Monday, October 24, 2011

धनतेरस

दुनिया भर के तमाम मित्रों को धनतेरस और दीपावली की शुभकामनाएं।

आज धनतेरस है। दीपावली के पखवाड़े की त्रयोदशी को ही धनतेरस कहा जाता है। दीपावली लक्ष्मी पूजन की अमावस्या है , धनतेरस खरीद फरोख्त की संध्या है।
पर्वों , त्यौहारों और हमारी सामाजिकता के बनने, प्रचलित होने और विकसित होने के बहुविध आयाम हैं। बरसात हमारे रहन सहन और घरगृहस्थी पर जो कीचड़ उछालती है वह हम दुर्गोत्सव के रावणवध तक किसी तरह वैसा ही रहने देते हैं। फिर शुरू होता है साफ़ सफाई का दौर। जो प्रायः तीसरा को और उसके बाद शुद्धिकरण के साथ होता है। फिर जाते हैं गंगा , जहां दशगात्र और द्वादशी आदि तर्पणादि के क्रियाकर्म कार्यक्रम के रूप में क्रमवार निपटाये जाते हैं। फिर होती है तेरहीं जिसे गंगाजली पूजन भी कहते हैं। इस दिन समाज के साथ बैठकर खाना खाया जाता है और मृतक को बताया जाता है कि आज तुम्हारे मरने पर हमें और समाज को विश्वास हो गया और हमारे सारे रिश्ते नाते लेनदेन वाद व्यवहार सब समाप्त। तुम अब कहीं भी सुविधानुसार जन्म ले सकते हो। रावण के परिवार में इन पंद्रह दिनों में यही हुआ होगा।
किन्तु दीपावली तो राम के अयोध्या , अपनी राजधानी लौटने का उत्सव है। राम अमावस्या के दिन अयोध्या लौटे होंगे। रात को उनके लौटने की खुशी में दिये जलाए गए और खूम धूम से नगाड़े तुरही शंख आदि ध्वन्यात्मक वस्तुएं बजायी गई होंगी ताकि हर्ष दिगदिगन्त तक प्रसारित हो सके। आज इन सब का सामान्यीकरण फटाखों में हो गया है। मतलब ये हैं कि दीपावली रामागमन का हर्षोत्सव है।
धनतेरस क्या है? राम के चौदह वर्षों को रामानुयायी गिन रहे थे। पंद्रह दिन पहले से तैयारियां आरंभ हो गई होंगी। लीपना , पोतना , साज सजावट , बंदनवार , दिए पोनी सब एकत्र किये जाते रहे होंगे। दो दिन पहले ही सब काम , सारी तैयारी पूरी की जा चुकी है , इसके संकेत के लिए धनतेरस के दिए जलाए गए होंगे। बात गले नहीं उतरी न। गले के नीचे धन तेरस नहीं जाता। जाती तो दीपावली की लक्ष्मी पूजा भी नहीं है। दीपावली साधे सीधे लक्ष्मी पूजन है तो धनतेरस धन इत्यादि एकत्र करने और संपत्ति खरीदने और धान वगैरह की उगाही का दिन हो सकता है, सन्ध्या हो सकती है।
परन्तु यह धनवंतरी वैद्य महोदय की जयंती भी है। स्वस्थ ऋतु के आंरभ होने की घोषणा। स्वास्थ्य का अनुष्ठान , स्वास्थ्य महोत्सव। इन पंक्तियों के लिखने के दौरान अखबारवाला अखबारों के पुलिन्दा घर के अंदर पैठा चुका है जो मेरे पास आ चुके हैं। अखबारों के मुखपृष्ठ जनरुचि के अनुसार ‘दीपावली की शुरुआत आज से’ यानी धनतेरस से या धनतेरस आज , पूजे जाएंगे धन्वंतरी -कुबेर’ जैसी हेडलाइंस से भरे पड़े हैं। ये अखबार स्मरण करा रहे हैं कि समुद्र मंथन से आयुर्वेद के प्रणेता धन्वंतरी आज ही उत्पन्न हुए। धन्वन्तरी महर्षि ने संसार को औषधियों का अमृत दिया। अमृत के शाब्दिक अर्थ पर जाइएगा तो बहक जाइएगा। अमृत को रसायन या प्राश समझिएगा तो सम्हल जाइएगा।
सम्हलने के बाद एक दूसरे प्रकरण पर नजर जाती है। आज का दिन धन-धान्य के अधिष्ठाता कुबेर का भी अवतरण पर्व है। इस दिन कुबेर की प्रतीक बहुमूल्य सामग्रियां द्रव्य इत्यादि संग्रहित करने से वे चिरकाल तक स्थिर रहती हैं। बहुत वर्षों से प्रतीक्षित एक सोफा हम बुक कर आए हैं। आज दोपहर के पहले वह आ जाएगा। सोफा हमारे लिए बहुमूल्य सामग्री है। चिरकाल तक का तो पता नहीं पर दूकानदार कहता है कि हमारे पु़त्र-पुत्रियों के पुत्र-पुत्रियां इसपर बैठेंगे , इतना मजबूत और टिकाऊ है। दूकानदार जानबूझकर झूठ बोलता है ताकि आज का अभी चल जाए वर्ना वह जानता है कि पीढ़ियों की रुचियां बदलती हैं। और चाहता भी है कि नयी पीढ़ी आए जिन्हें फैंसी आइटम पसंद हैं। हमें भी पता है कि कल जब हम नहीं होंगे तब यह सोफा , नए सोफे में बदल जाएगा।
परिवर्तनशीलता की व्यावहारिता के चलते शाश्वत और चिरकाल जैसे मादक शब्दों पर मेरा कभी भरोसा नहीं रहा। इसलिए मैं ‘यावत जीवेत सुखं जीवेत’ को सार्थक और चारु वाक्य मानकर सोफे पर जीवन पर्यन्त बैठूंगा इतना तो तय है। कुबेर का पता नहीं , उनसे मेरी प्रायः नहीं पटी। मैं राजनीति में नहीं हू , कोई उद्योग मेरा नहीं है , मैं एन जी ओ भी नहीं चलाता।
बहरहाल , आज धनतेरस को केवल धन्वंतरी की ही नहीं , कुबेर की भी जयंती है। एक तीसरा शुभ मुहुर्त भी , कहते हैं कि आज है। श्रीवत्स योग आज ही है। इसके होने से धनतेरस का महत्व बढ़ जाता है। लक्ष्मी जी के प्रभु हैं ये। शायद यही कारण है इस वर्ष धनतेरस दो दिन मनाई जाएगी। आज और कल।
हम देख रहे हैं कि एक ही दिन कइयों का जन्म दिन हो सकता है। एक साथ कई संयोग हो सकते हैं। कई प्रसंगों के पर्व हो सकते हैं। होते ही है। कुछ लोग मनगढन्त किस्से भी गढ़ते हैं। किस्से हालांकि मनगढ़ंत ही होते हैं। आज भी होते हैं।
खोजी महाशयों में एक बहु-आशयी सज्जन हैं, उनके अनुसार धनतेरस ‘धन की तेरही’ हैं। तेरही की तरह फिजूलखर्ची है। उनके अनुसार ‘तेरहीं यानी मृतक की आत्मशांति के लिए मृत्युभोज का व्यर्थ सामाजिक आयोजन।’ इसके दो दिन बाद ‘बची खुची लक्ष्मी’ का पूजन, उससे क्षमा याचना , उससे प्रार्थना कि तुम थीं तो यह सब किया , यह सब किया ; इसलिए तुम बनी रहो। हम पर अपनी कृपा बरसाती रहो।
एक और सार्थक तर्क वे दिया करते हैं। इस स्वस्थ ऋतु में जब तुम आरोग्य के देव धन्वंतरी का जन्मोत्सव मना रहे हो और लक्ष्मी पूजन कर रहे हो तो करोड़ों के पटाखे फोड़कर वातावरण और पर्यावरण क्यों दूषित कर रहे हो ? लक्ष्मी की बर्बादी क्यों कर रहे हो ?

हमारी सामान्य जनता इस पचड़ और उधेड़बुन में नहीं पड़ती। क्या , क्यों, किसलिए , कबसे , कैसे , इससे किसको लेना देना ? कौन करता है इसकी फिक्र ? ये सब खुचड़ खाली बैठे बैठेठाले निठल्लों की है। जिन बुद्धुओं को लगता है कि उनके पास बुद्धि है वे ये सब बोदी जुगालियां करते हैं। बाकी लोग डूबकर आनंद लेते और देते हैं।
एतदर्थ, आस्थावान और उत्साह-समर्थ जनता के लिए एक समय सारणी प्रकाशित की गई है। पंडितजन कार्यक्रम अधिकारी के रूप में यह समय सारणी या कार्यक्रम बनाते और संचालित करते हैं। व्यापारी लोग लेनदेन के मुख्य अंको में अपनी अपनी भूमिका का निर्वहन यानी रोल प्ले करते हुए प्रभावशाली अभिनय करते हैं।
समय सारणी निम्नानुसार है-

धनतेरस के दिन

सुबह 9 बजे से 10.45 तक इलैक्ट्रानिक्स , भूमि , भवन की खरीद ;
दोपहर 1.36 से 3.01 तक सभी प्रकार के चैपहिए या दुपहिए ;
अपरान्ह 3.01 से 4.27 तक स्वर्ण , भूमि , भवन ;
शाम 4.27 से 5.55 तक रासायनिक , सजावट , मनोरंजन की वस्तुएं ;
शाम 5.55 से 7.28 तक वाहन की खरीद।
इस बीच 10.30 से 136 का समय शायद भोजन वगैरह के लिए हो सकता है। इसी प्रकार सन्ध्या 7.28 के बाद का समय ग्राहकों की समझदारी पर छोड़ दिया गया है।

हमारा त्यौहारिक वाणिज्य प्रबंधन भी कितना चौकस है जरा देखिए। बस देखते रहिए और कुछ न कहिए। आप देखेंगे कि हमारे अभावों और हमारे सामर्थ्य ने कई किस्से गढ़े हैं , कई कहानियां बुनी हैं। हमारी पीढ़ियों ने ये कहानियां अपनी अपनी रुचि से सहेजी और चुनी हैं। नई पीढ़ी इसे परम्परा के रूप में याद करती है और मनाती है। इसमें नयी झारलें लगाती है , नये रोगन करती है। यही उत्सव है। उत्सव से उत्साह का सीधा संबंध है। हम सब यही करते रहे हैं यही करे। इसलिए ..शुभ धनतेरस , शुभ दीपावली।
24.10.11