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वनस्पतियों का सौदर्यशास्त्र

उर्फ रसिक पुष्पवृक्ष और रस-केन्द्र सुन्दरियां हमारे आंगन में फूले गुलाब और इठलाते डहलियों की कई प्रजातियां दूर से लोगों को आकर्षित करती रही हैं। पीले डहलिया भ्रमणार्थी रमणियों को विचलित कर देती और वे गुलाब के भ्रम में उन्हें देखने आ जाया करती। हमारे पड़ोस में एक नमकमिर्ची-पूर्णा थी। वह जुबान की काली थी। अगर वह आपके स्वास्थ्य की तारीफ कर दे तो आप बीमार पड़ जाएं। हमारे आंगन और बाड़ी में पत्नी अभिरुचि और प्रेम के कारण लहराते हुए गुलाब ,डहलिया ,सेवंती, गेंदे ,अनार ,अंगूर , चीकू , पालक , मैथी , बड़ी तुअर आदि की वह ‘मुंह में कुछ और दिल में कुछ’ के अंदाज में तारीफ करके उन्हें नज़र लगा चुकी है। उसकी तारीफ़ों से पत्नी को आजकल भय होने लगा है। हमेशा खिली रहनेवाली फुलवारी आजकल उदास हो गई है। एक दिन पड़ोसन आई और झूठी सहानुभूति जताते हुए बोली:‘‘ अरे तुम्हारे आंगन को क्या हो गया भाभी ?’’ तो भरी बैठी पत्नी ने दुखी स्वर में कहा-‘‘ पता नहीं किस डायन की नजर लग कई पुन्नो ! कुछ दिनों से पनप ही नहीं रही हैं।’’ पड़ोसन समझ गई कि पोल खुल चुकी है। अब पड़ोसन नहीं आती और पत्नी नये सिरे से बगिया की संभाल में लग गई है। ...

खाने की टेबल पर मां और बीवी का मसाला

एक वो भी मसालेदार विज्ञापन था कि आफिस से लौटा हुआ आदमी घर में घुसते ही हवा सूंघता था और बीवी से पूछता था,‘‘ मां आई है क्या ?’’ बीवी मुस्कुराकर मसालों को धन्यवाद देती थी। इसका मतलब कि अब मां खाने में नहीं महकेगी। उसका स्थान अब मसालों ने ले लिया है। इस तरह मसालों की नई खपत ने कम से कम किचन से मां के महत्व को खत्म कर दिया। मां का स्थान अब अमुक कम्पनी के मसाले ने ले लिया। पर उससे पत्नी का भी महत्व कम हो गया । पत्नी के स्थान पर कामवाली बाई या कोई भी बाई आराम से खाने को स्वादिष्ट बना सकती है। आप अगर बाई की कोई खास जरूरत किचन में नहीं समझते हों तो आप खुद भी उस खास कम्पनी के खास मसाले का उपयोग कर एक साथ मां ,बीवी और बाई की कमी को पूरा कर सकते हैं। (सीरियल वाले या फिल्म वाले इस समय मुझे थैंक्यू कह सकते हैं। मैंने उन्हें एक नया टाइटिल सुझाया है ‘मां ,बीवी और बाई। विज्ञापनवाले भी चाहें तो इसका लाभ उठा सकते हैं।) अभी-अभी एक नया विज्ञापन आया है। टेबिल सजी हुई है। मां भी है ,बीवी भी और खानेवाला वह कमाउ पूत भी जिसे खुश करने लिए खाना बना है। वही खाना बाकी लोगों के खाने के लिए बना है। खाने के टेबिल प...

पग: द ब्रांड एम्बेसेडर

बच्चे स्कूल ना जाने के बहाने ढूंढते हैं। स्कूल जाना ही पड़ा तो टीचर के एक्सीडेन्ट में मर जाने की कल्पना करते है।वास्तव में...शोक सभा के बाद घर जाकर सचिन तेन्दुलकर या शाहरुख बनने की भावना उनमें प्रबल होती है। हमने अपनी आने वाली पीढ़ी को खेल-खेल में कितना भविष्यगामी बना दिया है। इधर एक दूसरा ही बच्चा है जो आजकल लाइट में है। यह बच्चा अपनी मां की उम्र की मिस रोजी के ना आने से चिन्तित है। वह उसमें अपनी मां देखता होगा। पता चलता है कि मिस रोजी आज बहुत उदास है क्योंकि उसका कुत्ता मर गया है। वह आज स्कूल नहीं आएगी। यानी छुट्टी। अब कायदे से बच्चे को घर जाकर सचिन या शाहरुख बनने की कोशिश करनी चाहिए थी। मगर यह उल्टी ही खोपड़ी का बच्चा है जो अपनी प्यारी टीचर मिस रोजी को खुश करना चाहता है। यह प्रेरणा उसे राजू नाम से लोकप्रिय जोकर राजकपूर से नहीे मिली है जो अपने बचपन में ऐसी ही किसी रोजी को प्यार कर बैठता है और उसे सेन्सर नाम की मजेदार संस्था के सौजन्य से नहाते हुए देखता है। उस राजू की बजाय यह बच्चा शाहरुख से प्रभावित है जो एक अद्वितीय फिल्म में अंकल की उम्र का होने के बावजूद पता नहीं किस यूनिवर्सिटी के ...

जीवन की उलटबांसियां

सुबह चाय के साथ चुहल का दौर भी चल रहा था। चाय में मिठास थी और मैं छेड़छाड़ का नमक उसमें डाल रहा था। खिड़की पर तभी एक बिल्ली आकर बोली ,‘मैं आउं ?’ ‘ये कहां से आ गई।’ पत्नी ने कहा। ‘बहन से मिलने आई होगी।’ -मैंने कहा। ‘मम्मी आप को बिल्ली कह रहे हैं।’ -पुत्री ने मां को उकसाया। ‘कहावत है न -हमारी बिल्ली हमीं को म्यांउं’ -पत्नी मुस्कुराई। ‘कहावत गलत है। होना था, ‘हमारी बिल्ली हमीं को खाउं’ -मैंने काली मिर्च भी डाल दी पत्नी आंख निकालकर बोली-‘अब गुर्राउं ?’ ‘हमसे क्या पूछती हो , हम तो चूहे हैं’ -यह देखने में था तो समर्पण ,मगर बम था। पुत्री ने मां की वकालत की-‘ पापा अभी गणेशेत्सव गया है। हमने देखा कि एक चूहा भी हाथी को ढो सकता है।’ यह मेरे लिए हाइड्रोजन बम था। मैं चैंककर ,आश्चर्य से पुत्री को देखने लगा। वह हंसते हुए बोली ‘क्या हुआ पापा ,ठीक तो कह रही हूं।’ पत्नी मेरी कैफियत समझ गई। बोली-‘चल हमारा काम खत्म। इनको चारा मिल गया। नास्ता पकाने लगे हैं।’ मैं सचमुच नशे की हालत में डाइनिंग से रीडिंगरूम तक आया। बात निकली है तो अब दूर तक जाएगी और मैं सोच के धागों में बंधा हुआ चुपचाप घिसटता रहूंगा। ...

फूल हरसिंगार के

फूल हरसिंगार के राचौ ऋषिकेश और हरिद्वार से लौट आए हैं। वहां की हवा तो शायद नहीं न ला पाए मगर वहां के फूलों और वनस्पतियों के बीज जरूर ले आए हैं। जी हां, हरिद्वार और ऋषिकेश का अर्थ अब केवल धार्मिक कर्मकाण्ड और साधना नहीं रह गया है। पर्यटन तो था वह पहले से; अभी कुछ वर्ष पहले राजनैतिक समीकरण और बंटवारे का भी वह प्रतीक बन गया है। योग के शारीरिक-संस्थान और आयुर्वेद के विश्व-बाजारवाद की हवा भी इन पर्वतीय नगरों को लग गई है। शुक्र है मेरे मित्र राजनीति और योग का बाजारवाद लेकर नहीं आए। वे कश्मीरी तुलसी, दार्जिलिंग की मिर्ची और हिमाचल के फूूलों के बीज लेकर आए हैं। पहले उन्हें गमलों में अंकुरित किया और एक के बाद एक उन्हें मेरे बागीचे में रोपते गए। पहले उन्होंने कश्मीरी तुलसी लगाई और कई बार आकर उसकी पत्तियों की इल्लियां निकालते और गमले की मिट्टी संवारते रहे। मेरे उपवन में उन्हें इतनी रुचि क्यों? दो कारण हैं.. एक वे और दूसरे हम। हम अपने बगीचे को चाहनेवालों की चाहतों से दूर नहीं करते। चाहे फूल हों, चाहे सब्जियां हों या चाहे अमरूद और आम के फल हों। जो मांग सकते हैं, वे मांग ले जाते हैं। ज्यादा हो तो ...

कलाकार के हाथ

ब्रह्मा नाम है कलाकार का। कलाकार लकड़ी का काम करता है। फर्नीचर-रैक-अल्मीरा.....और दूसरे भी लकड़ी के इन्टीरियल-डेकोरेटिव काम करता है। प्लाईवुड का काम ज्यादा है इन दिनों। वह आसानी से मिलता है और यह काष्ठकर्मी उनसे मनचाहा व्यवहार कर सकता है। मनचाहे रूप दे सकता है। सागौन अब भी उपयोग में आता है, मगर वह नम्बर दो में है; क्योंकि उसका काम नम्बर दो में होता है। सागौन माफिया आपकी चाही हुई मात्रा में रात में चोरी की लकड़ी आपके घरों में बाकायदा चोरी की मर्यादाओं और आचार संहिताओं को पालता हुआ पटक जाएगा। ताकि चोरी का भ्रम बना रहे। दूसरे- तीसरे दिन वनरक्षक या वन विभाग का कोई कर्मी आपसे पूछेगा कि इस तरफ लगभग इतना माल आया है। क्या आप बता सकते हैं किसके यहां आया है ? दरअसल वनकर्मी को पता रहता है कि कितना माल कब और कहां जाना चाहता है। चोर उनसे पूछकर ही चोरी छिपे का लिहाज रखते हुए काम करते हंै। आपने सुना होगा कि एक चड्डी गिरोह है। वह चोरी के लिए , डाका के लिए घरों में घुसता है। घरस्वामी हुज्जत किए बिना माल दे देना चाहता भी है तो वे धुनाई करते हैं। बाद में माफी मांगते हुए माल लेकर जाते-जाते कहते हैं-‘‘ माफ क...

प्रेम के माइम और दुख की मिमिक्री

दो धाराएं हैं जिनमें समाज बह रहा है। एक प्रेम है और दूसरा दुख। दुख होता है तो दिखाई देता है। प्रेम भी छुपता नहीं। दुख दिखाई देता है तो पर्याप्त समय-प्राप्त लोगों को सहानुभूति होती है । करुणा और सान्त्वना आदि प्रदर्शित करने के प्रयासों की घटनाएं भी हो सकती हैं। दुख बहुत गंभीर हुआ तो भीड़ करुणा में इकट्ठी हो सकती है। प्रेम दिखाई देता है तो चर्चा होती है। घृणात्मक आक्रोश होता है। हंगामा भी हो सकता है। लोगों की भीड़ इकट्ठी हो सकती है। तमाशा देखने या आलोचना के पत्थर फेंकने। मजे लेने या थू थू करने....थू थू यानी अपने अंदर की गंदगी को बाहर उलीचने। दोनों स्थितियों में भीड़ इकट्ठी हो रही है। भीड़वादी लोग इसका लाभ उठाने का वर्षोें से प्रयास करते रहे हैं। दुख के कारण और प्रेम के कारण गौण हो सकते हैं किन्तु भीड़ का लक्ष्य ऐसे लोगों के लिए गौण नही होता। यहां से प्रेम और दुख की अभिनय-यात्रा शुरू होती है। प्रेम और दुख के अभिनय देखकर लोग प्रभावित होते हैं और उसका जन-संचार करते हैं। दुबारा उसे देखने की कोशिश भी करते हैं। प्रेम और दुख के व्यावसायिक संगठन और संस्थान विभिन्न नामों से कार्यरत हैं। राजनैतिक,...