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युवा नींद, क्वांरे सपनों को

 एक नवगीत








युवा नींद, क्वांरे सपनों को,
बटमारों ने चुन-चुन मारा।
अब केवल रतजगा हमारा।

मेरे सुख-दुख नहीं बांटना,
मेरी उन्नति नहीं चाहना,
कष्ट पड़े तो दूर भागना,
दुर्भिक्षों में नहीं झांकना।
              कूटनीति होगी उनकी यह,
              हर आयोजन है हत्यारा।
                  अब केवल रतजगा हमारा।

चुन-चुनकर, कर रहे बेदख़ल,

लगा रहे अपना सारा बल,
रच षड्यंत्र, प्रपंच और छल,
पग-पग मचा हुआ है दंगल।
         इधर अमावस पसर रही है,
         चमक रहा है उधर सितारा।
                  अब केवल रतजगा हमारा।

तोड़ रहे हैं, फोड़ रहे हैं,
वे धारा को मोड़ रहे हैं, 
तट भी गरिमा छोड़ रहे हैं,
भंवरों से गंठ जोड़ रहे हैं।
       विप्लव, प्रलय, बवंडर, आंधी,
       हुआ इकट्ठा कुनबा सारा।
                  अब केवल रतजगा हमारा।

                                 @ रा. रामकुमार, 
                     १३.११-०९.१२.२०२५, अपरान्ह १२.१३

Comments

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 10 दिसंबर 2025 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
Dr.R.Ramkumar said…
धन्यवाद आभार पम्मी जी
Admin said…
यह कविता सीधा दिल पर असर करती है। आप आज के समय की बेचैनी, धोखे और साजिशों को बिना घुमाए सामने रख देते हैं। युवा सपनों की टूटन हर पंक्ति में महसूस होती है। शब्दों में गुस्सा भी है और सच का साहस भी। “अमावस और सितारे” वाला भाव बहुत गहरा लगता है, क्योंकि अंधेरे में भी उम्मीद झलकती है।
Dr.R.Ramkumar said…
धन्यवाद एडमिन भाई