Skip to main content

कि सावन आया..

'कि सावन आया'

          अपने छतदार ऊर्ध्वाधर छज्जे में बैठा हुआ मैं, अभी  न चलनेवाली हवा और न बरसनेवाले बादलों से उम्मीदें लगाये हुए हूं। हवा चल नहीं रही, बादल बरस नहीं रहे। हालांकि ख़बर थी कि इस भूखंड में तीन चार दिनों तक भारी बारिश होगी। दो दिन बीत गए हैं, बारिश सिर्फ़ औपचारिकता निभाकर चली गई है। जैसे कोई आंगन में बाल्टीभर पानी उड़ेलकर चला जाए। झड़ी जैसी कोई घटना अभी तक नहीं घटी। उम्मीद के ही क़द घटते रहे हैं।

         फिलहाल मैं देख-सुन रहा हूं कि मेरे हवाई छज्जे के नीचे, कतारों में खड़े, जो कतारी-घर (राे हाउसेस) हैं, उनमें सुबह की हलचलें बाक़ायदा चल रही हैं। म्यूजिक सिस्टमों से गानों की प्रतिस्पर्द्धा के स्वर गूंज रहे हैं। इधर से कोई गाना बजता है, उधर से कोई जवाबी गाना आता है। इन्हीं गानों से पता चला कि सावन आ गया है। कोई पुकार रहा है-'सावन के झूले पड़े,तुम चले आओ', कोई कराह रहा है-'लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है', कोई कोई ख़ुशी ख़ुशी बता रहा है-'रिमझिम के गीत सावन गए', कोई कोई सावन के आने से भयभीत होकर बड़बड़ा रहा है-'अबके सजन सावन में, आग लगेगी बदन में, घटा बरसेगी मगर, यूं ही तरसेगी नज़र, मिल न सकेंगे दो मन, एक ही आंगन में'।

      इन सब गीतों से पर्यावरण में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। मैंने भी इस कान से सुना और उस कान से निकाल दिया। मौसम आते-जाते हैं, महीने आते-जाते हैं, मुख्य बात यह है कि हम क्या पाते हैं? ये आते-जाते मौसम-महीने हमें क्या देकर जाते हैं? इसलिए निर्विकार भाव से गाने सुना-अनसुनाकर मैं वीतरागी हो चुपचाप चाय के विलंबित घूंट भर रहा था। 

     तभी एक गाना सुनाई दिया और मैं चौंक गया। ऐसे लगा जैसे कोई मुझे छ्यालिस-सैंतालीस साल दूर से पुकार रहा है- 'सावन के दिन आये सजनवा आन मिलो। विरहा जिया तरसाये सजनवा आन मिलो।' 

       मैं आधी सदी पीछे चला गया। छुट्टियों में मैं अपने बड़े भाई मोहनलाल के घर आया हुआ था, जो किंग्सवे से बाई ओर सेंट्रल रेलवे कमर्शियल ऑफिस की किलेनुमा दीवार के किनारे जानेवाली सड़क की दाई ओर मोहननगर के मकान में किराए से रहते थे। वे टेलेकम्युनिकेशन में इंजीनियर थे और सीताबर्डी जानेवाले बहु-राहे में उनका कार्यालय था। 

     किसी एक दिन मैं लोखंड पुल के पास से होते हुए 'पंचशील टॉकीज' में लगी श्याम बेनेगल की फ़िल्म 'भूमिका' देखने चला गया। कला फ़िल्म के चर्चित कलाकार उसमें थे। अमोल पालेकर, नसीरुद्दीन शाह, स्मिता पाटिल, अनन्त नाग और अमरीशपुरी। उन्ही दिनों कुछ दिन पूर्व मैंने अमरीश पुरी का एक नाटक 'आधे अधूरे' देखा था, जो हमारे पाठ्यक्रम में शामिल साहित्यकार मोहन राकेश का नाटक था। यह नाटक 'पंचशील' चौक के अगले चौक में स्थिति 'धनवटे रंग मंदिर' में खेला गया था। उसी नाटक के बाद एक अजीब बात देखी कि नाटक ख़त्म होने के बाद जब सब दर्शक बाहर जा रहे थे, तब दुबले पतले अमरीश पुरी बिल्कुल आम व्यक्ति की तरह दरवाज़े के पास अकेले खड़े सिगरेट पी रहे थे। कोई उनकी तरफ़ ध्यान नहीं रहा था। एक पल मैं कुछ सवाल मन में लिए खड़ा रहा और फिर चुपचाप उनके 'मास ऑब्जरवेशन' में बिना खलल पहुंचाए, सीताबर्डी होते हुए गणेश चौक से मोहननगर आ गया, जहां मेरे बड़े भाई मोहनलाल किराए के मकान में रहते थे और कस्तूरचंद पार्क के अंत में बाई ओर के टेलीकम्युनिकेशन आफिस में बैठते थे। 

      ख़ैर, बात निकली तो बहक गया। मैं 'भूमिका' फ़िल्म देखने गया था, जो प्रसिद्ध और चर्चित अभिनेत्री हंसा वाडेकर की आत्मकथा पर आधारित थी और हंसा वाडेकर की 'भूमिका' स्मिता पाटिल कर रही थी। फ़िल्म में भी, किसी फ़िल्म के लिए उन पर एक गाना शूट हो रहा था जो यही गाना था - 'सावन के दिन आये सजनवा, आन मिलो।' यह पीड़ित मनुहार, प्रीति सागर और भूपेन्द्र सिंह की सर्दीली आवाज़ में, बर्फ़ के घुलनशील तीर की तरह सीधे दिल में उतर गया था। ऐसे अनेक गीत मोहन जोदड़ो के अवशेषों की तरह हृदय की गहराइयों में दबे रहते हैं। ज़रा से खनन से उभर आते हैं। जैसे सावन की यह मनुहार उभर आई। 

       बहुत देर मैं इस गाने की धुन को अंदर बजते हुए सुनता रहा, जिसे मज़रूह ने लिखा, वनराज भाटिया ने धुन बनाई थी और श्याम बेनेगल के साथ गिरीश कर्नाड तथा सत्यदेव दुबे जैसे रंगकर्मियों ने मिलकर पकाया था। 

       अचानक मेरी तन्द्रा को भंग करता हुआ एक खरखराता स्वर गूँजा- 'अरे आज श्रावण कृष्ण प्रतिपदा है भाई! सम्वत्सर दो हजार त्रेयासी। आयुष्मान योग। आज का दिन सब के लिए शुभ है। चिंता क्यों करते हो?'

       मेरे झज्जे के सामने जो कतारी-घर है उसमें एक कांकड़ी महाराज रहते हैं। बरामदे में बैठकर वे लोगों की कुंडली बनाते हैं, भविष्य बताते हैं। इस तरफ उनकी पीठ रहती है। वे और उनके ग्राहक मुझे देख नहीं पाते, मगर मैं सबको देखते रहता हूँ। अमरीश पुरी की तरह मूक आब्जर्वर बना हुआ। कांकड़ी महाराज की तो सारी बातें सुनाई देती रहती हैं। क्योंकि वे जंगल की कांकड़ी यानी कोटरी उर्फ़ 'चीखती हिरण'(बार्किंग डियर) की तरह तेज़ और कर्कश आवाज़ में बोलते हैं, ताकि पूरा जंगल मुसीबत के बाघ के आने से सावधान हो जाये। तेज़ बोलकर हाँका लगानेवाले कांकड़ी महाराज 'चीखता हिरन' भी थे, शिकारी भी थे और देखा जाए तो वे ख़ुद बाघ भी थे जो घबराए हुए प्राणियों को आसानी से शिकार बना लेते थे। 

       अभी उनका हाँका चल रहा था ताकि सावन से लोग सावधान होकर उनके पास शरणार्थी की तरह आने लगे। देव सो चुके हैं, लेकिन कांकड़ी महाराज जाग रहे हैं। सावन में सारे सावन सोमवारों, तीजा-पोरा, भुजलियाँ-भाई दूज के अकेले शिकारी वे जो हैं। 

     'ओह! तो सावन शुरू हो गया। आज तीस जुलाई है। पिछली तीस जून को कांकड़ी महाराज ने किसी को कहा था कि आषाढ़ लग गया। मुझे तिथियों और मुहूर्तों की तलब कभी नहीं रही। जुलाई से शिक्षा-सत्र शुरू होता था और जुलाई इकतीस को इनकम टैक्स रिटर्न की आख़िरी तारीख़ होती थी।' मैंने उकताकर अंगड़ाई ली और अपने शरीर की जकड़नें तोड़ीं। फिर उठकर अपने अध्ययन-कक्ष में आ गया। मगर देखता हूँ कि सावन भी मेरे पीछे-पीछे चला आया है। लाडले 'ग्रैंडसन'(नाती-पोते) की तरह मेरा सिर पकड़कर, मेरे कंधेपर बैठा हुआ।  

        मेरे अंदर सावन की सारी दबी हुई फ़ाइलें और लंबित प्रकरणों के दस्तावेज़ खुलने लगे। प्रिय और मुंह-लगी स्मृतियां समूह में आकर मन के ख़ास-ख़ाने में अपनी पावस-गोष्ठी करने लगीं। अध्यक्षासन पर महर्षि बाल्मीकि बैठे, कालिदास मुख्य अतिथि ठहरे, खुसरो, सूरदास, तुलसी, कबीर, मीरा और मो.जायसी अतिविशिष्ट अतिथि हुए। प्रभविष्ट अतिथियों में घनानंद और पद्माकर तथा विशिष्ट आमंत्रितों में प्रसाद, महादेवी, निराला, पन्त, पन्त मित्र बच्चन उपस्थित हुए।  आमंत्रित तो हर युग और हर काल के और भी रचनाकारों को किया गया, मगर विशिष्ट रूप से सावन पर रचना न होने से वे नहीं आये। मेरी प्रिय स्मृति के संचालन में 'पावस मास की सावन गोष्ठी' प्रारम्भ हुई और मेरा मूक मन भींगने लगा। 

         गोष्ठी डॉ. हरिवंश राय बच्चन से आरम्भ हुई। उन्होंने सुनाया-
         अब दिन बदले, घड़ियाँ बदलीं,
              साजन आ‌ए, सावन आया।
झोंका जब आया आंगन में
प्रिय का संदेश लि‌ए आया।
ऐसी निकली ही धूप नहीं
जो साथ नहीं ला‌ई छाया।
        अब दिन बदले, घड़ियाँ बदलीं,
        साजन आ‌ए, सावन आया।(बच्चन)

उनके बाद सुकुमार कवि पन्त ने सुनाया-

       झम झम झम झम मेघ बरसते हैं सावन के।
       छम छम छम गिरतीं बूँदें तरुओं से छन के।
      चम चम बिजली चमक रही रे उर में घन के,
      थम थम दिन के तम में सपने जगते मन के।   
                     

पन्त जी के बाद महादेवी वर्मा ने मेघों के बहाने अपनी पीड़ा सुनाई-

            नव मेघों को रोता था
            जब चातक का बालक मन।
            इन आँखों में करुणा के
            घिर घिर आते थे सावन!(महादेवी वर्मा)

महादेवी के बाद प्रसाद जी ने अपना विषाद प्रस्तुत किया-

        वे कुछ दिन कितने सुंदर थे?
      जब सावन-घन सघन बरसते,
       इन आँखों की छाया भर थे!
       सुरधनु रंजित नव-जलधर से—
       भरे, क्षितिज व्यापी अंबर थे।
       मिले चूमते जब सरिता के,
       हरित कूल युग मधुर अधर थे।(प्रसाद)

छायावाद के अंतिम प्रतिनिधि के रूप में निराला जी ने सुरीले कंठ से गाया-

         फिर बेले में कलियाँ आईं।
        डालों की अलियाँ मुसकाईं। 
        
       सींचे बिना रहे जो जीते,       
       स्फीत हुए सहसा रस पीते;       
       भरे अचानक सब घट रीते।        
            नैहर की ललियाँ लहराईं।
      सावन, कजली, बारहमासे
      उड़-उड़ कर पूर्वा में भासे;
      प्राणों के पलटे हैं पासे,
             पात-पात में साँसें छाईं। (निराला)

छायावाद के बाद रीतिकाल से आये कवि द्वय प्रस्तुत हुये। 'बगरो बसन्त है' के कवि ने पावस पर कवित्त सुनाया-

        चपला चमाकैं चहु ओरन ते चाह भरी
        चरजि गई ती फेरि चरजन लागी री।
       कहैं पद्माकर लवंगन की लोनी लता
       लरजि गयी ती फेरि लरजन लागी री ।
       कैसे धरौ धीर वीर त्रिबिध समीरैं तन
       तरजि गयी ती फेरि तरजन लागी री ।
       घुमड़ि घमंड घटा घन की घनेरी अबै
       गरजि गई ती फेरि गरजन लागी री।(पद्माकर)

फिर सवैया के समर्थ कवि घनानंद आये-.

       सावन आवन हेरि सखी,
       मनभावन आवन चोप विसेखी ।
       छाए कहूँ घनआनँद जान,
       सम्हारि की ठौर लै भूल न लेखी।
       बूंदैं लगै, सब अंग दगै,
       उलटी गति आपने पापन पेखी ।
      पौन सों जागत आगि सुनी ही,
      पै पानी सों लागत आँखिन देखी।(घनानंद)

       अब भक्तिकाल के कवियों की बारी आई।  इस क्रम में सबसे पहले ज्ञानाश्रयी निर्गुण सूफी धारा के मालिक मुहम्मद जायसी आमंत्रित हुए। उन्होंने अपने बारहमासा में से सावन का कड़बक (रमैनी, रमयनी) प्रस्तुत किया।

           सावन बरस मेह अति पानी। 
           भरनि परी हौं बिरह झुरानी।।
           सखिन्ह रचा पीउ संग हिंडोला। 
           हरियर भूमि कुसुम्भी चोला।।
          हिय हिंडोल अस डोले मोरा। 
            बिरह झुलाई देय झकझोरा।।
            बाट असूझ अथाह गँभीरी। 
            जिउ बाउर भा फिरै भँभीरी।।
            जग जल बूड़ जहाँ लगि ताकी। 
            मोरि नाव खेवक बिनु थाकी।।
दो. परबत समुद अगम बिच, बीहड़ घन बन ढाँख।
     किमि कै भेटौं कंत तुम्ह?  मोहिं पाँव न पाँख।।

सूफ़ी-कवि मलिक के बाद प्रस्तुत हुई कृष्ण-विरहिन मीरा। उन्होंने हरि की चिरप्रतीक्षा को सावन के बहाने प्रस्तुत किया- 

        बरसे बदरिया सावन की।
        सावन की. मन-भावन की।
        सावन में उमग्यो मेरो मनवा, 
       भनक सुनी हरि आवन की।
       उमड़-घुमड़ बही देस से आया, 
       दामिन दमकै झर लावन को।
       नन्हीं-नन्हीं बूंदन मेहा बरसे, 
       शीतल पवन सुहावन की।
       मीरा के प्रभु गिरधर नागर! 
       आनंद-मंगल गावन की।

फिर प्रस्तुत हुए सगुण धारा के रामाश्रयी महाकवि तुलसीदास। उन्होंने कहा हमारा तो सावन से जन्म और मृत्यु का संबंध है। जन्म हुआ श्रावण शुक्ल सप्तमी को और मृत्यु हुई श्रावण के कृष्ण पक्ष की तृतीया को। इससे संबंधित दो दोहे उन्होंने सुनाये 

जन्म
       पंद्रह सौ चौवन विषै, कालिंदी के तीर।
       सावन शुक्ला सप्तमी, तुलसी धरयौ सरीर।।
मृत्यु
        संवत सोरह सौ असी, असी गंग के तीर।
        सावन कृष्णा तीज शनि, तुलसी तज्यो सरीर।।

इसके बाद गोस्वामी जी ने कहा हमारा जीवन और मरण तो राममय है। दोहावली से मेरा एक दोहा समर्पित है -

    बरषा-रितु रघुपति-भगति, तुलसी सालि-सुदास।
    रामनाम बर बरन जुग, सावन-भादव मास॥

रामभक्त तुलसी जी के बाद कृष्णभक्त सूरदास आए। बोले -'मेरी गोपियों ने तो मेरे सावन-भादो आँसुओं से भर दिए। अब तो आंसू ही पावस ऋतु है। क्या सावन क्या भादो? गोपियों की भाषा में कहूं तो-

    निस दिन बरसत नैन हमारे। 
    सदा रहत पावस रितु इन पे जब से स्याम सिधारे

अब तो बलपूर्वक अंधकार हमारे जीवन को जकड़कर बैठा है -

      देखियत चहुंदिस ते घनघोर।
      मानो मत्त मदन के हथियन बल करि बंधन तोर। 

और अब तो हम इतनी अवसाद में हैं कि हर ऋतु पर हमको निर्दयी कृष्ण के छल प्रपंच दिखाई देते हैं। बादल भी कृष्ण ही दिखाई देते हैं जो रूप बदलकर हमें सताने आए हैं -

        बरु ये बदराउ बरसन आये।
        अपनी अवधि जान नन्द-नन्दन गरजि गगन घन छाये।

अब फक्कड़, रहस्यवादी, मुखर और खरी खरी कहनेवाले जनकवि कबीर प्रस्तुत हुए और बोले-

'मुझे तो ऋतुओं से क्या? मेरी बारिश तो अंदर होती है। तब ही तो मैं कहता हूँ-

      कबिरा बादल प्रेम का, हम परि बरस्या आइ।
     अंतरि भीगी आत्मा, हरी भई बनराइ।।

और कहता हूं-

    गगन घटा घहरानी साधो गगन घटा गहरानी।
   पूरब दिस से उठी बदरिया रिम-झिम बरसत पानी

साधना ही मेरी ऋतुएं हैं। अनंत से बादल घिरते हैं और संत समाज पर ऐसी बरसात होती है जिसे केवल संत समझते हैं। 

   गगन गरजि मघ जोइया, तंह दिसे तार अनंत।
   बिजुरी चमकि घन बरसिया जहाँ भिजत हैं सब संत

        पहले सत्र का समापन करते हुए हिन्दवी के सूफ़ी कवि अमीर खुसरो ने कहा-भारत की लोक संस्कृति ने मुझे ऐसा जकड़ा है कि जन-जन का लोकव्यहार मेरी बानी बन गया है। 'सावन आया' उन्वान के इस लोक-गीत में मैके आने के लिए तड़पती बेटी की और इधर कसमसाती विवश मां की कशमकश देखिये।  

     अम्मा मेरे बाबा को भेजो री - कि सावन आया।
     बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री - कि सावन आया।
     अम्मा मेरे भाई को भेजो री - कि सावन आया।
     बेटी तेरा भाई तो बाला री - कि सावन आया।
     अम्मा मेरे मामू को भेजो री - कि सावन आया।
     बेटी तेरा मामू तो बौरा री - कि सावन आया।

अपने गायन और संगीत के लिए प्रसिद्ध लोककवि अमीर खुसरो के इस गीत ने उपस्थित सभी महाकवियों की आँखें और मन गीला कर दिया। बेटियां तो सबकी होती हैं न। 

     मेरी लाड़ली स्मृति ने आंसू पोंछते हुए जलपान का अवकाश घोषित कर दिया। (क्रमशः)

@रा.रामकुमार,
गुरुवार, ३० जुलाई २६, श्रावण कृष्ण प्रतिपदा,२०८३, आयुष्मानयोग






Comments

Popular posts from this blog

काग के भाग बड़े सजनी

पितृपक्ष में रसखान रोते हुए मिले। सजनी ने पूछा -‘क्यों रोते हो हे कवि!’ कवि ने कहा:‘ सजनी पितृ पक्ष लग गया है। एक बेसहारा चैनल ने पितृ पक्ष में कौवे की सराहना करते हुए एक पद की पंक्ति गलत सलत उठायी है कि कागा के भाग बड़े, कृश्न के हाथ से रोटी ले गया।’ सजनी ने हंसकर कहा-‘ यह तो तुम्हारी ही कविता का अंश है। जरा तोड़मरोड़कर प्रस्तुत किया है बस। तुम्हें खुश होना चाहिए । तुम तो रो रहे हो।’ कवि ने एक हिचकी लेकर कहा-‘ रोने की ही बात है ,हे सजनी! तोड़मोड़कर पेश करते तो उतनी बुरी बात नहीं है। कहते हैं यह कविता सूरदास ने लिखी है। एक कवि को अपनी कविता दूसरे के नाम से लगी देखकर रोना नहीं आएगा ? इन दिनों बाबरी-रामभूमि की संवेदनशीलता चल रही है। तो क्या जानबूझकर रसखान को खान मानकर वल्लभी सूरदास का नाम लगा दिया है। मनसे की तर्ज पर..?’ खिलखिलाकर हंस पड़ी सजनी-‘ भारतीय राजनीति की मार मध्यकाल तक चली गई कविराज ?’ फिर उसने अपने आंचल से कवि रसखान की आंखों से आंसू पोंछे और ढांढस बंधाने लगी। दृष्य में अंतरंगता को बढ़ते देख मैं एक शरीफ आदमी की तरह आगे बढ़ गया। मेरे साथ रसखान का कौवा भी कांव कांव करता चला आया।...

मार्बल सिटी का माडर्न हॉस्पीटल

उर्फ मरना तो है ही एक दिन इन दिनों चिकित्सा से बड़ा मुनाफे़ का उद्योग कोई दूसरा भी हो सकता है, इस समय मैं याद नहीं कर पा रहा हूं। नहीं जानता यह कहना ठीक नहीं। शिक्षा भी आज बहुत बड़ा व्यवसाय है। बिजली, जमीन, शराब, बिग-बाजार आदि भी बड़े व्यवसाय के रूप में स्थापित हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य आदमी की सबसे बड़ी कमजोरियां हैं, इसलिए इनका दोहन भी उतना ही ताकतवर है। हमें जिन्दगी में यह सीखने मिलता है कि बलशाली को दबाने में हम शक्ति या बल का प्रयोग करना निरर्थक समझते हैं, इसलिए नहीं लगाते। दुर्बल को सताने में मज़ा आता है और आत्मबल प्राप्त होता है, इसलिए आत्मतुष्टि के लिए हम पूरी ताकत लगाकर पूरा आनंद प्राप्त करते हैं। मां बाप बच्चों के भविष्य के लिए सबसे मंहगे शैक्षणिक व्यावसायिक केन्द्र में जाते हैं। इसी प्रकार बीमार व्यक्ति को लेकर शुभचिन्तक महंगे चिकित्सालय में जाते हैं ताकि जीवन के मामले में कोई रिस्क न रहे। इसके लिए वे कोई भी कीमत चुकाना चाहते हैं और उनकी इसी कमजोरी को विनम्रता पूर्वक स्वीकार करके चिकित्सा व्यवसायी बड़ी से बड़ी कीमत लेकर उनके लिए चिकित्सा को संतोषजनक बना देते हैं। माडर्न ...

चूहों की प्रयोगशाला

( चींचीं चूहे से रेटसन जैरी तक ) मेरे प्रिय बालसखा , बचपन के दोस्त , चींचीं ! कैसे हो ? तुम तो खैर हमेशा मज़े में रहते हो। तुम्हें मैंने कभी उदास ,हताश और निराश नहीं देखा। जो तुमने ठान लिया वो तुम करके ही दम लेते हो। दम भी कहां लेते हों। एक काम खतम तो दूसरा शुरू कर देते हो। करते ही रहते हो। चाहे दीवार की सेंध हो ,चाहे कपड़ों का कुतरना हो , बाथरूम से साबुन लेकर भागना हो। साबुन चाहे स्त्री की हो या पुरुष की, तुमको चुराने में एक सा मज़ा आता है। सलवार भी तुम उतने ही प्यार से कुतरते हो , जितनी मुहब्बत से पतलून काटते हो। तुम एक सच्चे साम्यवादी हो। साम्यवादी से मेरा मतलब समतावादी है, ममतावादी है। यार, इधर राजनीति ने शब्दों को नई नई टोपियां पहना दी हैं तो ज़रा सावधान रहना पड़ता है। टोपी से याद आया। बचपन में मेरे लिए तीन शर्ट अलग अलग कलर की आई थीं। तब तो तुम कुछ पहनते नहीं थे। इसलिए तुम बिल से मुझे टुकुर टुकुर ताकते रहे। मैं हंस हंस कर अपनी शर्ट पहनकर आइने के सामने आगे पीछे का मुआइना करता रहा। ‘आइने के सामने मुआइना’ , अच्छी तुकबंदी है न! तुम्हें याद है ,तुम्हारी एक तुकबंद कविता किताबों में छप...