आंख की काली पुतली :
तंत्रिका तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है आंख। आँख के बीच में एक काला छेद होता है जो सिकुड़कर और फैलकर रोशनी को नियंत्रित करता है, जिससे हम स्पष्ट देख पाते हैं। इसे काली पुतली (Pupil) कहते हैं। काली इसलिए दिखती है क्योंकि आँख के अंदर जानेवाला प्रकाश आँख के अंदर के ऊतकों (tissues) द्वारा अवशोषित हो जाता है और बाहर परावर्तित नहीं होता, जैसे ब्लैक होल।
काली पुतली हमारी रोशनी का आधार है। पूरे संसार के सौंदर्य बोध से हम जुड़ते हैं, भाव-व्यवहार की पहचान कर निर्णय लेते हैं, इसलिए काली पुतली हमारे जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण अवयव है। अंगों में सबसे प्रिय आंख और उसकी पुतली है। इसलिए सबसे प्रिय को आंख की पुतली या आंख का तारा भी कहते हैं। काया-मूलक मुहावरे में प्रिय होने को आंख का तारा होना कहते हैं। अप्रिय व्यक्ति या वस्तु को आँख की किरकिरी कहते हैं। सांवली सलोनी युवती को अंग्रेजी में ब्लैक ब्यूटी कहते हैं। प्रसिद्ध प्रेमकथा में नायिका लैला काली चित्रित की गई है। "लैला भी थी काली ये किस्सा मशहूर है," काले रंग के महत्व को गाया गया है।
इस प्रकार काला रंग सर्वाधिक प्रिय रंग भी हुआ। इस पर दूसरा रंग काम नहीं करता। सूरदास ने एक पद में यह प्रमाण दिया है- 'सूरदास काली कमली पे चढ़े न दूजो रंग।'
आदि-कथाओं में सर्वाधिक प्रिय चरित्र श्याम या कृष्ण का चित्रित है। सूरदास ने इस चरित्र को महाकाव्य 'सूरसागर' ( भागवतपुराण का पद अनुवाद) का केंद्रीय पात्र बनाया। उनका भ्रमर गीत तो वियोग श्रृंगार में वाग्विदग्धता का अद्भुत सौंदर्यशास्त्र है इसमें काले का विप्रलम्भ अद्वितीय उप से उभरा है।
स्याम मुख देखे ही परतीति।(३३), वह मथुरा काजर की कोठरि, जे आवहिं ते कारे। तुम कारे सुफलकसुत कारे, कारे मधुप भंवारे। मानहु नील माट तें काढ़े लै जमुना ज्यों पखारे। ता गुन स्याम भई कालिंदी सूर स्याम गुन न्यारे।।(३८)।
जो पै स्याम कूबरी रीझे सो किन नाम धरावत। ज्यो गजराज काज के औसर औरै दसन दिखावत।(४५)।
निरखत अंक स्याम सुंदर के बार बार लावति छाती। लोचन-जल कागद-मसि मिलि कै, ह्वै गई स्याम स्याम की पाती। (५७)।
मधुकर! कह कारे की जाति?
कोकिल कुटिल कपट बायस छलि फिरि नहिं बहि बन जाति? तैसेहि कान्ह केलि-रस अंचयो बैठि एक ही पांति।(१५७)।
ऊधो! ऐसो काम न कीजै।
एक रंग कारे तुम दोऊ, धोय सेत क्यों कीजै?(१९७)
ऊधो!अब नहिं स्याम हमारे।
कपटी कुटिल काक कोकिल ज्यों अंत भये उड़ि न्यारे।(२३१)
मधुकर! देखि स्याम तन तेरो।(हरि मुख की सुनि मीठी बातें डरपत है मन मेरो।)(२५३)।
मधुकर! यह कारे की रीति।
मन दै हरत परायो सरबस, करै कपट की प्रीति। ज्यो खटपद अम्बुज के दल में बसत निसा-रति मानि। दिनकर उए अनत उड़ि बैठे, फिर न करत पहिचानि। भवन भुजंग पिटारे पाल्यो ज्यों जननी जनि तात। कुल-करतूति जाति नहिं कबहूँ , सहज सो डसि भजि जात। कोकिल काग कुरंग स्याम की छन-छन सुरति करावत। सूरदास प्रभु को मख़ देख्यो, निसदिन ही मोंहि भावत। (२६९)
मधुकर! ये सुनु तन मन कारे। कहूँ न सेत सिद्धतन परसे, ताई हैं अंग कारे। (२७३)।
मधुकर! तुम देखियत हौ कारे।
कालिंदी-तट पार बसत हौ सुनियत स्याम-सखा रे। मधुकर, चिहुर(चिकुर), भुजंग, कोकिला, अवधिन ही दिन टारे। २७५)
देखियत कालिंदी अति कारी।
कहियो पथिक! जाय कारे सौं यहै बिरह-जुर जारी। (२७८)
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आदिकथाओं (पुरानी कथा, पुराणों) में शक्ति की देवी काली या महाकाली के रूप में चित्रित है। संन्यासी विवेकानंद के गुरु परमहंस रामकृष्ण काली के भक्त थे। बंगालियों ने पूरे भारत और संभवतः पूरे विश्व में अपने पूजा स्थल को 'काली बाड़ी'(काली का गृह, घर या मंदिर) के नाम से स्थापित किया है।
काले और गोरे रंगों में बंटी इस दुनिया में सोच के अपने अपने मानसिक वर्ण हैं। अमेरिका में रंगभेद रहा है तो भारत में वर्णवाद। रंग या वर्ण नस्लवाद के रूप में रूढ़ हो गया। अमेरिका मुक्त हो गया लेकिन भारत के अंतःकरण से वर्णभेद निकल नहीं पाता, हिंसात्मक आंदोलन बनकर सर उठाता रहता है। यही दृष्टिकोण है। दृष्टिकोण यानी सोच की धार, आंख का ज़ाविया।
हर तरह के जज़्बात का ए'लान हैं आँखें।
शबनम कभी शो'ला कभी तूफ़ान हैं आँखें।
आँखों से बड़ी कोई तराज़ू नहीं होती,
तुलता है बशर जिसमें वो मीज़ान हैं आँखें।
आँखें ही मिलाती हैं ज़माने में दिलों को,
अंजान हैं हम तुम अगर अंजान हैं आँखें।
लब कुछ भी कहें इस से हक़ीक़त नहीं खुलती,
इंसान के सच झूट की पहचान हैं आँखें।
आँखें न झुकीं तेरी किसी ग़ैर के आगे,
दुनिया में बड़ी चीज़ मिरी जान! हैं आँखें।
आंखों के इसी महत्व के कारण इसे नेमत (वरदान, प्राकृतिक उपहार) ख़्या जाता है।
रंग बिरंगी आंखों से व्यक्तित्व निखर उठता है। किसी को क़ुदरत आंखें गहरी काली देती है तो किसी को भूरी। किसी को मंजरी (मार्जारी या बिल्लोरी, बिल्ली की तरह) तो किसी को नीली आंखें मिलती हैं। काली और नीली आंखें तो दुनिया भर में जादू का प्रतीक हैं। ऐसी आंखें रूस में तो मिलती ही मिलती ही मिलती हैं भारत में भी मिलती है। यही आंखें कभी कभी व्यक्ति के आंतरिक चरित्र का प्रतीक बन जाती हैं। भूरी या मंजरी आंखवाले धोखे बाज़ होते हैं ऐसी लोकापवाद है। वर्णवादी भारतीय समाज में एक नस्ल को काला और एक नस्ल को गोरा मैन लिया गया है। हालांकि यही सत्य नहीं है। किंतु एक कहावत इसी धारणा य्या लोकापवाद पर प्रचलित रही है -काला बांभन, गोरा गोंड, इन्हें विश्वसनीय नहीं माना जाता। यह भी केवल अज्ञान है। पर लोकापवाद को जीवित रखकर मनोरंजन करनेवालों की कमी नहीं है। मेरा व्यक्तिगत अमर्थन इसमें नहीं है।
मेरे समर्थन या असमर्थन से क्या फ़र्क पड़ता है। हमारे शहर में तो ऐसे सज्जन भी हैं जो स्वयं काले हैं किंतु काले रंग को अश्लील मानते हैं।
छत्तीसगढ़ में लोककला और लोक संगीत को लोकरंग के माध्यम से विश्वप्रसिद्ध करनेवाले दुर्ग के चिकित्सक और जमींदार दाऊ रामचंद्र देशमुख ने 'चंदैनी गोंदा' के अतिरिक्त 'कारी' नामक एक प्रसिद्ध लोक नाट्य भी किया था। उनके नाट्य आंदोलन में राजनंदगांव के खुमान साव, गिरजा सिन्हा, (संगीत), भैयालाल हेड़ाऊ, कविता हिरकने वासनिक (गायन अभिनय) आदि का बड़ा योगदान रहा है।
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