मेरी पहली मेदुवड़ा जांच
तबीयत हफ़्ते भर से ठीक नहीं चल रही थी। शरीर शिथिल और मन अन्मना बोझिल था। ज्वाराभास भी था। रात में संक्रमण और बुखार की टेबलेट लेकर सोता था। सुबह तक उसका असर रहता था। बुखार के कारण ही रात में तकिया और अंतर्वस्त्र गीले हो जाते थे। आजकल वायरल और बुखार का दौर चल ही रहा है। मुझ अकेले को ही नहीं, जो मिलता वही यह शिकायत करता था। जो सबके साथ हो रही है, वह कोई गंभीर बात नहीं है कोई समस्या नहीं है, यह मानकर हम सब के साथ मैं भी लापरवाह ही था और इसे सामान्य समस्या समझकर चल रहा था।
16 मार्च 2026 सोमवार की सुबह मेरे एक परिचित कवि और शिक्षक,जो सेवानिवृत्ति के क़रीब हैं, उनके बड़े बेटे के फांसी लगाकर जान देने का विडम्बनापूर्ण समाचार आया।
स्वैच्छिक-देह-निवृत्ति करनेवाले युवक की उम्र 29 वर्ष थी। कारण अज्ञात था। पिता के अनुसार कोई चिट्ठी भी लड़का नहीं लिखकर गया था। अन्य सूचनाओं के अनुसार वह अतिथि शिक्षक के रूप में जिस शासकीय विद्यालय में पढ़ाता था, संयोग से वह मेरे पड़ोस में ही था। यह मुझे घटनोत्तर पता चला।
कुलमिलाकर, पता चला कि मरणोत्तर-शल्य-क्रिया (पोस्ट मॉर्टम, पी एम) और पंचनामा के पश्चात लगभग 3 बजे तक शव-दाह (अंत्येष्टि) जागपुर के मृत्युंजय घाट में होना है। मुझे लगा कि जाना चाहिये। शिक्षक कवि से वैचारिक वैभिन्य और अनेक कवि-कुल-अप्रिय-प्रसंगों के बावजूद कुशल-क्षेम का संबंध था। पर मनुष्य समाज में मृत्यु-शोक के समय इसे भुला दिया जाता है। फिर यह तो अविवाहित युवा-पुत्र का मृत्यु-शोक था। मैं प्रायः अंत्येष्टि कार्यक्रमों में धूल और धुंआ के कारण भाग नहीं लेता, पर यहां जाने के लिए तैयार हो गया और पत्नी तथा बेटे को भी जाना उपयुक्त लगा।
मैं अपने कनिष्ट पुत्र के साथ अन्त्येष्टि में चला गया।
अंत्येष्टि की तैयारी और किसी विशिष्ट स्वजन की प्रतीक्षा में समय लगा। तकरीबन घण्टा भर मैं मित्रों के बीच खड़ा रहा। प्रतीक्षित के आते ही दाहकर्म आरम्भ हुआ। इधर गर्मी भरे माहौल में धूप, धुआं और आंच में मुझे थकान भी लगी और प्यास भी। मैं हटकर एक स्कूटर का सहारा लेकर बैठा। लेकिन प्यास और गर्मी से मुझे पेट में खिंचाव हुआ और मैंने पुत्र से पानी मांगा। दो घूंट पानी पिया ही था कि मुझे चक्कर आया, पसीना निकला, मूर्छा का क्षणिक स्पर्शाभास हुआ।
अब उम्र ज़्यादा। बोझ ज़्यादा। ले जाया गया हॉस्पिटल। मुझे होश था, मगर ऑक्सीजन लगाई गई, विटामिन वगैरह इंजेक्ट किया गया। लुपिड प्रोफाइल हुआ, ईसीजी हुई, दो तीन बार हुई, कई बार बीपी लिया गया। मगर सब नार्मल। अब डॉक्टर परेशान। कुछ तो निकलना चाहिये। वर्ना करोड़ों के बहुमंजिला हॉस्पिटल की प्रतिष्ठा ख़राब। वह किस काम का डॉक्टर और मेरे मरीज़ होने की क्या उपयोगिता?
यही सोचकर उसने मेरा अवेयरनेस टेस्ट लिया। कुछ शब्द बुलवाए। हाथ पैर उठवाए। पालथी मारकर बैठाया, उठाया। और वह निराश हो गया। जैसे मेरा बुरा चाहनेवाला तथाकथित कोई दोस्त हो, जो अफ़वाह फैलाने की तैयारी किये बैठा हो।
उसने एक अवसर और लिया। सहूलियत के लि मेरा सीटी स्कैन रेफर कर दिया।
अगले आधे घण्टे में वह 'मेदुवड़ा नुमा मशीनी टेस्ट' हो गया। मेदुवड़ा जांच में एक मेदुवड़ा-आकृति का गोलाकार यन्त्र होता है। पहली बार मेदुवड़ा मशीन को देखकर मुझे इस्पात संयंत्र के कॉफ़ी हाउस की याद आयी। कुँआरेपन के दिनों में यही कॉफ़ी हाउस हमारा अन्नपूर्णा था। सांभर और नारियल की चटनी के साथ डोसा, मेदुवडा, इडली आदि हमारे भोजन थे। चाय और कॉफ़ी तो दिन भर के सहयोगी।
मशीन को देखकर मेरे मुंह में मेदुवडा का कुरमुरा स्वाद भर गया। मैं लपककर मेदुवड़ा आकृति के साथ लगी हुई चम्मचनुमा शायिका पर लेट गया। इसी यंत्रीकृत चम्मच-नुमा शायिका पर लेटाकर रुग्णारोपी को मेदुवडा के अंदर भेजा जाता है। मुझे भी भेजा गया। अंदर कुछ अदृश्य एक्स-रे कैमरों से संभावित रुग्ण-क्षेत्र के मज्जा, ऊतक और अस्थियों की छबियाँ ली जाती हैं। चूंकि यह जांच एक्स रे रेडिएशन के जुरिस्डिक्शन में आती है, इसलिए ज़रा जल्दी हो जाती है। अधिक देरी कैंसर को आमंत्रित करती है। इसलिए इस 'क्विक-टेक' में क़रीब एक-डेढ़ दर्जन एक्स-रे छबियाँ बनीं। उन छबियों को पढ़कर डॉक्टर ने बेटे से कहा - 'दो क्लोट्स हैं। दवा से ठीक हो जाएंगे।" उसने कुछ मुतमइन दवाइयां लिख दीं।
सहयोगी डॉ. ने कहा : "रोगी को मत बताना। वह घबरा जाएगा।"
मुझे उन्तालीस साल से पढ़नेवाले बेटे ने कहा : "रोगी पढ़ने लिखने वाला व्यक्ति है। वह यह जानकर पढ़ने लिखने का बहाना ढूंढ लेगा। उससे कुछ छुपाना ठीक नहीं होगा।"
बेटे ने ही मुझे बताया कि डॉक्टर ने क्या क्या कहा। मेरी ज़िंदगी में नया ट्विस्ट आया। अध्ययन के नए क्षितिज खुले। ईसीजी में सीधी रेखाएं बुरी मानी जाती हैं और टेढ़ी रेखाएं अच्छी मानी जाती हैं। यह भी तो मुझे सालों ईसीजी करके ही पता चला है न?
इसलिए जब पता चला तो मैं हमेशा की तरह बेफ़िक़र, लापरवाह और ज़िंदादिली के साथ अपने बंदी बिस्तर की तरफ़ लौटा। अभी मैं भर्ती था न, इसलिये।
अस्पताल में नर्स बच्चियां ही थीं। बीस पच्चीस साल की, कच्चे अनुभववाली प्रशिक्षित परिचारिकाएँ। वे चुहल करते हुए बोलीं-"अंकल, आप तो जबरदस्त हो गए।"
मैंने दर्प के साथ कहा- "जबरदस्त तो मैं हूँ ही, यहां जबरदस्ती ले आया गया हूं।"
उधर डॉक्टर रसिक व्यक्ति था। वह चाहता था कि रात भर तो रुकूँ। पर मैंने साफ़ इंकार कर दिया। मेरी दृष्टि में एक ही नगर में रहकर किसी अन्य शायिका में शयन तो व्यभिचार ही है। इस प्रकार मेरे शील के कारण अंततः मुझे छोड़ दिया गया।
मगर डॉ. मुझसे फिर मिलना चाहता था। पांच दिन बाद और मिलने का अनुरोध उसने किया। हालांकि डॉक्टर से मिलकर किसे अच्छा लगता है। मैं तो डॉक्टर से मिलना ही नहीं चाहता। किंतु सबका दिल रखना ही पड़ता है। इसलिए ना चाहकर भी बेमन से साल छः महीने में एकाध बार मिल लेता हूं।
मैंने उसे भी निराश नहीं किया। पांच दिन बाद मैं मिलने चला गया। उसने भी कोई छेड़छाड़ नहीं की। न दिल देखा, न दिमाग़। न सीने पर हाथ रखा, न पीठ पर। बस, कुछ देर मेरी कलाई थामे रहा, फिर बोला :"कैसा लग रहा है।"
ले-देकर वह आध्यात्मिक व्यक्ति था और समाज सेवक भी। इस विचार से मैंने कहा :"बहुत बढ़िया।"
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इस मुलाक़ात से क़रीब दसेक दिन बाद हमारा नागपुर जाने का पूर्व-निर्धारित पारिवारिक योग आया।
खुबाला की बुकिंग दो महीने पहले हो चुकी थी। नाती के जन्मदिन पर किसी न किसी जंगल की सैर पर निकलते ही हैं हर वर्ष। इस वर्ष खुबाला सागवन का फार्महाउस चुना। यानी सागवन (सागौन) के जंगल में दो रात दो दिन का स्टे। दो दिन नागपुर स्टे था।
स्वजनों के दिमाग़ में आया कि लगे हाथ और पांव 'आल इंडिया सुपर स्पेशिलिटी हॉस्पिटल' की भी सैर कर ली जाए।
दो दिन में क्रमशः बीपी, ईसीजी, ईईजी और पैंतालिस मिनट्स का चुम्बकीय गुफ़ा शोरगुल हो हल्ला जांच यानी एमआरआई भी हुई।
एम-आर-आई मशीन भी सी-टी स्कैन मशीन की हम-शक्ल है। मेदुवड़ा या डोनेट की तरह के इस यंत्र में आरोपी रोगी को अंदर प्रविष्ट कराया जाता है और उसके चारों ओर मैग्नेटिक कैमरे घूमघूमकर छबियाँ लेते रहते है। रुग्णारोपी एक सेलेब्रिटी की तरह एटीट्यूड के साथ आँखमूंदकर पड़ा रहता है और कोलाहल तथा शोरगुल करते हुए कैमरे पपराजी की तरह इधर उधर हर एंगल से फ़ोटो लेते रहते हैं।
एमआरआई के धमाकेदार पौनघंटे के फोटो सेशन के बाद दो तीन घण्टे में फ़िल्म मिली। मगर वह अत्याधुनिक 'सुपर एस्पेशलिटी हॉस्पिटल' था इसलिए स्पेशलिस्ट डॉ. के कंप्यूटर में फ़िल्म आ चुकी थी। उसने दो फिल्मों की 24 एमआरआई छबियाँ (मैग्नेटिक रेनॉसंस इमेजेज़ ) 5 मिनट में पढ़ ली और सिर हिलाकर बोला -"कुछ भी नहीं है।"
उसने कुछ दवाइयां भी नहीं लिखीं। स्थानीय डॉक्टर ने जो लिख दीं थीं, वह भी फिंकवा दीं। मुझे बहुत अच्छा लगा। अच्छा लगा कि आसपास कोई दुश्मन भी नहीं था, नहीं तो उसे बुरा लगता।
लेकिन मुझे डॉक्टर की एक बात बुरी लगी कि बीपी की जो दवाएं ख़ून पतला करने और कदाचित ख़ून का थक्का जमे तो गला दे, ऐसी दवाएं ज़ारी रखीं। ओवर वेट होने के कारण कोलेस्ट्रॉल के हमले अवश्यम्भावी थे। यह जबरदस्ती दो-तीन पुलिसवालों की सुरक्षा उपलब्ध कराने जैसा था। मैं क्या कोई मंत्री यंत्री हूँ?सीधे सादे सेवानिवृत्त शिक्षक की इतनी सुरक्षा क्यों? दुनिया को किसी शिक्षक से क्या लाभ?
ख़ैर!!
अन्ततः निश्चिंत होकर परिवार जनों के साथ दूसरे दिन हम मोगलीलैंड के नयनाभिराम अभयारण्य खुबाला-सुरेवानी जंगल की तरफ़ निकल गए। वह भी नया अनुभव था, उसकी चर्चा फिर कभी।
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@डॉ. आर. रामकुमार,
१२.०४.२६, बाघनगर बालाघाट, दक्षिण मध्यप्रदेश।

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