Monday, March 27, 2017

फिर गर्माए दिन

*
घूम रहे हैं लिए सुपारी,
गर्मी खाकर दिन!
                - फिर गरमाए दिन!
*
खुली खिड़कियां बंद हो रहीं
कैद हुईं बतकहियां!
सूखी आँगन की फुलवारी
मंद हुयीं चहचहियां!
आस पड़ोस विदेश लग रहे
अलसाये पलछिन!
                - फिर गरमाए दिन!
*
अलगावों के, भेदभाव के,
खुलकर खुले अखाड़े!
सब दबंग परकोटों में हैं
सब दब्बू पिछवाड़े!
हवा हुई अपहृत या खा गई
उसे धूप बाघिन!
                - फिर गरमाए दिन!
*
लपट झपटकर सिंहासन पर,
लू लपटें आ बैठीं!
कुचल कुचलकर हंसी खुशी को,
फिरतीं ऐंठी ऐंठी!
जैसे सुख खा बैठे उनके
परदादा का रिन!
                - फिर गरमाए दिन!
*
आतंकी से लगते हैं सब
छुरी कटारीवाले!
सुबह शाम रात दिन भी हैं
पहुने भारीवाले!
जैसे तैसे काट रहे हैं
युग साँसों के बिन!
                - फिर गरमाए दिन!
*
आओ सब खटास घोलें अब,
पना बने खटमिट्ठा!
रस के धारावाहिक खोलें,
सुखद समय का चिट्ठा!
राग-रंग में क्यों घोले विष,
कलुष बुद्धि नागिन!
                - ठंडक पाएं दिन!
@ कुमार,
27.3.17,11.43 am
सोमवार,
.......

3 comments:

प्रतिभा सक्सेना said...

अनुभूति जैसी अभिव्यक्ति भीअनुपम!

Dr.R.Ramkumar said...

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय!

Pushpendra Dwivedi said...

हृदयस्पर्शी रचना