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Showing posts from December, 2025

कारी पुतरी>काली पुतली>काली पुत्री

 कारी पुतरी>काली पुतली>काली पुत्री  आंख की काली पुतली : शरीर के तंत्रिका-तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है आंख। आँख के बीच में एक काला छेद होता है जो सिकुड़कर और फैलकर रोशनी को नियंत्रित करता है, जिससे हम स्पष्ट देख पाते हैं।  इसे काली पुतली (Pupil) कहते हैं। यह काली इसलिए दिखती है क्योंकि आँख के अंदर जानेवाला प्रकाश आँख के अंदर के ऊतकों (tissues) द्वारा पूर्णतः अवशोषित हो जाता है और बाहर परावर्तित नहीं होता। प्रकाश विज्ञान का यही नियम है। सारे रंग लौटा दिए गए, पारेषण उनका हो गया तो बचा ही क्या? सब सफ़ेद हो गया। जो सब लौटा दे, किसी का कुछ ले ही न, वह साफ़ सुथरा, पाक-साफ़, निर्लिप्त, संत, सूफ़ी और प्रतिष्ठित हो गया। विश्वसनीय और आदरणीय हो गया।  वहीं दूसरी ओर, जिसने सब कुछ ले लिया, ग्रहण कर लिया, हड़प लिया, हजम कर लिया तो वह काला हो गया। सारे रंगों का अवशोषण ही काला (रंग) होना है। जैसे ब्लैक होल, वह ऐसा स्थान है, जहां जो भी गया है, लौटा नहीं है। जो सब हजम कर जाये, और डकार भी न ले, उस पर समाज कालिख पोत देता है। उसका मुंह काला हो जाता है। किसी को वह मुंह दिखाने लायक नहीं हो...
  नवगीत :  हवा .... चल रही है! इधर चल रही है, उधर चल रही है। हवा को तो पढ़िए किधर चल रही है। इसे चुभ रही है, उसे डस रही है। कहीं फाड़ मुंह बे-हया हंस रही है। कहीं है धमाका, कहीं झुनझुना है। करेला इसे है, उसे अमपना है।                    बढ़ाती कहीं स्वाद, लेकिन कहीं पर-                      निवालों में भरकर ज़हर चल रही है। सवालों के कितने पड़ावों से बचकर। बहुत झूठ बोली, कहीं पर उतरकर। बहानों से  देकर  कभी सच को फांसी।                 ठहाके लगाती है, पर है रुहांसी।                     चली  मालगाड़ी  सजाकर  बजारन,                    हवा उसकी बन हमसफ़र चल रही है।  ये तोते गगन में जो छाए हुए हैं। ये जनता के हाथों उड़ाए गए हैं। ये टेंटें, ये तोतारटन्ती, ये भाषण। ये दिल्ली के सबसे बड़े हैं प्रदूषण।   ...

युवा नींद, क्वांरे सपनों को

 एक नवगीत युवा नींद, क्वांरे सपनों को, बटमारों ने चुन-चुन मारा। अब केवल रतजगा हमारा। मेरे सुख-दुख नहीं बांटना, मेरी उन्नति नहीं चाहना, कष्ट पड़े तो दूर भागना, दुर्भिक्षों में नहीं झांकना।               कूटनीति होगी उनकी यह,               हर आयोजन है हत्यारा। चुन-चुनकर, कर रहे बेदख़ल, लगा रहे अपना सारा बल, रच षड्यंत्र, प्रपंच और छल, पग-पग मचा हुआ है दंगल।          इधर अमावस पसर रही है,          चमक रहा है उधर सितारा।   तोड़ रहे हैं, फोड़ रहे हैं, वे धारा को मोड़ रहे हैं,  तट भी गरिमा छोड़ रहे हैं, भंवरों से गंठ जोड़ रहे हैं।        विप्लव, प्रलय, बवंडर, आंधी,        हुआ इकट्ठा कुनबा सारा।                                  @ रा. रामकुमार,                       १३.११-०९.१२.२०२५, अपरा...

चाय

 चाय  धूप को चाय में घोलकर पी रहे। हम हवा को भी दिल खोलकर पी रहे। गांव से शह्र तक राह है पुरख़तर, 'आंख में ख़ून है' बोलकर पी रहे। कितनी शक्कर घुलेगी तो मर जायेंगे? जानकर बूझकर तोलकर पी रहे। ज़िंदगी में बनाएगा यह संतुलन, हम करेले का रस रोलकर पी रहे। जबसे पत्थर तलक रत्न होने लगे, तब से हर ज़ख्म का मोलकर पी रहे। - रा. रामकुमार, ०७.१२.२५, रविवार।