Thursday, February 25, 2010

भटा-भात और ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा




श्रीमान भटा को कौन नहीं जानता। भटाप्रसाद आलूलाल के कनिष्ठ और गोभीरानी के ज्येष्ठ भ्राताश्री हंै। शाकाहार करनेवालों की परम्परा में जैसे अध्यात्म के त्रिदेव हंै, वैसे ही सब्जी में यही तीन देवता प्रसिद्ध हैं। भटे के बारे में कुछ और बातें कहने के पहले भटे पर एक कवितानुमा गद्य या गद्यनुमा कविता या कवितानुमा तुकबाज़ी पढ़ें। कवि कहता है-

जैसे जुल्फों को घटा कहते हैं ,
जैसे जूड़े को जटा कहते हैं ,
जैसे पीढ़े को पटा कहते हैं ,
वैसे ही बैंगन को भटा कहते हैं ।

जैसे ऊंट की करबट होती है
वैसे बैंगन की एक थाली होती है
ऊंट की करबट को लोग नहीं जानते
बैंगन की फितरत को थाली तक नहीं जानती।

कहते हैं बैंगन यानी भटा बादी होता है
इसकी एलर्जी होती है
किसी को सूजन होती है
किसी को खुजली होती है
सुना है भटा खाकर जो करते हंै यात्रा
वो भटक जाते हैं
हालांकि ऐसा सुनकर
भटा-प्रेमियों के मुंह लटक जाते हैं

यानी भटे के कई रूप है ,कई रंग है
सब्जियों के राजा आलू के वह संग है ,अंतरंग है
यूं तो गोभीरानी का भी भटा साथ निभाता है
परन्तु कभी कभी गुरुदेव रवीन्द्र की तरह
अकेला ही पतीली में पक जाता है
कुलमिलाकर ,
जैसे छायावाद में प्रसाद ,निराला और महादेवी हैं
वैसे ही सब्ज़ियों में आलू ,भटा और गोभी हैं।

मित्रों ! आज सुबह सुबह एक प्रसिद्ध अखबार में एक कविता पढ़ ली। आजकल कविता लिखना सरल है। गुलजार और जावेद को पढ़ते हुए एक मीडियामैन प्रसून जोशी ने कविता लिखी और ‘अंधेरे से डरता हूं मां’ कहते हुए उजालों की दुनिया में चले गए। (मजाक है पी जे , बुरा न मानना।)
वैसे अंधेरों से बहुत सी चीजें और बहुत सी बातंे आजकल उज़ालों में चली आई हैं। जो काम दीपक बुझाकर होते थे ,अब स्पाट लाइट में होते हैं। बहुत सी आस्थाएं जो हमारे जीने का आधार थीं ,अंधेरे की बातें कहलाती हैं। वैज्ञानिक भाषा में उन्हें अंधविश्वास कहा जाता है। अब चूंकि हम विज्ञान के युग में रहे हैं ,इसलिए वैज्ञानिक संस्थापनाओं को मानना हमारी मज़बूरी है।
विज्ञान बहुत दिनों से खानसामे की तरह हमारे खानपान के पीछे पड़ा है। पीने के लिए नए नए ड्रिंक्स और खाने के लिए फास्ट फूड वह हमारे दस्तरक्ष्वान पर धर रहा है। जितने हम व्यस्त हो रहे हैं उतना विज्ञान इन्स्टेंट हो रहा है। विज्ञान हमें कहीं नहीं छोड़ रहा है, कहीं का नहीं छोड़ रहा है।
इधर बहुत दिनों से वह हमारी सब्जियों में लोकप्रिय और सर्वसुलभ भटे के पीछे पड़ा है। पहले तो लगता था कि जिस भटे की वह बात कर रहा है , वह कोई अमेरिकन होगा ,कोई खुफ़िया आतंकवादी होगा। श्वेतपुष्पी गाजरघास की शक्ल में हमारे पशुओं और इंसानों का कोई दुश्मन होगा। मगर आज जो अख़बार में फोटो देखी तो मैं स्तब्ध रहा गया। यह तो वही भटा है जिसे कल शाम ही बड़े चाव से मैं खरीद लाया हूं। आज ही बीवी ने जिससे भरवा बैंगन या दूसरे शब्दों में खड़ा भटा बनाया है। उफ ! गेंहूं बदले ,चांवल बदले ,अब सब्जी भी गिरगिट की तरह रंग बदल बैठी। बुजुर्गों ने सच ही कहा था - थाली के बैंगन का कोई भरोसा नहीं। कभी भी वह पाली बदल सकता है।
संक्षेपीकरण के इस युग में बीटी भटा बहुत दिनों तक मेरी समझ के परे रहा। फुलफार्म को जाननेवाले पूर्ण लोगों को ढूंढता रहा। पर कहते हैं न किताबों से अच्छा कोई दोस्त नहीं। इसलिए किताब के अंडाणु के रूप में विख्यात अखबार में आज यह पता चला कि बीटी यानी कीटाणुओं का शत्रुघ्न। बीटी ही किसी फसल या बीज को जीएम बनाता है।
जी ? जीएम से क्या आशय है ?
जी हां, मैं भी सुबह सुबह फंस गया था। जीएम यानी ‘जनरल मैनेजर’ बोल बैठा। तब बीवी ने हंसकर बताया -‘‘ सो रहे हैं श्रीमान ! मोबाइल और एसएमएस के दौर में जो नई भाषा विकसित हुई है , उसके मुताबिक यह जीएम....गुडमार्निंग का शार्ट फार्म है।’’
‘अरे तेरे की !’ मैंने माथे पर हाथ मारा। हालांकि जीएम यहां न यह मुख्य प्रबंधक है ,न गुडमार्निंग है। यहां वह वंश-सुधार या अनुवांशिक-परिसंवर्धन के अर्थ में आया है। वैज्ञानिक शब्द है-जेनेटिकल माडीफिकेशन।
अब कुछ स्वास्थ्यवादी लोग सवाल उठा रहे हैं कि यह साधारण से ‘जीएम’ हुआ भटा हमारे खाने लायक है भी या नहीं ? भविष्य में यह हमारे लिए क्या क्या खतरे पैदा करेगा ? यह हमारी ज़मीन को दूसरी फ़सले उगाने लायक छोड़ेगा भी या नहीं ? आदि आदि।
देशवासी मित्रों ! सिंथेटिक दूध जब बाजारवादियों ने हमें पीने के लिए दिया था ,तब भी यही हल्ला मचा था। मैं अपने लिए कहता हूं कि ‘यह मुंह और मसूर की दाल’ यानी साब! मैं क्या कहूं , जब सरकारें शराब को बुरा कहती हंै और लीगली लाइसेंस देती हैं ,तब सिन्थेटिक दूध ,सिंथेटिक मावा , इंस्टेंट फूड और बीटी भटा के लौकी आदि के लिए क्या विरोध करना ? हमारे पेट बहुत ताक़तवर हैं। यह सब पचा जाते हैं। टायर और नौसादर से बनी शराब, कास्टिक सोडा से बने मावा और दूध, चर्बी और डामर से बना हुआ घी........इन सबको हम यूं पचा लेते हैं ,जैसे नगरपालिका द्वारा मुहैया कराया हुआ अशोधित पानी।
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा नीति के नाम पर सब कुछ का सौदा करनेवालों ! तुम हमारी क्या परीक्षा लेते हो ? हम उस शंकर के भक्त हैं जो दुनियाभर की रक्षा के लिए विष गटक लेते हैं। हम उस देश की जनता हैं , जहां मीरा जैसी दीवानी जानबूझकर ज़हर पी जाती है ? तुम हमें चूहा मानकर प्रयोग करते रहो , हम तुम्हारे साथ हैं। आनेवाली पीढ़ी के लिए हम कोई भी परीक्षा देने के लिए तत्पर हैं।
भारत में एक कहावत है,‘घी कहां गया ? खिचड़ी में। खिचड़ी कहां गई ? भाई के पेट में।’ हमारा यह भाईचारा विश्व प्रसिद्ध है। तुम चिन्ता न करो। ‘‘हां आया ! बस। चार लाइनें और ..’’

मित्रों! माफ़ करना। पत्नी खाने के लिए आवाज़ दे रही है। आज जैसा कि मैंने बताया कि चटपटी ग्रेवी से ठसाठस भरा हुआ भरवा बैंगन या खड़ा भटा बना हैं। ग्रेवी की पतीली का ढक्कन खुल चुका है और असहनीय बेचैनी मुझे हो रही है। आप आ सकते तो आप भी आते क्योंकि जीभ आपकी भी रसीली हो रही है और अदरक का स्वाद आपको भी पता है।
ओहो ! यह भात का ढक्कन खुला। स्वादिष्ट सुगन्ध किसी पागल हवा के साथ मेरी नाक को मदहोश कर रही है। मुझे कोई भय भटे के पास जाने से नहीं रोक सकता। हमारे बुजुर्ग कहते हंै-‘जीवन भर कमाए और भटा भात कभी न खाए।’ मैं अभी खाउंगा। पुरखों की आत्मा को शांति पहुंचाउंगा।
और आखि़री बात। मैं यह नहीं मानता कि भटा खाकर अगर आज कहीं जाउंगा तो भटक जाउंगा। मैं तो मानता हूं कि भटकूंगा तब भी वास्को डी गामा की तरह कोई नया ‘न्यू-ज़ील-लैंड ’ (न्यूजीलैंड) अवश्य खोज लूंगा।बाई..सी यू..
दि. 21.02.10,

2 comments:

रचना दीक्षित said...

सर आपकी पोस्ट होली के बाद आराम से पढूंगी वैसे
आपको व आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनायें

CS Devendra K Sharma said...

well researched on भटा too.

sir, u write every time unique....amazing

sath me apka likhne ka andaaz bhi bahot interesting hai.

congrats