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दर्द के गुण-सूत्र

आपके इधर तो खैर आता ही होगा, हमारे भी आता है एक फेरीवाला..  प्लास्टिक  के घरेलू आइटम लेकर. वादा करता हे कि अगली बार वह भी लेकर आउंगा जो इस बार नहीं लाया..तो फिर जरूर आता है.. लीजिए मैंने भी कहा था कि अगली बार यह लेकर आउंगा तो आया... दर्द की चर्चा चल निकली। चार लोग बैठते हैं तो कुछ न कुछ चल निकलता है। चलते पुरजों से काम की बातें आप चाहे न निकाल पाएं, यह निष्कर्ष जरूर निकाल लेते हैं कि किसी के पेट में क्या है। मुझे लगता है कि यह कहावत ‘‘किसी के पेट में क्या है, कोई नहीं जानता’’, जरूर किसी दाई ने बनाई होगी। जचकी से संबंध बैठता है इसका। किसी दाई (मेटरनिटी मेड एक्सपर्ट) ने लक्षण देखकर बताया होगा कि लड़का होगा। हो गई होगी लड़की। भद्द हुई होगी तो झल्लाकर उसने कहा होगा-‘‘ अब किसी के पेट में क्या है, कोई थोड़े जानता है।’ लड़का होता तो वही शेखी बघारती और ईनाम लेती। कैसी अजीब बात है, जिस लड़की को लेकर दुनिया में इतनी मारकाट मची है, उसे ही लोग पैदा होने से रोकते है, भ्रूण में मार डालते हैं। खैर, चलते पुरजे अपना काम जिस खूबसूरती...

विवाह की वर्षगांठ: गांठ-विज्ञान के विशेष संदर्भ में।

आज मेरे विवाह की वर्ष-गांठ है। जयंती और दिवस जो होते हैं, वो मरणोपरांत मनाए जाते हैं। हमारे देश में प्रसिद्ध दिवस और जयंतियां हैं- बाल दिवस, शिक्षक दिवस, सदभावना दिवस, रजत जयंती, हीरक जयंती, प्रेमचंद जयंती, निराला जयंती। दिवस ‘मृत्यु का दिन’ और जयंती ‘जन्म लेने का दिन’ है। जैसे एक होती है प्रेमचंद-जयंती और दूसरा होता है प्रेमचंद दिवस। गांधी जी ने जन्म लिया तो गांधी जयंती दो अक्टोबर। जिस दिन उन्हें गोली मारकर मार डाला गया, वह मृत्यु का दिन हुआ। उस 31 जनवरी को, उनकी मृत्यु की याद में, हम ‘शहीद-दिवस’ कहते हैं। इस प्रकार दो दिन प्रसिद्ध हैं एक जयंती और दूसरा दिवस। जी! कुछ कहा आपने? आप पूछ रहे हैं कि बाल-दिवस और शिक्षक-दिवस किसकी मृत्यु के दिन है? पता नहीं। शायद बालमृत्यु की याद में बाल दिवस मनाया जाता है और भारत में किसी शिक्षक नामक मरे हुए व्यक्ति की याद में शिक्षक दिवस मनाया जाता होगा। मैं कुछ दावे से नहीं कह सकता। जी! क्या कहा आपने? अरे तो प्यार से बताएं न, इस तरह गाली गलौज क्यों करते है। जी! मैं समझ गया, बालदिवस हमारे प्रथम प्रधानमंत्री का जन्म दिन है और शिक्षक दिवस...

कुछ गर्मी खाए दोहे

मित्रों!  कुछ गर्मी से बचाए हुए फूल प्रस्तुत हैं, उम्मीद है आप तक आते आते इनकी खुष्बू बरकरार रहेगी.... लिखकर बताइये कि आप के उधर गर्मी के क्या हाल हैं। इधर तो ये हैं.......... नदियां छूकर जल मरीं, तले अतल सब ताल । वह भागे चारों तरफ़, पहन कांच की खाल ।। लपट झपटकर लूटता, उड़ता ले आकाश । खींच दुपट्टे फाड़ता, धूल झौंक बदमाश ।। होंठ फटे, सूखे नयन, संदेहों में नेह । हरे दुपट्टे से ढंकी, बिखरी धूसर देह ।। वृक्षों से टकरा गिरी, भरी जवानी धूप । उनकी बांहों में पड़ा, सांवल शीतल रूप ।। गर्मी के उपकार को, भूल सकेगा कौन । फिर प्यासों के होंठ तक, गागर आई मौन ।। बढ़ता जाता ताप है, घटती जाती भाप। धरा निर्जला कर रही, मृत्युंजय का जाप।। जलती धरती, जल रहे जलाशयों के घाट। पनघट मरघट हो गए, बस्ती सन्न सनाट।।  (सन्न सनाट- मूच्छित) आंखें पथराई हुई, पपड़ाए हैं होंट। भट्टी सी निकली हवा, दम जाएगी घोंट।। नागिन सी लू लपकती, हवा हुई है व्याल। हर पल अब लगने लगा, आग उगलता काल।।

नयी सुबह का गीत

दुनिया भर के तमाम दोस्तों, जाने और अनजाने साथियों को नये वर्ष हार्दिक शुभकामनाएं। नये साल में आप सारे इरादे पूरे कर डालें। धुंध हटाकर सोने जैसी सुबह सिरहाने आयी। अलस भोर के सपने सच होते, बतलाने आयी।। अधभिंच आंखें याद कर रहीं, बीते कल की बातें। भागमभाग भरे दिन को ले उड़ी नशीली रातें। तन्य तनावों में भी कसकर पकड़ीं कुछ सौगातें। जो पल मुट्ठी से फिसले थे, उन्हें उठाने आयी। सपने क्या देखे मैंने, केवल अभाव फोड़े थे। उनके अंदर स्वर्णबीज थे, वे भी फिर तोड़े थे। गरियां कुछ उपलब्ध हुईं या तुष्ट भाव थोड़े थे। इन मेवों का आतिथेय आभार चबाने आयी। भले, भेदभावों का दलदल, गहरे होते जाता। भले द्वेष, पथ पर दुविधा क,े सौ सौ रोड़े लाता। जिसको बहुत दूर जाना है, वह तो दौड़े जाता। कमर कटीली कसकर कितने काम कराने आयी। अस्त-व्यस्त पीड़ाएं झाड़ीं, स्वच्छ चादरें डालीं। धूप धुले शुभ संकल्पों वाली, आंगन में फैला ली, नव रोपण के लिए बना ली, क्यारी नयी निराली। नव उमंग की टोली भी उत्साह बढ़ाने आयी धुंध हटाकर सोने जैसी सुबह सिरहाने आयी। 29.12.11 डाॅ.आर.रामकुमार, विवेकानंद नगर, बालाघाट -...

फिसलनेवाले फर्स में एक शाम

पोली मेगामार्ट की वह शाम अभी भी आंखों में बसी हुई है। हम उस शाम मार्बल सिटी में थे और मेगामार्ट के बारे में उत्साह से जानकारी देनेवाली हमारी बच्ची ही थी जो मां को मल्टीपल किचन-वेयर उपलब्ध कराना चाहती थी। ऊमस भरी दोपहरी थकी हुई नींद से जागकर अभी अभी शाम में ढली थी। शाम का सदुपयोग हमारे तीन लक्ष्यों पर आधारित था : पहला पोली मेगामार्ट की सैर और खरीददारी, दूसरा मॉल की तफ़रीह , तीसरा चैपाटी ,सोनाली या रूपाली में किसी एक के ‘सौजन्य’ पर भोजन। पहला नाम चौपाटी, जग जाहिर है कि चैपाटी नाम के स्थान , बम्बई उर्फ मुम्बई की तर्ज पर बड़े बड़े शहरों में लगनेवाले चटोरी चाट के शौकीन इलाके हैं। बाकी के दो नाम ; सोनाली और रूपाली हाई-स्टेडर्ड के भोजनालय हैं। हम पहले लक्ष्य की ओर बढ़े। लक्ष्य के लिए बहुत दूर नहीं जाना पड़ा। पास ही था। बच्चियों का फ्लेट पॉज़ इलाके में था जो केन्द्रीय बाजार के मध्य में ही था। मेगा मार्ट में आज काफी चहल पहल थी। आज कुछ चीज़ों पर 40 प्रतिशत का डिस्काउंट ऑफर था और चांवल के पांच किलो के एक पैक के साथ एक पैक फ्री था। किसी भी मध्यम वर्गीय परिवार को यह लुभानेवाला खेल था। हम भी इससे आ...

हरी मिर्ची

सुबह सुबह जूते की अंतिम गांठ बांधकर मैं पूरी तरह तैयार होकर घूमने के लिए सीधा खड़ा हो गया। सुबह की हवा स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है। उपयोगितावाद का यह मंत्र मैंने ऐन बचपन में ही शहद के साथ चाटा है। जब तब इसकी मिठास मेरे मस्तिष्क पर लिपट जाती है। मैं जब माथे पर हाथ फेरते हुए होंठों पर जबान फिराता हूं ,तो इसका मतलब यही होता है कि अतीत अपनी सुन्दरता के साथ मुझे याद आ रहा है। ‘‘लौटते हुए हरी धनिया और हरी मिर्च तो नहीं लानी है?’’ निकलने के पहले मैंने अंदर की तरफ़ मुंह करके आवाज़ लगाई। अब तक पत्नी जान चुकी है कि नर्मदा नगर और मोती तालाब के बीच का जो अध -उधड़ा रास्ता है, उसमें करीब आधा दर्जन सब्ज़ियों की घरेलू दूकानें हैं जो सुबह सुबह ही खुल जाया करती है। मकानों के अहातों की सफाई और छिड़काव के बाद ,सब्ज़ियों के तख़्तों का सजना ऐसा ही है जैसे आंगन में किसी ने हरी, लाल, भूरी, बैंगनी, गुलाबी, प्याजी-आलुई रंगोलियां डाल दी हों। ‘आंखों के लिए हरापन और हरियाली देखना अच्छा होता है।‘ हरी मिर्च और हरी धनिया की चटनी की तरह यह बात मां ने बचपन में कई बार मेरे अलसाए हुए सबेरों को चटाई है। मैं अक्सर धुले हुए ...

धनतेरस

दुनिया भर के तमाम मित्रों को धनतेरस और दीपावली की शुभकामनाएं। आज धनतेरस है। दीपावली के पखवाड़े की त्रयोदशी को ही धनतेरस कहा जाता है। दीपावली लक्ष्मी पूजन की अमावस्या है , धनतेरस खरीद फरोख्त की संध्या है। पर्वों , त्यौहारों और हमारी सामाजिकता के बनने, प्रचलित होने और विकसित होने के बहुविध आयाम हैं। बरसात हमारे रहन सहन और घरगृहस्थी पर जो कीचड़ उछालती है वह हम दुर्गोत्सव के रावणवध तक किसी तरह वैसा ही रहने देते हैं। फिर शुरू होता है साफ़ सफाई का दौर। जो प्रायः तीसरा को और उसके बाद शुद्धिकरण के साथ होता है। फिर जाते हैं गंगा , जहां दशगात्र और द्वादशी आदि तर्पणादि के क्रियाकर्म कार्यक्रम के रूप में क्रमवार निपटाये जाते हैं। फिर होती है तेरहीं जिसे गंगाजली पूजन भी कहते हैं। इस दिन समाज के साथ बैठकर खाना खाया जाता है और मृतक को बताया जाता है कि आज तुम्हारे मरने पर हमें और समाज को विश्वास हो गया और हमारे सारे रिश्ते नाते लेनदेन वाद व्यवहार सब समाप्त। तुम अब कहीं भी सुविधानुसार जन्म ले सकते हो। रावण के परिवार में इन पंद्रह दिनों में यही हुआ होगा। किन्तु दीपावली तो राम के अयोध्या , अपनी राजधानी ल...