एक सांस्कृतिक स्मृति लेख
करार गोंदा फूल उर्फ़ त्योहारी गेंदा
एक: गोबरधन का धन है गेंदा
एक समय था जब दीपोत्सव और गेंदा का सम्बन्ध हम अभिन्न मानते थे। हालांकि बरसात के शुरू होते ही शालाओं के द्वार भी खुल जाते थे और तीज त्योहारों के भी। तीजा-पोला, नागपंचमी, रक्षाबन्धन, हलषष्टि, जन्माष्टमी, गणेशोत्सव, दुर्गापूजा आदि यादाबाद त्योहार बरसाती उत्सव ही थे। बरसाती यानी बरसात के मौसम में होनेवाले त्योहार।
दुर्गापूजा समाप्त होते ही दीपोत्सव की तैयारियां आरम्भ हो जाती थी। जो कच्चे-पक्के घर, आंगन, दीवारें महाकवि वाल्मीकि के शब्दों में ‘अभीक्ष्ण-वर्षोदक-विक्षत’ यानी लगातार बरसात का पानी पड़ने से क्षत-विक्षत हो गईं थीं, उनकी छपाई, लिपाई, पुताई, जहां जो लागू हो, प्रारम्भ हो जाया करती थी।
रेलवे भूमि पर साधिकृत हमारे कच्चे घर-बाड़ बने थे। दशहरा बीतते ही उनके उधड़े हुए आंगन-पार, घर के भीतर फर्श-दीवार नए ढंग से सँवारे जाने लगते। खेत-खंती की मिट्टी, इंजन के कोयले की जलन और भूसे की रांध से सांधकर छपाई और चिकनाई की कार्यवाहियां चलने लगती थी। उन दिनों दीपावली की पंद्रह-बीस दिन की छुट्टी हुआ करती थी। मिट्टी लाना और सानना, हमें पहाड़े पढ़ने और शुद्ध लेख लिखने से अधिक अच्छे लगते। घुटने तक मिट्टी में छप जाना और कलाइयों तक मिट्टी में सन जाना, हमें आंतरिक आनंद देता था। कुछ ही दिनों बाद घर-द्वार हल्दी और उबटन लगाकर नहाई हुई दुल्हन की तरह लगने लगते। मां जैसे त्योहारों में सँवरती है, वैसे घर-द्वार संवर जाते।
फिर आता दीपावली का त्योहार। पान, फूल, पत्ते बटोरकर घर में बंदनवार और तोरणें बांधने लटकाने का त्यौहार। तिवरिया के लाल, नीले, पीले, गुलाबी फूल, बारहमासी या सदाबहार की गुलाबी हथेलियों पर लाल नीली मेंहदी के गोल घेरेवाले फूल, गुलाबों के बिंदिया जैसे छोटे फूल, कांस की सफेद कलगियां, कत्थई ‘गेंदी’(छोटे) फूल, रूई के गोले या गेंद जैसे गोलमटोल स्वर्णिम गेंदे, लाल गेंदे के फूल। चारों तरफ फूल ही फूल। हर फूल का अपना महत्व। लेकिन बंदनवार के हार तो केवल गेंदे के लिए आरक्षित।
गेंदा त्योहारों का राजपुष्प है। गेदे के फूल भर-भर टोकरिया इकट्ठे किए जाते। सभी जगह तो लगने थे। चौखट में, चौरे में, चौक में, देवों के कोट में, गोबरधन के गोल घेरे में, गोबरधन की हर गोलाई में। दीपावली के दूसरे दिन अहीर-नाचा के लिए, पूरे आंगन में तोड़-तोड़ कर, पंखुड़ियों के पांवड़े बनाने के लिए।
गेंदे का महत्व हमारे लिए सांस-सांस में होता गया। गेंदे के फूल की काले वृंतवाली स्वर्णिम या लाल कत्थई पंखुडियां नोंचकर अलग करने पर सफेद गद्देदार उल्टी कटोरी निकलती थी। इसी पर ये पंखुड़ियां चुभी रहकर मज़बूती से खड़ी रहती थीं। यह गद्दीदार कटोरी इनका आधार-मंच होती हैं। इस गद्देदार कटोरी को हम खाया करते थे। मीठी लगती थी। उस मिठास के लिए कोई मिलान या साम्य नहीं है। खेलते, कूदते, गिरते या चलते-चलते पैर में, घुटने पर या अंगूठे में चोट लग जाती तो इसकी पत्तियों को मसलकर उसका रस चोट पर लगा लेते थे। जलन होती थी पर थोड़ी देर में शांत हो जाती थी। यह हमारा ‘हथेलिया-चिकित्सक’ था।(हथेली में पत्तियां मसलने से निकले रस से चिकित्सा करने के कारण)
इस सर्व-सुलभ ‘त्योहारी फूल’ और ‘हथेलिया चिकित्सक’ से बहुत बचपन में बिछोह हो गया। आठ या नौ साल का रहा हूंगा कि पढ़ने के लिए मुझे दूसरे स्टेशन जाना पड़ा। फिर वह घर, आंगन, गेंदा, गुलाब, बारहमासी गुलदाउदी, तिवरिया सब हमेशा के लिए पीछे छूट गये। फिर कभी नहीं मिले। अब तो केवल कंक्रीट के घर थे जिनमें न आंगन था न फुलवारी।
धीरे-धीरे मुझे गेंदे के बारे में बहुत सी बातें पता चलीं।
दो: गेंदे नहीं सोने के सिक्के
तभी से धार्मिक आयोजनों, सम्मान समारोहों, उत्सवों, पूजन-पर्वों में विश्व के लगभग सभी देशों में समान रूप से गेंदे के फूलों का ससम्मान उपयोग किया जाता है।
वास्तव में गेंदा सरलता से ऊगनेवाला बहु-उपयोगी पुष्पी-पादप है। तीज-त्योहारों में अधिकतम मांग के कारण इसे कतिपय स्थान पर ‘त्योहारी फूल’ भी कहते हैं। भारत के महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडू और मध्यप्रदेश (छ.ग. सहित) इस त्योहारी गेंदा को व्यावसायिक तरीके से उगााया जाता है। इसे गुजराती भाषा में ‘गलगोटा’ और मारवाड़ी भाषा में ‘हजारी गजरा फूल’ भी कहा जाता है।
मूलतः अफ्रीका का यह गेंदा-फूल मेक्सिको में ‘सेम्पासुचिल’ या ‘फ्लोर डे मुएर्टोस’ (मृतकों का फूल) के कहलाता है। मेक्सिको में होनेवाले वार्षिक ‘डिया डे लाॅस मुएर्टोस’ (मृतकों का दिन) नामक समारोह में इसकी सर्वाधिक मांग होती है। माना जाता है कि गेंदे के चमकीले नारंगी और पीले रंग मृतकों की आत्माओं को अधिक आकर्षित करते हैं और उन्हें जीवितों की दुनिया में वापस लाते हैं। गेंदे के फूलों का उपयोग भव्य वेदियों और रास्तों को सजाने के लिए किया जाता है, जो जीवन की क्षणभंगुरता तथा जीवित और मृत के बीच संबंधों का प्रतीक हैं।
प्राचीन यूनानी और रोमन संस्कृतियों में, गेंदे के फूलों का संबंध ‘एफ्रोडाइट’ और ‘हेरा’ सहित विभिन्न देवी-देवताओं से था। इनका उपयोग अक्सर धार्मिक अनुष्ठानों में भेंट-स्वरूप किया जाता था। ‘गेंदे के फूल’ को ‘कैलेंडुला’ भी कहते हैं जो लैटिन शब्द ‘कैलेंडे’ से लिया गया है, जिसका अर्थ ‘पहला दिन’ होता है। ऐसा माना जाता है कि इसका दिखना ‘जीवन का पहला शुभ दिन’ होता है, जो जीवन को ख़ुशियों से भर देता है।
ऐसे अद्भुत फूल का कोई कैसे मुरीद न बने? इसकी ख़ुशबू को मन की गहराइयों में कैसे न संजोकर रखे? मैंने कौन सा बचपना किया? गेंदे को प्यार ही तो किया है।
तीन. छत्तीसगढ़ का राजपुष्प गेंदा
1972 में मैं दक्षिण कोसल के राजनांदगांव में स्नातक की पढ़ाई के लिए आया। यहां मैंने सुना कि आकाशवाणी से गेंदा मुझे पुकार रहा है। मध्यप्रदेश का यह हिस्सा तब छत्तीसगढ़-अंचल था, राज्य नहीं। राजनांदगांव भी सांस्कृतिक और साहित्यिक नगर था, ज़िला नहीं था। मेरे वहां रहने के तीन महीने बाद जिल़ा बना। इस अंचल की बोली छत्तीसगढ़ी थी और है। यहां मैंने पहली बार आकाश-वाणी से जोशी बहनों को ‘करार गोंदा फूल’ गाते सुना। मध्यप्रदेश के इस दक्षिणी भाग में भी सभी प्रकार केे प्यारे-प्यारे फूल मौजूद थे, लेकिन गेंदा सर्वप्रिय युवराज बना हुआ था।
स्थायी- सास गारी दे थे, ननद मुंहा ले थे, देवर बाबू मोर।
सैयाँ गारी देथे, परोसी गम्मा लेथे करार गोंदा फूल।
-ए दे केरा बारी मं डेरा देबो चले के बेरा हो।
अंतरा 1. चिट्ठी के पैसा ला बीन लेत हों, मोरे साइकल के चलइ हा चीन्ह लेत हों। ग करार गोंदा फूल...
अंतरा 2. आए बैपारी गाड़ी मं चढ़ के। तोर आरती उतारूं बाड़ी मं चढ़ के। ग करार गोंदा फूल...
अंतरा 3. पहिर ल पनही खाए बीरा पान। मोर रयपुर के रहवैया चल देहे पाकिस्तान। ग करार गोंदा फूल...
इस गीत में मूल रूप से ‘करार’ शब्द है, जो सास, ननद, देवर और सैंया के साथ करार, अनुबंध या प्रतिबद्धता को दर्शाता है। चिट्ठी में पैसों का आना, साईकल में चलनेवाले प्रिय को पहचान लेना, बाहर से कार्य व्यापार करके गाड़ी में लौटे सजन का गाड़ी में चढ़कर आरती उतारना, और फिर पांव में पनही और पान का बीड़ा खाकर वापस रोज़गार में लौटनेवाले ‘रायपुर के निवासी’ को ‘पाकिस्तान चल देहे’ कहना, विरहिन के गहरे दुःख को अभिव्यक्त करता है। यहां ‘पाकिस्तान’ स्थान-बोधी नहीं है बल्कि दूरी का प्रतीक है। इसकी इसी मार्मिकता और लयात्मकता ने इसे जन-जन में स्वीकार्य बनाया।
गेंदे का जनजीवन के साथ जुड़ाव का अपना एक इतिहास है।
चित्रपट की दुनिया पर छठवे सातवें दशक में ही गेंदें का प्रभाव पड़ चुका था।
फुल-गेंदवा ना मारो, लगत करेजवा मा चोट
दहका हुआ ये अंगारा, फुल-गेंदवा जो कहलाए।
तन पर जहां गिरे जालिम वहीं दाग पड़ जाए।
अंग अंग मोरा पीर करे ओर कहे- फुल गेंदवा न मारो...
‘गोंदा फुलगे मोरे राजा, गोंदा फूल गे मोर बैरी,
छाती मं लागय बान, गोंदा फूल गे।’
इस फिल्म में बम्बई फिल्म उद्योग के गायक और अभिनेता शामिल थे ताकि यह फिल्म व्यवसाय भी कर सके। इसलिए इस गीत को लोक-कलाकरों ने नहीं बल्कि फिल्म उद्योंग के स्थापित गायक मोहम्मद रफी ने गाया था।
यह वह दौर था जब छत्तीसगढ़ में लोक संस्कृति के विकास के लिए हबीब तनवीर के न्यू थियेटर के साथ-साथ ‘सोनहा विहान’ और ‘चंदैनी गोंदा’ अपना योगदान दे रहे थे। ‘चंदैनी गोंदा’ मंडल में राजनांदगांव के शिक्षक और संगीतकार खुमान साव की लोक धुनों ने व्यापक प्रभाव छोड़ा। गीतकार शिक्षक लक्ष्मण मस्तुरिहा, शिक्षक रविशंकर शुक्ल, गीतकार मुकुन्द कौशल, हरि ठाकुर, रामेश्वर वैष्णव, आदि के साथ गायन एवं अभिनय में शिक्षक भैयालाल हिड़उ, अनुराग ठाकुर, ममता चंद्राकर, संतोष झांझी, कविता हिरकने आदि ने अदभुत गीतों के माध्यम से सीघे जन-जन के मर्म को छुआ।
‘चंदैनी गोंदा’ मंडल ने गेंदे के लघु-अवतार ‘चंदैनी गोंदा’ (गेंदे का सबसे छोटा महरून या कत्थई फूल) को आराध्य बनाकर पूरे भारत में इसकी महक फैला दी।
एखर रंग रूप ह जिव मा मिसरी साही घुलगे।।
सरसुती माई के मंय हां, गोड़ मां चघा दंव।
जेखर दया ले मोर कंठ हा, सूवा साहीं खुलगे।
(तुंहर दरस ला पाके हमर सबके भाग हा खुलगे। चंदइनी गोंदा फूलगे।)
इस सामान्य उल्लास-गीत और आस्था-गीत को सहज और प्रभावशाली ढंग से संगीत की चाशनी में पागने का कार्य राजनांदगांव के लोक-संगीत-गुरु और शिक्षक खुमान साव ने किया।
लागे झन काकरो नजर रे चंदैनी गोंदा,
-तोला लागे झन काकरो नजर।
लागे रे तोला, मोर चंदैनी गोंदा
चंदा सुरुज की उमर रे चंदैनी गोंदा।
मयरु के झुलना म झूलत रहिबे।
मोर चंदैनी गोंदा फूलत रहिबे।
महकत रहिबे देस की माटी म,
संग संग महर-महर रे चंदैनी गोंदा।
तोला लागे झन काकरो नजर।
इस पारंपरिक लोरी, आशीष गीत या सोहर-गीत में मां की ममता, आशीष और दुलार बहुत स्वाभाविक ढंग से अभिव्यक्त हुए हैं। ‘चंदैनी गेंदा’ के प्रति आत्मीयता, दुलार और जुड़ाव समवेत स्वर में आशीष दे रहे हैं कि चंदैनी गेंदा! तुझे किसी की बुरी नज़र न लगे, चांद और सूरज की कालजयी उम्र भी तुझे मिल जाये। तू हमारे प्रेम के झूले में निरन्तर झूलता रहे, ऐसे ही सदा फूलता रहे, और इस देश की मिट्टी के साथ-साथ यूंही महकता रहे। इस गीत का माधुर्य, करुणा और सहजता सीधे हृदय में उतर जाती है।
कहते हैं दिल से निकली दुआएं असर करती हैं। इस गेंदे की लोकप्रियता लगातार बढ़ती रही। नये नये लोकगीत और प्रणयगीत आते रहे।
‘चोरा म गोंदा रसिया मोर बारी म पताल रे,
पूछत अईबे, लाली गुलाली रंग छिचत अइबे रसिया, पूछत अइबे।’
इस गीत का ही प्रभाव था कि गेंदा फूल क्षेत्र की सीमाओं से आगे बढ़कर अपना प्रभाव और ख़़़्ाुशबू छोड़ते रहा है। जैसे छत्तीसगढ़ के बस्तर का यह हल्बी गीत ‘रिलो रिलो गोंदा फूल’ गेंदा फूल से सुनो सुनो गोंदा कहकर कितनी ही बातें करना चाहता है।
छत्तीसगढ़ की संस्कृति के साथ अपने देश की माटी से गोंदा फूल इतना रच बस गया है, इतना एकमेक हो गया हैं कि छत्तीसगढ़ी लड़कियां अपने जूड़े में गुलाब, मोंगरे नहीं, गोंदा फूल लगाती है। इसी देशज परम्परा को इस गीत में चित्रित किया गया है- ‘टूरी के वेणी म गोंदा फूल’
मोर जिनगी मा आके जिनगी!
तैं जिनगी सजाए ये मोरे गोंदा के फूल! (ओ मेरी ज़िन्दगी, मेरे गेंदा के फूल! तूने मेरी ज़िन्दगी में आकर मेरी ज़िन्दगी सजा (संवार) दी।)
2000 में जब मध्यप्रदेश से प्रथक् होकर छत्तीसगढ़ राज्य बना तो गेंदें के प्रति लोक के सार्वभौमिक लगाव के कारण इसे नवनिर्मित छत्तीसगढ़-शासन ने ‘राजपुष्प’ के रूप में मान्यता दे दी।
चार : गेंदा का वर्तमान
गेंदा-गीत का प्रसिद्ध होना कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, न ही कोई राजनैतिक आर्थिक, सांस्कृतिक, सांप्रदायिक, साहित्यिक तात्कालिक आंदोलन ही था। अगर ऐसा होता तो गेंदा फूल पर गीत सामयिक रूप से बनते, अपना लक्ष्य पूरा करते और लुप्त हो जाते। गेंदा के प्रति लोक-लगाव ऐसा गहरा था कि ‘गेंदा फूल’ छत्तीसगढ़ राज्य बनने के चालीस पचास साल पहले ही जन-नायक हो गया था और अब छब्बीस साल बाद भी गेंदे को ‘मोर मयारू’ कहकर होंठों से लगाया जा रहा है।
1964 के बाद एक बार फिर बाॅम्बे उर्फ़ मुम्बई के व्यावसायिक सिनेमा ने गेंदा को सर माथे पर बैठाया। इस बार गंगाराम शिवाय और भुलवाराम यादव के गाने ‘करार गेंदा फूल’ को मुम्बई ने उठाकर अपने ही ढंग से प्रस्तुत किया।
सास गारी देवे, देवर समझा लेवे, ससुराल गेंदा फूल।
सैयां छेड़ देवे, ननंद चुटकी लेवे, ससुराल गेंदा फूल।
छोड़ा बाबुल का अंगना, भावे डेरा पिया का हो...
सैयां है व्यपारी, चले हैं परदेस
सुरतियाँ निहारु, जियरा में लागे ठेस, ससुराल गेंदा फूल।
पहिने है बुशर्ट, और खाए बीडा पान,
पूरे रायपुर में अलग है, सैयां जी की शान, ससुराल गेंदा फूल।
यह सुखद है कि छत्तीसगढ़ की मूल ‘सुवास’ गेंदे में यथावत बसी हुई है। इस गीत में पुराने गीत की तरह रायपुर का नाम आते ही छत्तीसगढ़ थिरक उठता है। रायपुर तब केवल एक नगर था, कमिश्नरी था, और छत्तीसगढ़ केवल अंचल था। अब, 2009 में जब फिल्म बनी, छत्तीसगढ़ एक राज्य है और रायपुर उसकी राजधानी।
स्थायी स्त्री: बारी के तीर तीर फूले है गोंदा फूल। मोर मन ला मिलाके झन जाबे मोला भूल।
निर्मोही जोड़ी हो, मन ला मिला के झन जाबे मोला भूल।
स्थायी पुरुष: पानी रे पिये पीयत भर ले। तोला छोड़ूं नहीं जीयत भर ले।
मोर मैना मंजूर, छोड़ों नहीं आ जीयत भर.ले...
अंतरा-1.स्त्री: दगा झन देबे है तोला किरिया। मोला मन मं बसा के झन जाबे दूरिहा। निर्मोही जोड़ी हो...
अंतरा-2.पुरुष: मया के बरसा मं तेल गई री। चाहे होवे जमाना दोऊ के पैरी। मोर मैना मंजूर..
अंतरा-3.स्त्रीः गाए चराए हिआव कर ले। दोस्ती मं मजा नई हे बिहाव कर ले। निर्मोही जोड़ी हो ...
अंतरा-4.पुरुष: नरूआ के तिर तिर चरेल बरदी। ऐंसो फागुन मं संगी रचाबो हरदी। मोर मैना मंजूर...
इस गीत में कवि ने जन-सामान्य की अभिव्यक्तियों को और प्रिय संबोधनों को शामिल कर इसे जन-मन की थाती बना दिया है। ददरिया शैली के गीतों में पहले कोई अन्य वस्तुगत बात कहकर उसके तुक के साथ अपने मन की बात कही जाती है। जैसे नायिका का ‘बाड़ी के किनारे-किनारे गेंदा के खिलने’ की बात और फिर उसके तुक के साथ ‘मन मिलाकर भूल न जाने’ की बात कहना। नायक का ‘जी भर पानी पीने’ की वस्तुगत बात कहकर नायिका की शंका दूर करना कि ‘मैं जीते जी तुझे नहीं भूलूंगा’। इसी पंक्ति में नायक नायिका को ‘मोर मैंना मंजूर’ यानी मेरी मैंना मुझे मंजूर है कि तुझे जिन्दगी भर नहीं भूलूंगा।
यह जो मैंना शब्द है यह प्रायः छत्तीसगढ़ी कवि अपनी नायिका के लिए बड़े आत्मीय होकर कहते रहे हैं। लक्ष्मण मस्तुरिया जैसे अग्रगण्य लोक गीतकार ने भी इस मैंना शब्द का प्रयोग नायिका के लिए किया है। उनका एक लोक प्रिय गीत है -‘वाह री मोरी फड़की मैना’। पड़की या फड़की अर्थात चिड़िया। बोलती हुई चिड़िया मैना तो भारतीय कवियों की दुलारी रही है। ‘तोता मैना’ नामक प्याज की परतोंवाली लोक-कथाएं बहुत प्रसिद्ध हैं ही।
उल्लेखनीय है कि गीत में छग राज-पुष्प गेंदा और राज-पक्षी (पहाड़ी) मैना एक साथ आ गए हैं।
राजा तोर चेहरा, नजर म झुले मोहना रे, चिरैया गोंदा फूल।
मोर मन ..... मोर मन बगिया म फुले न, चिरैया गोंदा फूल 2
अपने प्रिय व्यक्ति, पुत्र, भाई, मित्र, पति को अत्यधिक लाड़ में ‘राजा’ संबोधित करना प्रियों की स्वाभाविक मनोवृत्ति है। इस गीत में नायिका नायक को संबोधन करते हुए कहती है कि राजा तेरा झूम झूम कर चलना तुझे ही शोभा देता है। यही कारण है कि तेरा चेहरा आंखों में झूलता रहता है। दुबारा स्थायी की ओर लौटते हुए वह ‘मोहना रे’ कहकर संबोधित करती है। यह मोहना शब्द नायिका के सम्मोहन को तो प्रदर्शित कर ही रहा है, श्रोताओं को भी मोह लेता है। खासकर जब ‘मोर मन’ को सरगम के अलाप में लहराते हुए, छोड़कर फिर गीत के स्थायी से जोड़ा जाता है। सरगम के इस सम्मिलन में अब वह अद्भुत शब्द आता है जो इस गीत यात्रा का पड़ाव है-‘मोर मन बगिया में फूले न ‘चिरैया गोंदा फूल।’
‘चिरैया गोंदा’ शब्द से मैं चैंका था। ‘चंदैनी गोंदा’ के बारे में डाॅ. हनुमंत नायडू अपने आलेख- ‘छत्तीसगढ़ी आंसुओं का विद्रोह-चंदैनी गोंदा’ में लिखते हैं -‘चंदैनी गोंदा यथार्थ में एक विशेष प्रकार के ‘नन्हे नन्हे गेंदे के फूलों’ का नाम है, जो छत्तीसगढ़ में बहुत पाए जाते हैं। ‘चंदैनी गोंदा’ ‘धरती की पूजा का फूल’ है।
‘चंदैनी गोंदा’ के बाद इस ‘चिरैया गोंदा’ ने इतना चकरा दिया कि मैंने अपनी पूर्व संस्था भिलाई इस्पात संयंत्र में कार्यरत इस गीत के कवि और संगीतकार दुष्यंत हरसुख से दूरभाष में चर्चा की और ‘चिरैया गोंदा’ के बारे में जानकारी लेने का जोखिम उठाया। उन्होंने बताया कि ‘चंदैनी गोंदा’ की तरह ‘चिरैया गोंदा’ गेंदे का कोई प्रकार नहीं है बल्कि ‘चिरैया’ अलग फूल है और ‘गोंदा’ अलग। चिरैया फूल को प्यार देने के लिए ‘चिरैया गोंदा’ कहा गया है।
अब जान लें कि चिरैया फूल होता क्या है? छत्तीसगढ़ में जिसे चिरैया कहते हैं, वह तिवरी, तिउरी, तिवरैया, तेरडा, तेर, तेरणा, गौर, गौरहू, गुलमेंहदी का फूल है। इसके गिल्ली जैसे फल को हाथ लगाते ही वह चटख जाता है। इस स्वभाव के कारण इसे ‘टच मी नाॅट’ (मुझे न छूना) भी कहते हैं। चिड़िया जैसा दिखनेवाला ये चिरैया फूल लाल, गुलाबी, सफेद, बैंगनी और हल्के जामुनी रंगों में खिलते हैं। आदिवासी, वनवासी और ग्रामीण महिलाएं इसकी पत्तियों और फूलों को पीसकर हाथों और नाखूनों पर मेहंदी की तरह रंगती हैं इसलिए इसका नाम ‘गुलमेंहदी’ हुआ। चिरैया के पत्तों के रस को गेंदें के पत्तों की तरह ही जलने, त्वचा की खुजली, और सूजन पर लगाने से राहत मिलती है।
‘चिरैया गेंदा’ (द्वंद्व-समास) के अतिरिक्त प्रिया को ‘झुलतरी गोंदा’ (कर्मधारय समास) भी कहा गया हैं। नायिका के झूलने या झूमने के कारण यह नाम दिया गया। ‘चंदैनी गोंदा’ के सुमधुर गीतकार तथा हिन्दी के प्रसिद्ध कवि मुकुंद कौशल का एक गीत ‘मोर झुलतरी गेंदा’, नायिका के इसी गुण की पुिष्ट करता है।
‘झुलतरी गेंदा’ शीर्षक के अंतर्गत एक अन्य गाने को ‘अलबेला रसिया’ एल्बम के लिए गिरवरदास माणिकपुरी, अमृत, आनंद और रवि के संयुक्त लेखन और उत्तम तिवारी के संगीत निर्देशन में कविता वासनिक और सुनील सोनी ने बहुत सुन्दर ढंग से गाया है। इस गीत में गेंदा/गोंदा के साथ तेमर, तिउरी पुष्प को भी सम्मिलित किया गया है।
स्थायी: बाग बगीचा दिखल हरियल, दुर्गवाला न दीखय बदऊं नरियल,
मोर झुलतरी, मोर फुलतरी गेंदा इंजनगाड़ी, तेमर फुलगे,
तेमर फुलगे अगासमान छिटक-घड़ी नरवा मं, नरवा मं गुर लेबे गा, नरवा मं गुर लेबे ना।
निस्संदेह गीत सुमधुर है। इसमें एक और विशेषता यह है कि इस गीत में एक आधार वाक्य का प्रयोग हुआ है ‘गाय चराए हियाव कर ले। दोस्ती मं मजा नइ हे, बिहाव कर ले।’ यह ध्येय वाक्य अन्य कवियों ने भी अपने ददरिया गीत में उपयोग किया है। शायद यही ददरिया की परम्परा होगी।
अम्बवा फूटे, टेसू फूले, कोयल बोले डार-डार।
और गोरी करत सिंगार-
-मलनियाँ गेंदवा ले लेकर करसों, सकल बन फूल रही सरसों...
000
डाॅ. रा. रामकुमार,
म.नं. 202, दूसरी मंज़िल, किंग्स केसल रेसिडेंसी, ऑरम सिटी, गोंदिया रोड, नवेगांव-बालाघाट।

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