Friday, June 20, 2014

कभी-कभी किसी-किसी दिन,



(गीतों की पैथालाजी मे प्यार का इ.एस.आर,)

कभी-कभी किसी-किसी दिन, सुबह रोज़ की तरह नहीं होती, सूरज आसमान से नहीं निकलता, किरणें दरवाजों से नहीं आतीं, रोशनी बाहर नहीं फैलती, गीत होठों से नहीं झरते, संगीत कानों से नहीं सुना जाता। कभी-कभी किसी-किसी दिन, कोई कोई सुबह, बिल्कुल अलग तरह की होती है, सूरज अंधेरे में खड़े, किसी मासूम बच्चे की तरह, अभी अभी जागे हुए सपनों की, आंखें मलता सा लगता है, खुशियों के फूलों को जमाने से छुपाता सा, आसमान उसकी पलकों में, दुबका हुआ लगता है, किरनें उसके होंठों में चमकती हैं, गीत उसके अंदर गूंजते हैं, संगीत उसके दिल में बजता है। कभी कभी किसी किसी दिन।
आज कुछ ऐसा ही दिन था, जो रोज की तरह नहीं था। वैसे भी रोज वही दिन कभी नहीं होता। कभी कभी पिछले दिन का कुछ छूटा हुआ रात में कुछ नया जोड़कर सुबह सुबह आ जाता है। कभी उसके पास पिछला कुछ होता ही नहीं, कुछ बिल्कुल नया सा लेकर आ जाता है जो आश्चर्य की तरह अनोखा और जानने लायक होता है।
आज सुबह वैसे ही हुआ। टेबल पर चमकता हुआ ‘स्पर्श पटलीय कोशिका चलितभाष’ (टच स्क्रीन सेल फोन) मेरा ध्यान खींचने लगा। उसे क्या हो गया है, यह देखने के लिए मैंने उसे उठा कर देखना चाहा तो वह गाने लगा। हड़बड़ाकर मैंने हाथ खींच लिया। मेरे हाथ का कोई हिस्सा उसके संवेदनशील पटल (सेंसर स्क्रीन) को छू गया होगा। रात में किसी ने गाना ‘चढ़ाकर’ (अपलोड) भेजा होगा, उसे ‘उतारने’ (डाउनलोड करने) के लिए रख छोड़ा गया था। जिस वक्त मेरा स्पर्श हुआ उस वक्त तक वह उतर चुका था और बजने के लिए मचल रहा था। गाने के लिए जो तड़प रहे होते हैं उन्से फिर कोई गधा भी कहे तो वे शुरू हो जाते हैं। यही हुआ। फोन गाने लगा।
गाना हिन्दी में था। किसी फिल्मी गाने का ‘रिमिक्स’ था। कभी कभी हिदी मेरी कमजोर हो जाती है। गीत मुझे समझ में नहीं आते। मतलब जिस अर्थ में वे लिखे गये हैं, उस अर्थ में वे मेरे अंदर नहीं उतरते। किसी और ढंग से वे मुझे बहकाने लगते हैं। अब जैसे ये जो गीत बज रहा है-‘आज फिर तुम पै प्यार आया है। बेहद और बेहिसाब आया है। जो भी इसे सुन रहा है, झूम रहा है, गुनगुना रहा है। मेर’ी हिन्दी कमजोर हो गई है। मैं कन्फ्यूज होकर इसके अर्थ में उलझ गया हूं।
मैं सोच रहा हूं - प्यार कैसे आता होगा? प्यार क्या आनेवाली चीज है? आता है तो किससे आता होगा? क्या वाहन है उसका? साइकिल से आता है या बीएमडबल्यू से? प्लेन से आता है या रेलगाड़ी से? रेल से आता है तो रिजर्वेशन करा कर आता है या जनरल में घुस घुसाकर आता है, स्टेडिन्ग में, सीढ़ी पर बैठकर या छत पर चढ़कर? आना जरूरी है तो आदमी फिर तकलीफ नहीं देखता। आने का तो यही दस्तूर यही तरीका देखा है मैंने। चलती गाड़ी में दौड़कर तो कई बार मैं भी चढ़ा हूं। टिकट खिड़की में खड़ा हूं और कतार लम्बी है, ट्रेन मेरा इंतजार किये चल पड़ी है तो मैं बिना टिकट के ही भागकर ट्रेन पकड़ता हूं। वहां मैं मान नहीं करता कि मेरा इंतजार किये क्यों चल पड़ी तू? मान करने वाले छूटती हुई ट्रेन को नहीं पकड़ पाते। मुंह फुलाकर शिकायत करते रहते है-‘‘जाने क्या समझती है अपने आपको? करोड़ों की हो गई है, एक्सप्रेस का दर्जा मिल गया है तो घमंड आ गया है। दो मिनट रुक नहीं सकती थी। ऐसा भी क्या घमंड? घमंड रावण का भी नहीं रहा।’’
जो किसी को पकड़ नहीं पाते वे ऐसे ही अनमेल उलाहने दिया करते हैं। ट्रेन के साथ रावण के घमंड का जैसे तुक नहीं बैठता ऐसे ही किसी भी आदमी के साथ नहीं बैठता। अहंकारी और असफल व्यक्ति ही दूसरे पर अहंकार का आरोप थोपता है। पर ये सब गोबर के कंडे छत पर थापने जैसे है। गोबर के लोंदे वहां ठहर नहीं पाते, थोपनेवाले मूर्ख के सर पर गिर पड़ते हैं। पर वह छत पर आरोप लगाता है कि मेरी हैकिन्तु दुश्मन से मिली हुई है। तुलसी के जीवन में ऐसे लोग बहुत थे, तभी उन्होंने निष्कर्ष निकाला-‘मूरख हृदय न चेत, जो गुरु मिलहिं बिरंची सम।’’ ऐसों के कोसने से चलती हुई कामकाजी ट्रैन को या छाया के महत्वपूर्ण काम में टिकी हुई छत को कोई फर्क नहीं पड़ता।
आपको गुस्सा आ रहा है? उसे ठण्डा पानी पिलाइये और शांति से बैठाइये। उसे बताइये कि उसके आने की हम बाद में मीमांसा करेंगे, थोड़ा सब्र करे, अभी प्यार आया हुआ है। ज़ोर से आया हुआ है। बे-हद और बे-हिसाब आया हुआ है। साइक्लोन या तूफान भी हमारे देश में आते है। भूकंप तक आते हैं। पर वे हिसाब से आते हैं। कोई तूफान साठ-सत्तर की स्पीड से आता है, तो कोई-कोई नब्बे या सौ की स्पीड से आता हैं। भूकंप भी ऐसे बेहिसाब नहीं आते। कोई तीन के रेक्टर में आ रहा है तो कोई पांच के रेक्टर में। पांच और छः रेक्टर के भी भूकंप हमने आते देखे हैं या महसूस किये हैं। यह भी एक हिसाब से ही आना हुआ। बेहिसाब कोई नहीं आया। हिसाब से आने-जाने वाले को समाज में ऊंची नजर से देखा जाता है। इसलिए भूकंप या तूफान को भले ही कोई पसंद न करे, पर उनका विरोध कोई नहीं करता। उनको लेकर कोई हंगामा नहीं करता। पहले से ही उनके आने की घोषणा की जाती है, उनके स्वागत की युद्ध स्तर पर तैयारी की जाती है। किन्तु प्यार के आने की कोई सूचना तक नहीं देता। वह चुपचाप, दबे पांव आ जाता है। जैसे अभी व्यास नदी में बाढ़ आ गई। कोई चौबीस युवक-युवतियां इस अचानक आई बाढ़ में बह गए। कहते हैं बांध का पानी अचानक छोड़ा गया इसलिये बाढ़ आ गई। बांध का यही रिवाज है। जहां बांध होते हैं, वहां अचानक पानी छोड़ना पड़ता है, नहीं तो बांध तोड़कर पानी के बहने का खतरा होता है। प्यार पर अक्सर इस तरह की तोड़-फोड़ का इल्जाम लगाया जाता रहा है। इतिहास गवाह है कि प्यार ने बड़े बड़े बांध तोड़े हैं। फरहाद ने पहाड़ ही काट डाला। प्यार के बारे में जरा सर्वे कराइये। उसका नाम सुनते ही सन्नाटा छा जाता है।
लेकिन जरा कमाल देखिए, सुबह सुबह बजनेवाले इस गीत में डिंडोरा पीटा जा रहा है कि आज फिर प्यार आया है। जैसे बच्चे उछल पड़ते हैं कि आइसकी्रमवाला आया, जीभ चटकारती हुई औरतें निकल पड़ती है कि चाटवाला आया, पानीपुरी वाला आया। मदारी आते हैं, बहुरूपिये आते हैं, सांप, भालू और बंदर वाले आते हैं। बच्चे बेहिसाब भागते हैं। उन्हें रोकने के लिए मां बाप कहते हैं- बच्चे पकड़नेवाला आया है, बाहर मत जाओ।’ प्यार को लेकर भी अमूमन यही होता है। ‘खबरदार जो घर के बाहर कदम रखा। प्यार का कोई हिसाब नहीं, कब क्या कर बैठे। कितना नुकसान कर बैठे।’ कुछ चीजों का हिसाब नहीं होता।
किन्तु जो चीजें खरनाक हैं, उनमें से कुछ का हिसाब होता है। बांध में कितना पानी बढ़ेगा तो पानी छोड़ा जायेगा। कितना बुखार आयेगा तो घर में क्रोसीन देकर ठीक कर लिया जायेगा। बुखार भी हमारे देश में हिसाब से आता है। एक सौ एक, एक सौ दो, एक सौ तीन। मुझे तो जब भी आया एक सौ चार आया। मेरा हिसाब यही है। जो भी आता है, अति में आता है। मरने के बिन्दु तक आता है। मेरी जिन्दगी जब से शुरू हुई है, इसी हिसाब से चली है। हर साल एक बार मैं म्त्यु के निशान को छूकर लौट आता हूं।
पर यह बेहिसाब और बेहद का प्यार मेरी समझ में नहीं आता। बेहिसाब और बेहद प्यार तो बच्चों को भी करना मना है। ज्यादा लाड़ प्यार से बच्चे बिगड़ जाते हैं, यही समाज का ‘मक्सिम’ है। परिवार में, समाज में, अड़ोस पड़ोस में व्यवहार का एक हिसाब होता है। आने और जाने का हिसाब होता है। ज्यादा आने-जाने से मान खत्म हो जाता है। बहुत जाओ या जाना छोड़ दो तो संबंध खत्म हो जाते है। तुलसी की बताई एक होमियोपैथी दवा मैं आपको बता रहा हूं--वे कहते हैं-‘आवत ही हरसें नहीं, नैनन नहीं सनेह। तुलसी तहां न जाइये, चाहे कंचन बरसे मेह।’ आने से प्रसन्नता न हो और आंखों में स्नेह के भाव न हों तो गरीब तुलसी कहते हैं कि चाहे पानी की जगह सोना भी बरस रहा हो तो भी वहां मत जाइये।
तुलसी बाबा ने कई प्रकार का आना-जाना बताया है। उसके अनेक पथ्य-अपथ्य और नुस्खे बताये हंै। उन्हें यह आजमाए हुए नुस्खे हिमालयवासी औघड़ बाबा शंकर से मिले हैं। हिमालय औषधियों का भंडार है। संसार में जो दवाई नहीं मिलती, हजारों लोग उसे घर से भागकर हिमालय में ढूंढते हैं। भीड़ की बीमारी का इलाज एकांत में मिलता है, यह कैसी अजीब बात है। क्यों न हो, भारत को अजूबों का देश यूं ही नहीं कहा जाता।
एकांत में साधना करनेवाले हिमालय के पर्वतपुत्र शंकर ने अपनी पत्नी दक्षकन्या सती को समाज का मानवीय विज्ञान समझाते हुए आने-जाने का मर्म कहा था-
जौ बिनु बोले जाहु भवानी। रहई न शील सनेहु न कानी।
जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलहुं न संदेहा।
तदपि बिरोध मान जंह कोई। तहां गए कल्यानु न होई।
-सुनो सती! बिना किसी के बुलाए जाना शिष्टाचार नहीं है, ऐसे जाने से न किसी का स्नेह मिलता है, न मान ही मिलता है। हालांकि मित्रों के घर, मालिक के घर, पिता और गुरु के घर बिना बुलाए निस्संदेह चले जाओ किन्तु अगर कोई मनमुटाव या विरोध चल रहा हो तो  फिर जाने में कल्यान नहीं है। आप विरोध या मनमुटाव की परवाह किये बिना सहज भाव से चले गये तो सामने वाला ठीक से बात नहीं करेगा। जैसा कि सती के आने पर पिता दक्ष ने किया।
ऐसे ही यदि आप सहज भाव से अपने परिवार सहित अपने विरोधी भाई या बंधु के चले गये लेकिन वह आपको देखकर मनमुटाव के कारण पड़ोस में क्रिकेट देखने चला जाये तो आपको कैसा लगेगा? अब रात में आप अपने छोटे छोटे बच्चों को लेकर कहां जायेंगें? अपमान का घूंट पीकर सुबह होने का इंतजार करेंगे। अरे भाई आपके जीवन में रात ही न हो अगर आप अपने विरोधी पिता, भाई, मित्र या गुरु के घर जाओ ही नहीं। सती चली गई शंकर के मना करने पर भी मगर विवाह में दक्ष ने शंकर और सती को नाराजी के कारण आमंत्रित नहीं किया था। सती गई लेकिन अपमान के कारण यज्ञ हवन कुण्ड में कूदकर जल गई। शादी विवाह में बुलाने पर जाना चाहिए। नहीं बुलाया जाता तो यह एक प्रकार आपके के स्वाभिमान की रक्षा का अवसर आपके दुश्मन ने दिया है, बुलाकर उपेक्षा करने की स्थिति से आपको उबारा है। उसका धन्यवाद करना चाहिए। ऐसों के यहां ‘ना जाने’ के निर्णय को वरदान मानना चाहिए।
मित्रों! यही समाज है। यहां आने-जानेवालों का पूरा हिसाब रखा जाता है। विवाह में तो एक आदमी आनेवालों का और व्यवहार करनेवालों का हिसाब रखता है। यही वह समाज है जहां मेहमान जीते हुए तो आते ही हैं, मरनेवाले भी आते हैं। कितने ही लोग हैं जिनके मरे हुए पिता और माता और दादा किसी बच्चे में लौट आते हैं। किसी पर बाबा आते हैं, किसी पर देवी आती है। किसी पर किसी का भूत या प्रेत आता है।
प्यार क्या इसी तरह के भूत या प्रेत की तरह आया है? मैं समझ नहीं पा रहा हूं। आज फिर तुमपे प्यार आया है’ का क्या मतलब? बाबा की तरह आया है कि देवी की तरह आया है? या किसी मरे हुए पुरखे की तरह किसी पर लौट आया है? बनिा बुलाए आ गया है या तुमने उसे बुलाया है?
मुझे ज्यादा ज्ञान तो नहीं है पर कह सकता हूं कि प्यार बिना बुलाए नहीं आता। देखा देखी के दौरान ही आंखों आंखें में प्यार को आमंत्रण के पीले चांवल डाल दिये जाते है। एक कबूतर या कौवे की तरह इन पीले दानों को चुगता-चुगता प्यार तुम्हारे आंगन में आ जाता है।
पितरों के समय देखो कैसी भेीड़ लगी रहती है। बेहिसाब कौवे तुम्हारे सम्मानपूर्वक परोसे गये पकवानों को प्रेम से खा रहे होते है। तुम्हारे अंदर भी बेहद और बेहिसाब प्यार आया हुआ होता है। किसी कौवे में मरे हुए पिता को देखकर, किसी कौवे में मरी हुई दादी को देखकर, किसी में मरे हुए नाना को देखकर, किसी में मरे हुए किसी अपने को देखकर तुम मन ही मन गदगद हो रहे होते हो। प्यार के आंसू तुम्हारी आंखों में आकर छलक रहे होते हैं।
क्या यही है इस गाने का भाव? आज फिर तुम पर प्यार आया है--ओह! गाना मुझे मजा नहीं दे रहा है, कन्फ्यूज कर रहा है। अब बस करते हैं। आपको भी त्रास आ रहा होगा। अच्छा विदा
डा. आर रामकुमार, 19-20.06.14



Wednesday, June 11, 2014

डर की सोनोग्राफी और प्रेम का आई-टेस्ट


   

डर इतना मन में भरा हुआ होता है कि भारी मन से हल्के धंुधलके में भी रस्सी को सांप समझकर लोग सहम जाते हैं, हड़बड़ाकर भागने के कारण लड़खड़ाकर गिर जाते हैं। घबराहट में धड़कनें तेज हो जाती हैं, आंतें सिकुड़ने लगती हैं, पैरों में खिंचाव होने लगता है, शरीर कांपने लगता है। रक्तचाप की जांच की जाये तो वह बढ़ा हुआ मिलेगा, अल्ट्रा साउंड में हार्ट बीट की फ्रिक्वेंसी हाई होगी। सोनोग्राफी आंतों की कराई जाये तो आंतों में भय चिपका हुआ मिलेगा। मुंह सूखेगा, त्वचा जलेगी, पसीना निकलेगा। जैसा कि युद्ध भूमि में अर्जुन के साथ हुआ था। पहले तो बहादुरी के साथ कृष्ण से बोला कि दोनों सेनाओं के बीच ले चलो। फिर सशस्त्र सेना में अपने ही भाई-बंधुओं को देखकर मोह-जनित पीड़ा और क्षोभ से डर गया। डर कर कृष्ण से कहने लगा-
‘‘सीदंति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते।। 29/1
डर, घबराहट, आघात जैसी उपरोक्त परिस्थितियों में सामान्योपचार या घरेलू इलाज यह है कि बड़ा हो तो पीठ थपथपा दो, छोटा बच्चा हो तो उसे सीने से लगा लो। ज्ञानवान हो तो उसे ज्ञान की बातें बताकर जागृत कर लो। कृष्ण ने अर्जुन का तीसरे क्रम का उपचार किया। यह हुआ डर का मोटा चित्र।
प्रेम में इससे उल्टा होता है। डर में जहां रस्सी भी सांप दिखाई देती है, प्रेम में सांप भी रस्सी दिखाई देता है। तुलसी के साथ यही हुआ। उनको प्रेम में मुर्दा नाव दिखाई दिया और सांप उनको रस्सी दिखाई दी। मुर्दे को नाव बनाकर उफनती नदी पार कर ली और सांप को रस्सी बनाकर रत्नावली की अटारी पर चढ़ गए। प्रेम नामक घटना का असर दृष्टि पर पड़ता है। कुछ का कुछ दिखाई देने लगता है। होता कुछ है, दिखाई कुछ देता है। कुछ कुछ मामले इतने बिगड़ जाते हैं कि सबमें एक ही दिखाई देने लगता है। अध्यात्म की दुनिया में इसे बड़ी ऊंची स्थिति कहा जाता है किन्तु साधारण दुनिया के सामाजिक लोग इसे दृष्टिदोष समझते हैं। वे कहने लगते हैं कि अगले की दृष्टि यानी नज़र खराब है। तो प्रेम आंख का रोग है।
प्रश्न उठ सकता है कि डर से कूदकर मैं प्रेम की बात क्यों करने लगा? दोनों में कौन सा संबंध है? संबंध तुलसी ने बनाया है। तुलसी कहते हैं-भय बिन होंहि न प्रीति। यानी डरोगे तो प्रेम करोगे। दोनों में अन्योन्याश्रित संबंध है। प्रेम में डर सम्मिलित है। प्रेम में मन डरा डरा सा, कांपा कांपा सा रहता है। तुलसी ही के शब्दों में-‘घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रियाहीन मन डरपत मोरा।’ मन ऐसा हो जाता है कि जरा सी बात से डरता है और प्रेम की ओर भागता है। इसी प्रकार प्रेम में पड़े हुए को डराकर उसे प्रेम से दूर ले जाया जाता है। कांटे से कांटा निकालना इसे ही कहते हैं। हीरा हीरा को काटता है तो विष ही विष का उपचार करता है। डर नामक मनोरोग से प्रेम नामक मनोरोग की चिकित्सा की जाती है।
यह कहने का आधार है। प्रेम कहीं आंख का रेग हैं तो किसी किसी समाज में इसे मानसिक-रोग समझा जाता है,े मानसिक खलल या दिमाग की खराबी समझा जाता है। देखा गया है कि प्रेम के रोगी को आंख के डाॅक्टर के पास ले जाओ तो वह अक्षर पढ़ने के लिये देता है। अगला ‘ए’ को ‘एल’ पढ़ता है। सेब उसे चुनरी दिखाई देती है और तरबूज को वह कुर्ती कहता है। आंख का डाॅक्टर कहता है-‘यह मामला आंख का नहीं है। किसी अच्छे साइकियाट्रिक्स को दिखाओ।’
मनोचिकित्सक के पास ले जाओ तो वह रिपोर्ट पाजीटिव देता है। मरीज में मनोरोग के सारे लक्षण दिखाई देते हैं। बिहारी ने इस अवस्था का वर्णन करते हुए लिखा है-
कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत खिलत, लजियात।
भरे भौन में करत हैं, नैननु हीं सब बात।।
आपको कैसा लगेगा जब आप अपने आप ही, बिना मुंह हिलाए, आंखों से किसी से कुछ कह रहे हों,   किसी बात से इंकार कर रहे हों जैसे कोई प्रत्यक्ष में छुपा हुआ है लेकिन आपके हाव भाव से लग रहा है कि वह कहीं आस पास है और आप उस पर रीझ रहे हों। फिर दूसरे ही क्षण आपके चेहरे और आंख के हाव भाव से लग रहा है कि आप किसी बात से चिढ़ रहे हो, फिर आपके चेहरे पर ऐसे भाव आये कि किसी से आप मिल रहे हांे और आप बड़े खुश हो रहे हों। फिर इस मिलने में ऐसा कुछ हो रहा है कि आप लजा रहे हो। यानी ऐसा भी हो रहा है कि भरे हुए भवन में आप अजीब अजीब सी हरकतें कर रहें हैं, आंखों आंखों में किसी से बात कर रहे हैं। लोग किसी और काम में पूरे होशेहवास से लगे हैं और आप अपनी ही दुनिया में डूबे हैं। आप ही बताइये किस बात के लक्षण हैं ये? ऐसे लक्षण को दीवानापन नहीं तो और क्या कहा जायेगा?
मीरां इस मामले में बहुत दो टूक बात करती हैं। वे कहती हैं- ‘ऐरी मैं तो प्रेम दिवानी, मेरा दर्द न जाने कोय।’ इस तरह के मामले की वे पहली है जिन्होंने पूरे होश में अपने को दीवानी कहा। उनकी भी खूब तरह-तरह की चिकित्सा की गई होगी। मिर्ची का धुआं दिया गया होगा, कड़वा काढ़ा पिलाया गया होगा। तभी तो परेशान होकर वे कहती हैं-‘मेरा दर्द न जाने कोय।’ पर मीरां बड़ी अदभुत थी। वे स्वयं उपचार भी बताती थीं। वे किसी घायल व्यक्ति से इसका उपचार करवाना चाहती थीं। क्यों? क्योंकि ऐसे मामले में बहुत से कबीलों में पत्थर से मार मार कर दीवाने को घायल करने की परम्परा रही है। भारत के ब्रज क्षेत्र में पूरा समाज प्रेम से लट्ठ खाने के लिए निकल पड़ता है। ऐसी मान्यता है कि घायल हुए तो सारे कष्ट साफ।
             मीरां को पता था यह। तभी कहती हैं कि ‘घायल की गति घायल जाने और न जाने कोय।’ कितने साफ तौर पर कह रही हैं कि केवल कोई घायल ही इस मामले को समझ सकता है, अन्य कोई मेरे दर्द को नहीं जान सकता। फिर वे संकेत देती हैं-‘मीरां री तब पीर मिटे जब वेद सांवलिया होय।’ वे सांवले रंग के किसी वेद की तरफ़ इशारा करती हैं और जैसे कहना चाहती है कि बेकार के उपचार में मत उलझो, उस सांवले रंग के वैद्य को ढूंढकर ले आओ। मैं ठीक हो जाउंगी।’    
लेकिन दीवानों की बात कौन सुनता है? मीरां की भी किसी ने नहीं सुनी। उनके परिवार वालों को किसी ने बताया होगा कि अनेक रोगों की चिकित्सा विष से की जाती है। इतना इलाज किया है मीरां का, यह भी कर देखो।
और सबको पता है कि परिवारवालों ने मीरां को विष देकर भी ठीक करना चाहा। पर वे सफल नहीं हुए। फिर सुना है, सचमुच किसी सांवले रंग के वैद्य ने ही मीरां का उपचार किया और मीरां अपने बाहरी वस्त्र छोड़कर केवल आंतरिक दर्द से ही नहीं, इस दुनिया से भी मुक्त हो गई। हालांकि किसी को वह वैद्य दिखा नहीं, केवल मीरां ने उसे देखा।
आधुनिक युग में कोई कोई डाॅक्टर इस प्रकार के प्रकरण में इलेक्ट्रिक शाॅक देने की बात करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस पद्धति से कई दीवानों के दिमाग ठिकाने आ गए है। पर लड़की या लड़के के पुराने विचारों के बाप के दिमाग में दूसरा ही इलाज चल रहा होता है। वे चिल्ला चिल्लाकर कहते हैं-‘चार जूते मारो सालों को, सारी अक्ल ठिकाने आ जायेगी, सब कुछ साफ साफ दिखने लगेगा।’’
पुराने जमाने की बात ही निराली है। जो लोग अपने पितरों का सम्मान करते हैं वे आज भी उनकी पद्धतियों को जीवित रखे हुए हैं। उसे मीडिया ने नया नाम दे रखा है-‘आनर किलिंग’। कहीं कोई जल रहा है तो कोई विष पी रहा है। किसी को पेड़ में लटकाकर फांसी दी जा रही है तो कोई जिन्दा दफनाया जा रहा है। सल्फास भी अच्छा और अधिक लोकप्रिय विकल्प के रूप में अपना लिया गया है।
एक और सस्ता और सामाजिक इलाज इस मनोरोग का किया जाता रहा है। आज भी किया जाता है। जैसे बहुत से रोगों में शरीर पर मिट्टी लपेटकर प्राकृतिक चिकित्सा की जाती है, वैसे ही इस रोग में हल्दी का लेप लगाकर प्राकृतिक चिकित्सा की जाती है। इस उपचार को पता नहीं क्यों हाथ पीले करना कहा जाता है, जबकि हल्दी पूरे शरीर पर लिपेटी जाती है। कुछ माामलों में यह इलाज कारगर सिद्ध हुआ है। बल्कि यही इलाज ज्यादातर मामलों में अपनाया जा रहा है। अन्तर सिर्फ इतना हुआ है कि पहले लड़के लड़की जिसका नाम सोते जागते लेते थे उसके साथ उन्हें नहीं रखा जाता था। इससे कई केस बिगड़े। अब लड़के लड़की जिसका नाम लेते हैं, उसी को साथ रखकर यह उपचार किया जाता है। अब मामले नहीं के बराबर बिगड़ते हैं।
मतलब क्या हुआ कि प्रेम का इलाज प्रेम से किया जाने लगा है। कोबरा ने काटा है तो काबरे के विष का डोज दो। संस्कृत में इसे ही 'विषस्य विषमौषधि' कहा है तो 'समं समे समाचरेत' भी कहा है। डर का भी यही हे इलाज। डा. छींक आने पर हार्ट डिसीज और टीबी होने का डर दिखाकर रोगी को भर्ती कर लेते हैं। कुछ रोगी तो बड़ी बीमारी का नाम सुनकर, यह सोचते हुए कि मरेंगे ही न? तो मरना तो है ही एक दिन, इलाज की क्या गारंटी। इलाज कराकर मरने से अच्छा है भगवान की दी हुई बीमारी से मर जाओ।
इसके आश्चर्यजनक परिणाम आए हैं। मृत्यु को समर्पित रोगी कुछ दिनों में पूरे आत्मविश्वास से घूमते नजर आने लगे। लोगों का आत्मविश्वास बढ़ रहा है तो डाक्टर अधिक से अधिक शुगर पीड़ित होकर इंशुलिन की मात्रा बढ़ाकर ले रहे हैं। इसलिए कहते हैं ‘दूसरों को डराओ मत, उनका आत्मविश्वास विकसित करो, उनसे प्रेम करो। खुद भी जिओ औरों को भी जीने दो।    10/12.06.14