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घूम रहे हैं लिए सुपारी,
गर्मी खाकर दिन!
- फिर गरमाए दिन!
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खुली खिड़कियां बंद हो रहीं
कैद हुईं बतकहियां!
सूखी आँगन की फुलवारी
मंद हुयीं चहचहियां!
आस पड़ोस विदेश लग रहे
अलसाये पलछिन!
- फिर गरमाए दिन!
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अलगावों के, भेदभाव के,
खुलकर खुले अखाड़े!
सब दबंग परकोटों में हैं
सब दब्बू पिछवाड़े!
हवा हुई अपहृत या खा गई
उसे धूप बाघिन!
- फिर गरमाए दिन!
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लपट झपटकर सिंहासन पर,
लू लपटें आ बैठीं!
कुचल कुचलकर हंसी खुशी को,
फिरतीं ऐंठी ऐंठी!
जैसे सुख खा बैठे उनके
परदादा का रिन!
- फिर गरमाए दिन!
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आतंकी से लगते हैं सब
छुरी कटारीवाले!
सुबह शाम रात दिन भी हैं
पहुने भारीवाले!
जैसे तैसे काट रहे हैं
युग साँसों के बिन!
- फिर गरमाए दिन!
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आओ सब खटास घोलें अब,
पना बने खटमिट्ठा!
रस के धारावाहिक खोलें,
सुखद समय का चिट्ठा!
राग-रंग में क्यों घोले विष,
कलुष बुद्धि नागिन!
- ठंडक पाएं दिन!
@ कुमार,
27.3.17,11.43 am
सोमवार,
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उर्फ
मरना तो है ही एक दिन
इन दिनों चिकित्सा से बड़ा मुनाफे़ का उद्योग कोई दूसरा भी हो सकता है, इस समय मैं याद नहीं कर पा रहा हूं। नहीं जानता यह कहना ठीक नहीं। शिक्षा भी आज बहुत बड़ा व्यवसाय है। बिजली, जमीन, शराब, बिग-बाजार आदि भी बड़े व्यवसाय के रूप में स्थापित हैं।
शिक्षा और स्वास्थ्य आदमी की सबसे बड़ी कमजोरियां हैं, इसलिए इनका दोहन भी उतना ही ताकतवर है। हमें जिन्दगी में यह सीखने मिलता है कि बलशाली को दबाने में हम शक्ति या बल का प्रयोग करना निरर्थक समझते हैं, इसलिए नहीं लगाते। दुर्बल को सताने में मज़ा आता है और आत्मबल प्राप्त होता है, इसलिए आत्मतुष्टि के लिए हम पूरी ताकत लगाकर पूरा आनंद प्राप्त करते हैं।
मां बाप बच्चों के भविष्य के लिए सबसे मंहगे शैक्षणिक व्यावसायिक केन्द्र में जाते हैं। इसी प्रकार बीमार व्यक्ति को लेकर शुभचिन्तक महंगे चिकित्सालय में जाते हैं ताकि जीवन के मामले में कोई रिस्क न रहे। इसके लिए वे कोई भी कीमत चुकाना चाहते हैं और उनकी इसी कमजोरी को विनम्रता पूर्वक स्वीकार करके चिकित्सा व्यवसायी बड़ी से बड़ी कीमत लेकर उनके लिए चिकित्सा को संतोषजनक बना देते हैं।
माडर्न ...
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