Thursday, November 25, 2010

बुरा न मिल्या कोय

खोजी पत्रकारिता के इस युग में केवल कबीर ही प्रासंगिक हैं। क्योंकि कबीर में भी वही आदत थी जो आज के खोजी पत्रकारों में है। बहुत खोजने के बाद कबीर कहते हैं,‘बुरा जो खोजन मैं गया’। आज के खोजी पत्रकार भी हमारे देश में बुराई को ही खोज रहे हैं। यहां कहां मिलेगी भैया ! बुराई और इस देश में। हमारे देश की एकमात्र अवधारणा है कि बुराई तो केवल विदेश में है। अब इस अवधारणा को तुम बुराई मानते हो तो मानते रहो। पर बुराई यहां कहां? यह तो ऊंची संस्कृति और नैतिकतावाला देश है। आगे जाओ और कोई दूसरा देश देखो। यहां न बुराई थी , न है , न रहेगी।
तुम्हें क्या पता नहीं कि तुम्हारी तरह पहले एक कबीर आए। खूब इधर उधर खोजते रहे। पर बुराई उन्हें भी कहां मिली ? हार कर उन्होंने कहना पड़ा -‘‘ बुरा जो देखन मैं गया , बुरा न मिल्या कोय।’’
नई मिलता न, क्या करोगे ? हमारे देश की यही बुराई है कि यहां खोजने पर भी कोई बुरा नहीं मिलता। खोजनेवाला बुरा हो सकता है, मिलनेवाला बुरा हो ही नहीं पाता। वह ले देकर अच्छा ही होता है। हमारे देश में बुरा कोई है ही नहीं । सब अच्छे हैं। वैसे सारी दुनिया में एक हमारा ही तो देश अच्छा है। हमारे देश को छोड़कर जानेवाले मोहम्मद इक़बाल को भी आखिर कहना पड़ा ‘‘ सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।’’ तुम बेकार सिर मार रहे हो ,जो यहां बुराई खोज रहे हो। बुराई यहां कहां मिलेगी ?
और जब इस देश में बुराई नहीं है तो मेरे नगर में तो हो ही नहीं सकती। इस देश की पतीली के भात का एक दाना है मेरा नगर। देश को देखना है तो मेरे नगर का ‘सीता’(भात का दाना) दबाकर देख लो।
यानी जो देश में हो रहा है , वह मेरे नगर में हो रहा है। इस बात के साथ स्पष्ट कर दूं कि हो सकता है कुछ इधर का उधर हो जाए और कुछ उधर का इधर हो जाए। इसलिए निवेदन है कि मुझे पढ़ते हुए शहर सोचे कि यह देश के बारे में है और देश यह समझे कि यह इसके शहर के बारे में है। वरना मुझे जो सजा देने आएगा वह एक दूसरे को सजा देगा। क्योंकि मैं शहर का भी हूं और देश का भी। मेरे लिए दोनों प्रिय हैं। यह बात अलग है कि दोनों को मैं प्यारा हूं या नहीं यह बाकी सब जानते हैं मैं नहीं।
कभी कभी मुझे बताया जाता है कि मैं दोनो ंके लिए मूल्यवान हूं जब चुनाव होता है। मैं अपनी जिम्मेदारी दोनों के प्रति मानता हुआ दोनों को मतदान करता हूं। वैसे ये तीन हैं। नगर और देश के बीच में एक प्रांत भी है। एक व्यक्ति नगर का भी है जहां पार्षद जैसे अच्छे लोग है, प्रांत का भी है जहां विधायक जैसे नागरिकों से अच्छे लोग हैं और देश का भी है जहां सांसदों से जैसे सुशांत, संभ्रांत और संसदीय लोग हैं। तीनों के लिए मुझे दान करना पड़ता है अपने अमूल्य मतों का। तो सब आपस की बात समझते हुए खुश रहिएगा, बुरा मानने की क्या बात है।
बुरा तो हमारे आत्मानंद जी भी नहीं मानते और सदानंद भी। एक हैं वर्णानंद जी। वे पेशे से पत्रकार हैं। वे खोजखोजकर ऐसा कुछ छापते हैं कि कायदे से आत्मानंद और सदानंद को बुरा मानना चाहिए ,पर नहीं मानते। तीनों का अनन्याश्रित रिश्ता है। जो कुछ आत्मानंद और सदानंद ‘सृष्टि’ करते है , वर्णानंद उसी पर ‘दृष्टि’ करते हैं। बुरा मानने वाली बात कोई है ही नहीं।
वैसे भी सृष्टि के दो पहलू हैं। इधरवाला पहलू और उधरवाला पहलू। सृष्टि के उधरवाले पहलू में आत्मानंद हैं और इधरवाले में सदानंद। कहने की जरूरत नहीं है कि इधरवालों की उधर चलती है और उधरवाले इधर छाए रहते हैं। यही प्रजातंत्र है। हालांकि इधरवाले अपने को उधरवालों से अच्छा समझते हैं और उधरवाले इधरवालों से अपने को। वर्णानंद देश के सामने परेशान है कि देखें देश किसे अच्छा और बुरा मानता है। वर्णानंद को आत्मविष्वास रहता है कि वह जिसे भला कहेंगे देश उसे भला मान लेगा ओर जिसे बुरा बताएंगे देश उसे बुरा मान लेगा। पर देश है कि ऐन वक्त इधर का उधर कर देता है। कुछ लोग सोचते हैं कि नगरपालिका या संसद इस मामले में मदद कर सकती है। उनका ख्याल पूरी तरह गलत नहीं है। नगरपालिका ने जब आवारा कुत्तों और पालतू कुत्तों की पहचान के रिकार्ड कायम किए हैं तो उसे तो अच्छे और बुरे की तमीज़ तो होगी। यद्यपि नगरपालिका की भी कुछ मज़बूरियां हैं। वह जिस आसानी से गंदगी कूड़ा कर्कट उठवा सकती है, उतनी सरलता से अच्छे बुरे का फैसला नहीं सुना सकती। फैसला सुनाते हैं इधरवाले या उधरवाले।
हमारे नगर में जब अन्य नगरों की तरह चुनाव हुआ तो उसमें इधरवाले भी खड़े हुए और उधरवाले भी। हर मुहल्ले में ऐसा हुआ। जहां देखिए वहां इधरवाले और उधरवाले। हर एक व्यक्ति इधर भी दिख रहा था उधर भी। हर व्यक्ति अर्जुन की तरह इधर उधर के संशय से ग्रस्त हो गया था।
बारीकी से देखें तो सारी दुनिया ही इधर और उधरवालों की है। या तो आदमी उधर से इधर हो जाए या फिर इधर की उधर करे। उन दिनों भी बहुत से लोग इधर से उधर हुए और बहुत से इधर-उधर। कभी सदानंद लपेटे में आए कभी आत्मानंद। यद्वपि दोनों हे भाई भाई ही। दोनों परम्परा की धरोहरें हैं। दोनों मौसेरे ममेरे हैं। एक भी है और अलग अलग भी। वर्णानंद की यही परेशानी है कि अब क्या करें। जब वे आत्मानंदजी के बारे में लेख तैयार करते हैं तो सदानंद जी के बारे में नई बातें तैयार हो जाती है।
पिछले कितने ही सालों से यही हो रहा है। बात उन दिनों की है जब स्कूल कमेटी के चेयरमैन थे विप्रवर सदानंदजी और पण्डित आत्मानंदजी हरिजन छात्रावास के संरक्षक थे। इसके पहले कि मामला तूल पकड़ता दोनों इधर उधर हो गए। एक मंडी अध्यक्ष हो गए तो दूसरे पालिका अध्यक्ष हो गए। ‘‘खाते पीते’’ या ‘‘खाने पीने’’ वाले लोगों के भाग्य कभी मंदे नहीं होते। फिर ऐसे दो लोग साथ हों तो और बढ़िया। एक से भले दो। ऊपर से मौसेरे और ममेरे। जिन कारणों से उन्होंने हैसियत बदली वह काम भी उन्होंने कर ही दिया। मंडीवालों के पचासों ट्रैक्टरों को चूहे कुतर गए और नगरपालिकाने मुहल्ले मुहल्ले जो बोरिंग लगवाई थीं वह जमीन निगल गई या आकाश में हवा हो गईं। अब उनके स्थान पर तकरार ही तकरार है। वर्णानंद के कागज़ी घोड़े कई सौ मील निरन्तीर पार कर आए लेकिन बीच में कालपी का नाला आ गया। घोड़ा नया था और थककर चूर था अतः अंततः गिर पड़ा। वह पता नहीं कर पाया कि ट्रैक्टर कांड में कितने की दलाली हुई ? किस कम्पनी के ट्रैक्टर को कुतरने के लिए किस कम्पनी के चूहे आए थे ,यह वह पता नहीं कर सके। हालांकि किसकिसने कितना खाया और मंडी अध्यक्ष को कितना मिला ,सचिव की पाचन क्षमता कितने की थी? इस मामले की खोजबीन में इधरवाले भी शामिल थे और उधरवाले भी। दोनों को खुरचन की उम्मीद थी। खुरचन , जिसके बारे में कहते हैं कि वह असली गुड़ से मीठी होती है।
उधर बोरिंग की खोज भी जारी है। खुरचनाकांक्षी खोजी लोग पालिका अध्यक्ष की भी खुदाई कर रहे हैं। बोरिंग के लिए कितना सैंक्शन हुआ ? कितने गड्ढे खोदे गए ? कितनी बोरिंग लगी ? कितनी बोरिंगों को ऊपर के पानी से पहले चालू बताया गया और बाद में उसको बंद बताकर उसकी अंत्येष्टि कर दी गई। इसकी भी जांच के असफल प्रयास हुए कि कितने लोग इस अंत्येष्टि में शामिल हुए और कितनों ने मरी हुई बोरिंग को कंधा दिया।
जनता कभी इधर देखती है कभी उधर । वर्णानंद विश्वासमत खोकर ग्लूकोस की बोतलों में अपना भाविष्य तलाश रहे हैं। सदानंद के लोग उसे रुपया खाकर लिखनेवाला बता रहे हैं और आत्मानंद के लोग उसे ब्लैकमेलिया कह रहे हैं। ‘माल उड़ावै कोई और मार खावै कोई’ की सी हालत उसकी हो गई है। अपवाह है कि सदानंद और आत्मानंद जैसे सदाचारी मौसेर भाइयों के अनुयायियों ने मिलकर उसकी पिटाई की है। घर में उनकी खटिया खड़ी हो गई है और अस्पताल मंे बिछी हुई है। उनकी दोनों टांगे ऊपर टंगी हुई हैं। जहां पहले हाथ पैर थे अब वहां प्लास्टर दिखाई देते हैं और जहां पहले आंखें मुंह और सिर था अब वह पट्टियों का फुटबाल दिखाई देता है। लोग सहानुभूति के लिए जाते है तो कहते है ‘‘ कैसे हो वर्णानंद , आनंद मंगल तो है न ?’’ वे कराहकर कहते हैं,‘‘ हां भैया ! दिल नामक स्थान की खोज हो गई है। उसमें छः सौ साल पुराना शिलालेख मिला है , जिसमें लिखा है ‘मौं सौं बुरा न कोय’।’’
वर्णानंद अब किसी से सीधी बात नहीं करते। लोग कहते हैं उनके दिमाग पर असर हुआ है। बुद्धिजीवी लोग कहते हैं ,वह दार्शनिक हो गए हैं। धार्मिक लोग कहते हैं, वे कबीरपंथी हो गए हैं। हारे हुए , पिटे हुए , दबे-,कुचलों के लिए एकमात्र ठिकाना कबीर हैं। अक्खड़ फक्कड़ कबीर को तुम क्या पीटोगे ?
इसलिए सदानंद कबीर की साखी गाने लगे हैं। पुलिस पूछ रही है,‘‘तुम को किसी पर शक है ? किसी का नाम लेना चाहते हो। तुम कोई बयान देना चाहते हो ?’’
दर्द भरी मुसकान में वर्णानंद बयान देते हैं‘‘ आग लगी आकाश में गिरगिर पड़े अंगार।
कबीर जल कंचन भया कांच भया संसार।।’’
पुलिस समझाती है -‘‘ डरो मत। तुम तो कलम के सिपाही हो। अत्याचार के खिलाफ आवाज़ बुलंद करो। हमारे काम में मदद करो। हम तुम्हारे हितैषी हैं। अपराधियों के नाम पते बताओ। हम उन्हें सजा दिलवाएंगे। तुम निश्चिंत होकर कहो।’’
पुलिस के काम का अर्थ जानते है इसलिए वर्णानंद हंसकर कहते हैं -
‘‘ ऐसा कोई न मिला जासों कहूं निसंक।
जासों हिरदे की कहूं सो फिर मारे डंक।।’’
खिसियाकर पुलिस कहती है -‘‘ देखो जब तक बुराई पर पर्दा डालोगे, पुलिस बुराई को खत्म कैसे करेगी ? तुम तो बुराई को खोजखोजकर मिटानेवाले लोगों में से हो। बताओ कौन है वे बुरे लोग जो समाज को खोखला कर रहे हैं ?’’
वर्णानंद ठहाका लगाकर कहते हैं: ‘‘ बुरा जो खोजन मैं चला बुरा न मिल्या कोय।
जो दिल खोजा आपना मांै सौं बुरा ना कोय।।’’
ठीक ही है। दूसरे बुरे नहीं हो सकते। ऋण और ऋण मिलकर धन हो जाते हैं। यह गणित छः सौ साल पहले कबीर की समझ में आ गया था। आज वर्णानंद समझ गए। कुलमिलाकर , खोजी पत्रकारिता के इस युग में केवल कबीर ही प्रासंगिक हैं।

निवेदन है कि इस लेख का संबंध कल परसों आए बिहार के नतीजे का परिणाम न मानें । यह लेख तो 'नीरक्षीर ' में, 30 अगस्त 1989 , अमृतसंदेश , रायपुर से छप चुका है। यह साभार है और पुनर्प्रकाशन है।