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देखते रहो...

 देखते रहो...


किस ओर चल रही है हवा देखते रहो।
किस वक़्त पे क्या क्या है हुआ देखते रहो। 

पाज़ेब पहन नाचती हैं सर पे बिजलियां,
आंखों के आगे काला धुंआ देखते रहो।

तक़रीर कर रहे हैं शिकारी नक़ाब में- 
'ज़ुल्मों से बचाएगा ख़ुदा देखते रहो।' 

अनुभव से अपनी राह चुनो जां पे खेलकर,
भटकाए किताबों का लिखा देखते रहो।

चारों तरफ़ है घोर घमासान मारकाट,
काटेगी सियासत ही गला देखते रहो।
 
@ कुमार, ०१.१२.२०२५, सोमवार, १०.१५.

Comments

Dr.R.Ramkumar said…
धन्यवाद
Dr.R.Ramkumar said…
जी धन्यवाद
Admin said…
आप हर शेर में चेतावनी देते हैं और आंख खोलने को कहते हैं। हवा, बिजली, धुआं और नक़ाब सब प्रतीक बहुत सटीक बैठते हैं। शिकारी वाली पंक्ति राजनीति और धर्म दोनों पर करारा वार करती है। आप अनुभव को किताबों से ऊपर रखते हैं, यह बात दिल को छूती है।