Sunday, April 26, 2009

साहित्य में अफ़सरवाद

उद्योग-नगरी के साहित्य क्लब में तब अध्यक्ष कोई बड़ा अधिकारी होता था और सचिव भी एक छोटा अफसर होता था। ये अफसर प्रायः प्रबंधक-वर्गीय होते थे। डाॅक्टर और इंजीनियर कार्यकारिणी में रखे जाते थे। टीचर्स ,इस्टेट और सैफ्टी इंस्पेक्टर वगैरह सदस्य हुआ करते थे। अध्यक्ष और सचिव पद पर बैठे पदाधिकारी अपनी शक्ति लगााकर महाप्रबंक जैसी मूल्यवान हस्तियों को तलुवों से पकड़कर ले आते थे और तालियां बजाकर अपने हाथ साफ कर लेते थे। उन दिनों मैं प्रबंधन में नया था और अफसर नहीं था। मेरे जैसांे की रचनाएं सराही तो जाती थीं मगर ’अधिकारी-सम्मान’ नहीं दिया जाता था।
एक दिन मैं प्रशासनिक सेवा के लिए चुन लिया गया। अचानक जैसे सब कुछ बदल गया। मैं अब उपेक्षणीय से सम्माननीय हो गया। मेरी रचनाओं में वज़न आ गया। जबकि राजधानी की प्रशासनिक अकादमी के लिए मुझे उद्योग-नगरी से विदा होना था , तब मेरे सम्मान में साहित्य क्लब में विशेष आयोजन किया गया। अध्यक्ष , सचिव और कार्यकारिधी के पदाधिकारीगण फूलमालाओं की तरह बात बात में गले लगने लगे।विदाई में जो रचनाएं मुझे पढ़नी थीं , उसे रिकार्ड करने का इंतज़ाम स्वयं अध्यक्षरूपी अधिकारी ने की थी। ये वही अधिकारी थे जो मेरी रचना पाठ के समय माथे पर यूं हाथ रखकर बैठे होते थे मानो उनकी इज्जत लूटी जा रही हो।
तभी मुझे साहित्य में अफसर होने का अर्थ बेहद नज़दीक से समझ में आया। निरंतर नीचा दिखाने का प्रयास करनेवाली तोपें सलामियां दे रहीं थीं। ये साहित्य को सलाम नहीं था बल्कि अफ़सर को कोर्निशें थीं। मुझे जैसे दिव्य-दृष्टि मिल गई। साहित्य का इतिहास मुझे आर पार दिखाई देने लगा। किसी मित्र ने मेरी समीक्षा-दृष्टि को कभी ‘एक्स-रे‘ कहा था। अफ्सरों द्वारा की गई उपेक्षाओं की मार से पीड़ित और कुंठित मुझ ‘ज्ञानीनाम अग्रगण्यम्‘ हनुमान को तब वह बात व्यंग्य की कालीमाता का खूनी-खडग प्रतीत हुई थी। वर्ना आज मैं नामवर होता। ‘हुए नामवर बेनिशां कैसे कैसे‘ के निराशावादी गानों के बावजूद मैं आलोचनावादी खेमे का सिपहसालार होता। खैर ,जो हुआ सो हुआ , ऐसी असफलता में तुलसी सहायता करते हैं कि ‘होहिहे वही जो राम रचि राखा‘।
आज लगा कि अफ़सर होना ब्रह्म-देव का सर्वोत्कृष्ट वरदान है। जिन रवीन्द्रनाथ टैगोर , रामचंद्र शुक्ल , महावीर प्रसाद द्विवेदी , सूर्यकांत त्रिपाठी , जयशंकर प्रसाद ,मुंशी प्रेमचंद , सुमित्रा नंदन पंत वगैरह के नामों को दुहराते दलराते मैं नहीं थका करता था ,अचानक वहां आई.सी.एस अधिकारी विलियम थैकरे , आर. व्ही. रसैल. मैकाले मेरे आदर्श बन गए. भारतीय आई.ए.एस. अध् िाकारियों में स्थापित कवि अशोक वाजपेयी, श्रीकांत वर्मा , सुदीप बैनर्जी , भारतीय आई.ए.एस. अधिकारियों में स्थापित व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल, रामावतार त्यागी ,अजात शत्रु ,डाॅ.देवेन्द्र वर्मा ,भारतीय आई.ए.एस. अधिकारियों में स्थापित जनसंपर्क एवं साक्षरता लेखक डाॅ. सुशील त्रिवेदी , रघुराज सिंह , नए भारत के प्रमुख दलित-विमर्श में स्थापित दलित आई.ए.एस. कवि और लेखक ओमप्रकाश मेहरा ,रमेश थेटे , डाॅ. धर्मवीर , राम मेश्राम आदि अनेक प्रशानिक अधिकारी स्थापित हो गए। इनमें कुछ बैंक अधिकारी ,कुछ प्रसिद्ध राजनेताओं के भतीजे भांजे और रिश्तेदार आ गए। जिन डायरियों में राजधानी के गलियारों में जगमगाते साहित्यकारों के पते थे ,जो सचिवालय के अवर सचिवों को ‘श्रद्धेय‘ कहकर चिरौरियां करते थे और वांछित लाभ प्राप्त करते थे , उनके स्थान पर उन साहित्यकारों के नाम आ गये जिन्हें पदेन श्रद्धेय होने का गौरव हासिल था।
‘‘ आपका भविष्य बहुत ब्राइट है साहब। आप तो संस्कृति विभाग के लिए ट्राई मारना। से।कड़ों टुटपुंजिए साहित्यकार और साहित्यिक संस्थाएं आपकी कृपा पाने के लिए लाइन लगाएंगी। सैंकड़ोंप्रकाशक आपकी रचनाओं के संकलन छापकर धन्य हो जाएंगे। कमीशनों की बाढ़ आ जाएगी और वे समीक्षक जो गैर-अफ़सरों के संकलनों को हाथ भी नहीं लगाते ,अब आपके घर के बाहर हाथ बांधे और कलम खोले दांत निपोरते खड़े रहेंगे। कहेंगे:‘ सर , लाइए ..समीक्षा कर दूं।...कुछ रेडीमेड समीक्षाएं भी आपको सौंपे जाते हैं..जब जहां जैसी जरूरत हो , इस्तेमाल कर लीजिएगा।‘‘ मेरे एक परमशुभचिंतक टाइप साहित्यकार ने मुझे सलाह दी। वे इसी प्रकार की सलाहें दे देकर प्रमोट हुए थे। अपने से बड़े अधिकारियों को ऐसी सलाहें देकर खुष रखने का उनको वर्षों का अनुभव था।सरकारी अकादमी के खाते से उन्होंने सैकड़ों अधिकारियों की किताबें छपती देखी थीं।
शिक्षक से जन-संपर्क अधिकारी बने एक अस्पष्ट कवि के दो-चार कविता संग्रह उन्होंने मुझे दिखाए। उनकी समीक्षा ऐसे साहित्यकारों ने की थीं जो प्रतिबद्ध किस्म के खड़ूस माने जाते थे।क्लर्क से प्रबंधक हुए एक उपन्यासकार और कवि की किताबों की समीक्षा लिखनेवाले अवकाशप्राप्त शिक्षक तथा बैंक के एक खजांची साहित्यकार का परिचय कराते हुए वे मुस्कुराए:‘‘सर ये स्थापित समीक्षक हैं। एक अनियतकालीन लघुपत्रिका के संपादक हैं और सचिवालय में उदीयमान प्रशासनिक साहित्यकारों की तलाश हेतु राजधानी में प्रायः प्रवासित रहते हैं। इनकी लघुपत्रिका का वर्तमान और भविष्य सचिवालय के दान पर टिका हुआ है।‘‘ फिर धीरे से बोले:‘‘ बहुत से प्रशासनिक अधिकारियों के लिए तो ये छद्मलेखन भी करते हैं।‘‘
‘‘ अच्छा !‘‘ अफसर बनने के बाद मुझे साहित्य में अवसर ही अवसर दिखाई देने लगे।साहित्य में अफ़सरवाद देखकर मेरे अंदर सुप्त हो गया साहित्य का कीड़ा कुलबुलाने लगा।मेरे हाथ में वषों से वह कलम थी जिसे ताकतवर होने का यश प्राप्त था ,किन्तु जिसे वास्तव में साहित्य की ताक़त कहते हैं , उसकी वास्तविकता आज मेरे समक्ष खुली थी।

Saturday, April 18, 2009

आईना मुझे देखकर हैरान सा क्यों है ?

लोंगों की धारणाओं में दर्पण के विषय में एक बात घर कर गई है कि दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता। ऐसा कहने के पीछे कोई घटना अवश्य रही होगी। शायद कोई ऐसी घटना जिसमें पहली बार किसी को किसी बात से लाज आई हागी। किसी बात से क्या , किसी सौन्दर्यजीवी ने किसी सुन्दरी से कह दिया होगा ‘‘ तुम्हारा सौन्दर्य अद्वितीय है।‘‘ स्वाभाविक लाज से तरुणी और सुन्दर हो गई होगी। धड़कती हुई बोली होगी:‘‘ धत्..‘‘ सौन्दर्य प्रेमी ने कहा होगा:‘6 विश्वास न हो तो दर्पण देख लो। दर्पण झूठ नहीं बोलता।‘‘ शर्मीली उत्सुकता युवती ने दख लिया होगा और बलखाकर मुंह छुपा लिया होगा कि हाय ! मैं इतनी सुन्दर हूं । पहले मेरा ध्यान क्यों इस तरफ़ क्यांे नहीं गया ?‘‘ इस आभास के बाद वह कैसे कह दे कि दर्पण झूठा है। इसी रसीले सौन्दर्यबोध ने दर्पण को सत्यवादी प्रचारित कर दिया।परन्तु केवल रसीले प्रमाणों तक ही दर्पण की सत्यवादिता ठहरी नहीं है। समाज की सुखद स्थितियां तो मिलन की केवल क्षणिक स्मृतियां है ,स्वप्न है। ‘मिलन स्वप्न है ,विरह जागरण ’ ही समाज का साहित्यिक-सत्य है। समाज जागरण की जगह खड़ा है और घुड़क रहा है:‘‘ तू किसी से मिलकर आ रही है या आ रहा है ? झूठ मत बोल। जाकर दर्पण देख। चेहरे पर साफ लिखा है कि तू हमसे कुछ छुपा रहा है या रही है।‘‘ अब आरोपी कया यह कहे कि दर्पण झूठ बोलता है। आरोपी ऐसा कह ही नहीं सकता । अगर छुपाछुपी के मिलन के बाद लौटा है और बात खुलने का डर उसके चेहरे पर है तो दर्पण के सामने आकर उसकी हालत क्या होगी? समाज के सामने तो चेहरे पर केवल भय दिख रहा है। दिख रहा है कि चोरी है जो छुपाई जा रही है। मगर आरोपी को दर्पध में अपने चेहरे के वे हिस्से दिखाई देंगे जो अब तक सिर्फ महसूस हो रहे थे। आरोपी और शर्मा जाएगा। वह और छुपाने की कोशिश करेगा। समाज और चिल्लाकर कहेगा:‘‘ पकड़ा गया न ? झूठ पकड़ा गया तुम्हारा , किया है तुमने गलत काम।‘‘ दर्पण आरोपी का भी सत्य है और वादी समाज का भी।एक समय में एक ही दर्पण दो विपरीत लोगों का सत्य सिद्ध हो रहा है। जो झूठ सिद्ध करना चाहते हैं , उनका भी और जो सत्य को गोपनीयता बनाना चाहते हैं ,उनका भी। दर्पण को सत्यवादी कहना सबकी मजबूरी है क्यों उसे झूठा कहना किसी के लिए संभव नहीं है।इसीलिए विद्वान-आखर्यों ने साहित्य को समाज का दर्पण कह दिया। साहित्य इसी खोज बीन में पड़ा रहता है कि समाज में कहां क्या घट रहा है ? क्या गुप्त है ,सुप्त है , लुप्त है कि खींचकर उसे ऐसा प्रयुक्त करले कि चारों तरफ हंगामा हो जाए। वस्तुतः दर्पण दोनों तरफ का सच है। सास बहू का भी ,ननद भौजाई का भी । प्रेमी प्रेमिकाओं का भी और दीवार खड़ी करनेवालों का भी । चोरों का भी और साहूकारों का भी। दर्पण उन चालाक लोगों का भी सत्य है जो दर्पण को झुठलाने की विधियां जानते हैं। दर्पध को झूठा सच्चा सिद्ध करने के साथ साथ ही दर्पध के जन्म, वंश और जाति पांति की जानकारी लेने की जिज्ञासा होने लगती है।जन्म की दृष्टि से दर्पण ‘दर्प‘ का पुत्र है। दर्प के परिवार में उसका जन्म हुआ। दर्प ही उसका जातीय धर्म-कर्म है। दर्प ही उसका व्यवसाय है और दर्प ही उसकी कीर्ति या गुडविल है , मूल्य है ,आजीविका है। अगर दर्पण दर्प के परिवार से चला जाए तो उसको कोई पूछेगा भी नहीं। दर्प से कटा तो झनझनाकर टूट जाएगा दर्पण। दर्प का पिता और दर्पण का पितामह है ‘अहं’ और मां है ‘अस्मिता’। ‘आत्मरति‘ इस अस्मिता के मैके का नाम है और पति अहं के साथ फेरे पड़ते ही उसका नाम हो गया -‘श्लाघा ‘, ‘आत्मश्लाघा‘। दर्प के भाई हैं गर्व ,दंभ , मान ,मोह ,लोभ , मद आदि । दर्प की बहने हैं लालसा , कामना , ईष्र्या ,लज्जा , घृणा , वितृष्णा। हालांकि दर्प ने अपने पुत्र ’ दर्पण ’ को अपने अपने सभी गंण दे दिये हैं , लेकिन कुछ गुण दर्पण ने स्वयं अर्जित किये हैं। जैसे खामोशी ,तटस्थता , रहस्यमयता। वह कूट शिरोमणि है। वह गूढता का गणपति है। वह राजारी का राजा है। खुलेपन का खिलाड़ी है। जो भी दर्पण को देखता हैं तो अपने अंदर दर्प से भर जाता हैं। मान से ,मोह से ,मद से ,लोभ से उनके रग रग में सुरूर आ जाता है। लालसा उनकी बलाएं लेने लगती हैं। महत्त्वाकांक्षा रूपी बालाएं उसे आकर्षित करने लगती हैं। दर्पण काम है इसी दर्प को उकसाना। पिता के काम को आगे बढ़ाना। इाीलिउ तो दर्प ने उसे उत्पन्न् किया है। विज्ञान की बढ़त से ,भाषाविज्ञान के कुछ नीरस विद्वानों ने उसे प्रतिबिम्बक कहकर केवल प्रतिबिम्ब बनानेवाला कहकर सीमित करने की चेष्टा की है। दर्पण शुष्क यथार्थ की दृष्टि से प्रतिबिम्ब बनाकर वस्तु को प्रतिभासित ही करता है। दर्पण का उसकी अर्थवत्ता की दृष्टि से दर्प का आभासीकरण ही है। अधिक दुखदायाी यथार्थ तो यह है कि आईने या दर्पण में जो प्रतिबिम्ब बनता है ,वह उल्टा बनता है। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोणवाले विद्वान साहित्य को झूठ , सरासर झूठ कहते हैं। रचनाधर्मी और बिम्बप्रधान रचनाकारों को ऐसे विद्वान समाज से लगाातार और मरणपर्यन्त कठिन और करुण संघर्ष करना पड़ता है।साहित्य को रचना-विरोधी लोग समाज की कपोलकल्पना कहते हैं , अतिरंजना कहकर खारिज़ कर देते हैं। तभी तो साहित्य कहीं आदर्शवादी है तो कहीं यथार्थवादी। कहीं आदर्शाेन्मुख यथार्थवादी। कहीं वह छायावादी है , धर्मवादी है तो कहीं आतंकवादी है। कुलमिलाकर ‘ जाकी रही भावना जैसी ‘‘ वैसा साहित्य रचा जाता है। ऐसे साहित्य से किस समाज का प्रतिबिम्ब बनता है ? किस साहित्य के दर्पण या आईने में समाज का सच दिखाई दे रहा है ? आखिर देखने वाले या रचनेवालों के ‘दर्प ’ के अतिरिक्त ‘ दर्पण ‘ में और क्या दिखाई दे रहा है ? कितना अधूरा , एकांगी ,व्यक्तिवादी या समूहवादी और पक्षपाती है दर्पण कहे जानेवाला ‘सामाजिक-साहित्य‘। जबकि दर्पण निर्मम तटस्थता के साथ ‘दर्शको ‘ के पक्ष में ‘ वस्तु ‘ को प्रस्तुत कर देता है। फिर भी कवियों ने कहा कि ‘ दर्पण झूठ न बोले ‘ । मगर एक शायर ने दर्पण को चकमा देकर हैरान कर दिया। वह कहता है - मुझमें ही नई बात नज़र आती है कोई ,आईना मुझे देखकर हैरान सा क्यों है ?

Friday, April 17, 2009

अनुभूतियां अभिव्यक्तियां

अनुभूतियां , अभिव्यक्तियां ,
जीवन की दो धु्रवशक्तियां ,
पीला चरण ळै आचरण ,दूजा चरण अनुवृत्तियां ।।

रचना का पहला धर्म है , संवेदना जीवित रहे ।
विचलित न हो जो हार से , साहस से चिरसिंचित रहे ।
एकाकी होकर भी चले,
उसका मनोबल क्या दलें,
दूषित स्वजीवी हेकड़ी , बूढ़ी अपाहिज भ्रांतियां ।।

अपने लिए सुविधा रखे , दुविधाएं देकर अन्य को ।
निर्मल सुजन कब पूजते ,ऐसे दुमुख सौजन्य को ?
उपकार की गणना करे ,
हर सांस में करुणा भरे ,
उसकी बनावट टूटती ,चलती जो सच की आंधियां ।।

अपने को रखकर केन्द्र में दूजे का मूल्यांकन करे ।
प्रतिफल की आशा में सदा , आदर्श का पालन करे ।
अपने लिए जीता मरे ,
विद्वेष विष पीता फिरे ,
ऐसे अभागे व्यक्ति की , खुलती कभी न ग्रंथियां ।।