एक अपढ़ गीतल, आनंद अपढ़ की एक से सौ तलक, सीखी हैं, गिनतियाँ अब तक। गिनाऊँ? किसने, कहां कीं हैं, गलतियां अब तक।। अनेक रंग, मेरी उंगलियों से झरते हैं, तो क्या पकड़ता रहा, सिर्फ़ तितलियां अब तक।।? फ़रेब देके, कैसे सो रहे, दुनिया वाले, हमें जगाए हुए हैं, ये हिचकियां अब तक।। गरज के साथ, फटे अब्र, मिट गया सब कुछ, चमक रही हैं, इन आंखों में, बिजलियां अब तक।। ज़ुबान, नस्ल, सियासत, हैं इस क़दर चौकस, न बंट सकीं, मेरे हाथों की, कजलियां अब तक।। चुहल, शरारतें, ठहरायीं गयीं, बचकानी, सयानी बन के, हुक्मरां हैं, तल्ख़ियां अब तक।। रईस लोगों के, अंगूर हो गए खट्टे, ग़रीब बस्ती, चाटती है, इमलियां अब तक।। #आनंद_अपढ़, १५.०१.२६, ०८.३० सायं, शुचिस्थल, इलाक़ा देवगढ़। प्रस्तुति : @ रा रा कुमार
कारी पुतरी>काली पुतली>काली पुत्री आंख की काली पुतली : शरीर के तंत्रिका-तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है आंख। आँख के बीच में एक काला छेद होता है जो सिकुड़कर और फैलकर रोशनी को नियंत्रित करता है, जिससे हम स्पष्ट देख पाते हैं। इसे काली पुतली (Pupil) कहते हैं। यह काली इसलिए दिखती है क्योंकि आँख के अंदर जानेवाला प्रकाश आँख के अंदर के ऊतकों (tissues) द्वारा पूर्णतः अवशोषित हो जाता है और बाहर परावर्तित नहीं होता। प्रकाश विज्ञान का यही नियम है। सारे रंग लौटा दिए गए, पारेषण उनका हो गया तो बचा ही क्या? सब सफ़ेद हो गया। जो सब लौटा दे, किसी का कुछ ले ही न, वह साफ़ सुथरा, पाक-साफ़, निर्लिप्त, संत, सूफ़ी और प्रतिष्ठित हो गया। विश्वसनीय और आदरणीय हो गया। वहीं दूसरी ओर, जिसने सब कुछ ले लिया, ग्रहण कर लिया, हड़प लिया, हजम कर लिया तो वह काला हो गया। सारे रंगों का अवशोषण ही काला (रंग) होना है। जैसे ब्लैक होल, वह ऐसा स्थान है, जहां जो भी गया है, लौटा नहीं है। जो सब हजम कर जाये, और डकार भी न ले, उस पर समाज कालिख पोत देता है। उसका मुंह काला हो जाता है। किसी को वह मुंह दिखाने लायक नहीं हो...