरफ लौटकर मैंने कल्पना के पांव पसारे -'इसका मतलब यह हुआ कि जब फूल आ ही रहे हैं तो फल भी आयेंगे।'
        मैंने झुककर स्टार फ्रूट की कलियाँ देखीं। अहा! चटख बैंगनी पंखुरी-युक्त लाल रंग की कोटीवाली खुली अधखुली कलियां बहुत दिल-फरेब थीं।  मैं पहली बार स्टार फ्रूट के पौधे और उनमें खिलती कलियां देख रहा था। जैसे कोई किसान बीजारोपण के बाद सफलता का अंकुरण देखकर प्रसन्न होता है, वैसा मैं भी हुआ। 
         ऐसा ही मैं तब प्रसन्न हुआ था जब पहली बार पचमढ़ी के प्रियदर्शनी मार्ग में स्टार फ्रूट की स्लाइसेस पहली बार चखीं थीं।

       मेरी यादों के पंख निकल आए और वे उड़कर दो हज़ार इक्कीस के दिनों की 'पचमढ़ी यात्रा' के अहाते में पहुंच गए। बल्कि उससे भी पहले, एक हज़ार नौ सौ इकहत्तर-बहत्तर की उत्कण्ठित तरुणाई की गलियों तक हो आई, जहां मेरा किशोर कवि पाँव-पाँव चलता हुआ विज्ञान और कविता के बीच से गुज़र रहा था। 

दो
       पचमढ़ी और सतपुड़ा की तरफ़ तब मेरी आंखों के झरोखे इतने नहीं खुले थे। मैं नहीं जानता था कि जिस पर्वतीय क्षेत्र में मैं रह रहा हूं, छिंदवाड़ा-सिवनी, कुरई-खवासा, पांढुर्ना-बैतूल, चांदामेटा परासिया ये सब के सब सतपुड़ा घाटियों में बसे हैं और  'सतपुड़ा की रानी'  पचमढ़ी है, प्रदेश का सबसे बड़ा हिल-स्टेशन। हम तब पचमढ़ी को संयुक्त मध्यप्रदेश की उप-राजधानी जानते थे जहां  अंग्रेजों के बनाए ऐशगाह थे और अब नए शासक वहां ग्रीष्म-कालीन सत्र के नाम पर कुछ माह राजकीय आमोद प्रमोद और काग़ज़ी कार्यवाहियां करते हैं।
     इन्हीं दिनों छिंदवाड़ा में एक कवि-सम्मेलन हुआ। कुछ राजनैतिक तनाव था। राजेंद्र अवस्थी या अनुरागी ने 'जो जहां है वह वतन के कम पर है। आज अपना देश पूरा लाम पर है।' 
दूसरी कविता जो याद रही वह है स्टपूडा के घने जंगल। ऊंघते अनमने जंगल।' यह कविता भवानी भाई उर्फ भवानी प्रसाद मिश्र ने इस ठहराव के साथ सुनाई कि मं सतपुड़ा के घने जंगल में जाने के लिए मचलने लगा। 
      तीसरा सिर्फ नाम याद है  रामकुमार शर्मा, जो उस कवि सम्मेलन का संचालन कर रहे थे और उन्होंने बार बार कहा था 'मैं छिंदवाड़ा का  पुत्र हूं, इसलिए मेरी जिम्मेदारी है कि इन विभूतियों का सम्मान करूं, अपनी धरती का मान रखूँ।'
      मैं भी उसी धरती का था, मैने उनकी भावनाओं का मान रखा और सतपुड़ा के जंगल जाने की ज़िद घर में दोहरायी। मुझे बताया गया कि भालीवाड़ा के जिस घने जंगल के बीच मेरा जन्म हुआ, वह सतपुड़ा के जंगल का एक टुकड़ा है। 
    फिर सतपुड़ा मेरे आसपास दिखाई देने लगा और सतपुम्म् की रानी से मिलने के आस मन में दबी रह गई। घूमने फिरने भ्रमण करना हमारे अर्थशास्त्र में तब निषेध था। यह निषेध सेवा समाप्ति के बाद ही टूटा। 
तीन 
       जबलपुर में तय हुआ कि पचमढ़ी की सैर की जाए। बड़ा  पुत्र वहीं था और हम भी वहीं पहुंच गए थे। 
     'विश्वस्त सूत्रों से' पता चला कि सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच समुद्र तल से 3550 फीट की ऊंचाई पर बसा पंचमढ़ी मध्य प्रदेश का यह एकमात्र हिल स्टेशन है। हरे-भरे और शांत पंचमढ़ी में बहुत-सी नदियों और झरनों के गीत सैलानियों में मंत्रमुग्ध कर देते हैं। पंचमढ़ी घाटी की खोज 1857 में बंगाल लान्सर के कैप्टन जेम्स फोरसिथ ने की थी। इस स्थान को अंग्रेजों ने सेना की छावनी के रूप में विकसित किया। पंचमढ़ी में आज भी ब्रिटिश काल के अनेक चर्च और इमारतें देखी जा सकती हैं। पंचमढ़ी मध्य भारत के सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थलों में एक है, जो मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में स्थित है। तब तक होशंगाबाद होशंगाबाद ही था। नाम परिवर्तन की आंधी तो अभी दो-चार साल पहले चली है। 
        पचमढ़ी पहुंचकर घूमते-घूमते हम पहुंचे प्रियदर्शिनी व्यू प्वाइंट। यह सतपुड़ा की पहाड़ियों का सबसे ऊंचा व्यू प्वाइंट है और पचमढ़ी के सबसे खूबसूरत और प्रसिद्ध दर्शनीय स्थलों में से एक है। 
           जानकार लोग (पर्यटन विशेषज्ञ और आजकल गूगल जी) बताते हैं कि इस स्थान से सतपुड़ा पहाड़ की ख़ूबसूरती को देखने के बाद कैप्टन जेम्स फोरसिथ ने 1857 में पचमढ़ी हिल स्टेशन की स्थापना की।  इस व्यू प्वाइंट को प्रारंभ में  'फोरसिथ प्वाइंट कहा गया। 1964 में तत्कालीन केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री, प्रियदर्शिनी इंदिरा गांधी ने इस स्थान का दौरा किया था। इसके बाद उनके नाम पर इसे 'प्रियदर्शिनी पॉइंट' कहा जाने लगा। इंदिरा गांधी को 'प्रियदर्शिनी' नाम शांतिनिकेतन में उनके गुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने दिया था। उन्हें उनके विपक्षी नेता अटलबिहारी बाजपेयी ने 'दुर्गा'' की उपाधि दी थी। अपने कार्यकाल में कड़े और अटल निर्णयों के कारण आज भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर  उन्हें 'आयरन लेडी(लौह महिला)' के नाम से जाना जाता है।
      'प्रियदर्शिनी व्यू पॉइंट' से चौरागढ़, धूपगढ़ आदि सतपुड़ा की चोटियां  देखी जा सकती हैं। धूपगढ़ सूर्यास्त के बेहद मनमोहक नजारे के  लिए प्रसिद्ध है। यहीं से अन्य अनेक पहाड़ियां, घने जंगल, गहरी घाटियां और सतपुड़ा की हरे-भरे वनों के अकल्पनीय दृश्य दिखाई देते हैं।
        'प्रियदर्शिनी व्यू प्वाइंट' स्थल से थोड़ी दूर पर एक बेहतरीन 'इको प्वाइंट' भी है, जहां परतदार पत्थरों से बने गंगनचुंबी पर्वत बोले हुए कि प्रतिध्वनि साफ़ साफ़ लौटते हैं। पर्यटकों को यह बहुत आकर्षित करता है और प्रायः मित्र, परिवार के लोग, दंपति, प्रेमी युगल ज़ोर-ज़ोर से एक दूसरे को पुकारते हैं। ये पुकार लौटती हुई और प्यारी लगती है। यह खेल बच्चों ने भी खेल और ख़ूब आनंद लिया। यहां आकर जाने का मन नहीं करता और समय कैसे बीतता चला जाता है, पता ही नहीं चलता।   
        'प्रियदर्शिनी दृश्य बिंदु (प्रियदर्शिनी व्यू पॉइंट')' पचमढ़ी की पहाड़ी पर है और पहाड़ी रास्ते पर पैदल चलकर इस व्यूपॉइंट तक पहुंचते हैं। बेतरतीब रस्ते पर विविध प्रकार के पेड़ों की स्वतंत्रता पूर्वक यत्र-तत्र खड़ी आकर्षक पेड़ों की बसाहट थकान और ऊब पैदा नहीं होने देती। 
         हालांकि रास्ते में अनेक छोटे और कच्चे टपरे हैं जो पेड़ों के झुरमुट में चाय, पानी, स्वल्पाहार की सुविधा प्रदान करते हैं। छोटे छोटे शिला-खण्डों पर बैठकर चाय, कॉफी, सॉफ्ट ड्रिंक, पकौड़े, उबली बेर, अन्य मौसमी जंगली पर्वतीय फल, जाम, आम, जामुन, तेंदु, चार, आदि का आनंद उनकी उपलब्धि पर लिया जा सकता है। हमने भी इस सुविधा का आनंद लिया।  
     पेड़ के एक कैनोपी के नीचे बाल सखाओं की तरह एक दूसरे के सिर से सिर मिलाकर, किसी गुप्त-मंत्रणा में व्यस्त की तरह कुछ शिलाखंड पड़े थे। उन पर हमने आसन जमाया यानी तशरीफ़ रख दी। हमारे दोनों युवा लड़के अपने सात वर्षीय भांजे को लेकर आसपास की गुमटियों में पानी और 'खाने लायक कुछ' लेने चले गए। जब वे वापस आए तो सभी के हाथ में पलाश और माहुल के पत्ते पर सितारे की तरह की स्लाइसेस या फांकें ले आए। पत्नी चिहुंककर बोली - 'अरे वाह! कमरख, स्टार फ्रूट ... बहुत ताज़े लग रहे हैं.. कहां मिल रहे हैं?'
'सब तरफ मिल रहे हैं मम्मी! एक पत्ता तो हम वहीं जीम लिए। सफेद नमक और लाल मिर्च के साथ इतने चटपटे हैं कि चटखारे लेते रह जाओगी।' लड़के ने कहा और स्टार फ्रूट की स्लाइसेस या फांकों या कतरनों का एक पत्र-पात्र उसने मम्मी को थमा दिया। एक पत्ता-तश्तरी मेरे हाथों में भी आईं।
     मैंने पहली बार सितारा फल की फांकें नमक मिर्च के साथ खाई थीं। आह! उनका खट मिट्ठा रसीला स्वाद मेरी जुबान, मेरे दांत, मेरे हलक़ तक को तर कर गए। एक अद्भुत आनंद में मेरी आँखें भिंच सी गई। जैसे किसी लड़की की नमक के साथ कच्ची कैरी या कच्ची इमली खाकर भिंच जाती हैं।
       अपनी आंतरिक फुहारें संभालकर पत्नी बोली - पता है, इसको खा लो तो प्यास नहीं लगती शरीर में पानी की तरावट देर तक बनी रहती है। शरीर और पेट को ठंडक मिलती है। थकान दूर होती है और मन तरोताज़ा हो जाता है। शरीर में हैं स्फूर्ति आती है।' मैंने अपना पानी संभालकर कहा - 'ये तुमसे किसने कहा?'
      पत्नी ने गर्व से कहा - 'सेल्फ एक्सपीरियंस है। स्कूल के दिनों से खा रही हैं, हमें पता नहीं होगा?
         मैं तो पहली बार मिला था इस चटोर-ग्रंथ के महानायक से। मैंने नमक मिर्च से सराबोर एक खट-मिट्ठा स्लाइस उठाकर मुंह में रखा और मन ही मन कहा - 'आप से मिलकर सचमुच बहुत ख़ुशी हुई  मि. स्टारफ्रूट! हिंदी में बोले तो प्यारे कमरख!' 
पांच
      इस सितारा-संरचना वाले कमरख फल के पहले स्वाद-विस्फोट साथ मेरा पहला अनुभव और परिचय था। मैं नई और खट्टी चीजों से कम ही प्रभावित होता हूं किंतु इस कम-रखे कामरंग से मिलकर मेरी कामनाएं चटखारे लेने लगीं। मैंने खोजबीन करवाई जिसका नतीज़ा अच्छा निकला। बहुत कुछ जान लेने के बाद मैं इस उपसंहार पर उतरा कि केवल जिव्हा की चटकार मात्र नहीं है करमबोला, यह हृदय तक पहुंचनेवाला रसीला घुसपैठ है। 
        कमरख एक औषधीय फल है जैसे कि सभी फल होते हैं।
कमरख में विटामिन सी होने से रोग प्रतिरोधक क्षमता मज़बूत होती है। इसका फाइबर पाचन क्रिया तथा पाचन तंत्र को स्वस्थ रखते है, फलस्वरूप  कब्ज़ नहीं होने देते।  कमरख के पोटैशियम और एंटीऑक्सीडेंट्स  ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखते हैं, त्वचा पर चमक लाते हैं, बालों को स्वस्थ रखते हैं, इसके सेवन से दमा, हृदय रोग, पेचिस, स्कर्वी रोग (विटामिन सी की कमी से होने वाली बीमारी) में लाभ मिलता है।  कमरख या करम्बोला के पत्तों तथा टहनियों को पीसकर लेप करने से दाद, खुजली आद चर्म रोगों का इलाज होता है। अर्थ यह है कि करम्बोला या कमरख के पत्ते, टहनियां, छाल, फल फूल सर्वांग लाभकारी है। देखने में प्रियदर्शन कमरख कई बड़े बड़े काम हैं। सिर्फ़ काम ही नहीं, नाम भी इसके अनेक हैं। दक्षिण एशिया मूल के इस पादप को वियतनाम, फिलीपींस, इंडोनेशिया, मलेशिया, चीन और भारत में अलग अलग नामों से पुकारा जाता है। वैज्ञानिक नाम एवरहोआ कैरम्बोला है। भारतीय प्रदेशों में इसके अलग अलग नाम हैं । सबसे लोकप्रिय नाम यही कमरख है हिंदी में और अंग्रेजी में स्टार फ्रूट। इसके स्लाइस स्टार की तरह होते हैं अतः अंग्रेज स्टारफ्रूट कहते हैं। देखने की बात की जाए तो अर्जुन (कहुआ) फल इसका हमशक्ल है। मगर यह तुलनात्मक चर्चा फिर कभी। आज बस इतना।

9 सितंबर 2026 

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