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कामियों के प्रिय, प्रिये! घनश्याम आए।

कामियों के प्रिय, प्रिये! घनश्याम* आए।


१.   पक्का चिट्ठा

         एक होता है कच्चा चिट्ठा। इसका 'अर्थ' नहीं होता; आशय, अभिप्राय अथवा लक्षणार्थ होता है। कच्चा चिट्ठा का लक्षणार्थ होता है - पोल, दबी हुई सच्चाई, छुपाकर रखा गया भेद। लोग कहते हैं - 'अंदर की बात बताऊं, ये पक्की बात है। मेरे पास उसका पूरा कच्चा चिट्ठा है।'  

         अब यहां कच्चा चिट्ठा अंदर की पक्की बात हो गया। जब बात पक्की है तो वह कच्चा चिट्ठा कैसे हुआ? पक्का चिट्ठा हुआ।  ठोक बजाकर, नक्खी की गई, लिखी गई कच्ची लिखत है, रफ़ नोट्स है अभी। जब सार्वजनिक होगी, तब 'पक्की बात' होगी। 

          तब से तब देखा जाएगा। बात जब पक्की है, तब चिट्ठा भी पक्का ही हुआ। राजा, मंत्री, कलेक्टर, महापुरुष, मान्यवर का बेटा गर्भ में आते ही युवराज हो जाता है। उसी तर्ज़ पर पक्की बात भी प्रकटीकरण के पूर्व पक्की बात, 'पक्का चिट्ठा' ही हुआ। 

       पुरानी सोच के अनुयायियों के गले यह बात नहीं उतरेगी, संभव है नई सोचवाले इसे नई लज़्ज़त के रूप में देख लें। पुरानी सोच और नई सोच में उम्र नहीं देखी जाती, सोचने की पद्धति देखी जाती है।     

      अठारह साल का नया लड़का भी पुरानी सोच के मान्यवर के पांव धोकर पी सकता है, उसकी चरण-रज अपनी शिखा (सिर की भंवरी के लम्बवत बाल) पर लगा सकता है। सत्तर अस्सी साल का बूढ़ा भी नई लहर, नई सोच, नए विचारों को स्वीकारकर नृत्य कर सकता है। कुलमिलाकर नयापन आयु में नहीं, विचारों में होता है।

       इसलिए ऐसा मानकर कि आपके अतिरिक्त और कोई अन्य आपका समर्थक नहीं हो सकता, पक्का चिट्ठा खोला जाए। कोई माने या माने, रुकना क्यों? समर्थन और मान्यता की यह एकांतता (onlyness) एक कड़वा सच है, लोकव्यवहार की कृत्रिमता (बनावट) सच नहीं है।

२.  तिमाही, छमाही

       आज १ जुलाई २०२६, गुरुवार है और आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा यानी पहली तिथि भी है। इसी तिथि को, यानी आषाढ़ प्रतिपदा को कालिदास ने अपने द्वितीय काव्य 'मेघदूतम्' में 'आषाढ़स्य प्रथम दिवस' कहा। यह इस वर्ष का संयोग है कि आषाढ़ का पहला दिन अंग्रेजी के जुलाई माह के पहले दिन से मेल खा रहा है। यह कमाल दो जेठ, पुरुषोत्तम मास, अधिक मास, मल मास का है। 

         यह दो माह का कमाल भी केवल विक्रम संवत्सर में ही है। क्योंकि तीस-तीस दिनों के मास के कारण,  एक ही तिथि में दो-दो तिथियों के आने के कारण कम पड़ते दिनों को ३६५ दिनों के प्रकाशवर्ष के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए, चुपचाप तेरहवां महीना जोड़ दिया जाता है। अधिक मास के रूप में। यही कारण है कि कभी दुबलों पर दो आषाढ़ पड़ जाते हैं, कभी दो जेठ अथवा कोई और मास। यही पुरुषोत्तम मास, अधिक मास, और मल मास हैं। 

       एक और कमाल का महीना होता है खरमास। विक्रमी मान्यता है कि सूर्य के घोड़ों के थकने पर गधों अर्थात खरों को जोतकर, धीमा ही सही, काम निकालने का काम हर वर्ष होता है। जिस महीने घोड़ों के स्थान पर गधे जोते जाते हैं, वह गधों को मान देने के लिए 'खर मास' कहलाता है।  

       खर केवल गधा नहीं है। अगर ऐसा होता तो प्रखर कहां जाता? प्रखर यानी तीक्ष्ण, प्रखर यानी तेज़। मराठी में खर यानी ठोस सत्य, वस्तुत:। खर यहां खरा का प्रतिनिधि है। 

       संस्कृत के एक प्राध्यापक हुए जो हिंदी के प्रसिद्ध कवि, लेखक और साहित्यकार भी थे। नाम था डॉ. रांगेय राघव। डॉ. रांगेय राघव ने कालिदास की पहली कृति 'ऋतुसंहार' का हिंदी-अंग्रेजी में गीत अनुवाद किया। ग्रीष्म ऋतु के अनुवाद में उन्होंने लिखा - प्रिये! आया ग्रीष्म खरतर। 

       सामान्यतः साधारण व्यक्ति सूक्ष्म-ऋतु-विभाजन के पचड़े में नहीं पड़ता। वह तीन ऋतुएं मानता है - सर्दी, गर्मी और बरसात। हर ऋतु के चार महीने। तभी तो वर्षाकाल का चौमासा प्रसिद्ध है।

      शिक्षा विभाग में तीन तीन महीनों का ऋतुकाल होता है। इसलिए  प्रथम तिमाही, तीन महीने बाद छः माही और  फिर वार्षिक परीक्षा। दो महीने गर्मी की छुट्टी। एक महीना परिणाम और प्रवेश के, इस प्रकार बारह महीने का एक शिक्षा-सत्र।

       आयकर विभाग भी तीन महीने का आयकर-वसूली मौसम मानता है। तीन-तीन महीने में आय की गणना और आयकर कटौती स्रोत से ही हो जाती है। बैंकों भी तीन तीन महीने में ब्याज की गणना की  जाती है। अलबत्ता मंहगाई भत्ता छः महीने में तीन प्रतिशत के करीब दिया जाता है। भारत त्रिगुणात्मक है बंधुवर!

     ख़ैर छोड़िए। संस्कृत के महाकवि कालिदास ने छः ऋतुएं मानी और ऋतुसंहार को छ: भागों में बांट दिया। प्रारंभ उन्होंने ग्रीष्म ऋतु से किया और  ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर, वसंत, इस क्रम में ऋतु-विभाजन किया।

         कालिदास 'ऋतुसंहार' के प्रथम अध्याय ग्रीष्म के पहले श्लोक में सूचित करते हैं - प्रचण्डसूर्यः स्पृहणीयचन्द्रमाः  
                          सदावगाहक्षतवारिसञ्चयः।
                          दिनान्तरम्योऽभ्युपशान्तमन्मथो   
                          निदाघकालोऽयमुपागतः प्रिये।१

          हिंदी में इसका अर्थ हुआ कि सूर्य प्रचण्ड हो गया है, चंद्रमा प्रिय लगने लगा है। गर्मी को शांत करने के लिए बार बार नहाने से संचित पानी भी समाप्त हो गया है। अब केवल शाम आने से ही मन्मथ महोदय शांत हो पाते है। कवि कालिदास कहते हैं कि प्रिये! ये लक्षण बताते हैं कि निदाघकाल (ज्वलन काल, ग्रीष्मकाल) आ गया। 

      कालिदास के इस काव्यकौशल को  'स्थायी'  बनाकर डॉ.रांगेय राघव अनुवाद करते हुए गीत लिखते हैं - 

                  प्रिये! आया ग्रीष्म खरतर। 
                  सूर्य भीषण हो गया अब, चंद्रमा स्पृहणीय सुंदर।
                  कर दिए हैं रिक्त सारे, वारिसंचय स्नान कर कर। 
                  रम्य सुखकर सांध्यबाला, शांति देती है मनोहर।
                 तीव्र मन्मथ का हुआ है, वेग अपने आप मुझपर।
                 दीर्घ काल निदाघ देखो, छा गया कैसा अवनि पर।
                        प्रिये! आया ग्रीष्म खरतर। -( डॉ.रांगेय राघव.)     
३. छ: ऋतुएँ
       ऋतुसंहार के प्रबंधन में कालिदास ने अपना वैशिष्ट्य प्रदर्शित किया है। वे प्रत्येक अध्याय का पहला श्लोक संबंधित ऋतु के आगमन की सूचना, एक काल्पनिक प्रिये या आलम्बन प्रेयसी को देते हैं। 
      १. गर्मी खंड के पहले श्लोक में निदाघकालोऽयमुपागतः प्रिये!।१।। प्रिये निदाघकाल आ गया कहकर सूचित करते हैं। 
      २. वर्षा खंड में सूचित करते हुए पहले श्लोक में वे लिखते हैं - घनागमः कामिजनप्रियः प्रिये ।।१। अर्थात कामीजनों के, रसिकों के प्रिय-घन आ गए प्रिये!
    ३ .  शरत् खण्ड की सूचना में लिखते है -प्राप्ता शरन्नववधूरिव रम्यरूपा।। १।। शरद ने नव-वधु का रम्य-रूप प्राप्त कर लिया है।
   ४ . हेमन्त खण्ड की सूचना देखिये - हेमन्तकालः समागत:  प्रिये।। १।। प्रिये! हेमंतकाल आ गया।
   ५ .  शिशिर के आगमन की सूचना कुछ प्रकारांतर से कवि ऐसे देते हैं - वरोरुकालं शिशिराह्वयं शृणु ।। १।। सुनो(प्रिये), हृदय के लिए श्रेष्ठ शिशिर हमें बुला रहा है, । 
६.  वसन्त खण्ड में विभिन्न प्रकार के खिले हुए पुष्पों को वसंत के योद्धा कहकर वे लिखते हैं - वसन्तयोद्धा समुपागतः प्रिये।। १।। वसंत का योद्धा आ गया प्रिये।
४.
         आज आषाढ़ का आरंभ वृष्टि के साथ हुआ है।  अब हुआ है, तो अवसर देखकर पूरा श्लोक ही ऋतु-राग के पकौड़े की तरह क्यों न आँखों की कढ़ाई में तल लिया जाए। यानी पूरा प्रथम श्लोक पढ़ लिया जाए। श्लोक है -
                          सशीकर अम्भोधर मत्तकुञ्जर:
                          तडित्पताकोऽशनिशब्दमर्दलः। 
                          समागतो राजवदुद्धतद्युतिर् 
                          घनागमः कामिजनप्रियः प्रिये ।।१।।
प्रस्तुत है पहले श्लोक का नवगीत अनुवाद 
कामियों के प्रिय', 
प्रिये! 
घन-श्याम आए। 

बिजलियों की ले पताका, 
व्यूह हाथी का चले।
युद्ध के मादल सी लगती 
गर्जना छाती दले।
वृष्टि की आकांक्षा के 
अश्रु गालों में ढले।
कौन है जो 
जल छिड़ककर 
होश में लाए।।१।।
'कामियों के प्रिय' ....
        जिस प्रकार बरसते पानी में  प्याज, आलू, गिल्की, पालक, भटे आदि के गर्म-गर्म पकौड़े रिवाज़ की तरह खाये जाते हैं; साथ में तली हुई मिर्ची, टमाटर का भुर्ता, दही की चटनी या लहसुन का थेचा स्वाद को दुगुना करने के लिए ज़रूरी होते हैं। वैसे ही संस्कृत के श्लोक का बहुमुखी आनंद उठाने के लिए उसका हिंदी अनुवाद बहुत आमोदमयी है। यह अनुवाद अगर गीत के रूप में हो तो सोने में सुहागा समझिए। 
           कविजन कहते हैं कि किसी गीत में कम से कम और अधिक से अधिक तीन पद तो होने ही चाहिए। इस शास्त्रीय वाणी के सम्मान में दो और श्लोकों का गीत अनुवाद प्रस्तुत है-
नितान्तनीलोत्पलपत्रकान्तिभिः 
क्वचित् प्रभिन्नाञ्जनरागसंनिभैः। 
क्वचित् सगर्भप्रमदास्तनप्रभैः 
समाचितं व्योम घनैः समन्ततः ।।२।।
नील नीरज से खिले हैं, 
मेघ जलवाले।
या नहाये नभ के माथे, 
बाल हैं काले।
या किसी अल्हड़ के बिखरे, 
केश घुंघराले। 
हो रहा है क्या
ये गुत्थी 
कौन सुलझाए।।२।।
 'कामियों के प्रिय

तृषाकुलैश्चातकपक्षिणां कुलैः 
प्रयाचितास्तोयभरावलम्बिनः। 
प्रयान्ति मन्दं बहुवारिवर्षिणो 
बलाहकाः श्रोत्रमनोहरस्वनाः।।३।
चातकों के कुल हैं व्याकुल, 
प्यास है मलमास। 
जलभरे नीरद से मांगे 
तृषित-जन की आस। 
'बरसकर भर दो बलाहक!
रिक्त-घट सायास।'
क्या पता होकर सदय 
कुछ रोज़ रुक जाए।।३।
'कामियों के प्रिय' ..
(हिंदी नवगीतअनुवाद :  डॉ.रा.रामकुमार, १-२ जुलाई २०२६.) 
        श्रीमंत पुन्नागों (पुरुषश्रेष्ठों)! आपको आषाढ़ का सतत्-स्निग्ध वर्षाकाल (आषाढ़, सावन, भादो) मुबारक! बधाई! शुभकामनाएं! 
शुभाकांक्षी 
कुमार
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*घन-श्याम = काले बादल 




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