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कारी पुतरी>काली पुतली>काली पुत्री

 कारी पुतरी>काली पुतली>काली पुत्री 



आंख की काली पुतली : शरीर के तंत्रिका-तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है आंख। आँख के बीच में एक काला छेद होता है जो सिकुड़कर और फैलकर रोशनी को नियंत्रित करता है, जिससे हम स्पष्ट देख पाते हैं।  इसे काली पुतली (Pupil) कहते हैं। यह काली इसलिए दिखती है क्योंकि आँख के अंदर जानेवाला प्रकाश आँख के अंदर के ऊतकों (tissues) द्वारा पूर्णतः अवशोषित हो जाता है और बाहर परावर्तित नहीं होता। प्रकाश विज्ञान का यही नियम है। सारे रंग लौटा दिए गए, पारेषण उनका हो गया तो बचा ही क्या? सब सफ़ेद हो गया। जो सब लौटा दे, किसी का कुछ ले ही न, वह साफ़ सुथरा, पाक-साफ़, निर्लिप्त, संत, सूफ़ी और प्रतिष्ठित हो गया। विश्वसनीय और आदरणीय हो गया। 

वहीं दूसरी ओर, जिसने सब कुछ ले लिया, ग्रहण कर लिया, हड़प लिया, हजम कर लिया तो वह काला हो गया। सारे रंगों का अवशोषण ही काला (रंग) होना है। जैसे ब्लैक होल, वह ऐसा स्थान है, जहां जो भी गया है, लौटा नहीं है। जो सब हजम कर जाये, और डकार भी न ले, उस पर समाज कालिख पोत देता है। उसका मुंह काला हो जाता है। किसी को वह मुंह दिखाने लायक नहीं होता। काला मुंह भी  कोई दिखाने की चीज़ है। फिर लाख सिर पटक लो, काले पर कोई रंग नहीं चढ़ता। 'जस की तस धर दीन्ही चदरिया' के  गायक महासंत कबीर के परवर्ती महाभक्त सूरदास ने एक पद में यह प्रमाण दिया है- 'सूरदास काली कमली पे चढ़े न दूजो रंग।'

  पुराणों या आदि-कथाओं में सर्वाधिक प्रिय चरित्र श्याम या कृष्ण का चित्रित है। सूरदास ने इस चरित्र को महाकाव्य 'सूरसागर' ( भागवतपुराण का पद अनुवाद) का केंद्रीय पात्र बनाया। उनका भ्रमर गीत तो वियोग श्रृंगार में वाग्विदग्धता का अद्भुत सौंदर्यशास्त्र है। इसमें काले का विप्रलम्भ अद्वितीय रूप से उभरा है।

          उद्धव की ब्रजयात्रा का पहला पद ही रंग-दर्शन से आरम्भ होता है।  'कोऊ आवत है तन स्याम!'(भ्रमर गीत, पद १३)। वहीं १७ वें पद में 'सुंदर स्याम सलोने' कहकर काले (कृष्ण) का महिमा-मण्डन किया गया है। 

'स्याम मुख देखे ही परतीति।(३३), वह मथुरा काजर की कोठरि, जे आवहिं ते कारे। तुम कारे सुफलकसुत कारे, कारे मधुप भंवारे। मानहु नील माट तें काढ़े लै जमुना ज्यों पखारे।  ता गुन स्याम भई कालिंदी सूर स्याम गुन न्यारे।।(३८)।

कारो नाम, रूप पुनि कारो, कारे अंग सखा सब गात। जो पै भले होत कहुं कारे, तो कत बदलि, सुता लै जात। (४३)।

जो पै स्याम कूबरी रीझे सो किन नाम धरावत। ज्यो गजराज काज के औसर औरै दसन दिखावत।(४५)। 

निरखत अंक स्याम सुंदर के बार बार लावति छाती।  लोचन-जल कागद-मसि मिलि कै, ह्वै गई स्याम स्याम की पाती। (५७)। 

 मधुकर! कह कारे की जाति?

कोकिल कुटिल कपट बायस छलि फिरि नहिं बहि बन जाति? तैसेहि कान्ह केलि-रस अंचयो बैठि एक ही पांति।(१५७)।

 ऊधो! ऐसो काम न कीजै।

एक रंग कारे तुम दोऊ, धोय सेत क्यों कीजै?(१९७)

ऊधो!अब नहिं स्याम हमारे। 

कपटी कुटिल काक कोकिल ज्यों अंत भये उड़ि न्यारे।(२३१)

मधुकर! देखि स्याम तन तेरो।(हरि मुख की सुनि  मीठी बातें डरपत है मन मेरो।)(२५३)। 

मधुकर! यह कारे की रीति।

मन दै हरत परायो सरबस, करै कपट की प्रीति। ज्यो खटपद अम्बुज के दल में बसत निसा-रति मानि। दिनकर उए अनत उड़ि बैठे, फिर न करत पहिचानि। भवन भुजंग पिटारे पाल्यो ज्यों जननी जनि तात। कुल-करतूति जाति नहिं कबहूँ , सहज सो डसि भजि जात। कोकिल काग कुरंग स्याम की छन-छन सुरति करावत। सूरदास प्रभु को मख़ देख्यो, निसदिन ही मोंहि भावत। (२६९)

मधुकर! ये सुनु तन मन कारे। कहूँ न सेत सिद्धतन परसे, ताई हैं अंग कारे। (२७३)। 

मधुकर! तुम देखियत हौ कारे। 

कालिंदी-तट पार बसत हौ सुनियत स्याम-सखा रे। मधुकर, चिहुर(चिकुर), भुजंग, कोकिला, अवधिन ही दिन टारे। २७५)

देखियत कालिंदी अति कारी। 

कहियो पथिक! जाय कारे सौं यहै बिरह-जुर जारी। (२७८)

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आदिकथाओं (पुरानी कथा, पुराणों) में शक्ति की देवी काली या महाकाली के रूप में चित्रित है। संन्यासी विवेकानंद के गुरु परमहंस रामकृष्ण काली के भक्त थे। बंगालियों ने पूरे भारत और संभवतः पूरे विश्व में अपने पूजा स्थल को 'काली बाड़ी'(काली का गृह, घर या मंदिर) के नाम से स्थापित किया है। मगर हमारी प्यारी काली पुतली ऐसी नहीं है। 

काली पुतली तो जगत की रोशनी का आधार है। काली पुतली के कारण ही सारे संसार के सौंदर्य से हम जुड़ते हैं, सुंदर विश्व और सृष्टि का बोध हमें उसके कारण होता है, हम  काली पुतली के माध्यम से सांसारिक भाव-व्यवहार की पहचान करते हैं और समुचित निर्णय लेते हैं, इसलिए काली पुतली का हमारे जीवन में सर्वाधिक महत्व है। इसलिये अंगों में सबसे प्रिय आंख और उसकी पुतली है। इसलिए संसार अपने सबसे प्रिय व्यक्ति को आंख की पुतली या आंख का तारा भी कहता है। काया-मूलक मुहावरे में आंख का तारा होना यानी प्रिय होना है। दूसरी ओर अप्रिय व्यक्ति या वस्तु को आँख की किरकिरी कहते हैं। कितनी मज़ेदार बात है कि सांवली सलोनी युवती को अंग्रेजी में ब्लैक ब्यूटी कहते हैं। प्रसिद्ध प्रेमकथा में नायिका लैला को काली ही चित्रित की किया गया है। "लैला भी थी काली ये किस्सा मशहूर है," इस गीत में काले रंग के महत्व को गाया गया है। 

इस प्रकार काला रंग सर्वाधिक प्रिय रंग भी हुआ। 


काले और गोरे रंगों में बंटी इस दुनिया में सोच के अपने अपने मानसिक वर्ण हैं। अमेरिका में रंगभेद रहा है तो भारत में वर्णवाद। रंग या वर्ण नस्लवाद के रूप में रूढ़ हो गया। अमेरिका मुक्त हो गया लेकिन भारत के अंतःकरण से वर्णभेद निकल नहीं पाता, हिंसात्मक आंदोलन बनकर सर उठाता रहता है। यही दृष्टिकोण है। दृष्टिकोण यानी सोच की धार, आंख का ज़ाविया। 

दृष्टि याआंख के इसी महत्व को उर्दू कवि अब्दुल हई साहिर लुधियानपुरी ने अनेक दृष्टिकोणों से बयान किया है- चूंकि यह ग़ज़ल सरल हिंदी उर्दू में है इसलिए भूमिका के बिना समझ में आ जाता है-

हर तरह के जज़्बात का ए'लान हैं आँखें।

शबनम कभी शो'ला कभी तूफ़ान हैं आँखें।


आँखों से बड़ी कोई तराज़ू नहीं होती, 

तुलता है बशर जिसमें वो मीज़ान हैं आँखें।

 

आँखें ही मिलाती हैं ज़माने में दिलों को,

अंजान हैं हम तुम अगर अंजान हैं आँखें।


लब कुछ भी कहें इस से हक़ीक़त नहीं खुलती, 

इंसान के सच झूट की पहचान हैं आँखें।

 

आँखें न झुकीं तेरी किसी ग़ैर के आगे, 

दुनिया में बड़ी चीज़ मिरी जान हैं आँखें।


आंखों के यह महत्व किस के कारण मिला? इसे किसने नेमत (वरदान, प्राकृतिक उपहार) का दर्जा दिलवाया? इसी काली पुतली ने।

क्योंकि हमारी प्यारी काली पुतली हमारी आंखों की जान  है। काली पुतली ही तो जगत की रोशनी का आधार है। काली पुतली के कारण ही सारे संसार के सौंदर्य से हम जुड़ते हैं, सुंदर विश्व और सृष्टि का बोध हमें उसके कारण होता है, हम  काली पुतली के माध्यम से सांसारिक भाव-व्यवहार की पहचान करते हैं और समुचित निर्णय लेते हैं, इसलिए काली पुतली का हमारे जीवन में सर्वाधिक महत्व है। इसलिये अंगों में सबसे प्रिय आंख और उसकी पुतली है। इसलिए संसार अपने सबसे प्रिय व्यक्ति को आंख की पुतली या आंख का तारा भी कहता है। काया-मूलक मुहावरे में आंख का तारा होना यानी प्रिय होना है। दूसरी ओर अप्रिय व्यक्ति या वस्तु को आँख की किरकिरी कहते हैं। कितनी मज़ेदार बात है कि सांवली सलोनी युवती को अंग्रेजी में ब्लैक ब्यूटी कहते हैं। प्रसिद्ध प्रेमकथा में नायिका लैला को काली ही चित्रित की किया गया है। "लैला भी थी काली ये किस्सा मशहूर है," इस गीत में काले रंग के महत्व को गाया गया है। 

इससे भला किसको इनकार हो सकता है कि रंग बिरंगी आंखों से ही व्यक्तित्व निखर उठता है। क़ुदरत किसी को गहरी काली आंखें देती है, तो किसी को भूरी। किसी को मंजरी (मार्जारी या बिल्लोरी, बिल्ली की तरह) तो किसी को नीली आंखें देती हैं। काली और नीली आंखें तो दुनिया भर में जादू का प्रतीक हैं। ऐसी आंखें रूस में तो मिलती ही मिलती ही मिलती हैं, भारत में भी मिलती है। यही आंखें कभी-कभी व्यक्ति के आंतरिक चरित्र का प्रतीक भी बन जाती हैं। भूरी या मंजरी आंखवाले धोखे बाज़ होते हैं, ऐसा लोकापवाद है। वर्णवादी भारतीय समाज में एक नस्ल को काला और एक नस्ल को गोरा मान लिया गया है। हालांकि यही सत्य नहीं है। किंतु एक कहावत इसी धारणा या लोकापवाद पर प्रचलित रही है -काला बांभन, गोरा गोंड, इन्हें विश्वसनीय नहीं माना जाता। यह भी केवल अज्ञान है। पर लोकापवाद को जीवित रखकर मनोरंजन करनेवालों की कमी नहीं है। मेरा व्यक्तिगत समर्थन इसमें नहीं है। 

       मगर मेरे समर्थन या असमर्थन से क्या फ़र्क पड़ता है। हमारे शहर में तो ऐसे सज्जन भी हैं जो  काले रंग को अश्लील मानते हैं। इससे 'काली पुतली' के अस्तित्व पर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, अपने नाम की भूख  और एक सम्प्रदाय विशेष पर हमले का बोध होता है। काली पुतली को आदिवासी बाला से जोड़कर देखने के बावजूद नाम परिवर्तन की  नाम-बुभुक्षु महत्वाकांक्षा के चलते अनेक वर्षों से एक मुहिम चल रहा है। काली पुतली चौक के नाम से ख्यात चौक के साथ आदिवासी जुड़ाव को ख़त्म करना। पहले सरदार भगतसिंग के पुतले को स्थापित करने के लिए सरदारों को उकसाया गया और  हिंदू परिषद से उन्हें जोड़ा गया। इस झगड़े में बनकर तैयार क्रांतिकारी भगतसिंग की काली प्रतिमा नगरपालिका परिसर में पड़ी रही। गोंड समुदाय की जागरुकता, पक्ष विपक्ष की  राजनीति और लोक-स्वीकृति के चलते काली पुतली पर आंच नहीं आयी। इस सबके खुलासे के लिये महत्वाकांक्षा की भूख के प्रकरण को खोलना पड़ेगा। वह फिर कभी....

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अन्य जानकारियां : 

 1. कारी- एक लोक नाट्य : में लोककला और लोक संगीत को लोकरंग के माध्यम से विश्वप्रसिद्ध करनेवाले दुर्ग के चिकित्सक और जमींदार दाऊ रामचंद्र देशमुख ने 'चंदैनी गोंदा' के अतिरिक्त  'कारी' नामक एक प्रसिद्ध लोक नाट्य भी किया था।  उनके नाट्य आंदोलन में राजनंदगांव के खुमान साव, गिरजा सिन्हा, (संगीत), भैयालाल हेड़ाऊ, कविता हिरकने वासनिक (गायन अभिनय) आदि का बड़ा योगदान रहा है।

2. कारी- एक स्थान :  भारत के मध्य प्रदेश राज्य के टीकमगढ़ ज़िले में स्थित एक नगर है कारी।

3. कारी- एक फ़िल्म : सन् 2022 की तमिल भाषा की हेमंत द्वारा लिखित और निर्देशित भारतीय स्पोर्ट्स एक्शन ड्रामा फ़िल्म है। 

4. 'कारी'-एक नाटक : भिलाई इस्पात संयंत्र में कार्यरत जनवादी रंगकर्मी और लेखक( प्रसिद्ध 'मुर्ग़ीवाला' नुक्कड़ नाटक) प्रेम साइमन के लिखे 'कारी' नाटक पर आधारित एक छत्तीसगढ़ी फ़िल्म। रामचन्द्र देशमुख (दुर्ग) के बैनर तले इसी पर एक लोक-नाट्य भी प्रसिद्ध हुआ।

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वास्तव में कारी पुतरी को काली पुतली के रूप में संस्कारित किया गया पर यह नहीं बताया गया कि वह वास्तव में काली पुत्री ही थी जो बोलने से बदली।


Comments

Anonymous said…
यह लेख पढ़ते हुए मैं रुक-रुक कर सोचता रहा। आप विज्ञान, दर्शन, लोककथा और समाज को एक ही धागे में पिरो देते हैं। काली पुतली को लेकर आपकी बात सीधे दिमाग में उतरती है। आप काले रंग से जुड़े डर, पूर्वाग्रह और राजनीति को खुलकर सामने रखते हैं। मुझे खास तौर पर यह अच्छा लगा कि आप कृष्ण, काली, सूरदास और लोक मुहावरों को सहज तरीके से जोड़ते हैं।
Dr.R.Ramkumar said…
आपका बहुत आभार एडमिन साहब! बहुत सूक्ष्मता और सतर्क होकर आपने यह आलेख पढ़ा और प्रोत्साहन दिया। कृपया अन्य लेख सुविधानुसार पढ़कर बेबाक परामर्श दें, मुझे मनोबल और दिशा मिलेगी।
पुनः धन्यवाद!

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