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Showing posts from February, 2026

मेल-जोल का खाना

          मेल-जोल का खाना (बालगीत) भूरे गोलू आलू से झुक बोला कालू बैंगन। 'भाई! आओ, आज बनाएं, मिलकर कोई व्यंजन। तरकारी, तेउन, सब्ज़ी, भाजी, जो लोग समझ लें, मिर्ची, धनिया, प्याज़, टमाटर, साथ हैं सारे परिजन।         कहो आग से -'पेट नहीं, चूल्हे में आग लगाए।         भूखे प्यासे लोगों के मन में उम्मीद जगाए।'         इस्पाती गंजी से बोलो-  'आए तैयारी से,        ताप सहनकर,छौंक झेलकर,साग लज़ीज़ पकाए।' मीठी नामक हरी नीम को, सर्वप्रथम तड़काओ। राई, जीरा, अदरक, लहसुन,  भूनो, घर महकाओ। हींग ज़रा सा डाल स्वाद का जादू-मंतर फूंको,  मुख्य विशिष्ट अतिथि आलू बैंगन को मंच चढ़ाओ।        जल-भुन जाने के पहले, बघरों पर पानी डालें।        सब आपस में घुल-मिल जाएं, ऐसा उन्हें खंगालें।        नमक स्वाद अनुसार डालकर सब पर ढक्कन डालो,        घर की बात न बाहर जाए, भीतर बात बना लें। चुगलखोर है हवा, मुहल्ले भर को बतलाएगी। 'क...

बीस दोहे

  बीस दोहे धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में, जल, जंगल, भू नष्ट। भारत-मां निज कोख का, स्वयं समझती कष्ट।।    1.१२.०२.२६, गुरुवार, प्रातः ०९.३१ ० बनी हड़प्पा साधना, द्वंद्व, विभाजन लक्ष्य।  वर्तमान को भूनकर, खाना प्रियतम-भक्ष्य।।    2. १२.०२.२६, गुरुवार, प्रातः ०८.१६. ० सम-मत, सम-रुचि, दृष्टि-सम, सह-जीवन, सम-रूप।            कोलाहल में ढूंढ मत, ठंडी छाया धूप।।   3. १२.०२.२६, गुरुवार, प्रातः ०९.००. ० अध्ययन-चिंतन-मनन बहु, अतिशय कम अभिव्यक्ति।,   शब्द-चयन, सीमित कथन, मत की अन्तर्शक्ति।।          4. ११.०२.२६, बुधवार, प्रातः ०८.३०. ० दो पद में ही नापिए, धरा गगन परिमाप। धरकर इनको शीश पर, मुग्ध रहें चुपचाप।।       5. ११.०२.२६, बुधवार, प्रातः ०८.१०. ० 'कटुक क्रोंच, कुचला, कनक, केर, किमाच, कनेर।' कोदो, कुटकी से सदा,  इनको रहता वैर।।    6. १०.०२.२६, सोमवार, अपरान्ह १२.१०. ० वक्ष करें दृढ़तर सदा, दुर्दिन से कर प्रेम। सूर्य-नमन साष्टांग कर, यही योग यह क्षेम।।     ...

श्मशान चंपा

    श्मशान चंपा *  1.          आज 1 जनवरी 2026, रविवार संत  रविदास जयंती यानी  माघी पूर्णिमा है।  सुबह से सोशल मीडिया में संत रविदास जयंती की बधाइयां और शुभकामनाएं प्रकाशित होनी शुरू हो गयी हैं।       संत रविदास जयंती, माघी पूर्णिमा मेरी मां की पुण्य तिथि भी है। इसलिए जब भी रविदास जयंती की सुगमुगाहट होती है, मेरे अंदर मां के जाने का हौल जाग जाता है। जैसा कि सुना है, 6 फरवरी 1993 के साढ़े छः बजे मां नित्यक्रिया से निवृत्त होकर अस्पताल के बिस्तर पर बैठी और तकिये के नीचे माला ढूंढने लगी। वह नहीं मिली। और मां अस्पताल के बिस्तर पर ही लुढ़क गयीं।        कफ़ के बहुत बिगड़ जाने से मां को रात में ही प्रियदर्शनी  ज़िला चिकित्सालय में भर्ती किया गया था। इंजेक्शन और दवाएं देकर उन्हें सुला दिया गया था।        सुबह सुबह नहा धोकर मां नियमित रूप से जाने कितने सालों से माला करती थीं। वही उनका इनहेलर था। उन्हें अस्पताल में भर्ती करने की हड़बड़ी में उनकी माला घर में रह गयी थी। माला कोई ज़रूरी सा...