Sunday, May 23, 2010

बिल्ली का भाग्य


डर्टी ,डफर ,चीटर कैट !
आई हेट यू!
अपने पीले गंदे दांत मत निपोरो । आई रियली हेट यू। मेरे सामने बिल्कुल म्यांऊं मत करो। मैं तुमसे नफ़रत करता हूं और नम्बर एक में नफ़रत करता हूं। नंबर दो में नहीं ..जहां आई हेट यू का मतलब आई लव यू होता है। आजकल युवाओं में प्रेम के मामले में इन्नोवेशन के चलते नये नये संप्रेषण के तरीके निकाले जा रहे है। मुझे कम से कम तुम युवा मत समझना। आज मैं गुस्से में हूं और चाहता हूं कि तुम पक्के तौर पर मुझे खड़ूस समझो। गुस्से में मुझे अपनी इमेज नही दिखाई दे रहीं ;केवल दिखाई दे रहा है वह पतीला जिस में शाम को फ्राई होने के लिए रखा गया भात था और तुमने उसे गिरा दिया । मुझे दिखाई दे रही है दूध से भरी हुई वह पतीली जिसमें मलाईदार दूध अभी भी रखा हुआ है और जिसे तुमने ..अरी चटोरी ,चालू ,चालाक, चोर , भड़ियाई बिल्ली ! लपलप सड़पसड़पकर जूठा कर दिया। तुम्हें पता है कि अब वह किसी इंसान के काम का नहीं रहा ? तुम्हें क्या पता ! तुम्हें तो मुंह डालने के पहले यह भी पता नहीं था कि इतना एक लीटर दूध तुम पी भी पाओगी या नहीं। बस मुंह डाल दिया।
इसके पहले तो तुम ऐसी नहीं थी। तुम सिर्फ चूहों के पीछे भागती थीं। छोटी सी प्यारी सी चितकबरी तुम हमें कितनी अच्छी लगती थीं। यह बात और है कि तुम्हारे नानवेजीटेरियन होने के कारण हम तुम्हें हाथ नहीं लगाते थे। दूसरे ...तुम्हारे बालों से मुझे एलर्जी है और तुम्हारे गंदे दांतों से घृणा। यही नहीं तुम्हारे नाखूनों से भी मुझे नफरत है, जिसके लग जाने से रेबिज का खतरा होता है। तुम रेबीज का भंडार हो। दांत, लार, नाखून। कैसे लोग तुम्हे मुंह लगाते है? मौका देखकर घर में घुस जानेवाली और खानेपीने की चीजों को खराब कर देने वाली कबरी कैट! तुम्हारे बारे में कम से कम मेरी राय तो अच्छी नहीं है। तुम्हारे कारण मेरी लाडली बच्ची कई बार डांट खा चुकी है। अगेन आई हेट यू!
यह क्या ? मुझे लग रहा है तुमने फिर दांत निपोरे। तुम मेरे गुस्से को मजाक समझ रही हो ? या फिर कैटरीना कैफ की तरह तुम केवल मुस्कुराते रहने का अभिनय कर रही हो। लगता है,यह बात तुम्हें पता चल गई है कि कैटरीना को लोग ‘कैट’ कहते हैं। अपने मतलब की चीजें सूंघने या ताड़ने में तुम बिल्लियों का जवाब नहीं। शायद यही वजह है कि पिछले कई दिनों से तुम्हारे हाव-भाव बदले हुए है। पहले तुुम आहट सुनकर भाग जाती थी। अब ‘कैटवाक’ करती हुई चली जाती हो। पहले हमें देखकर थोड़ी देर टकटकी लगाए देखती रहती थीं। आजकल यूं गुजर जाती हो जैसे देखा ही नहीं है। सचमुच ! तुम अपने को कैटरीना कैफ उर्फ ‘कैट’ समझने लगी हो। मगर डर्टी कैट ! तुम्हारे समझने से क्या होता है। तुम कैटरीना की तरह हीरोइन तो नहीं हो जाओगी। वैंप हो तुम वैंप। रामू और रामसे कैंप की वैंप। तुमने इन हारर लोगों की फिल्में देखी होगी तो देखा होगा कि तुम्हारा फ्रेम वे कैसा तैयार करते हैं। ..अंधेरी रात है..हवा चल रही है ..खिड़कियां अपने आप बंद हो रही है..खंढर हवेली में अजीब अजीब सी चीखें आ रही है... नीले लाइट में धबराई हुई हीरेाइन ऐसे मौके के लिए खास तौर से बनवाए गए पारदर्शी गाउन पहनकर ..‘‘कौन ! कौन !!’’ कहकर इधर उधर भाग रही है... क्या होने वाला है कोई नहीं जानता ...जिस रूप में लड़की को फोकस किया जा रहा है उससे कुछ चटोरे किस्म के दर्शकों को लग रहा है कि कोई विलेन टाइप का आदमी आएगा और पारदर्शी गाउन में लिपटी हुई लड़की .... बस ,एक गलतफहमी दर्शकों की धड़कनें बढ़ाने के लिए काफी है ..मगर अचानक तुम ..कबरी कैट! तुम म्यांऊ करती हुई कूद जाती हो.....तुम्हारे कूदते ही कुछ फेमिनाइन चीखें निकल जाती हैं......कुछ मैस्कुलाइन गालियां हवा में तैरने लगती है......दोनों का कहना यही होता है कि बेवकूफ डायरेक्टर ! जब बिल्ली ही कुदवानी थी तो हीरोइन को सादे कपड़े पहना देते। पर दूसरी बार फिर वे टिकट विंडों में दिखाई देते हैं कि कुछ भी कहो, गाउन में हीरोइन लग अच्छी रही थी। एक बार और देखते हैं। देख लो , तुम साइउ में हो। फिर भी तुम अपने को ‘कैट’ समझ रही हो ..यानी कैटरीना कैफ....खैर , गलतफ़हमी तो अच्छे अच्छों को हो जाती है। तुम तो फिर भी बिल्ली हो।
तुम यह मत समझना कि कैटरीना की बात करने लगा हूं तो मैं बहक गया हूं। कैट की बात करते हुए भी मैं तुमसे हैट कर रहा हूं। बिल्लो रानी ! मैं अपनी चाय के लिए रखे गए दूध को किसी ‘कैट’ या ‘बिप्स’ के साथ अदल बदल नहीं सकता। वे दूर का ढोल हैं। चाय यथार्थ की प्याली है ,जो मेरे होंठों से ,मैं जब चाहूं ,लग सकती है।
तो मैं कह रहा था मनहूस बिल्ली! कि तुम हारर फिल्मों की वैंप तो हो ही , मानव जीवन की भी वैंप हो। जिस रास्ते से तुम गुजर जाओ ,उससे आदमी नहीं गुजरते। रुक जाते है कि बिल्ली रास्ता काट गई। और यह देखते हैं कि कोई दूसरा गुजर जाए ,जिसने बिल्ली को रास्ता काटते नहीं देखा है। बिल्ली का रास्ता काटना अपसगुन है। बनते काम बिगड़ जाते हैं। मगर मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा। मैंने कभी दूसरे आदमी का इंतजार नहीं किया क्योंकि इस अंधविश्वास पर मैं नहीं पड़ा। मगर आज तुमने मेरी चाय का रास्ता काट दिया।
अभी अभी पत्नी मुझे परेशान देखकर यह कह गई है -‘‘ जाने दो ना। आज का दूध-चांवल बिल्ली के भाग्य का था। जाओ, दो पैकेटस जाकर ले आओ। इतना दुखी होने की जरूरत नहीं है।’’
बताओ ! मैं गुस्से में दिखना चाह रहा हूं और पत्नी मुझे दुखी समझ रही है। सारी तैयारी पर पानी फेर रही है। गुस्से में दिखना और दुखी दिखने में अंतर है भाई ! अब पत्नी को कैसे समझाऊं।
पर एक चीज़ मेरी समझ में आ रही है कि बिल्ली का भी भाग्य होता है। मैंने सुना है कि बिल्ली के भाग्य से छींका टूट जाते हैं। आजकल तो खैर छींके नहीं होते। फ्रीज होते हैं और जालियां होती हैं। मगर कभी रहे होंगे। यह मेरा अनुमान है। प्रमाण इसका नहीं है। मुझे लगता है किसी गलतफहमी की वजह से यह बात बनी होगी। माखन और दही चोर श्रीकृष्ण छींके तोड़कर भाग जाते रहे होंगे। जब छींके की मालकिन आती होगी तो रामसे और रामू कैंप की बिल्ली वहां अचानक कूद जाती होगी। लोग समझते होंगे कि बिल्ली के भाग्य से छींका टूट गया होगा। बिल्ली तो तोड़ नहीं सकती। यही सही है । यह मैं मान सकता हूं परन्तु मैं नहीं मान सकता कि बिल्ली के भाग्य से छींका कभी टूटा होगा। ऐसा मान लेने से बिल्ली की बच्ची! तुम्हारा चोट्टापन कम हो जाता है। और मैं ऐसा होने नहीं दूंगा।
नहीं ,बिल्ली के भाग्य नहीं होता। होता तो सूरदास या रसखान लिखते। कहां किसी चोट्टी बिल्ली के भाग्य के बारे में उन्होंने लिखा ? कौए के भाग्य के बारे में जरूर रसखान ने लिखा है कि काग के भाग बड़े सजनी ,हरि हाथ सौं ले गयो माखन रोटी।
रसखान क्यों इतने खुश हुए ? कृष्ण ने उनके छींके में कब हाथ डाला ? जैसे बिल्ली ने मेरे घर में डाला। मेरा अपना मत है कि अगर ऐसी बात थी तो रसखान को दुखी होना था या गुस्सा करना था। इतने आनंदित क्यों हुए। क्योंकि कौए ने रोटी उनके हाथ से नहीं छीनी थी न! कहते हैं किसी की रोटी नहीं छीननी चाहिए। किसी के पीठ पर मार लो , पेट पर कभी नहीं मारना चाहिए। अब बिल्ली और कौओं को कौन तहजीब सिखाए ? ठीक है ,उस समय के लोग भाग्यवादी थे। उनका मानना रहा होगा कि दाने दाने पर खानेवाले का नाम लिखा होता है। मैं नहीं मानता।
मुझे लगता है कि ‘यही ’ मानना ठीक नहीं है। क्योंकि यह मान लेने से गुस्से की जगह शांति मिलती है। मैं गुस्सा करना चाहता हूं। किन्तु हम हर जगह कहां गुस्सा कर पाते हैं?
पिछले दिनों मेरे साथ ‘दाने दाने में खानेवाले का नाम’ विषयक हादसा हुआ। जिस ज़मीन की रजिस्ट्री मैंने पत्नी के नाम कराई थी ,उसमें उसके अलावे पचीसों गैर और अजनबी लोगों के नाम भी लिखे महसूस हुए थे। वे रजिस्टर्ड तो खैर नहीं हुए पर स्टाम्प की खरीदी से लेकर डाइवर्सन ,पंजीयन, अभिलेख , नामांकन आदि-आदि में उनके हिस्से का दाना-पानी उनको दिये बिना रजिस्ट्री की न्यायमूलक कानूनी गाड़ी आगे नहीं बढ़ी। बाद में बात-बात पर कई लोगों के नामों के दाने बांटे गए, बांटे जा रहे हैं और अनंतकाल तक बांटे जाते रहंेगे। गृहप्रवेश से लेकर त्यौहारों में ,उसके बाद, बाल-बच्चों के होने पर तथा बेहद निजी क्षणों के सार्वजनिक होने के सामाजिकीकरण के सभी मामलों में दाने-दर-दाने अनेक प्रकार के लोगों ,जातियों और प्राणियों को गए हैं।
मैंने देखा है कि आज भी रसोई में रोटी बनती है तो गाय, कुत्ते , भिखारी और मेहमानों के लिए एक या दो रोटियां सुरक्षित रखी जाती हंै। गाय ,कुत्ता और भिखारी तो खैर नियमित रूप से दरवाजे पर आकर अपनी रोटी ले जाते हैं। अतिथियों की रोटी प्रायः हमीं लोग शाम को सेंककर खा जाते हैं। ऐसा तो है नहीं कि अतिथियों को कोई काम ही नहीं है और वे टाइम देखकर बस टपक पड़ने के लिए तैयार बैठे हैं। हां ,कई बार और बनानी पड़ती है,जब सचमुच जरूरतमंद अतिथिगण या परिचित लोग आकर ,नहा-धोकर हमारी कुटिया को देवता की तरह कृतार्थ करने लगते हैं। हम धन्य होने के हाव-भाव से भर जाते हैं। ये सब संचारी या व्यभिचारी भाव न होकर ,‘संस्कारी-भाव’ हैं । कुलमिलाकर गाय, कुत्ता, भिक्षुक और अतिथि ,किसी गृहस्थ के हिस्से के वे पुण्य हैं ,जिनके न करने से उसका जीवन व्यर्थ हो जाता है।
इस पूरी सूची में बिल्लो! तुमने देखा कि तुम्हारा यानी बिल्ली का कहीं जिक्र नहीं है। तुम तो झपट्टा मारनेवाले वर्ग की हो। शेरसिंह वगैरह तुम्हारी बहन के बेटे कहलाते हैं। तुम उनकी मौसी हो। चोर चोर मौसेरे भाई की कहावतें तुम्हीं लोगों को देखकर बनी होगी। मुफ्तखोरों! तुम इसे बहादुरी समझते हो ? धिक्कार है!! मेरे प्रिय महाकवि कबीर ने तुम्हारी बड़ी बुरी भद्द की है। उन्होंने लिखा है-‘‘ जब लगि सिंह रहै बन माहिं। तब लगि वह बन फूलै नाहिं।’ सुन रही हो , इतने मनहूस हो तुम लोग। यही नहीं कबीर ने इस समस्या के उन्मूलन का उपाय भी बताया है। कहते हैं-‘उलट स्यार जब सिंहहिं खाय। तब वह बन फूलै हरियाय।।’’ वाह! वाह!! इसे कहते ईंट का जवाब पत्थर से। निकृष्ट से उत्कृष्ट की कैसी दुर्गति हो रही है, कुटिला कैट! देख रही हो?
तुम लोगों की मक्कारी पर एक कहानी मैंने पढ़ी है। भगवतीचरण वर्मा ने ‘सोने की बिल्ली ’नामक कहानी में तुम्हारी और तुम्हारे मौसेरे-चचेरे भाइयों की अच्छी कलई खोली है। एक बहू ने तुम्हारी जैसी चोर बिल्ली को फेंककर कुछ मारा। अच्छा किया। चटोरी बिल्ली बेहोश हो गई । उसके मौसेरे रिश्तेदारों यानी पंडितवर्गीय लोगों ने ‘सोने की बिल्ली’ दान करने का प्रपंच रचा। परिवार पर बला टूटने का भय दिखाया। चलिये साहब सोने की बिल्ली तैयार हुई। कहानी में हो जाती है इतनी जल्दी। और जब दान का वक्त आया तो बिल्ली उठकर भाग गई। चूंकि वह कहानी भगवती चरण की थी ,इसलिए बिल्ली भाग गई। किसी बिल्ली की कहानी होती तो शायद दंड भी निर्धारित कर देती कि हजार बिल्ली को दूध पिलाओ तो पाप कटे। हो सकता है जीवन भर रोज दस बिल्लियां दूध पीकर जाती।
बिल्लो ! मुझे एक और कहानी याद आ रही है जो मुझे ज्यादा सुकून दे रही हैगी। तुम्हें पता है- बंदरबांट की कहानी? दो बिल्लियां आपस में इसलिए लड़ पड़ी कि उन्होंने एक साथ एक ही रोटी पर झपट्टा मारा था। अब बंटवारा कैसे हो? झपट्टा मारनेवाले प्रायः बंटवारे में कमजोर होते हैं। तब एक बंदर आया। वह चालाकी से रोटी बांटने लगा। कभी एक तरफ की रोटी ज्यादा कर देता और कभी दूसरी तरफ की। जितना हिस्सा ज्यादा होता उससे ज्यादा तोड़कर खा जाता। आखिर में जब कुछ न बचा तब बिल्लियों को समझ में आया कि बंदर ने क्या किया। मुझे आज यह कहानी अच्छी लग रही है। तब अच्छी नहीं लगी थी। धोकाधड़ी मुझे कभी अच्छी नहीं लगी। पर आज चूंकि मेरा नुकसान हुआ है तो मुझे तुम्हारे पुरखों का नुकसान अच्छा लगा। शायद यहीं से चोर का माल चंडाल खाए का मुहावरा बना होगा। ओर जाके पैर न फटे बिंबाई का भी । खैर ! अब मैं थक गया हूं। अब और गुस्सा नहीं हो सकता। तुमसे अब मैं बाद में निपटूंगा।
आज इतनी ही घृणा...शेष घृणा फिर कभी ....
तब तक याद रखना-आई हैट यू! डर्टी कैट!!
तुम्हारा -
कुछ नहीं ,कोई नहीं
8. 5.10 /9 ..5.10

Friday, May 14, 2010

नाक में दम

कैमिस्ट्री की कक्षा में मेरी कैमिस्ट्री ठीक रहती है। गणित और जूलाजी , फिजिक्स और वनस्पति के सभी केमिकल एक ही बीकर में मिल जाते हैं। मैं अपने पिपेट से बूंद बूंद एसिड टपकाता हूं। वे बीकर में अपने अंदर के ज्ञान-क्षार को संतृप्त होते महसूस करते हैं। एक दूसरे की सांद्रता का मजे़ से पता चलता रहता है। विज्ञान की भाषा इसे चाहे अनुमापन कहंे, मैं इसे साथ साथ पकना और पकाना कहता हूं। क्योंकि बात मुहावरों पर आकर ख़त्म होती है और मुझे मुहावरों में मज़ा आता है।
उस दिन जुलाजी के एक मैमल ने कहा:‘‘ सर , हिन्दी में एक मुहावरा है। नाक में दम होना या शायद नाक में दम करना ...तंत्रिका-तंत्र के हिसाब से यह ग़लत है। कृपया ,इस पर ज़रा प्रकाश डालें।’
प्रश्न सुनते ही मज़ा आ गया। मेरे अंदर आनंद की रासायनिक क्रिया शुरू हो गई। छात्र के सवाल में उत्प्रेरक के रूप में विविध क्रिस्टल पड़ गए थे। मैमेल पूछ रहा था हिन्दी का मुहावरा। कक्षा थी कैमिस्ट्री की। उसका आग्रह था भौतिकशास्त्र की फोटोमेट्री यानी प्रकाशमिति से संबंधित। कह रहा था ‘प्रकाश डालें।’ मेरा मन बाटनीकल गार्डन हो गया। मै कह चुका हूं कि इस क्लास में आकर मुझे मल्टीपल आनंद आता है।
मैंने पर्यावरण की संपूर्ण हवा को सीने में खींचते हुए फेफडों में दम भरा। पर मैं विचलित नहीं हुआ। मुझे पता है कि बात नाक में दम होने या करने पर अटकी हुई है। मैंने उत्साह में भरकर कहना शुरू किया:‘‘ विद्वान छात्रों और विदुषी छात्राओं!’’
सम्मोहित कक्षा में सन्नाटा खिंच आया। वे जानते थे कि जब जब मैं ऐसा कहता हूं तो विवेकानंद की तरह एक नई कैलीफोर्निया की नींव रखता हूं। जाहिर है ,सम्मोहन की यह कला मैंने पहले विवेकानंद से और बाद में ओशो’ से सीखी। विवेकानंद प्लेन ‘भाइयों और बहनों!’ में निपटा देते हैं। ओशो ‘मेरे प्रिय आत्मन!’ कहकर उसमें क्रीमी लेयर डाल देते हैं। जैसे बर्थ-डे केक में होता है। क्रीम केवल ऊपर होती है, असली मज़ा अंदर होता है। छात्र-छात्राएं असली मजे़ के क्षणों में निश्शब्द हो जाते हैं।
मैंने कहना जारी रखा ‘‘ आप ठीक कहते हैं। नाक में दम करना और होना तंत्रिकातंत्र का विषय नहीं है। दम का कोई स्थूल मास नहीं होता। वह एक कैमिकल रिएक्शन है। ‘नाक में उंगली करना’ भी एक मुहावरा है। वह स्थूल रूप से दिखाई देनेवाली क्रिया है। नाक भी दिख रही है और होनेवाली उंगली भी। पर जहां तक नाक में दम का सवाल है , वहां नाक तो दिखाई दे रही हैं ; लेकिन दम कोई दिखाई देनेवाली वस्तु तो है नहीं कि दिखे। हवा और प्रकाश से उसकी तुलना मत करना। प्रकाश को त्रिपाश्र्व से देखा जा सकता है। उसके इंद्रधनुष तुम जब चाहे तब बना सकते हो। इसीलिए वर्षा का इंतज़ार विज्ञान के विद्यार्थी नहीं करते।
हवा को तुम तौलकर देखते ही रहते हो। उसकी मात्रा ज्ञात करना तुमने भौतिकविज्ञान के प्रयोग के दौरान किया ही है। हवा को तुम सूंघ सकते हो। तुम्हारे अगल बगल बैठे दोस्त और दुश्मन हवा की विविध गंध का प्रयोग तुम्हें पास बुलाने या दूर भगाने के लिए करते ही रहते हैं। टीवी के विज्ञापनों में भी तुमने देखा ही है कि किसी खास किस्म के स्प्रे से कैसा दृष्य उपस्थित हो जाता है। वास्तविक दुनिया में क्या होता है आप में से बहुतो को उसका अनुभव हो सकता है। खैर । बात प्रकाश की चल रही है कि प्रकाश के बिना हम एक दूसरे के अस्तित्व को देख नहीं सकते। ऐसे ही हवा के बिना एक दूसरे की कैमिस्ट्री समझ में नहीं आती। प्रिय छात्र छात्राओं ! भटकिएगा नहीं। हवा कैमिस्ट्री का नहीं , भौतिकी का विषय है।
अब आइये दम पर। दम हवा नही है। मगर हवा में दम होता है। जिस तरफ चलती है उस तरफ भीड़ को बहा ले जाती है। भीड़ में दम नहीं होता कि हवा का दम निकाल सके। अगर ऐसा होता तो भीड़ मंत्री , मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री होेती और मनचाही हवा बनानेवाले मुट्ठी भर लोग भीड़ के द्वारा शासित होते। कुलमिलाकर, भीड़ में दम नहीं होता।
अब प्रश्न उठता है कि दम क्या है ? उसके गुण-सूत्र क्या हैं ? आवर्त-सारणी में उसका स्थान कहां है? ठोस है ,द्रव है या मात्र हवा है ? विज्ञान है या कला ? विज्ञान है तो किस प्रकार है ? कला है तो कौनसी कला है ? ललित कला है या फाइन आर्टस है ? वाणिज्य या टेक्नीकल साइड उसका झुकाव तो नहीं है ?
प्रिय छात्रों ! किसी भी बात को हंसी मजाक में नहीं लेना चाहिए। पूरी जांच पड़ताल के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए। आखिर आप विज्ञान के छात्र है। आस्था, मान्यता और परंपरा के अंधविश्वासों से निकलकर आपको तर्क के तराजू में तौलकर ही अपनी स्थापना करनी है। सिंद्धांत ही नहीं खड़े करने हैं। प्रायोगिक स्तर पर भी खड़े होना है।
‘‘सर! एक बात पूछूं ? आप नाक में दम होने का सिद्धांत बता रहे हैं या उसका प्रयोग कर रहें है? ’’ एक छात्र ने दम-साधकर पूछा।
मैंने दो सेकेण्ड दम-भरकर उसकी तरफ देखा और कहा:‘‘ सुन्दर प्रश्न। विज्ञान के छात्रों को लगातार इन्टेरेक्शन करते रहना चाहिए। पूछ पूछ कर नाक में दम कर देना चाहिए। उत्तर अवश्य मिलेंगे। इसे हम उदाहरण से समझें। जैसा कि आपने कहा है - नाक में दम होना या करना तंत्रिकातंत्र के हिसाब से गलत है। बिल्कुल गलत है। मैं मानता हूं और आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने इतना सोचा। मैं आपसे रवीन्द्रनाथ त्यागी की शैली में कहूं कि दम नामक वस्तु नाक नामक स्थान पर तभी होगी जब दम होगा । इसका अर्थ क्या हुआ कि दम नामक वस्तु वास्तव में मूत्र्त रूप में होती ही नहीं है। उदाहरणार्थ हम कहते हैं - सच का दम भरना सभी के दम की बात है , लेकिन सच्चा होना सबके दम में नही है। जैसे सच कोई वस्तु नहीं है, वैसे दम कोई वस्तु नहीं है।
अब हम कहते हैं नाक में दम होना या करना। इसे उदाहरण से समझाते हैं। यदि शूर्पनखा की नाक में दम ना होता तो रावण में दम कहां था कि वह सीता को चुराता?
दूसरी बात है नाक में दम करना। अगर रावणवर्गी खरदूषण व अन्य प्रतिवादी ऋषि मुनियों की नाक में दम न करते तो विश्वामित्र राम को लेकर वन में क्यों जाते ? राम में दम था इसलिए उन्होने नाक में दम करनेवालों की नाक से दम ही गायब कर दिया और क्षत्रियों की नाक ऊंची कर दी। हालांकि यह काम स्वयं विश्वामित्र का था , पर सवाल दम का है।’’
एक मेधावी छात्र ने पूछा ‘‘ सर थोड़ा कन्फ्यूजन है। यहां नाक में दम की बात भी हो रही है और अज्ञात स्थान पर रहने या होनेवाले दम की भी। ऋषियों की नाक में दम समझ में आ गया। यहां विषयांतर नहीं हुआ। लेकिन राम के दम पर प्रश्न उठता है कि वह कहां था ?’’
मैंने इसी सप्ताह धुली अपनी सफेद रूमाल निकाल ली। मेरे माथे पर गंगोत्री फूट पड़ी थी और शर्ट की बजाय रूमाल गीली करने में बुद्धिमत्ता थी। रूमाल को पतलून की जेब में ढूंसकर मैंने थूक निगलकर कहना शुरू किया:‘‘ बेटे ! क्या तुम कम्यूनिस्ट हो ?’’
लड़का सकपकाया। मैंने उसे तुरंत दिलासा का पानी पिलाकर कहा:‘‘ घबराओ मत। कम्यूनिस्ट होना बुरी बात नहीं है। दरअसल तुम्हारा प्रश्न उसी स्तर का है। अगर तुम रामकवि मैथिलीशरण गुप्त को पढ़ते तो समझ जाते कि राम के बारे में ऐसे सवाल नहीं किये जाते। तुम विज्ञान के विद्यार्थी हो इसलिए विज्ञानवादी सवाल कर रहे हो। विज्ञानवादी सवालों को प्रायः कम्यूनिस्टों के सवाल मान लिया जाता है। यहां एक बात अवश्य कहना चाहूंगा कि जब राम की बात हो तो तुलसीदास जी के बाद अगर कोई नाम याद रखना हो तो मैथिलीशरण गुप्त को खुलेआम याद रखना चाहिए। उन्होंने कहा है:‘ राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है। कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है।’ उनके बाबा तुलसी कहते हैं:‘होहिहे वही जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा।’ हमारा समाज विश्वासप्रधान समाज है। तर्क करने से नाक कटती है और आस्था से नाक सुरक्षित रहती है। कहीं कही तो ऊंची भी हो जाती है। यहां उल्लेखनीय है कि नाक कौन काटता है,जिसे तुम पहले ही भलीभंति समझ चुके हो।
जहां तक नाक ऊंची करने का सवाल है तो राम ने जीवन भर नाना प्रकार के लोगों की नाक ऊंची की। जहां जरूरत पड़ी लक्ष्मण से कहकर अनावश्यक नाक (और कान भीं ) कटवा दिए। नाक कटने से दम कम नहीं होता ; क्योंकि नाक तो परकोटा है, असली चीजें तो दो छेद हैं, जिनसे सांस अंदर बाहर आती जाती है और आदमी के फेफड़े गतिमान रहते हैं। इसी प्रकार कान काट देने से भी सुनने का मामला बंद नही होता। छेद वहां भी सलामत ही हैं। हवा नामक वस्तु , ध्वनि नामक तरंग को श्रवणीय बना देती है। यह भौतिकशास्त्र कहता है। हालांकि इसे छिद्रान्वेषण-शास्त्र के अंतर्गत लेना चाहिए।
यहां तक, इतनी नाक में दम कर देनेवाली बातें करने के बाद हम किस निष्कर्ष पर पहुंचे ? कि दम चूंकि भौतिकविज्ञान से परे पराभौतिकी का विषय लग रहा है, इसलिए इसे उसी तरह सोचता भी चाहिए।
तभी एक विदुषी छात्रा उठी और मुस्कुराकर बोली:‘‘सर! इसका मतलब है कि नाक में दम किसी एक विज्ञान या शास्त्र का विषय नहीं है। वह क्या है ? कैसा है ? कहां रहता है ? क्यों रहता है ? किसके साथ रहता है ? किसके साथ रहना पसंद नहीं करता ? किसे पकाता है ? किसके साथ पकना पसंद करता है ? सर से लेकर पांव तक और धरती से लेकर अंतरिक्ष तक , विज्ञान से लेकर पुराण तक , जुलाजी से लेकर जियोग्रफी तक, वह है भी और नहीं भी।’’
मैं पहले से ही अर्द्धमूर्छित था। मुस्कानमयी विदुषी छात्रा के घमासान प्रश्नों की बाढ़ में मेरे पैर ही उखड़ गए। मैंने हमेशा श्रद्धापूर्वक छात्राओं को विदुषी कहकर संबोधित किया है। इसके पीछे यह फिलासफी रही है कि करुणा की देवी कहलानेवाली वे दयामयी कृपाकरके मुझे बख्श देंगी। पर वे मुस्कुराती हैं और विद्वताभरे प्रश्न पूछती हैं। मैं विद्वान छात्रों की कठोरमुद्रा और विदुषी छात्राओं की मुस्कुराहटों से हमेशा भयभीत रहता हूं। सभी को रहना चाहिए।
मेरी हालत बाढ़ में बहते हुए निरीह आदमी की सी हो गई। पहली बार मुझे समझ में आया कि विश्वविद्यालय के एक अस्सी वर्षीय अवकाशप्राप्त विभागाध्यक्ष केन्द्रीय मुल्यांकन मे जाते समय कधे पर तौलिया क्यों रखते हैं। मेरी जेब में रूमाल थी जो पहले ही गीली हो गई थी। आज मुझे अपनी अदूरदर्शिता का पछतावा हुआ। मुझे ना सही कंधे पर, किन्तु बैग में तोलिया या नैपकिन लेकर चलना चाहिए। प्रश्नों की बारिश कभी कभी साइक्लोन भी हो सकती है।
फिर भी मैंने जेब में हाथ डाला कि कुछ तो राहत मिलेगी। राहत मिली। देवदूत की तरह प्यून ने स्विच दबाकर पीरियड समाप्त होने की घंटी बजा दी। मैंने थूक निगलकर कहा:‘‘ मेरे प्रिय छात्रों और छात्राओं ! यदि कल तक दुनिया शेष रही तो हम नाक में दम पर फिर बात करेंगे।’’
ऐसा कहकर मैं अपनी बेदम नाक पोंछता हुआ कक्ष से बाहर निकल आया।

नोट : शिफ्टंग पेन लिफ्टिंग दम

मेरे एक मित्र अभी अभी डाक्टर से मिलकर आये हैं। उनका दम फूल रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे दम निकल जायेगा। उनकी छाती में दम जैसे रह ही नहीं गया था। सांस खींच खींचकर उनकी नाक मेंदम हो गया था। दम था कि फिर भी फूल रहा था। किसी किसी की छाती फूलकर कुप्पा हो जाती है। पर वह खुषी में फूलना होता है। ये दमा से फूल और पिचक रहे थे। वे दोनों हाथों में दम लगाकर अपने को तानकर रखे हुए थे ताकि उनके दमाग्रस्त फेफड़े ठीक से फूल और पिचक सकें। उनका दम कभी नाक में होता था ,फेफड़ों पर तो कभी हाथों में।
दम एक प्रकार की चंचला टाइप की चीज़ है। जैसे लक्ष्मी होती है। जैसे कोई कुलच्छिनी होती है। जैसे कोई मनचला होता है। जैसे कोई लम्पट होता है। उसकी तुलना शिफ्टिंग पेन से की जा सकती है। वह कभी कंधे पर होता है कभी पीठ पर ं कभी दाएं होता है कभी बाएं। कभी सर में तो कभी माथे में। कभी दिल में तो कभी जिगर में। एक शायर ने इस शिफ्टिंग पेन को यूं चित्रित किया है -
सर से सीने में कभी पैर से पांवों में कभी
एक जगह हो ता कहें दर्द इधर होता है।।
दम भी उसी के परिवार का लगता है। किसी की आंख में दम होता है किसी की नाक में , किसी के होठों में दम होता है किसी की जुल्फों में, किसी के हाथ में दम होता है किसी के हस्ताक्षर में। किसी की जेब में दम होता है किसी के टेलीफोन में। किसी की बात में दम होता है तो किसी के लात मे। इसी से एक मुहावरा भी बना - लातों के भूत बातों से नहीं मानते।
कहने का मतलब यह है मित्रों कि दम बहुरूपिा भी है और बंजारा भी। वह जगह बदलता रहता है और अपने औजार बनाता रहता है। जिसे जिससे मतलब होता है वह वहां दम लगा देता है। आप अपनी प्रतिभा और पसंद से दम के दर्शन कर लें। मरे सामने चाय की प्याली आ गई है। मुलेठी इलायची लौंग सौंठ काली मिर्च तुलसी आदि इत्यादि के बने हुए पावडर की मसालेवाली चाय में दम है। इतना दम कि वह मुझे अपनी जगह से लिफ्ट करा देती है और मैं दीवान पर पालथी मारकर चाय की चुश्कियां लेने लगता हूं। ओके ..दम दमादम!!


दिनांक 19.04.10/3.5.10