Saturday, October 17, 2009

फूल हरसिंगार के

राचौ ऋषिकेश और हरिद्वार से लौट आए हैं। वहां की हवा तो शायद नहीं न ला पाए मगर वहां के फूलों और वनस्पतियों के बीज जरूर ले आए हैं। जी हां , हरिद्वार और ऋषिकेश का अर्थ अब केवल धार्मिक कर्मकाण्ड और साधना नहीं रह गया है। पर्यटन तो था वह पहले से ; अभी कुछ वर्ष पहले राजनैतिक समीकरण और बंटवारे का भी वह प्रतीक बन गया है। योग के शारीरिक-संस्थान और आयुर्वेद के विश्व-बाजारवाद की हवा भी इन पर्वतीय नगरों को लग गई है। शुक्र है मेरे मित्र राजनीति और योग का बाजारवाद लेकर नहीं आए। वे कश्मीरी तुलसी , दार्जिलिंग की मिर्ची और हिमाचल के फूूलों के बीज लेकर आए हैं। पहले उन्हें गमलो में अंकुरित किया और एक के बाद एक उन्हें मेरे बागीचे में रोपते गए। पहले उन्होंने कश्मीरी तुलसी लगाई और कई बार आकर उसकी पत्तियों की इल्लियां निकालते और गमले की मिट्टी संवारते रहे।
मेरे उपवन में उन्हें इतनी रुचि क्यों ? दो कारण हैं.. एक वे और दूसरे हम। हम अपने बगीचे को चाहनेवालों की चाहतों से दूर नहीं करते। चाहे फूल हों ,चाहे सब्जियां हों या चाहे अमरूद और आम के फल हों। जो मांग सकते हैं, वे मांग ले जाते हैं। ज्यादा हो तो हमीं बांट आते हैं। इससे मेल-मिलाप की सुगंध और स्वाद मिलते रहते हंै। पड़ोस है मेरे आसपास , कोई हिन्दुस्तान या पाकिस्तान का राजनैतिक विवाद नहीं है। हां , कुछ संकोची और प्रातः भ्रमणार्थी भी होते हैं जो घुसपैठियों की तरह जासौन और चमेली के फूलों को चुरा ले जाते हैं। डालियां नहीं टूटती तो हमें भी दुख नहीं होता।
दूसरा कारण वे हैं। वे अपने पिता की जमीन पर बनाए मकान में सबसे ऊपर उपलब्ध कमरे में रहते हैं। चाहकर भी वे उपवन नहीं लगा सकते। हमारे उदार उपवन में वे अपनी इच्छाओं का प्रत्यारोपण करते रहते हैं। हमें भी अच्छा लगता है।
इस बार आए तो बोले ,‘‘ पारिजात का पौधा लाया हूं। आपके बगीचे की सुन्दरता बढ़ाएगा। गैट के बगल यह ठीक रहेगा।’’
कौन सी चीज कहां लगेगी इसका फैसला पत्नी करती है। उसने राचै को ,‘‘जैसा तुम उचित समझो भैया!’’ कहा तो राचै ने खुद ही लोहे की छड़ उठाई और पौधा रोप दिया। फिर चाय का दौर चलना ही था। चर्चा चली कि पारिजात क्या होता है और कैसा होता है ? मैंने पढ़ा है पारिजात का कोई फूल होता है मगर देखा नहीं है। राचै ने बताया कि सफेद रंग के सुगंधित फूल होते हैं। कोई दस फुट का झाड़ ही होता है। फूल रात मंे खिलते हैं और दिन में झड़ जाते हैं।
मेरी स्मृति में तत्काल एक गीत क्लिक हुआ और बजने लगा:‘‘ सांझ खिले ,भोर झरे , फूल हरसिंगार के ; रात महकती रहे।’’
‘‘ क्या यह हरसिंगार है ?’’ मैंने गीत पाॅज करते हुए पूछा। राचै नहीं जानता था। मुझे याद आया कि पड़ौसी ने कुछ माह पहले हरसिंगार का जिक्र किया था। उनकी पत्नी को कई सालों से साइटिका है और उसके इलाज के लिए हरसिंगार की पत्तियों का काढ़ा वे बनाना चाहते थे। तब गर्मी के कारण पत्तियां झर चुकी थीं। वे शरद ऋतु का इंतजार कर रहे थे। तब भी यह गीत मेरे दिमाग में गूंजा था। खैर उस वक्त बात अज्ञान के पाले में चली गई।
राचै के जाते ही पत्नी बोली ,‘‘ पता है , हरसिंगार घर के सामने नहीं लगाते !’’ मैं उत्सुकता से भर गया। पत्नी जानती है कि यह हरसिंगार ही है जिसका दूसरा नाम पारिजात है। ‘‘यानी पारिजात ही हरसिंगार है।’’ मैंने पूछा।
‘‘पता नहीं मगर लक्षण अगर यही हैं कि रात में खिले और सुबह झर जाए तो यह हर सिंगार है और इसका घर के सामने रौपा जाना कोई अच्छा सगुन नहीं है। नानाजी कहते थे कि सुबह इसके झरे हुए फूल देख लो तो दिन मनहूस हो जाता है।’’
‘‘हह....मैं इन बातों को नहीं ंमानता।’’ मैंने बात को टाल दिया। मेरी जिज्ञासा सिर्फ यह थी कि बचपन से गीत की शक्ल में गूंज रहे गीत का अनुसंधान कर सकूं। आलसी हूं या अज्ञानी या दोनों , मुझे कुछ पता नहीं। आखिर अपने संसाधनों से मैंने शीघ्र ही अपनी तड़पती हुई जिज्ञासा को सारे उत्तर उपलब्ध करा दिए।
पारिजात ही हरसिंगार है। बंगाल की शैफाली और तमिल की पाविजामल्ली। मैं फिर सारे सूत्ऱ लेकर गुनगुनाने लगा:‘‘सांझ खिले भोर झरे फूल हरसिंगार के ,रात महकती रहे।’’ पूरे दिन यह गीत मेरे गले में खदबदाता रहा और पत्नी पकती रही।

शाम को एक हादसा हो गया। मैं जब घूमकर लौटा तो देखा कि पारिजात का पौधा गेट के बाजू में नहीं है। मैंने पत्नी से पूछा। उसने बताया कि उसे अच्छा नहीं लग रहा था इसलिए उसने पौधा उखाड़कर बगीचे के पिछवाड़े लगा दिया है। अब उसे अच्छा लग रहा है।
‘‘ओह..’’ मैं संतुष्ट हुआ कि बगीचे में कहीं भी हो ,मेरा अज्ञात बालमित्र सुरक्षित तो है। मगर क्या सचमुच उसका भविष्य सुरक्षित है ? जिसका इतिहास चोट और बर्बादी से भरा हुआ है उसका वर्तमान कितना सुरक्षित रह सकता है। हरसिंगार के साथ यह जो मनहूसित का लांछन लगा हुआ है क्या वह सही है ? क्या पत्नी को अच्छा नहीं लग रहा था तो उसकी वजह उसकी घर के सामने मौजूदगी थी ? मैं अब गंभीर हो गया था। घर के सामने था हरसिंगार तो पत्नी उदास थी और अब वह पीछे हो गया है तो मैं गंभीर हूं। यह द्वंद्वात्मक-मानसिकता विचारों के कारण थी। मुझे उत्तर मिल गया। हम अपनी सोच को जीवन का हिस्सा बना लेते हैं। मैं जो गीत गुनगुना रहा था उसमे सुबह खिलने की बजाय झरने की बात थी। पर उस गीत में संगीतकार रघुनाथ सेठ का माधुर्य और संयोजन कोई नहीं देख रहा था। क्या बात थी कि संगीतकार हेमंतकुमार मुखोपाध्याय अपनी बेटी रानू मुखर्जी के साथ उस गीत को गाने के लिए विवश हुए। क्या कारण है कि डाॅ.हरिवंशराय बच्चन ने अपने गीत के लिए हरसिंगार के खिलने और झरने की अस्वाभाविकता को चुुना। मैं इस गीत को इसलिए नहीं गुनगुनाता था कि मैं उदास होना चाहता था। इसका संगीत संयोजन और खिलने झरने की विपरीतता मुझे आनंद देती थी। उदास गीतों का सौन्दर्य मुझे अक्सर रोमांचित और आनंदित करता है। यह टिपिकल है क्या ? मैं उदास गीतों को गुनगुनाकर आनंदित होता हूं कि कितना सहजोच्छवास और अभिव्यक्ति का कितना उदात्त संमिश्रण कवि ने किया है। उदासी मुझे नहीें घेरती , तो क्या मैं संवेदना से शून्य हूं ? मेरी मान्यता है कि उदासी के गीतों से भी रस और आनंद की सृष्टि हो सकती है।विरेचन हो सकता है। उदास गीत सुनकर उदास होना ही ईमानदारी नहीं है। गीत के साहित्यिक सौन्दर्य में डूबना भी ईमानदारी है। अगर ऐसा नहीं होता तो कबीर की उलटबासियां अद्भुत नहीं होतीं। अगर ऐसा नहीं होता तो नर्मदा परम्परा के विपरीत पूरब से पश्चिम बहकर पूजनीय नहीं होती है।
फिर हरसिंगार ,पारिजात या शैफाली का इतना अनादर क्यों ? शैफाली से याद आता है कि मेरे मोहल्ले में एक बंगाली लड़की थी शैफाली । ठिगने कद की उस सुन्दर सी लड़की का काॅलेज में मैं सीनियर था। मोहल्ले का होने से वह मुझे भाई मानती थी। वह अपने को सुरक्षित और विश्वस्थ समझती थी कि मैं था। पर सुना कि विवाह के बाद वह जलकर मर गई। वह एक हादसा होगा। क्या नाम उसका शैफाली था इसलिए वह जल गई ?
शैफाली , पारिजात या हरसिंगार को लेकर एक दुखांत कहानी भी रची गई है। एक सुन्दरसी लड़की थी पारिजातिका जो सर्वसाक्षी सूर्य के असाक्ष्य प्रेम
में पड़ गई। जो सबकी दृष्टि का कारण बनता है , वही सूर्य उसके प्रेम को नहीं देख पाया। परिस्थितियां ऐसी बनी कि प्रेम की तीव्रता और प्रिय की निरन्तर उपेक्षा के कारण पारिजातिका को आत्मोत्सर्ग करना पड़ा। शैफाली सर्वसाक्षी के जीवन से चली गई। कवियों को इसीलिए लगा कि पारिजात रात में खिलता है और सूर्य के उगने के पहले ही झर जाता है। हालांकि कहानी यह भी बनाई जा सकती थी कि पारिजातिका चंद्रमा के प्रेम में थी और अब भी है। भारतीय स्ववाग्दत्ताओं की तरह वह केवल चंद्रमा की प्रतीक्षा करती है , इसलिए रात में खिलती है और सूर्य जैसे पराए पुरुष की नजर न पड़े इसलिए सूर्योदय के पहले ही झर जाती है। मगर तब यह केवल प्रेम-कहानी होती। दुखांत बनाने के लिए पारिजातिका का उत्सर्ग जरूरी समझा गया।
ऐसे कवियों और कथागूंथकांे से मैं क्या शिकायत करूं ? शिकायत मुझे अपने प्रिय और सम्माननीय साहित्यकार पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी से है। उन्होंने पुनर्नवा में भट्टनी की दाह देखी। अशोक के फूल की तरफ गौर से देखा। कुटज जैसे जीवंत वन-पादप भी उनकी नजर से नहीं बच सके। ‘हिन्दी साहित्य की भूमिका’ लिखते हुए कविप्रसिद्धियों के बहाने वे चम्पा और मालती का जिक्र शीर्षक बनाकर करते रहे। मन्दार और मौलश्री की पड़ताल करते रहे। मगर बंगाल के संस्कारों से सने और गुरुदेव के सानिध्य में पके इस संस्कृतनिष्ठ गद्य-कवि ने जब शैफाालिका का जिक्र किया तो बड़ी उपेक्षा के साथ। ज्यादा जांचपड़ताल ,खोजखबर तो दूर ; एक अदना उपशीर्षक भी इस ‘वैद्यनाथ’ ने उसे नहीं दिया! चलते हुए पैराग्राफ में उसे निपटा दिया! क्या सचमुच पंडितजी नहीं जानते थे कि पारिजात या शैफाालिका एक ‘देवपुष्प’ है ? क्या सचमुच उन्हंे नहीं पता था कि यही एकमात्र ऐसा पुष्प है जो पृथ्वी पर गिरकर भी देवताओं के सिर पर चढ़ने के योग्य होता है ? इसी कारण इसका नाम पड़ा ‘दि फ्लावर आॅफ गाॅड’।
अंधेर है हरसिंगार। एक बात और ! हरसिंगार कहने से ‘हर’ शब्द पहले आ रहा है। हर अर्थात् भूतनाथ शंकर। हरसिंगार कहने से तो तुम शंकर के सिंगार हो जाते हो। कहीं इसीलिए तो वैष्णवी मानसिकता के भारत ने तुम्हारी उपेक्षा नहीं की ? नहीं मुझे यह नहीं लगता। मैं मानव कमजोरियों और स्वभाव की तरफ यात्रा कर रहा हूं।
वैज्ञानिकों ने तुम्हें ‘निक्टेन्थिस अर्बार्टिªस्टिस’ यानी रात को खिलनेवाला शोकवृक्ष कहा। तुम्हें ‘ट्री आॅफ सारो’ कहा। फिर यह भी बताया कि किन-किन रोगों को दूर करने के लिए तुम्हारी पत्तियां और छाल काम आती है। घर को महकाने के लिए तुम जलकर भी सुगंध फैलाते हो। सौन्दर्य प्रसाधन में तुम्हारा पेस्ट लाभदायक ,सर्दी जुकाम में तुम्हारा काढ़ा कामयाब ,साइटिका में तुम्हारी पत्तियों का रस उपयोगी। पेट दर्द और कब्ज तुम्हारी पत्तियों का रस दूर कर देता है। मगर दिमागी कब्ज को कौन दूर करे। इतने लाभकारी होनेके बादभी कृतघ्न समाज तुम्हें मनहूस समझता है जबकि तुम सुबहसुबह उनके लिए पांवड़े बन जाते हो।
परन्तु पारिजातिके! शैफाालिके! अगर तुम बुरा न मानो तो मैं अपना प्रेम निवेदित करता हूं। इसमें यह शर्त भी नहीं है कि तुम सूरज को भूल जाओ। मेरे लिए इतना काफी है कि तुम उसके सामने नहीें खिलोगी। सुना े! एक खुशखबरी है कि राशि के लिहाज से तुम मेरे लिए लकी हो। मैं सेजीटेरियस हूं...धनु। आज दीपावली है। ज्योतिष अभी अभी पत्नी को बता गया है कि आपके पति पारिजात का पौधा लगाएं और विष्णु की आराधना करें। लक्ष्मी प्रान्न होकर दीपावलीमें धन बरसाएगी। पारिजातिके!देवताओं ने तुम्हे हमेशा चाहा है। तुम्हारा पौधा रोपने को लेकर कृष्ण की दोनों पत्नियों में भी झगड़ा हो गया था। कृष्ण कहीं से पारिजात का पौधा ले आए। सत्यभामा और रुक्मिणी अपने अपने आंगनों में लगाने की जिद करने लगी। कृष्ण दोनों पक्षों को खुश करने में माहिर। सत्यभामा को तो पौधा दे दिया ताकि पारिजात फूले तो सुबह रुक्मिणी के आंगन में फूलों की चादर बिछ जाए।देखा तुम मनहूस नहीं हो शैफालिके!
इसलिए पारिजातिके ! विष्णु की आराधना और धन की बरसात पर मै ंबिल्कुल विश्वास नहीं करता। मगर सोचो तो तुम मेरी राशि के लिए शुभ होने से कितनी सुरक्षित हो गई हो। अब चाहकर भी मेरी पत्नी तुम्हें उखाड़ नहीं सकती। तुम्हें न सही मेरे भाग्य को तो वह बचाएगी ही। तो प्रेम भले ही स्वीकार न करो, दीपावली की शुभकामनाएं तो स्वीकार कर ही सकती हो। हैप्पी दिवाली।

Thursday, October 15, 2009

कलाकार के हाथ

ब्रह्मा नाम है कलाकार का। कलाकार लकड़ी का काम करता है। फर्नीचर-रैक-अल्मीरा.....और दूसरे भी लकड़ी के इन्टीरियल-डेकोरेटिव काम करता है। प्लाईवुड का काम ज्यादा है इन दिनों। वह आसानी से मिलता है और यह काष्ठकर्मी उनसे मनचाहा व्यवहार कर सकता है। मनचाहे रूप दे सकता है। सागौन अब भी उपयोग में आता है, मगर वह नम्बर दो में है; क्योंकि उसका काम नम्बर दो में होता है। सागौन माफिया आपकी चाही हुई मात्रा में रात में चोरी की लकड़ी आपके घरों में बाकायदा चोरी की मर्यादाओं और आचार संहिताओं को पालता हुआ पटक जाएगा। ताकि चोरी का भ्रम बना रहे। दूसरे- तीसरे दिन वनरक्षक या वन विभाग का कोई कर्मी आपसे पूछेगा कि इस तरफ लगभग इतना माल आया है। क्या आप बता सकते हैं किसके यहां आया है ?
दरअसल वनकर्मी को पता रहता है कि कितना माल कब और कहां जाना चाहता है। चोर उनसे पूछकर ही चोरी छिपे का लिहाज रखते हुए काम करते हंै। आपने सुना होगा कि एक चड्डी गिरोह है। वह चोरी के लिए , डाका के लिए घरों में घुसता है। घरस्वामी हुज्जत किए बिना माल दे देना चाहता भी है तो वे धुनाई करते हैं। बाद में माफी मांगते हुए माल लेकर जाते-जाते कहते हैं-‘‘ माफ करना , बिना मेहनत की कमाई हमारे डाकाशास्त्र’ में हराम है।’’ सागौन चोरों के लिए भी चोरी का वातावरण बनाए बिना लकड़ी चुराना हराम है। वनकर्मी ही चोरांे के वास्तविक ठेकेदार होते हैं। अब आप अपनी पोजीशन के हिसाब से बात संभाल लेते हैं। दरअसल बात होती ही इसलिए है कि संभल जाए । काम में रिस्क होती है ,संभलकर चलने की सलाहें दी जाती हैं और बातें जो हैं कि संभलती रहती हंैऔर सारा काम कायदे से चलते रहता है।
मेरा नगर सागौनपुर या सगुणनगर है। सागौन या सागवान जिसे कहा जाता है, मुझे लगता है वह ‘सगुन’ शब्द से बना होगा। सगुण शब्द सागौन की गुणवत्ता की रक्षा करता है और उसके सम्पूर्ण कृतित्व और व्यक्तित्व को उजागर करता है। सागौन गुणवानांे की पहली पसंद है। इसलिए मैं सागौन को सगुण कहता हूं। इस नगर को सगुणनगर कहता हूं। यहां वही इज्जतदार आदमी है जिसके पास सारा फर्नीचर, दरवाजे खिड़कियां नम्बर दो की सागौन का है। आसपास सगुण-सागौन का सैकड़ों मील फैला घना जंगल है। फलस्वरूप ज्यादातर लोग यहां इज्जतदार हंै। लगभग सेंटपरसेंट। एक दो परसेंट वो लोग हैं जो सिद्धांतों की भूलभुलैया में परिस्थितिवश पड़े हुए हैं। जैसे कि गुरुदेव सामरिया। गुरु सामरिया मेरे घर के सामने रहते हैं। मेरी तरह वे भी सिद्धांतों की भूलभुलैया में घिरे हुए हैं। इसलिए सिद्धांतों के कारण जब वे परिस्थियों से पिटते है तो मैं उन्हें सान्त्वना देता हूं और कहता हूं-‘‘ सत्य परेशान तो हो सकता है मगर पराजित नहीं हो सकता।’’ यही बात वे मुझे कहते हंै जब मै परिस्थियों से सिद्धांत नामक आत्मज के कारण पिट जाता हूं। हम दोनों एक दूसरे के राहत केन्द्र हंै। प्रायः रोज ही हमें राहत की जरूरत पड़ती है और रोज ही हम एक दूसरे को वह ‘परेशानी और परास्त’ का सिद्धांत ,सूत्र या काढ़ा पिलाते रहते हैं। लोग समझते हैं कि हम दोनों में जमती है। इसीलिए किसी ने कहा है-‘‘खूब गुजरेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो।’’
काष्ठकर्मी ब्रह्मा उनके घर में काट-छांट, ठुकाई-पिटाई कर रहा है। सामरिया गुरु भी अपनी अंटी को संभालते हुए उसके आसपास ही लगे हुए हैं। जैसा कि ऐसे मामलों में होता है ,मुझसे रहा नहीें जाता। मैं जानबूझकर किया गया नमस्कार उनसे करता हूं और सर्वर मिलते ही कहता हूं , ‘‘ गुरुदेव! क्या आप भी नगर की इज्जतदार परम्परा से जुड़े जा रहे हैं।’’
वे सान्त्वनेय होकर कहते हैं ,‘‘नहीं आदरणीय, पलंग ढीला हो गया था, दीवान का प्लाई घुन गया था , वही ठीक करा रहा हूं। यानी वही अपनी सीमाओं की रिपेयरिंग चल रही है। नगर के सभी लोग गणमान्य हो जाएंगे तो भगवान की नैया कौन चलाएगा ?’’मैं जोर से हंस पड़ा और बोला ,‘‘ मैं तो घबरा गया था कि आप भी साथ छोड़कर चले....’’
वे सान्त्वना के मूड में आ गए और बोले ,‘‘ नहीं नहीं कैसी बात करते हैं.... उधर भी साथ ही चलूंगा।’’
मैं आश्वस्त हो गया। यही तो मैं होना चाहता था। उधर , वहां और उस तरफ का ख्याल बना रहता है। हम दोनांे इन शब्दों के मतलब समझते हंै और वेदरक्षा करते हैं।
अचानक दोपहर में जब पढ़ने आए बच्चों को मैं निपटा रहा था तभी गुरुदेव के घर से लगभग झगड़ने जैसी आहट आयी। मैं राहत की थैली सम्हालते हुए दौड़ा। किस्सा-ए-मुख्तसर यह कि कलाकार कुछ कलाकारी करना चाहता था। पाए और प्लाई में कुछ नयी डिजाइनें डालना चाहता था और इसके लिए उसे नये सिरे से सामान चाहिए थे जो उससे जुड़े हुए प्लाई-विक्रेता के यहां ही मिल सकते थे। गुरुजी कला के विरोधी नहीं है और कलाकारों का बहुत सम्मान करते हैं लेकिन उनकी मजबूरी यह है कि कला सिर्फ कला के लिए है और अपने बजट में वे उसे दखलंदाजी की छूट प्रदान नहीं कर सकते। मंदिर की आरती में जाकर वे शामिल हो सकते है ंमगर घर में मुर्ती स्थापित करने के वे पक्ष में नहीं हो सकते। वे भड़क गए थे। मै जब पहुंचा तो वे कह रहे थे -‘‘ भाई ब्रह्मा! तुम बहुत ऊंचे कलाकार हो ,तुम्हारा काम बहुत ऊंचा है, मैं तुम्हारे काम की प्रशंसा करता हूं। मगर तुम समझते क्यों नहीं कि तुम इस नगर के नगरसेठों के यहां काम नहीं कर रहे हो। तुम एक गुरुजी के यहां काम कर रहे हो। तुम उस ऊंचाई में जाकर मुझे क्यों पुकार रहे हो ? मैं नहीं चढ़ पाउंगा भगवन! मुझे माफ करो। और फिर इस पलंग पर मुझे सोना है, मुझे ... मुझे। किसी ऐश्वर्या राय या अमिताभ बच्चन को नहीं। हम आम आदमी की भूमिका नहीं कर रहे हैं , आम आदमी हैं। इसलिए इसे केवल पलंग बनाओ , अजंता और ऐलोरा है हिन्दोस्तान में।’’
काष्टकर्मी ब्रह्मा मुंह बाए गुरुजी का मुंह देख रहा था। पता नहीं वह उनकी बात समझ भी रहा था या नहीं मगर इतना जरूर समझ रहा था कि गुरुजी का बजट बिगड़ रहा है। मैंने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए कहा-‘‘ जैसा कहते हैं वैसा ही बनाओ , कला को कहीं और के लिए सुरक्षित रखो।’’ ब्रह्मा ने थूक निगलकर सिर हिला दिया और ठोंक-पीट करने लगा। मगर उसका उत्साह धीमा पड़ गया था। गुरुजी ने उसके हाथ काट दिए थे। ये वो हाथ थे जो कला को तो आकार देना ही चाहते थे मगर गुरुजी की अंटी को भी क्षतिग्रस्त करना चाहते थे। जानबूझकर नहीं अनजाने में। कलाकार तो अपनी धुन में काम करता है। वह बजट की परवाह नहीं करता। क्यांेकि उसे काम का पैसा समय के हिसाब से मिल रहा है। बजट सामनेवाले का बढ़ रहा है। काष्टकर्मी का बजट बन रहा है। उसकी कला पेट के लिए थी। गुरुजी पेट काटकर काम करा रहे थे। उनका वश चलता तो खुद ही पलंग सुधार लेते। मगर पलंग बिना कारीगर या काष्टकलाकार के सुधरते ही नहीं। मजबूरी में उन्होंने बढ़ई को बुलवाया था।
खैर कला ने बजट के साथ समझौता कर लिया था। गुरुजी ने कहा, ‘‘आपको चाय पिलवाऊं आदरणीय’’ और बिना उत्तर ग्रहण किण् वे अंदर चले गए। उनके अंदर जाते ही कलाकार का दर्द मेरे सामने फूट पड़ा-‘‘ गुरुजी बेकार नाराज हो रहे हैं... ऐसा काम कर के देता कि लोग देखते और पूछते किसने किया.. मगर क्या करूं...मेरे तो हाथ कट गए..’’
मैंने कहा -‘‘ तुमको पता है कि पहले क्या होता था...ताजमहल बनते थे , कलाकार अपनी पूरी कला उसमें उड़ेल देते थे.. उन्हें राजा मुंहमांगा पैसा भी देते थे और ईनाम भी देते थे। मगर उनके हाथ काट लेते थे ताकि वैसी कला वह और कहीं दिखा ना पाए। तुम शुक्र करो कि तुम्हारे हाथ सलामत हैं, तुम्हारी कला बची हुई है। कहीं और उसका इस्तेमाल कर लेना।’’
मगर कलाकार का मन खिला नहीं। वह अब एक आम बढ़ई की तरह ठोंक पीट कर रहा था।

Saturday, October 3, 2009

प्रेम के माइम और दुख की मिमिक्री

दो धाराएं हैं जिनमें समाज बह रहा है। एक प्रेम है और दूसरा दुख। दुख होता है तो दिखाई देता है। प्रेम भी छुपता नहीं।
दुख दिखाई देता है तो पर्याप्त समय-प्राप्त लोगों को सहानुभूति होती है । करुणा और सान्त्वना आदि प्रदर्शित करने के प्रयासों की घटनाएं भी हो सकती हैं। दुख बहुत गंभीर हुआ तो भीड़ करुणा में इकट्ठी हो सकती है।
प्रेम दिखाई देता है तो चर्चा होती है। घृणात्मक आक्रोश होता है। हंगामा भी हो सकता है। लोगों की भीड़ इकट्ठी हो सकती है। तमाशा देखने या आलोचना के पत्थर फेंकने। मजे लेने या थू थू करने....थू थू यानी अपने अंदर की गंदगी को बाहर उलीचने।
दोनों स्थितियों में भीड़ इकट्ठी हो रही है। भीड़वादी लोग इसका लाभ उठाने का वर्षोें से प्रयास करते रहे हैं। दुख के कारण और प्रेम के कारण गौण हो सकते हैं किन्तु भीड़ का लक्ष्य ऐसे लोगों के लिए गौण नही होता। यहां से प्रेम और दुख की अभिनय-यात्रा शुरू होती है। प्रेम और दुख के अभिनय देखकर लोग प्रभावित होते हैं और उसका जन-संचार करते हैं। दुबारा उसे देखने की कोशिश भी करते हैं। प्रेम और दुख के व्यावसायिक संगठन और संस्थान विभिन्न नामों से कार्यरत हैं। राजनैतिक, वाणिज्यिक, सामाजिक, धार्मिक ,गैर शासकीय ,आदि तरीको से प्रेम और दुख का अपेक्षित दोहन किया जा रहा है। दुख और प्रेम के दोहन की अपनी अपनी शैलियां और विधाएं हुआ करती हैं। अभिनय की परम्परागत शैलियों के अलावे एकाभिनय की दो विभिन्न शैलियां भी प्रचलित हैं। मूकाभिनय और एकल प्रदर्शन। अंग्रेजी में इन्हें हम माइम और मिमिक्री के नाम से जानते हैं।
माइम के माध्यम से अभिनेता या प्रस्तुतकत्र्ता लोगों की करुणा और वाहवाही लूटने की चेष्टा करता है। वह गंभीर उद्देश्यों की व्यंजनामूलक अभिव्यक्ति की कला है। मूकाभिनय के माध्यम से दर्शकों के दिमाग के जागे रहने की मांग इस कला में छुपी होती है। इसमें अनजाने और अछूते विषयों को छूने की कोशिश की जाती है।
मिमिक्री पूरी तरह प्रसिद्धों की विद्रूपताओ का माखौल या नकल होती है। इसमें ध्वनि और संवादों का पूरा प्रयोग होता है। दर्शक जिसमें हास्यानुभूति जीवित होती है वह दिमाग को एक तरफ सरकाकर मजे के स्वीविंग पूल में छलांग लगा देता और जोर जोर से हाथ पर हाथ और जमीन पर पैर पटक पअटक कर हंसता है। दिमाग ऐसे समय पूरी तरह आकसिमक अवकाश पर होता है और तरोताजा होकर फिर अपने दुख के भवसागर में माइम करने चला आता है।
कहते हैं वह सर्वश्रेष्ठ हास्य कलाकार होता है जो सर्वाधिक दुखी होता है। अब तक भारत में हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ व्यंग्य लेखक हरिशंकर परसाई माने जा रहे हैं। उनहोंने अपने व्यंग्य से हंसाया भी है और खुद हंसे भी है। उन्होंने सवाल उठाया -‘‘ व्यंग्य क्या है ?’’ आगे उत्तर दिया -‘‘ चेखव ने कहा है ,‘ जो दुखाी होता है ,वह हास्य व्यंग्य लिखता है। जो सुखी होता है वह दुख का साहित्य लिखता है।’’’
व्यंग्य और हास्य में अंतर होता है। दुख की मिमिक्री करने से हंसी आती है। कुछ कलाकारों ने हंसते हुए रुलाया भी है। वे हास्य की भूमिका रचते हैं और लोग करुणा से भरने लगते हैं। मेहमूद यहां जीत गए। हंसाते हंसाते रुलाने में वे सिद्धहस्त कहलाए। उनके हास्य में तीखा व्यंग्य और आक्रोश भी दिखाई देता है। राजकपूर ने हमेशा नायक बनने का प्रयास किया । वे करुण पात्रों की हास्यास्प्रद परिस्थियों में करुणा की तलाश करते हुए नायक बनते थे। जोकर के अति कारुणिक परिस्थिति में हास्यास्प्रद होकर और रोकर वे न रुला सके न हंसा सके। उनकी उस कल्पना को भारतीय दुखवादी
दर्शकदीर्घा ने अस्वीकार कर दिया। यही भूल आलातरीन गायक मोहम्मद रफी ने की। ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ में जहां उन्होंने लयात्मक सिसकारी भरी है ,वह प्रभावहीन हो गई और मोहम्मद रफी फिसलकर नेपथ्य में चले गए। पर उनके अमर गीत आज भी अपनी जगह हैं। फिसलता इंसान है ; रचनाएं अपनी जगह खड़ी रहती हैं।
इन दिनों मिमिक्री को हास्य में तब्दील करके दर्शकदीर्घा में टी आर पी का जाल फेंका जा रहा है। मगर वह फूहड़ क्षणजीविता का हुनर है। दुख पर हंसना हम चाहते हैं क्योंकि दुख की घुटनभरी कोठरी से बाहर आना चाहते हैं। प्रेम हमारे लिए माइम ही बना हुआ है। प्रेम की बात चलते ही हम मूक हो जाते हैं। प्रेम में ‘हंसे तो फंसे’ का जुमला द्वि-अर्थी है।फंसने का अर्थ जीवन भर की मुसीबत मोल लेना भी हां सकता है। प्रेम की बात चलते ही हंसे तो अविश्वसनीयता के घेरे में आ जाओगे। वह मादक हंसी दूसरी है जो रक्त में तूफान पैदा करती है और हंसी को चुप्पी की मोहनी जकड़ लेती है।
राजनीति दोनों का सौदा करती है। एक ही व्यक्ति गंभीर राजनेता भी है और उद्देश्यपूर्वक हंसोड़ वक्तव्य देता है।लोग हंसते हैं तो वह अपनी सफलता पर खुश होता है और हंसता है। इसी हंसोड़ घोषणापत्र को लेकर वह देश के सर्वोच्च पद की चाहत भी रखता है। मगर वह सिर्फ प्रसाद नहीं है , लाल भी है और सिंह भी। शराब सबके असली चेहरे और नकली गंभीरता को उंडेल कर बाहर उलीच देती है। हंसाते हुए भी तुम कूटनीतिज्ञ हो और गंभीर होकर भी तुम मज़ाक कर रहे हो। जनता जानती है कि कौन कब जनता का नहीं है। राजनीति जनता को नहीं स्वयं को धोक़ा देने से शुरू होती है और स्वयं को छलती हुई खत्म हो जाती है। जयशंकर प्रसाद ने ठीक कहा था कि जब वीरता भागती है तो उसके पैरों से राजनीति के छल छंदों की धूल उड़ती है। 021009

Thursday, October 1, 2009

उम्मीद के चेहरे

सारे शहर में उसने तबाही सी बाल दी
अपना पियाला भरके सुराही उछाल दी

हमने उड़ाए इंतजार के हवा में पल
वो देर से आए ओ कहा जां निकाल दी

मां को पता था भूख में बेहाल हैं बच्चे
दिल की दबाई आग में ममता उबाल दी

जिस आंख में उम्मीद के चेहरे जवां हुए
बाज़ार की मंदी ने वो आंखें निकाल दी

नंगी हुई हैं चाहतें ,राहत हैं दोगली
‘ज़ाहिद’ किसी ने अंधों को जलती मशाल दी
021009/शुक्रवार