Friday, October 29, 2010

अपना मध्यप्रदेश

मध्यप्रदेश का गीत:

1 नवम्बर को मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ अपने स्थापना दिवस मना रहे है। छत्तीसगढ़ 1 नव. 2000 को अस्तितव में आया जबकि 1 नवम्बर 1956 को मध्यप्रदेष की स्थापना हुई।
इस अवसर पर मध्यप्रदेश के नाम यह गीत समर्पित है जो मेरी जन्म भूमि भी है और वर्तमान में कर्मभूमि भी। छ.ग. (पूर्व मध्यप्रदेश) में मैंने उच्च शिक्षा पाई और वहीं अपने कर्मयोग का आरंभ भी किया।


अपना मध्यप्रदेश !
विन्ध्याचल ,कैमूर, सतपुड़ा , मैकल शिखर-सुवेश ।

हरी भरी धरती के सारे सपने हरे हरे हैं।
पूर्व और पश्चिम तक रेवा के तट भरे भरे हैं।
ताल और सुर-ताल हृदय से निकले तभी खरे हैं।
भरे हुए बहुमूल्य ,अनूठे ,अनुपम रत्न विशेष।
अपना मध्यप्रदेश !

नम्र निमाड़ी, बन्द्य बुंदेली, बंक बघेली बोली,
घुलमिल गोंड़ी भीली के संग करती हंसी ठिठौली।
करमा, सैला नाच मनाते सभी दिवाली होली ।
तानसेन बिस्मिल्ला की धुन में डूबे परिवेश।
अपना मध्यप्रदेश !


तेंदू और तेंदुओं वाला हर वन अभ्यारण है।
बाघ ,मयूर , हिरण, भालू के यहां तरण-तारण हैं।
महुंआ, कांस, पलाश हमारी पूजा में ‘कारण’ हैं।
कण-कण नैसर्गिक-शुभ देता शुचिता का संदेश।
अपना मध्यप्रदेश !

अब सत्ता भी संबंधों के मुकुट पहनकर आती।
नहीं राजधानी बहनें सब भाई के घर जातीं।
बापू , चाचा , मामा , दीदी-मां अब लाड़ लड़ाती।
कर सकती है ऐसे घर में कटुता कहां प्रवेश ?
अपना मध्यप्रदेश !

Thursday, October 14, 2010

माटी के पुतले 3

स्थापना और विसर्जन

पूरे देश में मूर्तियां स्थापित हो गई हैं। हम उन मूर्तियों को स्थापित होते देख सकते हैं , जिन्हें हममें से कुछ लोग बनाते हंै और बहुत से लोग स्थापित करते हैं। क्यों बनती हैं मूर्तियां , कैसे बनती हैं मूर्तियां और क्यों और किसके लिए स्थापित होती हैं मूर्तियां ? कौन मूर्तियां बनाता है ? किसके इशारे पर बनाता है और कौन स्थापित करता है इन्हें ? इन सवालों के बारे में सोचने की ना तो हमें जरूरत हैं और ना तो कोई सोचता है। मूर्तियां स्थापित हो जाएं , उन्हें प्रतिष्ठित कर दिया जाए, एक लोक आयोजन हो ,नगर और अपने सहज पहुंच में पड़नेवाले स्थानों पर अगर हम जाना चाहें तो जाकर देखकर आनंदित हो लें या श्रद्धावनत होलें। सामाजिक मनुष्य से इतनी ही अपेक्षा की जाती है और इतनी ही उसकी आवश्यकता होती है। स्थापना और प्रतिष्ठा का सुख जिन्हें मिलता है , वे उसका आनंद सप्रयास ले लेते हैं।

मैंने मूर्तियों के निर्माण का आनंद लिया। यह आनंद हमारे हाथ में होता हैं। हम ही निश्चित करते हैं कि किस चीज़ का हमें आनंद लेना है। थोपी गई भयंकर और भयानक ‘सुन्दर’ वस्तु का आनंद लेना किसी के वश की बात नहीं हैं। चाहे फिर वह अमूर्त सुन्दर वस्तु हो या मूर्त। जीवित या जड़।
मैंने जड़ मूर्ति के निर्माण को नजदीक से देखा। यह मेरे लिए सरल भी था और संभव भी।जीवित वस्तुओं के निर्माण के बारे में मैं केवल सोच सकता हूं। सोच कर लोग ज्यादा आनंदित होते हैं पर देखकर आनंदित होना सरल तो है पर कठिन भी। यह भी हमारी सोच पर निर्भर है। यदि बहुत सुन्दर की कल्पना के साथ देख रहे हैं तो दुखी हो सकते हैं क्योकि सब कुछ बहुत सुन्दर नहीं होता। ‘जो भी है ,देखते हैं कैसा है ’ इस भाव से देखते हैं तो हमारे आनंदित होने की संभावना है। मैं इसी भाव से बैठा रहा और जिज्ञासा मेरा पूरा साथ देती रही।

मैंने और मेरी जिज्ञासा ने देखा कि कैसे लकड़ी का ढांचा खड़ा किया जाता है। कैसे कीलें ठोंकी जाती हैं और कैसे सुतलियां बांधी जाती है। कैसे घास और पैरे से पेशियां गढ़ी जाती हैं। कैसे मिट्टी के ढेलों को मांस की तरह चढ़ाया जाता है। फिर महीन बुनी हुई पटसन यानी सन की फट्टि यों के टुकड़ों को निथरी हुई मिट्टी के गाढे घोल मेें लपेटकर त्वचा की रचना की जाती है और रगड़रगड़कर उसे चिकना बनाया जाता है।

फिर सांचे में ढाले गए सिर या मुखाकृति रखी जाती है। उसे मूर्ति के साथ मिट्टी से जोड़ दिया जाता है। फिर लेप। और फिर रंगकारी। और फिर श्रृंगार। ग्राहक बीच बीच में आकर देख जाते हैं कि कैसी बनी और कहां तक बनी ? बड़ी मूर्तियां आर्डर और एडवांस की ताकत से ही बनती हैं। ओर फिर गंतव्य की ओर मूर्तियां एक अनाज के बोरे की तरह उठकर चली जाती हैं। मूर्तिकार अपनी मेहनत का मुआवजा ले लेता है और प्रशंसा का बोनस भी।


आजकल कलाकार का काम उद्योग की तरह हो गया है। मिट्टी की खरीद से लेकर अन्य कच्चे माल को एकत्र कर उसको उपयोग के लायक बनाना। फिर ढांचा बनाकर उसे समुचित रूपाकार देना उसके हाथ में हैं। रंग और उसका संयोजन उसकी कल्पना और कौशल की कला है। किन्तु जिन मूर्तियों को विशिष्ट श्रंगार देना है उसके लिए पश्चिम बंगाल पटसन, कार्क , प्लास्टिक और कागज आदि से बनी सामग्रियां शेष भारत में भेजता है। इससे कलाकार का काम हल्का भी हो जाता है और तेज भी। कम समय में अधिक का उद्पादन और विपणन इससे संभव हो जाता है। समय जो है सो प्रतिस्पद्र्धा का है। जो चूका वह फिसला , पिछड़ा ,पददलित हुआ। इसलिए समय जैसा चाहे कलाकार वैसा रच दे, यही रचना का नियम है। दुनिया इसी की कद्र करती है। हमें बदले में दुनिया की कद्र करनी चाहिए। कलाकार का क्या है , उसके साथ उसका स्वाभिमान है। कला लोगों की हो जाती है, कलाकार पृष्ठभूमि में चला जाता है। जब कोई नहीं होता तो वह अपनी कल्पना और स्वाभिमान के साथ फिर नये सृजन में जुट जाता है। हर व्यक्ति कलाकार नहीं ोता पर कला की प्रशंसा वह कर सकता है। यही सरल है। कलाकार पैदा होते हैं। प्रशंसक भी पैदा ही होते हैं। कला बहुमूल्य होती है। प्रशंसक अपनी प्रशंसा की कीमत लगाते हैं और उसी के अनुकूल आयोजन इत्यादि करते हैं। संगठन खड़ा करते हैं। स्थापित और विस्थापित करते हैं।
कबीर कहते हैं-
माटी के हम पूतरे मानुस राखा नाम।
चार दिवस के पाहुने बड़ बड़ रूंधहिं धाम ।
और यह भी कहते हैं-
माटी एक भेस धरि नाना सबमें एक समाना
कह कबीर भिस्त छिटकाना दोजग ही मन माना ।
कहते हैं कि एक ही मिट्टी के हम बने हैं। बस अलग अलग रूप ले लिया हैं। नाक नक्श बदले होने से क्या होता है। रा-मटेरियल एक ही है। इस बदले हुए रूप के कारण बहिश्त (भिस्त) और दोजख (दोजग) तुमने अलग अलग खड़े कर लिए। एक जायेगा बहिश्त और दूसरा जलेगा दोजख की आग में । दूसरा कौन ? वही जिसे एक गरियाते हुए काफिर कहता है। यह कबीर कह रहे हैं।
बहादुर शाह ज़फ़र इसी का अनुवाद करते हैं -
उम्रेदराज़ मांगकर लाए थे चार दिन
दो आरजू़ में कट गए दो इंतज़ार में।
यानी मनुष्य चार दिन का गणित है। दुर्गोत्सव या गणेशोत्सव भले ही वह दस दस दिन का मनाए ,यह उसकी उम्र बढ़ाने की कोशिश हो सकती है, मगर मध्यकाल और आधुूनिक काल के पास चार दिन का ही हिसाब है। हम इसी सूत्र से स्थापना और विसर्जन करते हैं। विसर्जन के बारे कबीर पूछते हैं, अपनी साखी में कि -
माटी मे माटी मिली , मिली पौन में पौन
हौं तौं बूझौं पंडिता दो में मूआ कौन।
कबीर पूछते हंै कि भाई यह जो चार दिन का आयोजन है और यह जो स्थापना का तांडव है उसके बाद तो अनिवार्यतः विसर्जन है। विसर्जन में क्या होगा कि मिट्टी जाकर मिट्टी में मिल जायेगी और पवन पवन में मिल जायेगा। पांचों तत्त (तत्व) ...जल, छिति ,पावक ,गगन ,समीरा .. ये पांचों भी मिल जायेगें अपने अपने संस्रोतों में। तो मरा कौन ?
कबीर ने केवल दो के उदाहरण से पूछा कि मिट्टी और हवा में कौन मर गया ? मरता तो केवल रूप या फार्म है। जीते जी बस इसकी नाटकीयता के दर्शन का सुख हमें मिलता है। यही हमारे बस में हैं बाकी सब बेकार की बातें हैं। बस! अब चेतो और बेकार की बातें छोड़ो। यह कबीर कह रहे हैं।
-13.10.10

Wednesday, October 6, 2010

काग के भाग बड़े सजनी



पितृपक्ष में रसखान रोते हुए मिले। सजनी ने पूछा -‘क्यों रोते हो हे कवि!’
कवि ने कहा:‘ सजनी पितृ पक्ष लग गया है। एक बेसहारा चैनल ने पितृ पक्ष में कौवे की सराहना करते हुए एक पद की पंक्ति गलत सलत उठायी है कि कागा के भाग बड़े, कृश्न के हाथ से रोटी ले गया।’
सजनी ने हंसकर कहा-‘ यह तो तुम्हारी ही कविता का अंश है। जरा तोड़मरोड़कर प्रस्तुत किया है बस। तुम्हें खुश होना चाहिए । तुम तो रो रहे हो।’
कवि ने एक हिचकी लेकर कहा-‘ रोने की ही बात है ,हे सजनी! तोड़मोड़कर पेश करते तो उतनी बुरी बात नहीं है। कहते हैं यह कविता सूरदास ने लिखी है। एक कवि को अपनी कविता दूसरे के नाम से लगी देखकर रोना नहीं आएगा ? इन दिनों बाबरी-रामभूमि की संवेदनशीलता चल रही है। तो क्या जानबूझकर रसखान को खान मानकर वल्लभी सूरदास का नाम लगा दिया है। मनसे की तर्ज पर..?’
खिलखिलाकर हंस पड़ी सजनी-‘ भारतीय राजनीति की मार मध्यकाल तक चली गई कविराज ?’ फिर उसने अपने आंचल से कवि रसखान की आंखों से आंसू पोंछे और ढांढस बंधाने लगी।
दृष्य में अंतरंगता को बढ़ते देख मैं एक शरीफ आदमी की तरह आगे बढ़ गया। मेरे साथ रसखान का कौवा भी कांव कांव करता चला आया। मैंने दो एक बार सातवें दशक की किसी हीरोइन की तर्ज पर ‘और लताजी की आवाज मंे ‘ चल कान न खा’’ कहा भी । पर वह कहां माननेवाला था। पित्पक्ष चल रहा है और वह मेरे किसी पुरखे की भूखी आत्मा की तरह मेरे पीछे मुक्ति के लिए पड़ा था। मगर मुक्ति अगर मिलनी होती तो एक ही पित्पक्ष में मिल जाती , पितृपक्ष बार बार क्यों आता। फिर वही पितृ , फिर वही तर्पणकर्ता ?...फिर वही कौवे...कौवे......!? इतने में फिर एक कौवा आया और मेरे कान के पास आकर जोर से चिल्लाया‘‘कांव कांव !!’’
मैंने झल्लाकर कहा -‘‘क्या है यार! बोर क्यों कर रहे हो। जाओ यहां से। मैं तुम्हे दाना नहीं डालनेवाला। न पूरी , न खीर...हमारे सारे पितृ खा पीकर मरे हैं। सब इतने चलते पुरजे थे कि एक जगह बैठकर नहीं रहते थे। अब तक तो दो तीन बार पैदा होकर स्वर्गीय हो चुके होंगे। जवान होकर किसी पर मर जाने की उनकी बुरी आदत थी। कोई कौवा नहीं बना होगा। क्या बने होंगे यह तुम नहीं समझोगे।’’ इतना कहते हुए मैं अंदर आ गया। दिमाग में मगर बचपन में पढ़ी कविता गूंजने लगी-
आज गई हुति नंद के भौनहि ,भोरहिं ते रसखान बिलोकी
धूर भरे अति सोभित स्यामजु ,तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी
खेलत खात फिरे अंगना ,पग पैंजनिया ,कटि पीरी कछौटी
काग के भाग बड़े सजनी! हरि हाथ सौं लै गयो माखन रोटी।

-अर्थात् एक सखि दूसरी सखि से कहती है कि हे सजनी! आज सुबह सुबह ही मैं नंद महाराज के घर चली गई और वहां मैंने रसखान को देखा। यहां रसखान में श्लेष अलंकार है। रसखान यानी रस की खान ..रस का भंडार। दूसरा अर्थ कवि का नाम ..रसखान..। खैर सजनी! मैंने क्या देखा कि रस-सागर धूल से भरे और सने हुए हैं ,मगर बहुत सुन्दर लग रहे हैं। उनके बड़े बड़े बालों की चोटी भी बड़ी सुन्दर लग रही है। वे खेल-खेल में खा रहे हैं और खा-खा कर खेल रहे हैं। सजनी! मेरा ध्यान उनके पैरों में की पैंजनियां पर है जो बज रही हैं और कमर पर भी है जिसमें पीले रंग की कछौटी यानी हगीज़ बंधी हुई है। हे सखी ! इसी समय वह घटना घटी, जिसका इतना हल्ला हो रहा है। यानी वही कौवे की हरकत...अच्छे भले खेलते हुए कन्हैया के हाथ से वह रोटी छीनकर एक कौवा ले उड़ा ,जिसमें मक्खन लगा हुआ था। रसखान कह रहें कि कौवा बड़भागी है जिसने हरि के हाथ से मक्खन-चुपड़ी रोटी छीन ली।
ठीक कह रहे हैं रसखान। मैं आह भरकर सोच रहा हूं। छीननेवाले बड़े भाग्यशाली होते हैं। बड़े भी और भाग्यशाली भी। मैं तो उस भुच्च संस्कारों का पालतू जीव हूं जिसमें छीनना पाप है। छीननेवालों को अपनी हिस्सा दे देना पुण्य है। ‘देनेवाला हाथ हमेशा ऊपर होता है’, इस आत्मघाती संस्कृति के हम चराग पुरुष हैं। चराग होने के चक्कर में अपना ही घर फूंककर फुटपाथ पर बैठे आल्हा गाते रहते हैं। कबीर भी उकसाते रहते हैं-चलो हमारे साथ। हम कटोरा लेकर उनके पीछे हो लिए।
इधर रसखान खुश हो रहे हैं कि कौआ हरि के हाथ से रोटी ले गया। टीवी में आ रहा है कि कौआ हमारे पूर्वज हैं। शास्त्रों में लिखा है। पंडित ने पहले कहा त्रेता से यह परम्परा चल रही है। किसी ने उसे बताया कि त्रेता के पहले सतयुग होता है , शास्त्रों में लिखा है तो उसने सुधार लिया। कहने लगा ,सतयुग से कौआ हमारे पितर हैं। डार्विन ने शास्त्रों की दुर्गत कर दी। उसने कहा -हम बंदरों से विकसित हुए हैं। बंदर हमारे पितर थे। ले भई ! हम उसके विकासवाद की लाज रखने के लिए कौओं की बजाय बंदरों की औलाद बन गए। हमारी वल्दियत बड़ी साफ्ट किस्म की है। समय पड़ता है तो हम गधे को भी बाप बना लेते हैं। बंदर और कौआ क्या चीज़ है।
फिल्हाल हम पितृपक्ष मना रहे हैं। कौओं को अपना पितर मानकर उन्हें खाना खिला रहे है। एक ही कोआ मुहल्ले के कई घरों में घूम रहा है। शुक्ला , खान , डेनियल ,अरोरा .. वह सबका पितर है। कईयों का आजा दादा है। तभी हम एक दूसरे को भाई कहते हैं और हमारा भाईचारा बना रहता है। हमारी संस्कृति विश्वबंधुत्ववाली है। हमारी दृष्टि की दाद दीजिए। कबूतरों को हम पोस्टमैन बनाते हैं और कौओं से कहते हैं पिताजी ! जाइये ! पूरी दुनिया को हमारा भाई बनाइये ! ये कौअे विदेश भी जाते होंगे। कई एंडरसन ,एनरान , बारबरा , स्वेतलाना वगैरह हमारे पितरों की हींग और फिटकरी लगे बिना हमारे वंशज हो गए हैं। भारत बहुत उदारवादी देश है। मेरा भारत महान है।
कहते हैं -देवता लोग आदमी बनने के लिए तरसते हैं। खासकर भारत का आदमी। पर मेरे पास प्रमाण है कि देवता लोग कौआ बनने के लिए भी तरसते हैं। स्वर्ग के राजा इंद्र का बेटा जयंत कौआ बनकर माता सीता के पास आशीर्वाद लेने आया था। उनके पैर पड़ने आया था। श्री राम गलत समझ गए। उन्होंने गलतफहमी में उसकी एक आंख फोड़ डाली।
उधर कौओं के हाई ब्रीड चीलों ने श्री राम का बड़ा साथ दिया। जटाऊ रावण से भिड़ गया और घायल होकर मर गया। बाद में उसके जुड़वा भाई संपाती ने आकाश में उड़कर देख दिया कि अपहृत माता सीता कहां हैं। बंदर, भालू , गिलहरियां , मगरमच्छ और मच्छर तक को गोस्वामी जी ने रामचरित में मित्रवत्-भूमिकाएं (फ्रेंडली एपीयरेन्स) दी हैं। कौअे को तो ऋषि भुशुण्डि की चरित्र भूमिका दी है। भगवान विष्णु के वाहन-सह-चालक गरुण उनके प्रिय श्रोता हैं।
देखिए , धीरे धीरे कौअे का व्यक्तित्व कैसा खुलते जा रहा है।
मुझे याद है कि आठवीं में मैं संस्कृत का बड़ा मेधावी छात्र था। भार्गव गुरुजी अब नहीं रहे वर्ना वे इसका प्रमाण देते। खैर जाने दीजिए...यही क्या कम है कि एक श्लोक मैंने तब पढ़ा था और वह आज भी याद है। श्लोक है-
काक-चेष्टा, वको-ध्यानं ,श्वान-निद्रा तथैव च ,
अल्पाहारी, गृहत्यागी विद्यार्थीं पंच लक्षणम् ।।

-अर्थात् कौअे जैसी कोशिशें करते रहो कि बार बार भगाए जाने पर भी उड़-उड़कर आओ या जाओ , बगुले जैसा ध्यान करो कि जैसे ही मछली सीमा में आई कि मारा झपट्टा। कुत्ते की नींद यानी सो रहे हैं मगर जरा सी आहट हुई कि लगा ,कहीं ये वो तो नहीं। अल्पाहारी यानी अपने घर में कम खाना और गृहत्यागी यानी अपना घर छोड़कर दूसरों के घर में कम्बाइंड स्टडी करना। ये पांच लक्षण बहुतों के बहुत काम आते रहे हैं। मुझे यह बड़ा व्यावहारिक श्लोक मालूम पड़ता है। एकदम प्रेक्टीकल। दुनिया का खूब अध्ययन करके किसी विद्वान ने यह श्लोक गढ़ा होगा। यहां उल्लेखनीय यह है मित्रों ! कि कौआ अंकल (पुरखे ) इस श्लोक में भी सम्मानपूर्वक फ्र्रंट सीट पर बैठै हैं। श्लोक उन्हीं से शुरू हुआ- ‘काक चेष्टा.......।’
कौआ मीरां बाई को भी प्रिय था। उसपर उन्होंने कविता लिखी। दोहा है-
कागा सब तन खाइयो, मेरा चुन चुन खइयो मास
दो नैना मत खाइयो जामे पिया मिलन की आस।

यहां कागा यानी काक.. कौआ। पहले काक का काका हुआ होगा, बाद में अपभ्रंश के नियम से कागा हो गया होगा। काका पिता के छोटे भाई को कहते हंै। पंजाब में तो बेटे को काका कहते हैं। साई लोग तो बात-बात पर एक दूसरे को काका कहते है। अब तो साई का पर्याय ही काका हो गया है।
कुलमिलाकर ,काका यानी कागा यानी कौआ हमारी सांस्कृतिक पहचान है। गंदी संदी चीजें खाना उसका स्वभाव है। हम उससे सालभर घृणा करते हैं और फिर सोलह दिन उसकी पूजा करते हैं। किसी पक्षी को यह स्थान प्राप्त नहीं है। कोई हमारा पुरखा या पूर्वज नहीं है। बंदर को चिड़ियाघर और तीर्थ स्थलों पर जरूर हम केला और चना देते हैं।
कौआ हमारे प्रेयसियों का प्रिय रासिद है। रासिद यानी रहस्य की बातों को चिट्ठी में लिखनेवाला, पोस्टमैन ,संवदिया। एक गीत है- ‘भोर होते कागा पुकारे काहे राम , कौन परदेसी आएगा मोरे गाम।’
-एक सखी डॉ.रामकुमार से पूछती है कि हाय राम ! सुबह सुबह यह कौआ क्यों चीख रहा है। बताइये न कौन परदेशी हमारे नगर आनेवाला है।’
राम जब जनक-ग्राम पहुंचे थे तो जानकी के कमरे के सामने कई कौअे ऐसे ही चिल्लाए होंगे। तब यह गाना बना। एक दूसरा गाना भी बना। विवाह योग्य कन्या चुपके-चुपके योग्य वर मिल जाने पर अपनी मां को इशारे से बता रही है- माई नी माई , मुंडेर पै मेरे , बोल रहा है कागा
जोगन हो गई तेरी दुलारिन मन जोगी संग लागा।

- इस कविता में थोड़ा कन्फ्यूजन जरूर है कि जोगन हुई तो जोगी से मन लग गया कि जोगी से मन लग गया तो जोगन हो गई। हालांकि ले दे के बात तो एक ही घटित हुई। यानी छोरी का लम्पट जोगी से मन लग गया क्योंकि मुंडेर पर कागा बोल रहा है।
इसीलिए गांव में कौओं को भगाने के लिए बिजूका लगाया जाता है जिसे अन्य शब्दों में कागभगौड़ा भी कहते हैं। कौओं को भगानेवाला झूठमूठ का आदमी। आगे चलकर इसी झूठ से दूसरा किस्सा बना। लोगों में ‘झूठ बोले कौआ काटे ’एक कहावत बन गई। यानी कौअे इस झूठ को समझ गए और आदमियों को काटने लगे।
और भी बहुत सी बातें हैं जो आपसे शेअर करनी है मगर नौकरी में जाने का वक्त हो गया है। देखूं कहीं घरवालों ने सारा खाना इन कौओं को तो नहीं खिला दिया। यह आशंका अभी और दस ग्यारह
दिन रहेगी। फिर निश्चिंतता से लिख सकूंगा कि मैं अकेला कौआ होउंगा जो मजे से पेटभर कर खा सकूंगा और सरकारी कार्यालय में जी भर ऊंघ सकूंगा। तब तक आप भी अपने अपने कौओं को निपटाइये, इस संस्कृत-निष्ठ निवेदन के साथ कि-
काक चंचु मार मार क्षीर में सुहास के ,
फिर अमा शिविर लगाने आ गई खवास के ।

शब्दावली:
काक - कौआ ,
चंचु - चोंच ,
क्षीर - खीर ,
सुहास - हंसी खुशी ,
अमा - अमावस्या,
शिविर - कैंप ,
खवास - खाने की घोर इच्छा। अघोरी।

26.9.10/7-10-10

Tuesday, October 5, 2010

माटी के पुतले -2



2. एसराम उइके पेन्टर

आदिजन बहुल क्षेत्र के एक सामान्य परिवार से संबद्ध श्री एसराम उइके रेलवे मुलाजिम हैं। यद्यपि यह कलाकार रेलवे में पेन्टर के रूप में 1985 से पदस्थ है ; लेकिन अरविंद आश्रम के अनुयायी एक कांक्रीट कलाकार श्री अनादि अधिकारी के साथ संपर्क होने से कैनवास पेन्टिंग में इनकी प्रतिभा अद्भुत रंग उभारती रही है। भविष्य में इस श्रमजीवी कलाकार की कण कण में निखरी चित्रकला और रंग-रचनाओं के साथ साथ अरविन्द-आश्रम के सिद्धहस्त रंगशिल्पी और मूर्तिकार अनादि अधिकारी के
शिल्प का परिचय देने का प्रयास करूंगा।
बहरहाल श्री एसराम ने अपनी अक्षर पेन्टिन्ग के साथ साथ इस क्षेत्र की विशिष्ट पहचान बाघ या टााइगर के तैल चित्रों से रेल सूचना पटलों को पूरे संभग में रंगा डाला है और अपन अभीश्ट प्रभाव छोड़ा है। एक और आदिमजन छिंदवाड़ा में पतालकोट का मूर्तिशिल्प रचने और कपड़े के थान के थान को अािदवासी संस्कृति का कैनवास बनाकर प्रस्तुत करने के लाइव प्रदर्शन कर चुके हैं। छिंदवाड़ा में उनके जीवंत मूर्तियों को आदिवासी संग्रहालय में देखा जा सकता है।


श्री एसराम ने यद्यपि इस विशाल और वृहद स्तर पर अपने शिल्प को प्रस्तुत नहीं किया है लेकिन अपने विविधता से भरे मूर्तिशिल्प और रंगसंयोजन को लेकर इस क्षेत्र में अपने पहचान जरूर बनाई है। कागज और केन्वास पर इनकी तूलिका ने अनेक मौलिक रचनाओं को जन्म दिया है। रेलवे के बोर्डों और होर्डिंग पर लेखन के साथ-साथ प्रमुख रूप से कान्हा के सौन्दर्य और बाघों के जीवित चित्र इस संभाग में देखे जा सकते हैं।
दुर्गा प्रतिमाओं को कला के साथ प्रस्तुत करने के लिए श्री एसराम दूर-दूर तक विख्यात हैं। एक समग्र कलाकार के रूप में इनकी पहचान है। इनकी कलाकृतियां इनके दृष्टि-विस्तार की परिचायक हैं। जब तक यानी 7 अक्टोबर तक इन मूर्तियों रंगा जाता है, तब तक इन मूर्तियो ंके निर्माण को हम देखें। अगले दो दिनों में इन माटी के पुतलो को रंगीन देख सकेंगें
2.10.10
क्रमशः

Monday, October 4, 2010

माटी के पुतले 1


पूरे भारत में हिन्दू आस्था और विद्या की प्रतीक गजानन गणपति की मूर्तियों का विसर्जन किया जा चुका है। यह भाद्र मास था। अश्विन-मास के साथ ही पितृ मोक्ष पखवाड़ा प्रारंभ हुआ। पितृमोक्ष अमावस्या के देसरे दिन अष्विन शुक्ल की प्रतिपदा से शक्ति की प्रतीक देवी दुर्गा की प्रतिमाओं की प्राणप्रतिष्ठा और पूजन का होगा।

गणेश और दुर्गा की प्रतिमाओं का वृहदस्तर पर निर्माण किया जाता है। जो भी मृदाशिल्प में रुचि रखता है और इसमें पारंगत है वह व्यापारिक दृष्टि से मूर्तियों का निर्माण करता है और मांग के अनुसार उनका व्यापार करता है। रक्षाबंधन और दीपावली में उत्सब के अनुकूल राखियों और पटाखों का निर्माण अधिकांशतः मुस्लिम मतावलंबी करते हैं। मूर्तियों का निर्माण भी अनेक स्थानों में विभिन्न समुदायों के लोग करते हैं ,जिनमें मुस्लिम समुदाय के लोग भी हैं। इन दिनों मंदिर मस्जिद के तथाकथित विवादों और तनावों का चर्चा गर्म है। इसलिए ऐसे समाचार चित्र सहित अखबारों में आते रहते हैं।

मेरे शहर में पिछले बीस बाइस सालों से दो विविध कलाकार मूर्तियों का व्यवसाय कर रहें है। व्यावसायिक स्तर पर किये जाने के कारण और उसमें स्वरुचि का रंग होने से ये मूर्तियां विशिष्ट रंग-रूप में आकर्षण का केन्द्र होती हैं। मैं बहुत वर्षों से प्रभावित हो रहा हूं और स्वांतः सुखाय जो रस मिल रहा है उसे पर्याप्त मान रहा हूं। इस बार ऐसा लगा कि इसकी चर्चा अपने ब्लाग के माध्यम से की जाए। शायद शिल्प पे्रमियों को पसंद आए।
मेरे मन में ये सवाल थे: -
1. कैसे बनती हैं मूर्तियां ? 2. किन चीजों से बनती हैं ? 3. अपने प्रारंभिक निर्माण के दौरान कैसी दिखती हैं ? 4. कैसे धीरे धीरे विकसित होती हैं और कैसे रंग वस्त्र शस्त्र और श्रृंगार के बाद इनका रूप निखरता है ?
इन सवालों के जवाब ये मिले:-
आवश्यक सामान: 1. पैरा : धान की बालियां निकलने के बाद शेष सूखे पौधे , 2. घास , 3. भूसा: गेंहू के पौधे से बालियां निकालने के बाद उसका मिंजा हुआ अवशेष , 4. लकड़ी और पट्टे ,5. कीलें , 6. सुतली (पटसन) और नारियल-बूच की रस्सी , 7. बीड़ी की फट्टियां , 8. मिट्टी विशेष तौर पर बंजर के कछार से बुलवाई गई , 9. चाक मिट्टी , 10. रंग: सभी प्रकार के - फेब्रीकिल, आइल पेंट, वाटर कलर , फ्लोरोसेंट ,लेककलर इत्यादि, 11. कपड़े ,साड़ी, ब्लाउस ( मांग के अनुसार ) 12. पटसन और केले के रेशों के कलकतियां केश ,बाल , 13. टिन के पत्तरों , कार्क , सोलम्सेट ,केला और थर्मोकाल से बने अस्त्र-शस्त्र , मुकुट, श्रृंगार आदि , 14. स्वयं शिल्पकार अपने सहयोगियों श्रमिकों और पारिवारिक सदस्यांे सहित।
ये हैं कलाकार - 1. चक्रवर्ती परिवार :

चक्रवर्ती परिवार के सुभाष (55) और रेवा (45) प्रमुख रूप से अपने पुस्तैनी मिट्टी के काम को करते हुए इस शिल्प की तरफ बढ़े। पांच भाइयों के इस परिवार में ये दो मुख्य रूप से इस काम में जुड़े हुए हैं। 1960 से इनके पिता श्री हरिप्रसाद चक्रवर्ती भी मूर्ति का काम करते थे। पूरे परिवार के साथ इसे विस्तार देने का काम इन भाइयों ने किया।
चक्रवर्ती और प्रजापति आदि कुंभकार समुदाय के लोग हैं , जिनका मुख्य काम रसोई घर के लिए मिट्टी के भांड़े बनाना था। दीपावली के दीपक , पोला के घुड़ले, लक्ष्मी -महालक्ष्मी , होलिका , काली , सरस्वती आदि की मूर्तियां भी प्रारंभ में इसी समुदाय ने बनाई। बाद मे ंअन्य कलाकार भी इस तरफ़ आकर्षित हुए। सभी वर्ग के व्यापारी इनकी बनाई हुई गणेश की छोटी छोटी मूर्तियां दूकानों में बेचते हैं। अधिकांश घरों में छोटी मूर्तिया स्थापित करने का चलन हिन्दू परिवारों में है।
अन्य संप्रदाय के लोग भी गणपति रखा करते हैं। प्रायः सामूहिक तौर पर गणेश स्थापित किये जाते रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में एकता के लिए प्रारंभ इस आंदोलन को शुरुआती दौर में सामूहिक रूप से ही आयोजित किया गया। बाद में व्यक्तिगत आस्था और सुरक्षा के तौर पर घरो में स्थापित किया जाने लगा। हालांकि भारत में हिन्दू-मुस्लिम एक्य के प्रतीक गणेशोेत्सव की अनेक कथाएं जीवित हैं।
दुर्गा अपेक्षाकृत वृहदस्तर पर सामूहिक तौर पर स्थापित की जाती है। अतः मुहल्लों में सहयोगात्मक तरीके से इनकी पूजा होती है। सभी वर्गों के लोग इसमें शामिल होते हैं।

क्रमशः