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फूल हरसिंगार के

फूल हरसिंगार के


राचौ ऋषिकेश और हरिद्वार से लौट आए हैं। वहां की हवा तो शायद नहीं न ला पाए मगर वहां के फूलों और वनस्पतियों के बीज जरूर ले आए हैं। जी हां, हरिद्वार और ऋषिकेश का अर्थ अब केवल धार्मिक कर्मकाण्ड और साधना नहीं रह गया है। पर्यटन तो था वह पहले से; अभी कुछ वर्ष पहले राजनैतिक समीकरण और बंटवारे का भी वह प्रतीक बन गया है। योग के शारीरिक-संस्थान और आयुर्वेद के विश्व-बाजारवाद की हवा भी इन पर्वतीय नगरों को लग गई है। शुक्र है मेरे मित्र राजनीति और योग का बाजारवाद लेकर नहीं आए। वे कश्मीरी तुलसी, दार्जिलिंग की मिर्ची और हिमाचल के फूूलों के बीज लेकर आए हैं। पहले उन्हें गमलों में अंकुरित किया और एक के बाद एक उन्हें मेरे बागीचे में रोपते गए। पहले उन्होंने कश्मीरी तुलसी लगाई और कई बार आकर उसकी पत्तियों की इल्लियां निकालते और गमले की मिट्टी संवारते रहे।
मेरे उपवन में उन्हें इतनी रुचि क्यों? दो कारण हैं.. एक वे और दूसरे हम। हम अपने बगीचे को चाहनेवालों की चाहतों से दूर नहीं करते। चाहे फूल हों, चाहे सब्जियां हों या चाहे अमरूद और आम के फल हों। जो मांग सकते हैं, वे मांग ले जाते हैं। ज्यादा हो तो हमीं बांट आते हैं। इससे मेल-मिलाप की सुगंध और स्वाद मिलते रहते हैं। पड़ोस है मेरे आसपास, कोई हिन्दुस्तान या पाकिस्तान का राजनैतिक विवाद नहीं है। हां, कुछ संकोची और प्रातः-भ्रमणार्थी भी होते हैं जो घुसपैठियों की तरह जासौन और चमेली के फूलों को चुरा ले जाते हैं। डालियां नहीं टूटती तो हमें भी दुख नहीं होता।
दूसरा कारण वे हैं। वे अपने पिता की जमीन पर भाइयों द्वारा बनाए मकान में सबसे ऊपर उपलब्ध कमरे में रहते हैं। चाहकर भी वे उपवन नहीं लगा सकते। हमारे उदार-उपवन में वे अपनी इच्छाओं का प्रत्यारोपण करते रहते हैं। हमें भी अच्छा लगता है।
इस बार आए तो बोले -‘‘पारिजात का पौधा लाया हूं। आपके बगीचे की सुन्दरता बढ़ाएगा। गेट के बगल यह ठीक रहेगा।’’
कौन सी चीज कहां लगेगी इसका फैसला पत्नी करती है। उसने राचौ को ‘‘जैसा तुम उचित समझो भैया!’’ कहा तो राचौ ने खुद ही लोहे की छड़ उठाई और पौधा रोप दिया। फिर चाय का दौर चलना ही था। चर्चा चली कि पारिजात क्या होता है और कैसा होता है? मैंने पढ़ा तो है कि पारिजात का कोई फूल होता है, मगर देखा नहीं है।  राचौ ने बताया कि सफेद रंग के सुगंधित फूल होते हैं। कोई दस फुट का झाड़ ही होता है।(बाद में मेरे ही बाग में 20 फीट का झाड़ हुआ।) पारिजात के फूल रात में खिलते हैं और दिन में झड़ जाते हैं।
मेरी स्मृति में तत्काल एक गीत क्लिक हुआ और बजने लगा -‘‘सांझ खिले, भोर झरे, फूल हरसिंगार के; -रात महकती रहे।’’
‘‘क्या यह हरसिंगार है ?’’ मैंने गीत पाॅज करते हुए पूछा। राचौ नहीं जानता था। मुझे याद आया कि पडोसी ने कुछ माह पहले हरसिंगार का जिक्र किया था। उनकी पत्नी को कई सालों से साइटिका है और उसके इलाज के लिए हरसिंगार की पत्तियों का काढ़ा वे बनाना चाहते थे। तब गर्मी के कारण पत्तियां झर चुकी थीं। वे शरद ऋतु का इंतजार कर रहे थे। तब भी यह गीत मेरे दिमाग में गूंजा था। खैर उस वक्त बात अज्ञान के पाले में चली गई।
राचौ के जाते ही पत्नी बोली,‘‘ पता है, हरसिंगार घर के सामने नहीं लगाते !’’ मैं उत्सुकता से रोमांचित हो गया। पत्नी जानती है कि यह हरसिंगार ही है, जिसका दूसरा नाम पारिजात है। ‘‘यानी पारिजात ही हरसिंगार है।’’ मैंने पूछा।
‘‘पता नहीं, मगर लक्षण अगर यही हैं कि रात में खिले और सुबह झर जाए तो यह हरसिंगार है और इसका घर के सामने रौपा जाना कोई अच्छा सगुन नहीं है। नानाजी कहते थे कि सुबह इसके झरे हुए फूल देख लो तो दिन मनहूस हो जाता है।’’
‘‘हंह....मैं इन बातों को नहीं मानता।’’ मैंने बात को टाल दिया। मेरी जिज्ञासा सिर्फ यह थी कि बचपन से गीत की शक्ल में गूंज रहे गीत का अनुसंधान कर सकूं। आलसी हूं या अज्ञानी या दोनों, मुझे कुछ पता नहीं। आखिर अपने संसाधनों से मैंने शीघ्र ही अपनी तड़पती हुई जिज्ञासा को सारे उत्तर उपलब्ध करा दिए।
पारिजात ही हरसिंगार है। बंगाल की शैफाली और तमिल की पाविजामल्ली। मैं फिर सारे सूत्र लेकर गुनगुनाने लगा- ‘‘सांझ खिले, भोर झरे, फूल हरसिंगार के, रात महकती रहे।’’ पूरे दिन यह गीत मेरे गले में खदबदाता रहा और पत्नी पकती रही।

शाम को एक हादसा हो गया। मैं जब घूमकर लौटा तो देखा कि पारिजात का पौधा गेट के बाजू में नहीं है। मैंने पत्नी से पूछा। उसने बताया कि उसे अच्छा नहीं लग रहा था इसलिए उसने पौधा उखाड़कर बगीचे के पिछवाड़े लगा दिया है। अब उसे अच्छा लग रहा है।
‘‘ओह..’’ मैं संतुष्ट हुआ कि बगीचे में कहीं भी हो, मेरा अज्ञात बालमित्र सुरक्षित तो है। मगर क्या सचमुच उसका भविष्य सुरक्षित है? जिसका इतिहास चोट और बर्बादी से भरा हुआ है, उसका वर्तमान कितना सुरक्षित रह सकता है? हरसिंगार के साथ यह जो मनहूसित का लांछन लगा हुआ है क्या वह सही है? क्या पत्नी को अच्छा नहीं लग रहा था तो उसकी वजह उसकी घर के सामने मौजूदगी थी?
मैं अब गंभीर हो गया था। घर के सामने था हरसिंगार तो पत्नी उदास थी और अब वह पीछे हो गया है तो मैं गंभीर हूं। यह द्वंद्वात्मक-मानसिकता विचारों के कारण थी। मुझे उत्तर मिल गया। हम अपनी सोच को जीवन का हिस्सा बना लेते हैं। मैं जो गीत गुनगुना रहा था उसमें सुबह खिलने की बजाय झरने की बात थी। पर उस गीत में संगीतकार रघुनाथ सेठ का माधुर्य और संयोजन कोई नहीं देख रहा था। क्या बात थी कि संगीतकार हेमंतकुमार मुखोपाध्याय अपनी बेटी रानू मुखर्जी के साथ उस गीत को गाने के लिए विवश हुए? क्या कारण है कि कवि  पं. नरेेन्द्र शर्मा ने अपने गीत के लिए हरसिंगार के खिलने और झरने की अस्वाभाविकता को चुुना? मैं इस गीत को इसलिए नहीं गुनगुनाता था कि मैं उदास होना चाहता था। इसका संगीत संयोजन और खिलने झरने की विपरीतता मुझे आनंद देती थी। उदास गीतों का सौन्दर्य मुझे अक्सर रोमांचित और आनंदित करता है। यह टिपिकल है क्या? मैं उदास गीतों को गुनगुनाकर आनंदित होता हूं कि कितना सहजोच्छवास और अभिव्यक्ति का कितना उदात्त संमिश्रण कवि ने किया है। उदासी मुझे नहीें घेरती, तो क्या मैं संवेदना से शून्य हूं? मेरी मान्यता है कि उदासी के गीतों से भी रस और आनंद की सृष्टि हो सकती है। विरेचन हो सकता है। उदास गीत सुनकर उदास होना ही ईमानदारी नहीं है। गीत के साहित्यिक सौन्दर्य में डूबना भी ईमानदारी है। अगर ऐसा नहीं होता तो कबीर की उलटबासियां अद्भुत नहीं होतीं। अगर ऐसा नहीं होता तो नर्मदा परम्परा के विपरीत पूरब से पश्चिम बहकर पूजनीय नहीं होती।
फिर हरसिंगार, पारिजात या शैफाली का इतना अनादर क्यों?

शैफाली से याद आता है कि मेरे मोहल्ले में एक बंगाली लड़की थी शैफाली। ठिगने कद की उस सुन्दर सी लड़की का काॅलेज में मैं सीनियर था। मोहल्ले का होने से वह मुझे भाई मानती थी। वह अपने को सुरक्षित और विश्वस्त समझती थी कि मैं था। पर सुना कि विवाह के बाद वह जलकर मर गई। वह एक हादसा होगा। क्या नाम उसका शैफाली था, इसलिए वह जल गई?
शैफाली , पारिजात या हरसिंगार को लेकर एक दुखांत कहानी भी रची गई है। एक सुन्दर सी लड़की थी पारिजातिका जो सर्वसाक्षी सूर्य के असाक्ष्य प्रेम में पड़ गई। जो सबकी दृष्टि का कारण बनता है, वही सूर्य उसके प्रेम को नहीं देख पाया। परिस्थितियां ऐसी बनी कि प्रेम की तीव्रता और प्रिय की निरन्तर उपेक्षा के कारण पारिजातिका को आत्मोत्सर्ग करना पड़ा। शैफाली सर्वसाक्षी के जीवन से चली गई। कवियों को इसीलिए लगा कि पारिजात रात में खिलता है और सूर्य के उगने के पहले ही झर जाता है। यह कहानी कथाखोरों ने बनाई है।

हालांकि कहानी यह भी बनाई जा सकती थी कि पारिजातिका चंद्रमा के प्रेम में थी और अब भी है। भारतीय स्ववाग्दत्ताओं की तरह वह केवल चंद्रमा की प्रतीक्षा करती है, इसलिए रात में खिलती है और सूर्य जैसे पराए पुरुष की नजर न पड़े, इसलिए सूर्योदय के पहले ही झर जाती है। मगर तब यह केवल प्रेम-कहानी होती। दुखांत बनाने के लिए पारिजातिका का उत्सर्ग जरूरी समझा गया। दुखांत का प्रभाव सुखांत से ज्यादा और दीर्घ कालिक होता है।
ऐसे कवियों, कथाखोरों और कथागूंथकों से मैं क्या शिकायत करूं? शिकायत मुझे अपने प्रिय और सम्माननीय साहित्यकार पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी से है। उन्होंने पुनर्नवा में भट्टनी की दाह देखी। अशोक के फूल की तरफ गौर से देखा। कुटज जैसे जीवंत वन-पादप भी उनकी नजर से नहीं बच सके। ‘हिन्दी साहित्य की भूमिका’ लिखते हुए कविप्रसिद्धियों के बहाने वे चम्पा और मालती का जिक्र शीर्षक बनाकर करते रहे। मन्दार और मौलश्री की पड़ताल करते रहे। मगर बंगाल के संस्कारों से सने और गुरुदेव के सानिध्य में पके इस संस्कृतनिष्ठ गद्य-कवि ने जब शैफाालिका का जिक्र किया तो बड़ी उपेक्षा के साथ। ज्यादा जांच-पड़ताल, खोजखबर तो दूर; एक अदना उपशीर्षक भी इस ‘वैद्यनाथ’ ने उसे नहीं दिया! चलताऊ पैराग्राफ में उसे निपटा दिया! क्या सचमुच पंडितजी नहीं जानते थे कि पारिजात या शैफाालिका एक ‘देवपुष्प’ है ? क्या सचमुच उन्हें नहीं पता था कि यही एकमात्र ऐसा पुष्प है जो पृथ्वी पर गिरकर भी देवताओं के सिर पर चढ़ने के योग्य होता है? इसी कारण इसका नाम पड़ा ‘दि फ्लावर ऑफ गाॅड’।
अंधेर है हरसिंगार। एक बात और! हरसिंगार कहने से ‘हर’ शब्द पहले आ रहा है। हर अर्थात् भूतनाथ शंकर। हरसिंगार कहने से तो तुम शंकर के सिंगार हो जाते हो। कहीं इसीलिए तो वैष्णवी मानसिकता के भारत ने तुम्हारी उपेक्षा नहीं की? नहीं, मुझे यह नहीं लगता। मैं मानव कमजोरियों और स्वभाव की तरफ यात्रा कर रहा हूं।
वैज्ञानिकों ने तुम्हें ‘निक्टेन्थिस अर्बार्टिस्टिस’ यानी रात को खिलनेवाला शोकवृक्ष कहा। तुम्हें ‘ट्री ऑफ सारो’ कहा। फिर यह भी बताया कि किन-किन रोगों को दूर करने के लिए तुम्हारी पत्तियां और छाल काम आती है। घर को महकाने के लिए तुम जलकर भी सुगंध फैलाते हो। सौन्दर्य प्रसाधन में तुम्हारा पेस्ट लाभदायक, सर्दी जुकाम में तुम्हारा काढ़ा कामयाब, साइटिका में तुम्हारी पत्तियों का रस उपयोगी। पेट दर्द और कब्ज तुम्हारी पत्तियों का रस दूर कर देता है। मगर दिमागी कब्ज को कौन दूर करे। इतने लाभकारी होने के बाद भी कृतघ्न समाज तुम्हें मनहूस समझता है जबकि तुम सुबह-सुबह उनके लिए पांवड़े बन जाते हो।
परन्तु पारिजातिके! शैफाालिके! अगर तुम बुरा न मानो तो मैं अपना प्रेम निवेदित करता हूं। इसमें यह शर्त भी नहीं है कि तुम चांद या सूरज को भूल जाओ। मेरे लिए इतना काफी है कि तुम मेरे सामने  खिलोगी। सुनो! एक खुशखबरी है कि राशि के लिहाज से तुम मेरे लिए लकी हो, सौभाग्यदायी हो। मैं सेजीटेरियस हूं...धनु। आज दीपावली है। एक ज्योतिषी अभी-अभी पत्नी को बता गया है कि आपके पति पारिजात का पौधा लगाएं और विष्णु की आराधना करें। लक्ष्मी प्रसन्न होकर दीपावली में धन बरसाएगी।

पारिजातिके!देवताओं ने तुम्हें हमेशा चाहा है। तुम्हारा पौधा रोपने को लेकर कृष्ण की दोनों पत्नियों में भी झगड़ा हो गया था। कृष्ण कहीं से पारिजात का पौधा ले आए। सत्यभामा और रुक्मिणी अपने अपने आंगनों में लगाने की जिद करने लगी। कृष्ण दोनों पक्षों को खुश करने में माहिर। सत्यभामा को तो पौधा दे दिया ताकि पारिजात फूले तो सुबह रुक्मिणी के आंगन में फूलों की चादर बिछ जाए। देखा तुम मनहूस नहीं हो शैफालिके!
 पारिजातिके! विष्णु की आराधना और धन की बरसात पर मै बिल्कुल विश्वास नहीं करता। मगर सोचो तो तुम मेरी राशि के लिए शुभ होने से कितनी सुरक्षित हो गई हो। अब चाहकर भी मेरी पत्नी तुम्हें उखाड़ नहीं सकती। तुम्हें न सही मेरे भाग्य को तो वह बचाएगी ही। तो प्रेम भले ही स्वीकार न करो, दीपावली की शुभकामनाएं तो स्वीकार कर ही सकती हो। हैप्पी दिवाली।

https://youtu.be/KhZXA-S6pOw

Comments

Unknown said…
अति उत्तम

वाह !


आपको और आपके परिवार को दीपोत्सव की

हार्दिक बधाइयां
दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें
काबिलेतारीफ बेहतरीन


SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com
आपका गद्य लाजवाब है...
सरोकारों को क्या खूब तरीके से पिरोते हैं आप इसमें...
शुक्रिया....
bahut hi achha likha hai.......prabhaw chhod gaya
Dr.R.Ramkumar said…
आपके प्रोत्साहनका आभार मित्रों !
kumar zahid said…
उदासी मुझे नहीें घेरती , तो क्या मैं संवेदना से शून्य हूं ? मेरी मान्यता है कि उदासी के गीतों से भी रस और आनंद की सृष्टि हो सकती है।विरेचन हो सकता है। उदास गीत सुनकर उदास होना ही ईमानदारी नहीं है। गीत के साहित्यिक सौन्दर्य में डूबना भी ईमानदारी है। अगर ऐसा नहीं होता तो कबीर की उलटबासियां अद्भुत नहीं होतीं। अगर ऐसा नहीं होता तो नर्मदा परम्परा के विपरीत पूरब से पश्चिम बहकर पूजनीय नहीं होती है।

बहुत अच्छी बात कही है आपने । पुरा गद्य लाजवाब है।
हरसिंगार पर बहुत अच्छा लिखा है आपने ..इस से जुड़े मनहूस तमगे से वाकिफ नहीं थी मैं ..वैसे मुझे भी यह बहुत पसंद है ..शुक्रिया

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