Wednesday, March 24, 2010

चूहों का साहित्य-विमर्श

पिछले पत्र का पुनश्च:
चूहों का साहित्य-विमर्श

मेरे आत्मन,, मेरे अपरूप चींचीं,
इतनी आत्मीय से घबराना मत कि कहीं मैं सरक तो नहीं गया। आगे पढ़ोगे तो समझ जाओगे कि मैं तुम्हें अपना अपरूप क्यों कह रहा हूं।
‘पर्दे के पीछे’ के लेखक जयप्रकाश चौकसे एक समर्थ लेखक है। दिनांक 24 मार्च 10 को प्रकाशित उनका लेख ‘ बचपन को समर्पित अमर पात्र ’ चींची तुम्हारी याद में है। श्री चौकसे कविता दर्शन और साहित्य का ऐसा समन्वय उपस्थित करते हैं कि उनका लेख फिल्मी कहीं से नहीं रह पाता। वे गंभीरता पूर्वक सामाजिक सरोकार के पैरोकार लगते हैं और उनके सूत्र विश्वगुरुओं के उद्गार। मैं उनके आलेखों को रेखांकित करते हुए पन्नों को और काला करता हूं। यह साहित्य का अद्भुत रंग दर्शन है कि जितने काले होते हैं पन्ने ,उतने उजले होते हैं। श्रद्धेय चैकसे के कुछ रेखांकित अंश चींचीं तुम भी पढ़ो..............‘ बचपन को समर्पित अमर पात्र ’
कार्टून पात्र ‘टाॅम एंड जैरी ’ सारी दुनिया के लागों का मनोरंजन विगत सत्तर वर्षों से कर रहे हैं।..हर कथा के अंत में मजबूत और डील डौल में बड़ी बिल्ली थककर निराश हो जाती है । हमेशा छोटा चूहा जीत जाता है। ..चूहे की जीत में आम आदमी को आनंद मिलता है ,क्योंकि जीवन में आम आदमी चूहा ही है और संस्थाएं तथा व्यवस्था बिल्ली हैं, जिनके भाग्य से प्रायः छींका टूटता रहता है। जीवन संग्राम में आम निहत्था आदमी कभी कभार ही जीत पाता है, परन्तु साहित्य और सिनेमा उसकी विजयगाथा ही प्रस्तुत करते हं , क्योंकि यही आदर्श स्थिति है। ...कार्टून देखते समय उन्हें प्रताड़ित करने वाले को प्रताड़ित होते देखना अजीब आनंद देता है।
चार्ली चैपलिन ने अपने बचपन (जो अत्यंत मुफलिसी का दौर था) में एक कसाई को कुत्ते के पीछे भागते देखा और बूचड़खाने के इस अनुभव को अपनी ध्वनिहीन फिल्मों में अनेक बार चोर पुलिस की दौड़ के रूप में प्रस्तुत किया। किसी को पकड़ने के लिए दौड़ना हमेशा मनोरंजन करता है। मुफलिस चैपलिन ने यह गति जीवन से ली। जीवन का स्पंदन कला में ढलकर मनभावन हो जाता है। सारी महान रचनाएं सरल ही होती है।.....रोजमर्रा के जीवन की छोटी मोटी घटनाएं ही महान रचनाओं का आधर होती हैं। किसी भी कलाकार के लिए बच्चों से बड़ा कोई ग्रंथ नहीं होता। उनकी छोटी सी भंगिमाओं में मानव जीवन के सारे गूढ़ रहस्य मिल सकते हैं। शायद इसीलिए सभी सृजन धर्मी अपने भीतर के बचपन को अक्षुण्ण रखते हैं। (जयप्रकाश चैकसे , )
चींचीं ! इसे तुम मेरे पत्र के पक्ष में दिया गया खुला समर्थन समझना। सोचना कि तुम्हारे मस्तिष्क पर किए जानेवाले अनुसंधान का भविष्य क्या है। और फिर बात यहीं खत्म नहीं हो रही है। बहुत कुछ आगे भी है। देअर आर माइल्स टू गो।
मित्र ! साहित्य में बदी-उज्जमा का एक उपन्यास लोकप्रिय और चर्चित हुआ है -‘एक चूहे की मौत ’। बिना मारे चूहे की मौत हो जाए तो प्लेग का खतरा लोगों की नींद हराम कर देता है। तुम डरने की भी चीज हो भाई! इस बात की भी बधाई! ‘भय बिनु होही न प्रीत’ राम ने लक्ष्मण को बताया था। तुलसी के राममानस को तो कुतरा होगा न तुमने ...?
प्रसिद्ध साहित्यकार और व्यंग्य लेखक श्री हरिशंकर परसाई ने भी अपने साहित्य में तुम्हारा जिक्र किया है। वे लिखते हैं ‘‘यदि आपके हाथ से चूहा मर गया है और आप कहीं यह बात सफल वकील के सामने कह दें तो वह चैंककर पूछेगा- ‘क्या कहा ? चूहा मार डाला ? आपने ? कैसे ? आप उसे बताएंगे कि आलमारी हटाते समय चूहा चपेट में आ गया।...वकील.. कहेगा ‘आपने दफा 302 का जुर्म कर डाला।’’ (कचहरी जानेवाला जानवर ,207,) 302 की धारा मनुष्यों की हत्या पर लगती है अगर वह हत्या मनुष्य ने ही की हैं

यानी तुम भी मनुष्य हो गये ,चर्चा का विषय हो गए दोस्त चींचीं ! बधाई!!!

तुम्हारा

फिर वहीं आदमी

दिनांक 24.03.10, रामनवमी

Saturday, March 13, 2010

चूहों की प्रयोगशाला

( चींचीं चूहे से रेटसन जैरी तक )

मेरे प्रिय बालसखा ,
बचपन के दोस्त ,
चींचीं !
कैसे हो ?
तुम तो खैर हमेशा मज़े में रहते हो। तुम्हें मैंने कभी उदास ,हताश और निराश नहीं देखा। जो तुमने ठान लिया वो तुम करके ही दम लेते हो। दम भी कहां लेते हों। एक काम खतम तो दूसरा शुरू कर देते हो। करते ही रहते हो। चाहे दीवार की सेंध हो ,चाहे कपड़ों का कुतरना हो , बाथरूम से साबुन लेकर भागना हो। साबुन चाहे स्त्री की हो या पुरुष की, तुमको चुराने में एक सा मज़ा आता है। सलवार भी तुम उतने ही प्यार से कुतरते हो , जितनी मुहब्बत से पतलून काटते हो। तुम एक सच्चे साम्यवादी हो। साम्यवादी से मेरा मतलब समतावादी है, ममतावादी है। यार, इधर राजनीति ने शब्दों को नई नई टोपियां पहना दी हैं तो ज़रा सावधान रहना पड़ता है।
टोपी से याद आया। बचपन में मेरे लिए तीन शर्ट अलग अलग कलर की आई थीं। तब तो तुम कुछ पहनते नहीं थे। इसलिए तुम बिल से मुझे टुकुर टुकुर ताकते रहे। मैं हंस हंस कर अपनी शर्ट पहनकर आइने के सामने आगे पीछे का मुआइना करता रहा। ‘आइने के सामने मुआइना’ , अच्छी तुकबंदी है न!
तुम्हें याद है ,तुम्हारी एक तुकबंद कविता किताबों में छपी थी और हम लोगों को पाठ्यक्रम में लगाकर बचपन में पढ़ाई जाती थी। उसी किताब से पता चला कि मेरी नई की नई तीनों रंगीन शर्टस जो अचानक गायब हो गई थीं वो तुमने चुराई थी और मुहल्ले के टेलर से उसकी कमीज और पतल्ून सिलवाई थी। यार ! तुम तब मुझे दुनिया के सबसे गंदे आदमी लगे थे। हां हां मुझे याद है , आदमी कहने से तुम्हें बुरा लगता है। मगर यार यहां आदमी तो किसी को भी कह दिया जाता है। अपराधी भी आदमी है और न्यायाधीश भी। नेता भी आदमी है और अभिनेता भी। सिर्फ सरदार को आदमी कहने से लोग हंसते हैं। दुनिया का चलन है। अपने मज़े के लिए लोग दूसरों को ऐसे ही टोपी पहनाते रहते हैं।
अरे हां , टोपी से याद आया। मेरी कमीजों को कुतर कर तुमने दर्जी से एक रंगीन टोपी सिलवाई थी। उस रंगीन टोपी को पहनकर तुम कितने इतराते फिरे थे। तुम बार बार मेरे सामने से गुजरते थे और मैं अपनी गुम हुई कमीजों को भूलकर तुम्हारी टोपी की तारीफें किए जा रहा था। तुम मज़े से हंस रहे थे। जैसा कि अमूमन हमारे देश में होता है कि जनता का पेट खंरोचकर लोगों के कुर्ते और टोपियों में कलफ का कड़कपन आता है और जनता अपना पेट का दर्द भूलकर उनकी बतकही का आनंद लेती रहती है। वो तो जब उनके कारनामे अखबारों में आते हैं तब जनता को समझ में आता है कि अरे ये तो उनकी ही खाल की खादी थी। खाल की खादी , एक बार फिर अच्छी तुक बन गई न ?
खैर छोड़ो। उस टोपी का क्या हुआ ? उसे किसे पहना दी प्यारे ? इधर टोपी पहनाने का बड़ा फैशन जैसा चल पड़ा है। राजनीतिक पाटियों की अलग अलग टोपियां हैं। लगता है ,राजनीति में टोपियां तुम्हारे ही इन्सपिरेशन से आई हैं।
धत् तेरे की!! चीचीं यार , इन्सपिरेशन से याद आया कि मैंने आज तुम्हंे इसी बात पर बधाई देने के लिए पत्र लिखना शुरू किया था और आदतन भटक गया।
कल अखबार में पढ़ा कि तुम पर एक नया प्रयोग होने वाला है। इधर कृत्रिम दिमाग बनाने का फितूर ,हमेशा कुछ न कुछ कृत्रिम बनानेवाले कृत्रिमता विशेषज्ञ वैज्ञानिकों के फितूरी दिमाग पर चढ़ बैठा है। अब वे पूरी तरह कृत्रिम हो चके आदमी के अंदर एक कृत्रिम बनाकर उसे पूरी तरह कृत्रिम बना देंगे। तुम तो जानते ही हो कि केवल आदमी ही वह प्राणी है जो अपने को बड़े फ़क्ऱ के साथ कृत्रिम कहलाना पसंद करता है। नही समझे ? क्यों वह अपने को कृत्रिम ईश्वर यानी ईश्वर का प्रतिनिधि और अवतार वगैरह नहीं कहता फिरता।
मुंहमैं फिर भटक गया। मैं बता रहा था कि कृत्रिम दिमाग बनेगा। आदमी का अब तक लगभग हर अंग कृत्रिम रूप से बनाया जा चुका है । नकली हाथ , पैर ,गुर्दा ,दिल। प्लास्टिक सर्जरी से नकली मंुह, नाक , कान। और भी दूसरे मनोरंजन प्रधान अंग। नकली बालों की विग। नकली आंख। ये सारी खुराफात जिस दिमाग की थी अब खुराफाती आदमी उस दिल को भी बनाएगा। आदमी मतलब वैज्ञानिक। वैज्ञानिक भी अभी तक आदमी होते हैं। केवल डाक्टर ही आदमी नहीं होते। वे बहुरूपिये हैं। कहीं कहीं भगवान होते हैं कहीं शैतान और कहीं कहीं तो साक्षात यमराज होते हैं।
तो बात वैज्ञानिकों की चल रही थी। वे अब दिमाग बनाएंगे। कृत्रिम दिमाग। इसका उपयोग चिकित्सा उद्योग में मानवीय उपचार के लिए किया जाएगा। इसमा मतलब यह है कि साइडइफेक्टवाली दवाओं से ऊबकर या घबराकर चिकित्सा माफिया अब मनोविज्ञानके के पांव पर गिर पड़ा है। इसके पहले वह स्रगीत चिकित्सा की शरण में गया जो कि एक प्रकार की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा ही है। दुनिया में सभी प्रकार के धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में सदियों से मनोविज्ञान की इसी ब्रेनवाशिंग टेकनिक से सफलतापूर्वक काम चल रहा है। राजनीति और अपराध इंडस्ट्री मनोवज्ञिान के आधार पर चुनाव ,आतंक तथा लूटमार की दूकानदारी चला रहे हैं। सहायक उपकरणें में सहायता के नाम पर रुपये ,शराब,कम्बल , घड़ी आदि ऐन टाइम के लिए है। फुलटाइम और पार्टटाइम के लिए तो मनोविज्ञान ही काम करता है। पार्टी का मनोविज्ञान। पार्टी यानी मुर्गा। आदमी मतलब गुर्गा। इधर जो नवनिर्माण की बातें कर रहे हैं वे क्या कर रहे हैं ? वे क्या बनाने की बात कर रहे हैं। वे बना रहे हैं। अपने ही लोगों को बना रहे हैं।
खैर । दिमाग बन रहा है और पहला प्रयोग चींचीं चूहे! तुम पर ही होगा। मगर मुण्े हंसी आ रही है। ये आदमीनुमा वैज्ञानिक तुम्हें क्या बनाएंगे। तुम तो स्वयं विद्यावाहन हो।(विद्याबालन नहीं)। विद्याधिपति विनायक के वाहन। तफमहारी सवारी गणेश हैं। जैसे शरीर की सवारी मस्तिष्क। जब आलरेडी गणेश तुम पर सवार हैं तो तो कृत्रिम दिमाग कहां बैठाएंगे ये लोग ? तुम्हें ये क्या दिमाग देंगे। तुमसे तो मनुष्य दिमाग लिया करते हैं। मुझे याद है कि तुमसे दिमाग लेने का उल्लेख महाभारत में आया है। लाचागृह प्रसंग में एक चूहे की प्रेरणा से ही सुरंग बनी थी और पांडुपम्नी सहित पांचों पांडव सकुशल बाहर भाग निकले थे।
टाम एण्ड जैरी नामक जो लोकप्रिय कार्टून सीरियल है और जिसे देखदेखकर हमारे बच्चे बड़े होते हैं और बड़े होकर चूहे हो जाते हैं , उसमें एक बात अच्छी है कि रेटसन जैरी चालाक बिल्ले टाम से हमेशा जीतता है। उसकी दोस्ती आदमी के वफादार कुत्ते से हुआ करती है। यह सीरियल मुझे भी अच्छा लगता है और प्रेरणा देता है। प्रेरणा यह है कि कितना भी एक दूसरे को नीचा दिखाएं , टाम और जैरी हमेशा एक दूसरे को मिस करते हैं तथा आखिर में हमेशा एक दूसरे के मित्र हो जाते हैं। जेसे मेरी रंगीन शर्टस का ेचिन्दी ब करनेवाले दुष्ट चींचीं चूहे ! मै ंतुम्हें हमेशा मिस करता हूं।
यार सच कहूं चींचीं! कृत्रिम मस्तिष्क बनाने और तुम पर प्रयोग किए जाने की खबर से मै थोड़ा डर गया हूं। हालांकि वैज्ञानिकों का उद्देश्य गलत नहीं है। अवसाद ,उन्माद ,प्रमाद ,कुण्ठा ,विक्षिप्तिी आदि के मामले में कृत्रिम मस्तिष्क की भूमिका बहुत ज़ोरदार है। जेसे पेसमेकर वैसे ब्रेन केअरटेकर । मगर मानलो , लादेन , बाल-उद्धव-राज जैसों के हाथ में उसका फार्मेट या फार्मूला आ गया तो या नयी ब्रेन इंडस्ट्री ही उन्होंने खरीद ली तो क्या होगा। जैसे तुमने एक टोपी बनायी थी वैसी टोपियांबनाबनाकर ये अपने अनुयायियों को पहनाएंगे। फिर महाराष्ट्र ही क्या सारा राष्ट्र लहूलुहान हो जाएगा। केवल अमेरिका में ही भारतीय एजेन्सियों के ट्विनटावर नहीं गिरेंगे , भारतीय राजभवन को भी कोई नहीं बचा पाएगा। राजनीति इसका कितना उपयोग करेगी यह राजनीति जाने। यही सोचकर डर रहा हूं।
लेकिन फिर सोचता हूं कि ऐसा भी हो सकता है कि अच्छे लोगों के हाथों में यह दिमागी कारखाना आ जाए। ऐसा हो गया ता ेराजठाकरे जैसे लोगों को सकारात्मक नवनिर्माण के लिए ब्रेन ट्रांस्फार्मिंग के जरिए ठीक किया जा सकेगा। सारे आतंकवादियों को कसाब की तरह पकड़ा जाएगा , उनकी ब्रैनटांस्फार्मिंग की जाएगी और आतंकवाद खत्म हो जाएगा। अमेरिका और पाकिस्तान के राष्ट्रपतियों को उपहारस्वरूप ब्रेनप्रड़ी पहनायी जाएगी और वे आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों का बारूदी ओर विनासकारी सौदा करने की बजाय अरबों का शंतिवादी सौदा करने लगेंगे।
प्रिय चींचीं चूहे! तुम मुझे चिढ़कर ‘आदमी कहीं का’ कहते थे। जैसे लड़कियां रुआंसी होकर लुच्चा कहीं का कहती हैं। आज मैं जब तुम्हें चूहा कह रहा हूं तो सम्मान से कह रहा हूं। यार अगर तुम न होते तो चिकित्सा के नाम पर होने वाले इन प्रयोगों का क्या होता।एक तरफ मैं आरूश्ंका से डश्र रहा हूं तो दूसरी तरफ यह भी सोच रहा हूं कि डरा ही क्यों जाए ? हमारे पास दिमाग है तो इसका उपयोग अवसाद से निपटने के लिए ओरिजनली क्यों न किया जाए। यानी प्रयोग होने दिया जाए। ज़रूरत पड़े तो मैं भी हाजिर हूं। हम शुभ की कल्पना करते रहें और अशुभ को घटने के लिए छोड़ दें। चूहे की मौत.....आई मीन आदमी की मौत मरने से बेहतर है शुभ संकल्पों के लिए अपने को उत्सर्ग कर दिया जाए। जो होगा अच्छा होगा।
तो मित्र चींचीं चूहे! मेरी शुभकामनाएं।

तुम्हारा-
‘आदमी कहीं का ’
दिनांक: 5-6.03.10

Tuesday, March 2, 2010

फिर बसंत आया

इस बार बसंत जल्दी आ गया।
जल्दी आनेवाले को बेमौसम कहते हैं। देर से आनेवाले को भी बेमौसम कहते हैं। इसका मतलब है कि सबका अपना एक समय होता है ,जिसे मौसम कहते हैं। आम का मौसम ,जाम का मौसम, शाम का मौसम , फिर एक और जाम का मौसम , काम का मौसम , अंततः राम का मौसम।
पतझर का भी मौसम होता है। वह बसंत के पहले भी आता है और बाद में भी आता है। पहले आकर वह जासूसी करके चला जाता है कि रास्ता साफ है, अब बसंत आ सकता है। यानी बसंत उस खूसट और खुर्राट आब्जर्वर की तरह होता जो पहले क्षेत्र का मुआयना करने आता है तथा जिसे कार्यकत्र्ता घास तक नहीं डालते। कार्यकत्र्ता हरे हरे पत्ते लेकर आनेवाले बसंतनुमा उम्मीदवार को हरी हरी घास डालते हैं।सौदा इस हाथ दे ,उस हाथ ले का होना चाहिए। वोट चाहिए तो नोट बांटने की व्यवस्था करो। व्यवस्था करनी हो तो नोट बांटो।
कहा जा सकता है कि गड़बड़ी की आशंका से बसंत हड़बड़ी में जल्दी आ गया है। लोग समझ ही नहीं पाए और वह आ गया। न खांसा ,न खकारा। लोगों की हालत गफ़लत में सोये हुए उस जोड़े की तरह हो गई जो यह समझ रहा था कि बच्चे स्कूल में हैं। बुढ़उ बाजार गए हैं। पड़े रहो आराम से। क्या पता था कि स्कूल में आज जल्दी छुटटी हो जाएगी और बाजार बंद हो जाएगा। दोनों का कारण एक ही था -नगर बंद। नगर के एक इज्जतदार आदमी को पुलिस ने गलत काम करते रंगों हाथ पकड़ लिया था और अपनी शक्ति दिखाने के लिए इज्जतदार आदमी ने अपने कार्यकत्ताओं से कह दिया ‘कर दो नगर बंद।’ इज्जत चली जाए, परवाह नहीं, ताकत दिखनी चाहिए। इज्जत का क्या है , ताकत के बल पर उसे जब चाहे तब महफिल में नचवाया जा सकता है। ताकत चली गई तो समेटने में वक्त लगेगा। अतः बाजार बंद हो गए, दूकानें बंद हो गई। विशेष रूप से स्कूल बंद हो गए। नगर बंद सफल हो गया।
लोग हड़बड़ा गए कि अरे बसंतलाल ! ...अचानक ?....कैसे ? फिर लोग आसपास देखने लगे। आम तो बौरा गए हैं। कोयलियां कूक रही हैं। कैलेण्डर के छपने में भूल हो गई थी इसलिए तिथियां पहले की लग रही हैं। वर्ना एक ही पार्टी के तीन ताकतवर लोग यानी आम की बौर ,कोयल की कूक और नाचते गाते लड़के लड़कियों की सरस्वती पूजा जब एक साथ मंच पर आ गए हैं तो समझो बसंत आ गया है।
नये लड़के बसंत को नहीं पहचानते। उन्हें सारी ऋतुएं बसंत लगती हैं। उनसे कहो, ‘बसंत में फूल खिलते हैं। मन में अजीब सा कुछ होता है। सुन्दर चीजें सिर्फ अच्छी ही नहीं लगती ,कुछ और लगने लगती हैं।’ तो वे कहते हैं-‘ ऐसा तो हमेशा होता है। इसका मतलब हमेशा बसंत रहता हैं।’ नये लड़के परिभाषाओं में नहीं बंधते ,न टाइम का उन पर कोई बंधन होता है।
प्रौढ़ लोगों के सर पर इतनी जिम्मेदारियां और इतने टेन्शन हंै कि गप-सड़ाका ,धींगा -मुश्ती और ऐश अय्यासियों के लिए उनके पास वक्त नहीं है। बसंत उनको चाबता है और टाइम वेस्ट करता है। बूढ़े इतने बसंत देख चुके हैं कि अब बसंत के नाम से उनको जुर चढ़ने लगता है। ‘‘अब हो गया बहुत। अब तो राम नाम जपने की उम्र हो गई है। क्या रखा है बसंत फसंत में?’’ बसंत के बारे में पूछो तो उनका यही जवाब होता है।
फिर भी बसंत आया है। जब लोग ध्यान देना छोड़ दें तो लोगों के आने जाने का समय आगे पीछे हो जाता हैै। बाई चार बजे आए या पांच बजे, घरवालियां सोती रहें और बर्तन मांजने के लिए रख दें तो क्े अपनी सुविधा से आती जाती हैं। बसंत अपनी सुविधा से आया हैै। पोस्टमैंन चिट्ठी डाल जाता है। तुम पढ़ो या न पढ़ो। टेलीफोन का बिल ,बिजली का बिल को तुम्हारे हाथ से मतलब नहीं है। जहां जगह मिलती है वहां उन्हें डाल दिया जाता है। तुम उठाओ या न उठाओ ,तुम्हारा सिर दर्द। अखबारवाला पोंगली बनाकर आंगन में या बालकनी में फेंक जाता है । उठाओ न उठाओ ,पढ़ो न पढ़ो तुम्हारी मर्जी।
बसंत ऐसे ही आया है। देखो न देखो तुम्हारी मर्जी। सरस्वती पूजा , बसंत पंचमी न होती तो भाई लोगों को पता कहां चलता कि वह आया है। समय ऐसा घालमेल कर रहा है कि कुछ पता ही नहीं चलता।
बसंत से कुछ लोग कतराने भी लगे हैं। लोग समझते हैं चंदा मांगनेवाले चले आये हैं। गणेश का चंदा , दुर्गा का चंदा। डांस प्रोग्राम का चंदा। सरस्वती पूजा का चंदा। होली का चंदा। मंहगाई है कि रोज नए इंजीनियरिंग और कम्प्यूटर के पाठ्यक्रमों की तरह बढ़ती जा रही है। इसलिए चंदा देने और भीख देने में लोगों की रुचि कम हो गई है। जिनके पास ऊपर का आ रहा है ,लोग उन पर घुटने रखते है। बाकी लोगों के पास प्रायः नहीं जाते। तो जिनके पास नही जाते उनको पता ही नहीं चलता कि कोई महोत्सव आ गया है। बसंत का भी यही हाल है।
आजकल एम बी ए का क्रेज़ है। कुछ लड़के बैग में कुछ सड़क छाप प्रडक्ट, साड़ी सूट आदि लेकर आते हैं और प्रायः बंगाल से आते हैं। उन्हें हिन्दी नहीं आती। जो अंग्रेजी उन्हें आती है उससे अच्छी अंगे्रजी मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के लड़के बोल लेते हैं। वे बताते हैं कि एमबीए के छात्र हैं और कम्पनी के विज्ञापन के लिए तथा अपने प्रोजेक्ट के लिए वे निकले हैं। उन्हें देखकर गुस्सा आता है। वे पुरुषों की बजाय स्त्रियों के सामने अपना प्रेजेन्टेशन करते हैं। महिलाएं मोल तोल करके प्रायः उनके प्रडक्ट खरीद लेती हैं। पुरुष धुतकार देते हैं।

बसंत इस बार कम्पीटिशन बढ़ जाने से अपना प्रडक्ट लेकर पहले ही रिटेल मार्केटिंग करने आ गया है। बजट भी इन्हीं दिनों आता है। बजट और बसंत इस मामले में मौसेरे भाई हैं। दोनों की कोशिश महिलाओं को रिझाना है। पुरुषों को न बजट प्रभावित कर रहा है न बसंत। दोनों से मुंह फेरकर पुरुषवर्ग काम के समय में भजिये खाने और चाय पीने कैन्टिन की तरफ निकल गया हैं। तनखाह में रुपयों की जगह जब मंहगाई और इन्कम टैक्स मिल रहा हो तो आदमी काम की जगह कामचोरी करने लगा है। स्कूलों के शिक्षक जनगणना और चुनाव करवा रहे हैं और जनगणमन गाते हुए स्कूल के समये ही ढाबे की रौनक बढ़ा रहे हैं। राजनीति सीखनेवाले बच्चों को पढ़ाने का मन ही नहीं हो रहा है। लड़के भी पढ़ना नहीं चाह रहे हैं।
फिर भी बसंत बैग टांगकर घूम रहा है। लोग उसकी तरफ ध्यान नहीं दे रहे हैं तो वह गार्डन में बैठकर घर से लाया हुआ टिफिन खा रहा है और बोतल में लाए पानी को पी रहा है। इस नगर का शेडयूल पूरा करके वह दूसरे नगर में चला जाएगा। इस उम्मीद में कि किसी को तो उसकी जरूरत होगी। कोई तो उसका प्रडक्ट खरीदेगा।

(रचना का समय और तारीख : बसंत पंचमी से रंगपंचमी तक,
पढ़ने का समय: कहीं भी और कभी भी) -02.03.10