दो नवगीत : १. मन की भोर, २. आडम्बर के इंद्रप्रस्थ
मन की भोर-
मन की भोर सुहानी हरदम ।
नव-अंकुर को देती रहती, उचित समय पर पानी हरदम।
सघन रात के गहन अँधेरे।
युगत-भुगतकर हुए सबेरे।
नव-उत्साह उमंग नयी भर, ज़ारी रखे रवानी हरदम।
मन की भोर सुहानी ....
जोड़-घटाना छोड़ चुका है।
लेन-देन कुछ नहीं रुका है।
खाली हाथ चला है हँसता, ना याचक ना दानी हरदम।
मन की भोर सुहानी ....
प्रेम क्षेम सब नैसर्गिक हैं।
भावाभाव सभी स्वर्गिक हैं।
यत्न-प्रयत्न व्यर्थ हैं सारे, समय करे मनमानी हरदम।
मन की भोर सुहानी ....
15.06.26, सोमवार
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आडम्बर के इंद्रप्रस्थ
ऐसा कहाँ सुयश था मेरा।
पत्थर दक्ष हाथ होते पर, मुख शब्दों का सफल चितेरा।
खेतों में बारूद उगाता, जंगल काट खदानें करता।
अंदर भूमि खोखली होती, मैं नभ तलक उड़ाने भरता।
घर, दौलत, दाना-पानी से, ऊपर होता अपना डेरा।
इंद्रधनुष के तार खींचकर, मकड़जाल फैलाता रहता।
त्राहि त्राहि के बीच खड़ा मैं, 'त्यागी बनो' सभी से कहता।
आडम्बर के इंद्रप्रस्थ में, मदिरा पीता नित्य अंधेरा।
मर जाता आंखों का पानी, आत्मघात करती मर्यादा।
अंत:-करण बेचकर स्वामी, चौपड़ का बन जाता प्यादा।
इस शतरंज में जीत न होती, सदा मात का होता फेरा।
ऐसा कहां सुयश था मेरा।
@बालाघाट, सोमवार, 15.06.26

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