एक अपढ़ गीतल, आनंद अपढ़ की एक से सौ तलक, सीखी हैं, गिनतियाँ अब तक। गिनाऊँ? किसने, कहां कीं हैं, गलतियां अब तक।। अनेक रंग, मेरी उंगलियों से झरते हैं, तो क्या पकड़ता रहा, सिर्फ़ तितलियां अब तक।।? फ़रेब देके, कैसे सो रहे, दुनिया वाले, हमें जगाए हुए हैं, ये हिचकियां अब तक।। गरज के साथ, फटे अब्र, मिट गया सब कुछ, चमक रही हैं, इन आंखों में, बिजलियां अब तक।। नस्लोमज़हब, ज़ुबां, ख़याल, इस क़दर चौकस, न बंट सकीं, मेरे हाथों की, कजलियां अब तक।। चुहल, शरारतें, ठहरायीं गयीं, बचकानी, सयानी बन के, हुक्मरां हैं, तल्ख़ियां अब तक।। रईस लोगों के, अंगूर हो गए खट्टे, ग़रीब बस्ती, चाटती है, इमलियां अब तक।। #आनंद_अपढ़, १५.०१.२६, ०८.३० सायं, शुचिस्थल, इलाक़ा देवगढ़। प्रस्तुति : @ रा रा कुमार