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आईना मुझे देखकर हैरान सा क्यों है ?

लोंगों की धारणाओं में दर्पण के विषय में एक बात घर कर गई है कि दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता। ऐसा कहने के पीछे कोई घटना अवश्य रही होगी। शायद कोई ऐसी घटना जिसमें पहली बार किसी को किसी बात से लाज आई हागी। किसी बात से क्या , किसी सौन्दर्यजीवी ने किसी सुन्दरी से कह दिया होगा ‘‘ तुम्हारा सौन्दर्य अद्वितीय है।‘‘ स्वाभाविक लाज से तरुणी और सुन्दर हो गई होगी। धड़कती हुई बोली होगी:‘‘ धत्..‘‘ सौन्दर्य प्रेमी ने कहा होगा:‘6 विश्वास न हो तो दर्पण देख लो। दर्पण झूठ नहीं बोलता।‘‘ शर्मीली उत्सुकता युवती ने दख लिया होगा और बलखाकर मुंह छुपा लिया होगा कि हाय ! मैं इतनी सुन्दर हूं । पहले मेरा ध्यान क्यों इस तरफ़ क्यांे नहीं गया ?‘‘ इस आभास के बाद वह कैसे कह दे कि दर्पण झूठा है। इसी रसीले सौन्दर्यबोध ने दर्पण को सत्यवादी प्रचारित कर दिया।परन्तु केवल रसीले प्रमाणों तक ही दर्पण की सत्यवादिता ठहरी नहीं है। समाज की सुखद स्थितियां तो मिलन की केवल क्षणिक स्मृतियां है ,स्वप्न है। ‘मिलन स्वप्न है ,विरह जागरण ’ ही समाज का साहित्यिक-सत्य है। समाज जागरण की जगह खड़ा है और घुड़क रहा है:‘‘ तू किसी से मिलकर आ रही है या आ रहा है ? झूठ मत बोल। जाकर दर्पण देख। चेहरे पर साफ लिखा है कि तू हमसे कुछ छुपा रहा है या रही है।‘‘ अब आरोपी कया यह कहे कि दर्पण झूठ बोलता है। आरोपी ऐसा कह ही नहीं सकता । अगर छुपाछुपी के मिलन के बाद लौटा है और बात खुलने का डर उसके चेहरे पर है तो दर्पण के सामने आकर उसकी हालत क्या होगी? समाज के सामने तो चेहरे पर केवल भय दिख रहा है। दिख रहा है कि चोरी है जो छुपाई जा रही है। मगर आरोपी को दर्पध में अपने चेहरे के वे हिस्से दिखाई देंगे जो अब तक सिर्फ महसूस हो रहे थे। आरोपी और शर्मा जाएगा। वह और छुपाने की कोशिश करेगा। समाज और चिल्लाकर कहेगा:‘‘ पकड़ा गया न ? झूठ पकड़ा गया तुम्हारा , किया है तुमने गलत काम।‘‘ दर्पण आरोपी का भी सत्य है और वादी समाज का भी।एक समय में एक ही दर्पण दो विपरीत लोगों का सत्य सिद्ध हो रहा है। जो झूठ सिद्ध करना चाहते हैं , उनका भी और जो सत्य को गोपनीयता बनाना चाहते हैं ,उनका भी। दर्पण को सत्यवादी कहना सबकी मजबूरी है क्यों उसे झूठा कहना किसी के लिए संभव नहीं है।इसीलिए विद्वान-आखर्यों ने साहित्य को समाज का दर्पण कह दिया। साहित्य इसी खोज बीन में पड़ा रहता है कि समाज में कहां क्या घट रहा है ? क्या गुप्त है ,सुप्त है , लुप्त है कि खींचकर उसे ऐसा प्रयुक्त करले कि चारों तरफ हंगामा हो जाए। वस्तुतः दर्पण दोनों तरफ का सच है। सास बहू का भी ,ननद भौजाई का भी । प्रेमी प्रेमिकाओं का भी और दीवार खड़ी करनेवालों का भी । चोरों का भी और साहूकारों का भी। दर्पण उन चालाक लोगों का भी सत्य है जो दर्पण को झुठलाने की विधियां जानते हैं। दर्पध को झूठा सच्चा सिद्ध करने के साथ साथ ही दर्पध के जन्म, वंश और जाति पांति की जानकारी लेने की जिज्ञासा होने लगती है।जन्म की दृष्टि से दर्पण ‘दर्प‘ का पुत्र है। दर्प के परिवार में उसका जन्म हुआ। दर्प ही उसका जातीय धर्म-कर्म है। दर्प ही उसका व्यवसाय है और दर्प ही उसकी कीर्ति या गुडविल है , मूल्य है ,आजीविका है। अगर दर्पण दर्प के परिवार से चला जाए तो उसको कोई पूछेगा भी नहीं। दर्प से कटा तो झनझनाकर टूट जाएगा दर्पण। दर्प का पिता और दर्पण का पितामह है ‘अहं’ और मां है ‘अस्मिता’। ‘आत्मरति‘ इस अस्मिता के मैके का नाम है और पति अहं के साथ फेरे पड़ते ही उसका नाम हो गया -‘श्लाघा ‘, ‘आत्मश्लाघा‘। दर्प के भाई हैं गर्व ,दंभ , मान ,मोह ,लोभ , मद आदि । दर्प की बहने हैं लालसा , कामना , ईष्र्या ,लज्जा , घृणा , वितृष्णा। हालांकि दर्प ने अपने पुत्र ’ दर्पण ’ को अपने अपने सभी गंण दे दिये हैं , लेकिन कुछ गुण दर्पण ने स्वयं अर्जित किये हैं। जैसे खामोशी ,तटस्थता , रहस्यमयता। वह कूट शिरोमणि है। वह गूढता का गणपति है। वह राजारी का राजा है। खुलेपन का खिलाड़ी है। जो भी दर्पण को देखता हैं तो अपने अंदर दर्प से भर जाता हैं। मान से ,मोह से ,मद से ,लोभ से उनके रग रग में सुरूर आ जाता है। लालसा उनकी बलाएं लेने लगती हैं। महत्त्वाकांक्षा रूपी बालाएं उसे आकर्षित करने लगती हैं। दर्पण काम है इसी दर्प को उकसाना। पिता के काम को आगे बढ़ाना। इाीलिउ तो दर्प ने उसे उत्पन्न् किया है। विज्ञान की बढ़त से ,भाषाविज्ञान के कुछ नीरस विद्वानों ने उसे प्रतिबिम्बक कहकर केवल प्रतिबिम्ब बनानेवाला कहकर सीमित करने की चेष्टा की है। दर्पण शुष्क यथार्थ की दृष्टि से प्रतिबिम्ब बनाकर वस्तु को प्रतिभासित ही करता है। दर्पण का उसकी अर्थवत्ता की दृष्टि से दर्प का आभासीकरण ही है। अधिक दुखदायाी यथार्थ तो यह है कि आईने या दर्पण में जो प्रतिबिम्ब बनता है ,वह उल्टा बनता है। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोणवाले विद्वान साहित्य को झूठ , सरासर झूठ कहते हैं। रचनाधर्मी और बिम्बप्रधान रचनाकारों को ऐसे विद्वान समाज से लगाातार और मरणपर्यन्त कठिन और करुण संघर्ष करना पड़ता है।साहित्य को रचना-विरोधी लोग समाज की कपोलकल्पना कहते हैं , अतिरंजना कहकर खारिज़ कर देते हैं। तभी तो साहित्य कहीं आदर्शवादी है तो कहीं यथार्थवादी। कहीं आदर्शाेन्मुख यथार्थवादी। कहीं वह छायावादी है , धर्मवादी है तो कहीं आतंकवादी है। कुलमिलाकर ‘ जाकी रही भावना जैसी ‘‘ वैसा साहित्य रचा जाता है। ऐसे साहित्य से किस समाज का प्रतिबिम्ब बनता है ? किस साहित्य के दर्पण या आईने में समाज का सच दिखाई दे रहा है ? आखिर देखने वाले या रचनेवालों के ‘दर्प ’ के अतिरिक्त ‘ दर्पण ‘ में और क्या दिखाई दे रहा है ? कितना अधूरा , एकांगी ,व्यक्तिवादी या समूहवादी और पक्षपाती है दर्पण कहे जानेवाला ‘सामाजिक-साहित्य‘। जबकि दर्पण निर्मम तटस्थता के साथ ‘दर्शको ‘ के पक्ष में ‘ वस्तु ‘ को प्रस्तुत कर देता है। फिर भी कवियों ने कहा कि ‘ दर्पण झूठ न बोले ‘ । मगर एक शायर ने दर्पण को चकमा देकर हैरान कर दिया। वह कहता है - मुझमें ही नई बात नज़र आती है कोई ,आईना मुझे देखकर हैरान सा क्यों है ?

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