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पग: द ब्रांड एम्बेसेडर




बच्चे स्कूल ना जाने के बहाने ढूंढते हैं। स्कूल जाना ही पड़ा तो टीचर के एक्सीडेन्ट में मर जाने की कल्पना करते है।वास्तव में...शोक सभा के बाद घर जाकर सचिन तेन्दुलकर या शाहरुख बनने की भावना उनमें प्रबल होती है। हमने अपनी आने वाली पीढ़ी को खेल-खेल में कितना भविष्यगामी बना दिया है।
इधर एक दूसरा ही बच्चा है जो आजकल लाइट में है। यह बच्चा अपनी मां की उम्र की मिस रोजी के ना आने से चिन्तित है। वह उसमें अपनी मां देखता होगा। पता चलता है कि मिस रोजी आज बहुत उदास है क्योंकि उसका कुत्ता मर गया है। वह आज स्कूल नहीं आएगी। यानी छुट्टी। अब कायदे से बच्चे को घर जाकर सचिन या शाहरुख बनने की कोशिश करनी चाहिए थी। मगर यह उल्टी ही खोपड़ी का बच्चा है जो अपनी प्यारी टीचर मिस रोजी को खुश करना चाहता है। यह प्रेरणा उसे राजू नाम से लोकप्रिय जोकर राजकपूर से नहीे मिली है जो अपने बचपन में ऐसी ही किसी रोजी को प्यार कर बैठता है और उसे सेन्सर नाम की मजेदार संस्था के सौजन्य से नहाते हुए देखता है। उस राजू की बजाय यह बच्चा शाहरुख से प्रभावित है जो एक अद्वितीय फिल्म में अंकल की उम्र का होने के बावजूद पता नहीं किस यूनिवर्सिटी के नियम के तहत अपने से बहुत छोटी उम्र के बच्चों की क्लास में भर्ती हो जाता है और एक आवश्यक आयु और सौन्दर्य वर्ग की टीचर से अनिवार्य रूपसे प्यार करने लगता है।
यह बच्चा बहुत छोटा है और टीचर आंखों को अच्छा लगने की तमाम आवश्यताओं से परिपूर्ण है। बच्चा अपनी किताबें फाड़कर उसकी गेंद बनाकर टीचर की गोद में डाल देता है। टीचर उसे फेंकती है तो वह कुत्ते की तरह दौड़कर उठाता है ...बिल्कुल कुत्ते की तरह एक पैर उपर करके .. और मुंह में दबाकर मिस के पास लौट आता है। पानी पड़ा हुआ है। कीचड़ मचा हुआ है। टीचर अपनी खूबसूरत उदासी और उतनी ही खूबसूरत शाल ओढ़कर बैठी है। बच्चे के कपड़े सफेद झक....और वह उन कपड़ों की परवाह किये बगैर ,कीचड़ में लिथड़ता हुआ मिस को खुश करने के लिए कुत्ते की भूमिका में परफेक्शन ला रहा है। बच्चे की कोशिश कामयाब होती है। टीचर उस कीचड़ में लिपटे हुए बच्चे के अंदर की उजली भावना को देख लेती है। काश यह काम हमारी सरकारें कर लेतीं तो...खैर जो नहीं हुआ उसका क्या जिक्र ? एक साफ-सुथरे बच्चे ने कीचड़ में लिथड़कर मरे हुए कुत्ते का स्थान ले लिया है। यह कीचड़ धोनेवाली साबुन या डिटजेन्ट का विज्ञापन है।
मगर जो कुत्ता हमारा लक्ष्य है वह मरा नहीं है। वह इस बच्चे से ज्यादा पारिश्रमिक पाता है और एक कम्पनी का ब्रांड एम्बेसेडर है। वह कुत्ता पग है। हथेली में आ जाए इतना छोटा। वह कुत्ता एक विज्ञापन में स्कूल जाती बच्ची के मौजे ढूंढकर लाता है। यह कुत्ता समय पर न सोने वाले बच्चे की मदद पुंगी बजाकर आनेवाले खतरे और फिर चले जानेवाले खतरे की सूचना देता है। यह एम्बेसेडर कुता ण्क बच्ची के साथ बागवानी कर रहा है। फूलों के पौधे रौप रहा है। वह गड्ढे कर राह है ओर बच्ची उन गड्ढों में पौधे रौप रही हैं। इस विज्ञापनी और एक खास कम्पनी के लिए एक खास ब्रांड के लिए पता नही कितने लाख की एम्बेसेडरी करने वाले इस पग जाति के कुत्ते से बच्चों को प्यार हो गया है। एक छोटी बच्ची उसे ला देने की जिद करने लगी है। उसके मध्यमवर्गी पिता ने कहीं से उसकी कीमत पता की है। वह सबसे महंगा कुत्ता है। एक सप्ताह के नवजात पिल्ले की कीमत करीब पचास से पचहत्तर हजार रुपये है। मध्यमवर्गीय पिता ने शायद इतनी बड़ी रकम एक साथ कभी नहीं देखी। अब वह बच्ची को क्या जवाब दे ? कि यह कुत्ता चाइना मेड है ? कि ऐसे कुत्ते होते ही नहीं ? कि हम गरीब हैं और ऐसे कुत्ते अफोर्ड नहीं कर सकते ? कि हम विज्ञापन में दिखनेवाले इस कुत्ते से गए बीते हैं ?
अरे कांच के पर्दे ! कुछ तो बता ! इतने बड़े-बड़े झूठों में एक तो सच बता जो विज्ञापनों के कीचड़ में कंवल खिला सके। एक पिता अपनी रोती हुई बच्ची को चुप करा सके। जिन्दगी ने हमारे रास्तों में जो गड्ढे खोदे है उनमें एक पौधा ता किसी फूल का लगा सके। वक्त ने हमारी जो जुराबें छुपा दी है उन्हें खोजा जा सके। ऐसा हो सके कि जब मुसीबतें आएं तो यह पग हमारे लिए चेतावनी की पुंगी बजा सके ओर हम सुरक्षित हो जाएं। आखिर कब तक अर्थशास्त्र हमारे साथ ऐसे ही गदागदैय्यल खेलता रहेगा ? हास्यास्प्रदी 101109

Comments

बहुत भावुक कर गयी दर्द से सराबोर आपकी ये कृति उस दिन का इंतजार हमें भी है
kumar zahid said…
इतने बड़े-बड़े झूठों में एक तो सच बता जो विज्ञापनों के कीचड़ में कंवल खिला सके। एक पिता अपनी रोती हुई बच्ची को चुप करा सके। जिन्दगी ने हमारे रास्तों में जो गड्ढे खोदे है उनमें एक पौधा ता किसी फूल का लगा सके। वक्त ने हमारी जो जुराबें छुपा दी है उन्हें खोजा जा सके। ऐसा हो सके कि जब मुसीबतें आएं तो यह पग हमारे लिए चेतावनी की पुंगी बजा सके ओर हम सुरक्षित हो जाएं। आखिर कब तक अर्थशास्त्र हमारे साथ ऐसे ही गदागदैय्यल खेलता रहेगा ?

बेहद सच्ची बात चाहे तल्ख ही सही । बहुत सुच्चे सवाल। हकीकत का ऐसा जिन्दा चित्र ! कमाल का अंदाजेबयां...का़बिलेतारीफ़

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