कारी पुतरी>काली पुतली>काली पुत्री आंख की काली पुतली : शरीर के तंत्रिका-तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है आंख। आँख के बीच में एक काला छेद होता है जो सिकुड़कर और फैलकर रोशनी को नियंत्रित करता है, जिससे हम स्पष्ट देख पाते हैं। इसे काली पुतली (Pupil) कहते हैं। यह काली इसलिए दिखती है क्योंकि आँख के अंदर जानेवाला प्रकाश आँख के अंदर के ऊतकों (tissues) द्वारा पूर्णतः अवशोषित हो जाता है और बाहर परावर्तित नहीं होता। प्रकाश विज्ञान का यही नियम है। सारे रंग लौटा दिए गए, पारेषण उनका हो गया तो बचा ही क्या? सब सफ़ेद हो गया। जो सब लौटा दे, किसी का कुछ ले ही न, वह साफ़ सुथरा, पाक-साफ़, निर्लिप्त, संत, सूफ़ी और प्रतिष्ठित हो गया। विश्वसनीय और आदरणीय हो गया। वहीं दूसरी ओर, जिसने सब कुछ ले लिया, ग्रहण कर लिया, हड़प लिया, हजम कर लिया तो वह काला हो गया। सारे रंगों का अवशोषण ही काला (रंग) होना है। जैसे ब्लैक होल, वह ऐसा स्थान है, जहां जो भी गया है, लौटा नहीं है। जो सब हजम कर जाये, और डकार भी न ले, उस पर समाज कालिख पोत देता है। उसका मुंह काला हो जाता है। किसी को वह मुंह दिखाने लायक नहीं हो...
नवगीत : हवा .... चल रही है! इधर चल रही है, उधर चल रही है। हवा को तो पढ़िए किधर चल रही है। इसे चुभ रही है, उसे डस रही है। कहीं फाड़ मुंह बे-हया हंस रही है। कहीं है धमाका, कहीं झुनझुना है। करेला इसे है, उसे अमपना है। बढ़ाती कहीं स्वाद, लेकिन कहीं पर- निवालों में भरकर ज़हर चल रही है। सवालों के कितने पड़ावों से बचकर। बहुत झूठ बोली, कहीं पर उतरकर। बहानों से देकर कभी सच को फांसी। ठहाके लगाती है, पर है रुहांसी। चली मालगाड़ी सजाकर बजारन, हवा उसकी बन हमसफ़र चल रही है। ये तोते गगन में जो छाए हुए हैं। ये जनता के हाथों उड़ाए गए हैं। ये टेंटें, ये तोतारटन्ती, ये भाषण। ये दिल्ली के सबसे बड़े हैं प्रदूषण। ...