Saturday, February 27, 2010

सभी परिन्दे उड़ जाते हैं पेड़ खड़ा रह जाता है।

नैनपुर की पहचान उमाशंकर के साथ होती है। नैनपुर के सबसे बड़े भूखण्ड के वे स्वामी थे। स्कूल , कारखाने, गोदाम , बिल्डिंग , बैंक भवन ,जीवनबीमा भवन सब उनके थे। सबसे ज्यादा लोग उनके थे । अमीर उनके थे गरीब उनके थे। सभी विभागों के अधिकारी उनके थे। छोटे बड़े कर्मचारी उनके थे।

वे अपने एक मित्र के इलाज के सिलसिले में मुबई गए थे। एक होटल में कमरा बुक करा रहे थे। फोन पर बात करते हुए वे एक खराब लिफ्ट के टूटे हुए बाटम से नीच गिर गए।
उनके न रहने की खबर नगर को मिली और सब स्तब्ध रह गए।



हमने सीखा है सलीक़ा तुम्हीं से जीने का।
दर्द सहने की अदा ,ढंग ज़ख़्म सीने का ।
हादसों और करिश्मों से भरी दुनिया में,
मौत दरवाज़ा खुला छोड़ती है ज़ीने का।।
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रखी तुमने बुनियाद , जब ज़िन्दगी की।
अदा हमने सीखी है , तब जिन्दगी की।
वो मुस्काते आना , वो मुस्काते जाना,
तुम्हें आंखें ढूंढेगी , अब ज़िन्दगी की।।

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इस मिट्टी का चलन निराला , गिनगिन बोते अनगिन पाते।
बीच सड़क का नगर ज़िन्दगी , कितने आते कितने जाते।
पत्थर होकर रह जाते हैं , शिलालेख लिखवानेवाले ,
अमिट वही चेहरे होते जो दिल पर छाप छोड़कर जाते ।।

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भीड़ भाड़ से भरा रास्ता यहीं पड़ा रह जाता है।
सभी परिन्दे उड़ जाते हैं पेड़ खड़ा रह जाता है।
कहने को तेरी मेरी है , दुनिया झूठी माया है ,
महल अटारी सोना ज़ेवर यहीं धरा रह जाता है।


दिनांक 27.02.10

5 comments:

रवि कुमार, रावतभाटा said...

सबसे बड़े भूखंड के स्वामी...
सही कहा..महल अटारी सोना ज़ेवर यहीं धरा रह जाता है।

शुभकामनाएं...

रचना दीक्षित said...

पत्थर होकर रह जाते हैं , शिलालेख लिखवानेवाले ,
अमिट वही चेहरे होते जो दिल पर छाप छोड़कर जाते ।।

भीड़ भाड़ से भरा रास्ता यहीं पड़ा रह जाता है।
सभी परिन्दे उड़ जाते हैं पेड़ खड़ा रह जाता है।
कहने को तेरी मेरी है , दुनिया झूठी माया है ,
महल अटारी सोना ज़ेवर यहीं धरा रह जाता है।
क्या बात है? सर आज किसी दूसरे मूड में, होली का असर है. बहुत अच्छी है पूरी पोस्ट पर कुछ बातें तो बेमिसाल है बधाई स्वीकारें

Kumar Koutuhal said...

हमने सीखा है सलीक़ा तुम्हीं से जीने का।
दर्द सहने की अदा ,ढंग ज़ख़्म सीने का ।
हादसों और करिश्मों से भरी दुनिया में,
मौत दरवाज़ा खुला छोड़ती है ज़ीने का।।
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इस मुक्तक में अंतिम दो पंक्तियां-
हादसों और करिश्मों से भरी दुनिया में,
मौत दरवाज़ा खुला छोड़ती है ज़ीने का।
-
जिन्दगी को मौत के सापेक्ष परिभाषित करती हे। यानी जिन्दगी ही नहीं मौत भी आपको नये झरोखे और दालान देती है।
नयी दृश्टि है साब। बधाई

Apanatva said...

dil kee matee ko poora bhiga gayee aapkee ye rachana.......

अल्पना वर्मा said...

भीड़ भाड़ से भरा रास्ता यहीं पड़ा रह जाता है।
सभी परिन्दे उड़ जाते हैं पेड़ खड़ा रह जाता है।
-बेहद खूबसूरत लिखा है.
इन सभी मुक्तकों में जीवन दर्शन दिख रहा है.

[-आप के अन्य लेख भी पढ़े ..बहुत अच्छा व्यंग्य लिखते हैं.]