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Showing posts from March, 2026

मगहरी कबीरा

 मगहरी कबीरा अगम है आशा, सुगम निराशा, सुलभ है सत्यानाश। बारूदों से भरा हुआ है, यह शाश्वत आकाश।  अक्षर अंतरिक्ष भी करता, मृत्युंजय का जाप। सारे ग्रह नक्षत्र सूर्य की, रहे हैं गर्दन नाप।  समय की बलिहारी है,  प्रलय की तैयारी है। तेल खनिज तकनीक लड़ रहे, अपनी धूर्त्त लड़ाई।  पर्यावरण विषाक्त कर रहे, मिल मौसेरे भाई। दुनिया के भूगोली गोलों से खगोल थर्राया। महाशक्ति के समीकरण का अब त्रिकोण चकराया। चतुर्भुज चौथी दुनिया,  उखाड़े खूंटा थुनिया। बिन ईंधन के समय का पहिया, यहां वहां ठहरा है। तेलकूप का जल, थल, नभ पर, उपग्रह से पहरा है। छुटभइए भी बने चौधरी, हैं कट्टे लहराते। चीख रहे हैं चील बने सब, मुर्दों पर मंडराते। शरीफों मगहर आओ। कबीरा मिलकर गाओ।  @ रा.रामार्य वेणु, १४.०३.२६, शनिवार