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चुहिया बनाम छछूंदर

डायरी 24.7.10

कल रात एक मोटे चूहे का एनकाउंटर किया। मारा नहीं ,बदहवास करके बाहर का रास्ता खोल दिया ताकि वह सुरक्षित जा सके।
हमारी यही परम्परा है। हम मानवीयता की दृष्टि से दुश्मनों को या अपराधियों को लानत मलामत करके बाहर जाने का सुरक्षित रास्ता दिखा देते हैं। बहुत ही शातिर हुआ तो देश निकाला दे देते हैं। आतंकवादियों तक को हम कहते हैं कि जाओ , अब दुबारा मत आना। इस तरह की शैली को आजकल ‘समझौता एक्सप्रेस’ कहा जाता है। मैंने चूहे को इसी एक्सप्रेस में बाहर भेज दिया और कहा कि नापाक ! अब दुबारा मेरे घर में मत घुसना। क्या करें , इतनी कठोरता भी हम नहीं बरतते यानी उसे घर से नहीं निकालते अगर वह केवल मटर गस्ती करता और हमारा मनोरंजन करता रहता। अगर वह सब्जियों के उतारे हुए छिलके कुतरता या उसके लिए डाले गए रोटी के टुकड़े खाकर संतुष्ट हो जाता। मगर वह तो कपड़े तक कुतरने लगा था जिसमें कोई स्वाद नहीं होता ना ही कोई विटामिन या प्रोटीन ही होता। अब ये तो कोई शराफत नहीं थी! जिस घर में रह रहे हो उसी में छेद कर रहे हो!? आखि़र तुम चूहे हो ,कोई आदमी थोड़े ही हो। चूहे को ऐसा करना शोभा नहीं देता।
हालांकि शुरू शुरू में…

‘मंत्र’: आदमी और सांप के किरदार

प्रेमचंद जयंती(31 जुलाई) पर विशेष -
 मुंशी  प्रेमचंद की कहानी ‘मंत्र’ की आख्या:

-डाॅ. रा. रामकुमार,

प्रेमचंद की ‘मंत्र’ कहानी दो वर्गों की कहानी है। ये दो वर्ग हैं ऊंच नीच, अमीर गरीब, दीन सबल, सभ्य और असभ्य। ‘मंत्र’ दोनों के चरित्र और चिन्तन, विचार और सुविधा, कठोरता और तरलता के द्वंद्वात्मकता का चरित्र-चित्रण है। मोटे तौर पर देखने पर यह कहानी ‘मनुष्य और सांप’ के दो वर्ग की भी कहानी है। अजीब बात हैं कि मनुष्य अपनों में सांप बहुतायत से देख लेता है किन्तु सांपों को मनुष्य दिखाई नहीं देते।
यद्यपि प्रेमचंद अपनी कथाओं में समाज का यथार्थ चित्रण करते थे किन्तु उनका उद्देश्य आदर्शमूलक था। उनकी सभी कहानियां समाज के द्वंद्वात्मक वर्गों का व्यापक चित्र प्रस्तुत करती हैं। अच्छे और बुरे, अमीर और गरीब, ऊंच और नीच, पढे-लिखें और अनपढ़, ग्रामीण और शहरी, उद्योगपति और मजदूर। स्थूल रूप से भारत का समाज ऐसे जितने भी वर्गों में विभाजित है और उसमें जितनी भी विद्रूपताएं हैं, उनका वर्णन संपूर्ण व्याप्ति और पूर्णता के साथ प्रेमचंद की कथाओं में मिलता है।
भारत वर्गों का नही जातियों का देश है। यहां वर्गों का विभाजन अकल…

और अंतिम रस है- वात्सल्य-रस:

बाल कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान के विशेष संदर्भ में
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कभी कभी और प्रायः सोचता हूं कि मीठा अंत में क्यों परोसा जाता है? समारोह का अध्यक्ष आख़री में क्यों बोलता है? प्रथम विजेता की घोषणा अंत में ही क्यों की जाती है? सबसे ज्यादा और  प्रभावशाली कवि को बाद में ही क्यों प्रस्तुत किया जाता है? नव-रसों में श्रृंगार को पहला स्थान क्यों दिया गया तथा औचकदन कूद पड़नेवाले वात्सल्य रस को दसवें रस के रूप में क्यों दिया गया?
यदि इन सब सवालों से बचकानापन टपक रहा है तो टपक रहा है। इस बचकानेपन को छोड़ पाना या इससे अलग हो पाना संभव होता तो ‘झांसी की रानी’ के गौरव का गान करनेवाली कवयित्री सुभद्राकुमारी चैहान का मातृत्व कभी ‘कदंब के पेड़’, कोयल, खिलौनेवाला और धूप और पानी जैसे कालजयी बाल-गीतों की तरफ़ नहीं मुड़ा होता।
मेरा बचपन जिस बालगीत को ‘मां की आरती’ की तरह गाकर तृप्त होता रहा है, वह हर बच्चे की तरह मेरा अपना आत्मीय गीत बनकर दिल में रच-पच गया था। यह बहुत बाद में मुझे पता चला कि वह गीत ‘झांसी की रानी’ गानेवाली तथा ‘वीरों का कैसा हो वसंत’ सिखानेवाली स्वतंत्रता-समर की वीरांगना कवयित्री सुभद्राकुमारी चैहान…