Saturday, May 19, 2012

दर्द के गुण-सूत्र


आपके इधर तो खैर आता ही होगा, हमारे भी आता है एक फेरीवाला.. प्लास्टिक के घरेलू आइटम लेकर. वादा करता हे कि अगली बार वह भी लेकर आउंगा जो इस बार नहीं लाया..तो फिर जरूर आता है..
लीजिए मैंने भी कहा था कि अगली बार यह लेकर आउंगा तो आया...




दर्द की चर्चा चल निकली।
चार लोग बैठते हैं तो कुछ न कुछ चल निकलता है। चलते पुरजों से काम की बातें आप चाहे न निकाल पाएं, यह निष्कर्ष जरूर निकाल लेते हैं कि किसी के पेट में क्या है।
मुझे लगता है कि यह कहावत ‘‘किसी के पेट में क्या है, कोई नहीं जानता’’, जरूर किसी दाई ने बनाई होगी। जचकी से संबंध बैठता है इसका। किसी दाई (मेटरनिटी मेड एक्सपर्ट) ने लक्षण देखकर बताया होगा कि लड़का होगा। हो गई होगी लड़की। भद्द हुई होगी तो झल्लाकर उसने कहा होगा-‘‘ अब किसी के पेट में क्या है, कोई थोड़े जानता है।’ लड़का होता तो वही शेखी बघारती और ईनाम लेती। कैसी अजीब बात है, जिस लड़की को लेकर दुनिया में इतनी मारकाट मची है, उसे ही लोग पैदा होने से रोकते है, भ्रूण में मार डालते हैं।
खैर, चलते पुरजे अपना काम जिस खूबसूरती से निकालते हैं उसे कोई पा नहीं सकता। ये सारे निष्कर्ष पहले से निकले रखे हैं। लेकिन जिस प्रकार पुराणों, कथा-कहानियों, सरकारी गोदामों में सड़ते अनाजों, वन विभाग की घुनती गलती लकडियों, रेलवे यार्डों में जंक खाकर धूल होते लोहे की तरह सारी ठोस बातें धरी रह जाती हैं  और आदमी वही करता है जो तत्काल उसे मजे़दार लगती हैं, भले ही वह पर्दे पर चलती मायावी तस्वीरें ही क्यों न हो।
समय के रुपहले पर्दों पर बुद्धिजीवियों की बातें एक रोचक और तथाकथित गंभीर मायावी संसार की रचना करती रहती हैं। समाज के रूट लेवल पर सक्रिय संसार को इन बातों में हवा-हवाई दिखाई देती है। बुद्धिजीवी देश नहीं चलाते। देश चलानेवाले लोग चलते-पुरजे़ हैं। वे ही बुद्धिजीवियों को चलाते हैं। अपने हिसाब से।
इसी गुणसूत्र के चार बुद्धिजीवी वहां बैठे थे। अर्थशास्त्र, विधिशास्त्र, वनस्पतिशास्त्र और साहित्य ही उन चारों की अपनी अपनी आजीविका थी। प्रसंग निकला कि वन विभाग के लिए वनरक्षकों की परीक्षा का समन्वयन इसी महाविद्यालय से होना है। हिन्दी साहित्य के अट्ठावन वर्षीय शिक्षक ने कहा कि इतने युवाओं में मुझ बुजुर्ग को क्यों शामिल किया गया?
            ‘‘आप कहां बूढ़े हैं? आपक कहां से बूढ़े हैं?’’ एक व्यक्ति मेरी सूरत को देखकर कहते हैं ‘‘आप 45 वर्ष के लग रहे हैं।’’
वे अर्थशास्त्र के अध्यापक हैं। अक्सर अनुमान गलत लगाते हैं। इस देश के प्रधानमंत्री भी अर्थशास्त्र के डाक्टर हैं। फिर भी देश की अर्थव्यस्था चरमरा रही है।
पर मेरे देश के अर्थशास्त्र से ज्यादा यह सवाल महत्वपूर्ण लग रहा है कि लोग बूढ़े कहां से होते है? किस जगह से बूढ़ा होना शुरू करते हैं और सिक जगह पर अंत करते हैं। बाल से या खाल से? भाल से या गाल से? चाल से या ढाल से? तन से या मन से?  शरीरविज्ञान के पास इसका कोई जवाब हो सकता है। वही बताएगा कि बूढे़ होने के क्या गुणसूत्र  हैं  ?
पिछले दिनों मैंने ब्लड टेस्ट कराया। रिपोर्ट देखकर कहा गया कि मैं एकदम फिट हूं। लेकिन यह डायगनोसिस गलत है। मैं दमा से पीड़ित हूं। बीस सालों से कंधे के दर्द से परेशान हूं। नागपुर, रायपुर, भिलाई आदि एडवांस्ड जगहों में मैंने दर्द की जांच कराई। दर्द का फिजीकल एक्सिस्टेंस नहीं मिला। हर बार डाक्टर ने लिखा ‘नो फिजिकल एक्सिसटेंस’। अब क्या करूं? अरे भाई फिजिकली ही हो रहा हैं दर्द, मालिश करवा रहा हूं। दर्द उठता है तो आंखें वाष्पीभूत हो जाती हैं। तुम्हें उसका अस्तित्व दिखाई नहीं दे रहा है।
दर्द की एक्सरे रिपोर्ट नहीं बनती।मशीनें  दर्द का चित्र खींचने में असमर्थ है। पैथालाजिकल लैब चिकित्सा विभाग का मजाक उड़ा रही हैं । दर्द ठठाकर हंस रहा है-‘‘ खोजो, खोजो। खोज लो तो मुझे भी बताना। मैं भी देखना चाहता हूं कि कैसा दिखता हूं मैं।’’
दर्द ठठाकर हंसता है तो मारे दर्द के मैं रो पड़ता हूं। मैं उसे ढूंढ कर मार डालना चाहता हूं। पेन किलर उतने कुशल हत्यारे नहीं हैं। उनका मारा हुआ दर्द चौबीस घंटे में उभर आता है। रक्त बीज की तरह उसकी एक एक बूंद हजार हजार दर्द को जन्म देती हैं।
कंधे में होते होते अब  दर्द मेरी पीठ में होने लगा है। कमर भी कई बार ऊपर वाले माले यानी धड़ का बोझ नहीं संभाल पाती। दर्द से सन्ना जाती है। पर ये सारे दर्द कैसे दिखाऊं? कोई चित्र उनके नहीं मिले। कोई चित्रकार इन दर्दों का चित्र नहीं बनाता। किसी फोटोग्राफर ने उसरी फोटों नहीं खींची। प्रसिद्ध कलाकार मकबूल फ़िदा हुसैन ने ऐसे तो सारी नग्न तस्वीरें बनाकर करोड़ों अरबों कमाए, लेकिन एक दर्द को वह नहीं साध सका। वे मजे़ का सौदा करते रहे और दर्द कराहता रहा। कला के नाम पर मजे़ के सौदे व्यापारी-जगत करता रहा, पर दर्द के वाणिज्य की चित्रात्मक झांकी वह नहीं खींच सका।
कैसे कहूं कि मुझे दर्द है। कैसे यकीन दिलाऊं कि यह दर्द हैं, देख लो। दर्द का विज्ञापन नहीं किया जा सकता। बस, चुपचाप सहा जा सकता है।
दर्द चिकित्सा विज्ञान का विषय नहीं है। दर्द का कोई विधिशास्त्र भी नहीं है। कोई दर्द लीगल है या इल्लीगल, कानूनविद् इस तथ्य को नहीं जानते। वनस्पतिशास्त्र कहता है कि शरीर प्राणीविज्ञान का विषय है। वनस्पतिशास्त्र पेड़ पौधों के बारे में बताता है। बताता है कि पेड़ पौधों को दर्द नहीं होता।
दर्द केवल साहित्य का विषय है। कवियों ने उसे देखा सुना है। उससे बातें की है। सच्चा साहित्य दर्द से निकलता है।
एक कवि ने लिखा है ‘‘विरही होगा पहला कवि, दर्द से निकला होगा गान।’’
अद्भुत साहित्य-संसार है। दर्द होता है तो कराह नहीं निकलती, गान निकलता है। क्या इन्ही उल्टी बातों के आधार पर साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है? दर्द को ज़रा दर्पण दिखाओ। मैंने सुना है भूत दर्पण मे नहीं दिखते। दर्पण में इच्छाधारी नाग-नागिन दिखते हैं। वर्तमान मंे ना दिखाई देने वाले ग़ायब कल्पनापात्र लाल कांच में दिख जाते है। एक्सरे में भी ना दिखनेवाला दर्द भूत नही हो सकता। वह भूत है भी नहीं। दर्द तो हमेशा वर्तमान होता है। दर्द को क्या दर्पण दिखाऊं?  फिर दर्पण में तो वर्तमान ही उल्टा दिखता है। इसीलिए शायद दर्द को आईना दिखाओ तो वह रोने की बजाय गाने लगता है। तभी पहले कवि ने दर्द के सापेक्ष गान लिखा। कवि लोग भी पता नहीं किस दुनिया से आते हैं।
एक दूसरे कवि आर. रामकुमार हैं ।  उनका प्रसिद्ध गीत है-‘‘न चिल्लाऊं चीखूं , न दुखड़े सुनाऊं। बहुत दर्द जागे तो चुपके से गाऊं।’’
अजीब कवि है। सब दर्द में चीखते चिल्लाते हैं, दुनिया भर के दुखड़े सुनाते फिरते हैं, यह कवि गीत गा रहा है। गा भी रहा है तो चुपके से। इसका मतलब है कि दर्द का बाईप्रडॅक्ट, गीत है। वाह! क्या दर्द है।
     

    31.03.12/2.5.12

Wednesday, May 9, 2012

विवाह की वर्षगांठ: गांठ-विज्ञान के विशेष संदर्भ में।




आज मेरे विवाह की वर्ष-गांठ है।
जयंती और दिवस जो होते हैं, वो मरणोपरांत मनाए जाते हैं। हमारे देश में प्रसिद्ध दिवस और जयंतियां हैं- बाल दिवस, शिक्षक दिवस, सदभावना दिवस, रजत जयंती, हीरक जयंती, प्रेमचंद जयंती, निराला जयंती।
दिवस ‘मृत्यु का दिन’ और जयंती ‘जन्म लेने का दिन’ है। जैसे एक होती है प्रेमचंद-जयंती और दूसरा होता है प्रेमचंद दिवस। गांधी जी ने जन्म लिया तो गांधी जयंती दो अक्टोबर। जिस दिन उन्हें गोली मारकर मार डाला गया, वह मृत्यु का दिन हुआ। उस 31 जनवरी को, उनकी मृत्यु की याद में, हम ‘शहीद-दिवस’ कहते हैं। इस प्रकार दो दिन प्रसिद्ध हैं एक जयंती और दूसरा दिवस।
जी! कुछ कहा आपने? आप पूछ रहे हैं कि बाल-दिवस और शिक्षक-दिवस किसकी मृत्यु के दिन है? पता नहीं। शायद बालमृत्यु की याद में बाल दिवस मनाया जाता है और भारत में किसी शिक्षक नामक मरे हुए व्यक्ति की याद में शिक्षक दिवस मनाया जाता होगा। मैं कुछ दावे से नहीं कह सकता। जी! क्या कहा आपने? अरे तो प्यार से बताएं न, इस तरह गाली गलौज क्यों करते है।
जी! मैं समझ गया, बालदिवस हमारे प्रथम प्रधानमंत्री का जन्म दिन है और शिक्षक दिवस हमारे दार्शनिक शिक्षक राष्ट्रपति जी का जन्म दिवस है। इन दोनों जन्म दिनों को ‘दिवस’ कहना लिपिकीय भूल है, यह भी मान लेता हूं।
जी! जी! बिल्कुल मैं आपसे सहमत हूं कि किसी लिपिकीय भूल को सुधारना कलेक्टर के पिताजी के हाथों में भी नहीं है। सत्यनारायण जगदीश की श्रीमती लक्ष्मी अगर इंटेरेस्ट लें तो यह भूल सुधर सकती है। पर वे देवता लोग है, मनुष्यों के मामले में क्यों और किसलिए दखलंदाजी करें। अगर कर सकते हों तो मैं सवा रुपये का प्रसाद चढ़ाने को तैयार हूं।
खैर, कैसे मौक़े में हम यह क्या अटर-सटर गिटर-पिटर करने लगे।
जी,जी! धन्यवाद! आपको याद है कि आज मेरे विवाह की वर्ष-गांठ है। चूंकि यह विवाह-जयंती या विवाह -दिवस नहीं है, इसलिए लगता है कि हमारा विवाह अभी भी जीवित है। अगर विवाह जीवित न होता तो गांठ नहीं होता। विवाह का नियम ही गांठ है। बच्चों का जनम दिन मनाते हैं तो कहते हैं पहली वर्षगांठ, तीसरी वर्षगांठ, पाचवीं वर्षगांठ।
जरा सोचूं कि इस ‘जन्म और स्थापना’ की वर्षगांठ मनानेवाले ‘वर्षगांठ’ का जन्म कब हुआ?
मुझे लगा है, जब गिनती का जन्म नहीं हुआ था। अक्षर और अंक नहीं बने थे। जब जमीन पर या दीवार पर या किसी पर्सनल पेड़ की पीड़ पर लकीरें खींचकर हिसाब किया जाता था। इंतज़ार किया जाता था कि अब आएगा। और इतना रह गया है।
एक तरीक़ा महिलाओं ने यह भी निकाला कि पांच हाथ की जो वे साड़ियां पहने रहती हैं, उसमें एक एक गिनती को गांठ बांधकर याद रख लें। साड़ी नहीं पहनती तो रूमाल को गांठ लगा ली और फुसफसाकर कहा- ‘देख बहना! भूल न जाना। मेरी ज़िन्दगी का सवाल है। गिनती इधर से उधर हो गयी तो ज़िन्दगी का हिसाब ही बिगड़ जाएगा।’ साड़ी के पल्लू और रूमाल के छोर पर बांधी गई गांठ याद रखती थी कि हिसाब क्या है।
गांठें हमेशा याद रखने का मनोवैज्ञानिक उपाय रहीं हैं। दार्शनिक तर्कशास्त्री मनोविश्लेषणत्मक व्याख्या कर सकते हैं कि मन की गांठें ज्यादा याद रहती है। छोटी मोटी खुशियां और छोटे मोटे दुख आदमी भूल जाता है। बड़ी गांठें याद रह जाती हैं।
बच्चों का जन्म बड़ी खुशी है मां बाप के लिए। इसलिए वर्षगांठ के रूप याद है। ‘‘तुम जिओ हजारों साल। साल के दिन हो पचास हजार।। जनम दिन आया, आया। ममता के फूल जागे।। हैप्पी बर्थ डे। मैनी मैनी हैप्पी रिटन्र्स आॅफ द डे।’’ ये वो शुभकामनाएं हैं जो गा गाकर दी जाती हैं। खुशी खुशी दिये जलाए जाते हैं। मोमबत्तियां बुझाई जाती हैं। केक काटे जाते हैं।
विवाह की वर्षगांठ भी एक प्रकार की गिनती ही है। जिस प्रकार बच्चों के जन्मदिन मां बाप के लिए आनंदोत्सव, उसी प्रकार मां-बाप के विवाह की वर्ष-गांठ बच्चों के लिए स्पेशल सेलेब्रेशन। हज़ारों गांठें इस दिन आनंद की गति में फिसल कर पार हो जाती हैं। बस एक बात याद रहती है-यह गांठ आज ही बंधी थी। दूल्हे के दुपट्टे से दुल्हन के दुप्पट्टे में आज ही बांधी गई थी यह गांठ। इस गांठ के आगे दुनियां की सारी गांठें गठान हैं। यह भुचाल का दिन है। एक नये मौसम के सूत्रपात का दिन है। बच्चे लगे हैं अपने अपने ढंग से सेलीब्रेट करने। नये कपड़े नया कुछ कुछ। नयी नयी सरप्राइज़ेस।
सुना है कभी सात गांठे बांधी जाती थीं। हर फेरे पर एक। बनती हुई पत्नी से कहा जाता है-‘गांठ बांध लो, अब यही तुम्हारा पति है और यही तुम्हारा परमेश्वर!’ होते हुए पतियों के अंगोछे में पड़ती है गांठ कि-‘‘ पत्नी तुम्हारी अद्र्धांगिनी है, लक्ष्मी है।’’  पति और परमेश्वर ? पत्नी यानी लक्ष्मी? पड़ गई न यह गांठ। पत्नी जीवन भर पति में परमेश्वर तलाशती रहती है और पति कभी झूठा सिद्ध होता है, कभी मक्कार,। कभी लम्पट निकलता है, कभी बदकार। पति ढूंढता रहता कि लक्ष्मी ने अब अमीर बनाया..अब बढ़ा बैंक बैलेन्स...अब आयी गाड़ी..अब आई इंडस्ट्री। ऐसा होता है या नहीं होता है तो किसी ने किसी कारण से पड़ती रहती हैं गांठें। हर दिन हर पल कोई न कोई गांठ। पी रहे हैं तो गांठ, खा रहे हैं तो गांठ। खाते पीते हंसते बोलते उठते चलते कोई न कोई न गांठ। पुरुष इस गांठ को रोड़ा और बाध समझते हैं और चतुराई से इसका हल निकालते हैं। वे समझते हैंअक्ल के मामले मे औरतें पीछे हैं। यह भी एक गांठ है जो सदियों से पुरुषों के मन का ट्यूमर बनी हुई है। कुछ समझदार पुरुष भी होते हैं जो इसे पतंग वाली घिर्री में मंजा किया हुआ धागा समझते हैं तथा खेंचने और ढील देने के संतुलन के साथ संभालकर लपेटते रहते हैं। भारतीय पत्नियां इस गांठ को सिलाई का धागा समझती है और तरीके से सुलझाने का प्रयास करती हैं। ऊपर धागे की मूल गिड्डी लगाकर नीचे कुछ धागा बाबिन नामक बाॅबी टाइप के यंत्र में नीचे लगाकर तरीके से सिलाई करती रहती हैं।
पर सब कुद इसी तरह आसान हो जाए तो फिर जिन्दगी का सौन्दर्य, जिन्दगी का मज़ा, जिन्दगी का स्वाद, जिन्दगी का लुत्फ़ ही चला जाए, खत्म हो जाए। (कृपया कुछ पर्यायवाची शब्द आप भी जोड़ लें।) । गांठ होने और उसे सुलझाने का मतलब आम भारतीय महिलाएं समझती हैं और मन में कोई अन्य गांठ पड़ने नहीं देंती। पड़ती हैं तो उन्हें वे सरपूंद बांधती हैं ताकि एक झटके से खोली जा सकें। अक्सर कुछ गांठे आंसुओ से खुल जाती हैं। कुछ गांठे मैके जाने के धौस से फिस्स हो जाती हैं। बाक़ी, अगर विवाह की वर्षगांठ निरंतर मनाना हो तो गांठ-शास्त्र को समझना बहुत जरूरी है।
  आज मेरे उसी विवाह की वर्षगांठ है। मौसम अच्छा है। कल तेज आंधी चली थी। थोड़ी बूंदाबांदी भी हुई थी। गर्मी में थोड़ी राहत मिली। मई में ऐसा कहां होता है। मई की गर्मी के बढ़ते तेवर को देखकर और विवाह की वर्षगांठ का तालमेल नहीं बैठा पाने पर तैयारियों में लगी लाड़ली पूछती है-‘‘दिसम्बर, जनवरी या ज्यादा हुआ तो फरवरी में क्यों नहीं बांध ली यह गांठ...मई का महीना ही मिला था आपको?’’ पंचांग का मुंह देखकर शादी करने वाले एक दूसरे का मुंह देखते और झुका लेते हैं। किस मुंह से कहें और क्या कहें? अब जो हुआ सो हुआ। डेट आफ बर्थ नहीं है कि कुछ ले देकर हलफ़नामा बनवाकर बदल दी जाये। विवाह है भाई! विशेष रूप से वहन किया जाने वाला परिवाह है यह विवाह।
आज सुबह से फोन आ रहे हैं। फोन यानी मोबाइल, सेल फोन..। जिस नाम से भी आधुनिकता बोध हो वह समझ लें। आधी रात को बच्चों के फोन आ चुके थे। नई तारीख लगी नहीं कि हैप्पी मेरिज एनीवर्सरी कहने का मोह वे टाल न पाए। जिन लोगों ने रात की भरपूर नींद ली भरे पूरे सुबह उनकी बधाइयां आई। कुछ खास ही निकट के लोग हैं। वर्ना कौन याद रखता है। याद भी रखे तो कौन लेता देता है। खास लोग हैं जो खास तरह से याद रखते हैं।
राजस्थान से फोन आया है कि उधर भी बारिश हुई है। भोपाल से भी फोन आया है कि उधर भी बारिश हुई हैं। रायपुर में बादल तो हैं पर बरसने से हिचक रहें हैं। इंन्वर्टर से चलनेवाले पंखें गरम हवा फेंक रहे हैं। इधर ठीक है। जापान दिल्ली की दिशा से पास पड़ता है। पड़ता तो चीन ज्यादा पास है। पर जापान की चीजे़ं और घटनाएं हमेशा विश्वव्यापी रही हैं। वहां आए चक्रवात ने काफ़ी तबाही मचायी है। चक्रवात का जन्म ही तबाही मचाने के लिए हुआ है। हमारी सभ्यताएं प्रार्थना नहीं कर सकतीं कि हे चक्रवात इस बार तू नवनिर्माण लेकर आ। हम विनाश को भी नई शुरुआत बनाकर देखते हैं। जापान ने तो खास इस विद्या में महारत हासिल की है। मैं जापान की बहुत सी चीज़ों को प्यार करता हूं। बहुत सी मज़ेदार चीज़े हैं जापान की मेरे पास। टोकियो को मैंने नहीं देखा पर बहुत प्यार करता हूं उसे। दुनियां में बहुत सी चीज़ें हमने नहीं देखीं पर लगातार उनसे प्यार करते हैं। आनेवाले कल को भी। आशाओं को। अब तक न मिले किसी खास मिलनेवाले पल की। राष्ट्रपति पुरस्कार, पद्मभूषण, बहुत सा धन, असाधारण सुविधाएं...इन सब को हमने नहीं  देखा पर इन्हंे बहुत प्यार करते हैं। मिलने की उम्मीद भी नहीं रखते पर प्यार करते हैं। यही सच्चा प्यार है।
ऐसा ही प्यार मैं मनोविनोद से भी करता हूं। मेरा ऐसा है कि हंसने की शायद कमी पड़ गई थी पूर्व में ...तो बहाने ढूंढता हूं हंसने के। जीवन में वैसे भी कथ्यात्मक और तथ्यात्मक हंसी खुशी के अवसर कम ही हैं। भावुक होना एकांतसुख है। ‘स्वांतःसुखाय’ भी आंसू ही बहते हैं। इसलिए लोग पब्लिक में ओव्हर एक्टिंग और अतिउत्साह दिखाते पाए जाते हैं। निश्चित रूप से वे खोखले हैं। मैं संतुलन बनाने का प्रयास करता हूं। कहीं कहीं फिसल जाता हूं पर संभल जाता हूं। मुझे जाननेवाले जानते हैं जो नहीं है उसी के ग़म गलत करने के कारण यह बिना पिये लड़खड़ाया है। मैं खुशियों के लिए ग़म गलत करने का सबसे अच्छा पेय गेय कविता और प्रेय आलेखों को मानता हूं। पीकर भी सुना है कि झूठा और कुछ देर का भुलावा मिलता है। लेखन भी कौन सा कल सच होने वाला है। यह भी ग़म ग़लत करने का एक तरीका मात्र है।
मैं जानता हूं मैं कुछ नहीं कर सकता तो लिखने बैठ गया हूं। उधर टीवी चल रही है। बीवी का काम भी चल रहा है। उसे गृहकार्य नहीं छोड़ते।  मेरे लिए तैयारी करती हुई वह प्याज काट रही है। टीवी पर एक गीत आ रहा है- ‘बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है।’ मैं पत्नी की तरफ देखता हूं। वह मेरी तरफ। उसकी आंखें आंसुओं से भरी हुई हैं। ये प्याज के आंसू हैं यह बताने के लिए वह मुस्काराती है। फिर कटी हुई प्याज लेकर वह अंदर जाते हुए कहती है- ‘‘चीले बना रही हूं..प्याज पालक और बेसन के। दस मिनट में तैयार हो जाओ।’’
मैं तैयार ही तो नहीं हो पाता। मेरे मन में यह गीत कुछ ऐसे बजने लगता है-जो धीरे धीरे कागज में उतरने लगता है। मैं इस गीत को आज का उपहार दूंगा। आप भी सुनेंगे?

सबेरे से बिना मुंह धोये गहरी सांस भरता है।
बनाकर चाय मुंह में डाल दूं, यह आस करता है।

वही है गैस की किल्लत, वही बिजली की बदमाशी।
वही बुढ़िया की किचकिच है, वही बुड्ढे की हैं खांसी।
वहीं खूसट सजन बेकार की बकवास करता है। सबेरे से ....

मैं जब से आई हूं तब स,े घुसी रहती रसोई में।
सदा बर्तन, बुहारा, कपड़े करती बाई कोई मैं।
मुझे घर मालकिन कहकर जगत उपहास करता है। सबेरे से...

मुझे कहकर ‘मुसीबत’, जब पिया करता है रुसवाई।
‘मुसीबत लेने तुम आए थे, मैं चलकर नहीं आई।’
पलटकर कहती हूं ,तो हंसके वो, शाबाश करता है। सबेरे से...

‘‘हो गए तैयार?’’ पत्नी आकर पूछती है।
‘‘ हां हो गई तैयार...सुनो क्या लिखा है।’’ मैं उत्साह में कहता हूं तो खीझकर पत्नी कहती है।‘‘ ओफ्फो... तुम और तुम्हारी कविताएं......तुम्हीं लिखो और तुम्हीं सुनो...’’ वह बेसनपालक के चीले मेरे सामने धरकर चली जाती है। टीवी अभी भी चल रहा है। इस बार एक ग़ज़ल आ रही है। ‘‘दरोदीवार पर शकलें सी बनाने आई। फिर ये बारिश मेरी तनहाई चुराने आई।’’
मैं चीले खाते हुए ग़ज़ल का लुत्फ लेता हूं। मगर अपने गीत की उपेक्षा उस ग़ज़ल को भी विकृत कर देती है- मैं चीले के हर कौर के साथ एक एक शेर पढ़ता हूं।
मेरी बीवी है वो ये मुझको बताने आयी।
दिल जलाकर मेरा वो चाय चढ़ाने आयी।

लिखती रहती थी वो पन्नों में ख़र्चे दुनिया के,
दाल आटे का मुझे भाव बताने आयी।

                       
मेरी हर इक ग़ज़ल को सौत कहकर आह भरती है,
‘ये डायन कलमुंही घर मेरा जलाने आयी।’

‘मैं सब कागज उठाकर डाल दूं चूल्हे में अब के अब’,
ये कहती आई जब खाने को बुलाने आयी।

‘किसी को ऐसी किस्मत अय खुदा देना नहीं अब तू,
मैं दुल्हन बनके क्या बस जल्वे दिखाने आयी।’

ग़ज़ल की चटनी के साथ चीले खाकर मैं खत्म कर चुका हूं। अब पानी पीकर चाय का इंतज़ार करने लगता हूं। अंदर अंदर सुलगती हुई पत्नी चाय बड़ी ज़ायकेदार बनाती है। बस इसी कारण तो हमारी गांठ इतनी मज़बूत बंधी हुई है। अस्तु, अत्र कुशलं तत्रास्तु।
बुधवार, 09.05.12





अगले आकर्षण हैं- 
  1. दर्द के गुणसूत्र
   2. श्मशान गीता (तीन भाग)