Thursday, June 30, 2016

इस कारवाने जीस्त में...



बढ़ते रहो, रुकना नहीं, कैसी भी हो मुश्किल बड़ी!
हर हाल में चलते रहो, हर हार से मंजिल बड़ी!
ताकत बड़ी, हिम्मत बड़ी, हर हौसला, चाहत बड़ी,
इस कारवाने जीस्त में, हर राह है संगदिल बड़ी!

डाॅ. रामकुमार रामरिया,
नये राम मंदिर के पीछे, गुलमोहर गली,
35, स्नेह नगर-27, बालाघाट
शुक्रवार,1 जुलाई 2016, प्रातः 7.19

शब्दावली :

कारवाने जीस्त: जिन्दगी का अभियान, जीवन की यात्रा,
संगदिल: पत्थरदिल, कठोर, निर्मम,

Wednesday, June 22, 2016

मोको कहां ढूंढे रे बंदे

कबीर जयंती पर विशेष ..

कहानी -


 मोको कहां ढूंढे रे बंदे

निस्तारखाने में बाल्टी रखकर अमर इसके पहले कि मां को इस घटना का हाल सुनाता, उसने देखा कि रमजू, अलतू और शफ़्फू उसे घेरकर खड़े हो गए।
‘‘तुम कोई तीसमारखां हो?’’ रमजू ने अपनी कमर में हाथ रखकर सवाल किया ‘‘रात में भी तुम गेट से अंदर घुसे...और एकदम सामने बैठे...और अब पानी के नल पर हुश्नपरियां तुमसे गुफ़्तगू करने लगी हैं।’’
‘‘तो मैं क्या करूं?’’ अमर ने कहा।
‘‘हां, अब ये क्या करे?’’शफ़्फ़ू ने कहा। अल्तू ने हां में हां मिलाई।
रमजू सिर खुजाने लगा। अमर उससे एक क़दम निकल गया था। रमजू का चेहरा खिंच गया।
अमर उत्साह में था। वह सब कुछ बताना चाहता था। रमजू को फुसलाते हुए बोला: ‘‘रमजू! क्या बात है उस्ताद?’’
‘उस्ताद मत कहो, अम्मू उस्ताद! तुम तो हमारे भी उस्ताद निकले।’’ रमजू ने हथियार डाल दिए। उसके चेहरे पर मुस्कान फिर खिल उठी थी।
पंचायत बैठी। वास्तव में उसे चौपाल कहना ठीक है। पांच नहीं, चार थे वे लोग। अमर, रमजान, अलताफ़ और शफ़ीक़। चारों की चौपाल में हुश्नपरियों की चर्चा चली।  वे जहां ठहरी हैं सराय में उस मेहमानख़ाने का नक़्शा खींचा गया।
इस चौकड़ी के परिवार जहां रहते हैं वह चाल वास्तव में ‘धन्ना सेठ की सराय’ का ही एक हिस्सा है। आगे के हिस्से में इनकी दूकानें और परिवार है, पीछे किराने और चाय समोचे की दूकानें हैं। ऊपर के हिस्से में सराय हैं, जहां थियेटरवाले ठहरे हुए हैं। उसी के सामने ही मैदान है जहां थियेटर लगा हुआ है।
‘‘यानी ये लोग ठीक हमारे सर पर ठहरे हैं!....तो हमें भी उन्हें सरआंखों पर लेना चाहिए।’’ रमजू ने प्रस्ताव रखा।
चौपाल ने फैसला किया कि जब वे मानती है कि वे हमारी मेहमान हैं तो उनकी पूरी ख़ातिरतवज़्ज़ो की जाएगी।
आंखों ही आंखों में आपसी इकरारनामे पर दस्तखत हो गए। रमजान तो आसमान पर उड़ने लगा। जन्नत इतने नजदीक है और हमें ही पता नहीं। उसने सारी ताकत इस पेशकश पर लगा दी कि अम्मू उस्ताद को जो गाने का दावतनामा पेश किया गया है वह किसी भी सूरत में टाला नहीं जाएगा।

दोपहर होते होते चारों बच्चे पीछे की सराय के रास्ते पर खड़े थे। टिकट-कीपर भाईजान सीढ़ी पर ही मिल गए। मुस्कुराकर अमर से बोले-‘‘होर छोटे म्यां! सब ख़ेरियत तो हे...कां चल दिए मझे मझे में..’’
‘‘कही नहीं...हम तो ऐसे ही...’’ अमर सकुचा गया तो रमजान ने आगे बढ़कर मोर्चा सम्हाल लिया-‘‘ सलाम भाई जान! दरअस्ल सुबो सुबो इसका गाना...बेबियों ने सुना...होर...’’ उसकी आधी बातें हलक में ही अटक गई क्योंकि जिस सीढ़ी पर वे खड़े थे उसी पर फरफराती हुई वही लड़कियां ऊपर चढ़ी आ रहीं थीं।
‘‘आदाब!’’ छरहरी गायिका और नर्तकी ने, जिसने इस वक़्त सलवार कमीज़ पहन रखी थी, अमर को आदाब पेश किया। अमर ने हाथ जोड़ दिए और हकलाकर कहा -‘‘ ये रमजान अली है..ये शफीक खान और ये अलताफ़ खान है..और मैं अमरकुमार...ये सब मेरे दोस्त हैं।’’
बाद सबको आदाब के उस छरहरी लड़की ने ठीक उसी अंदाज़ में परिचय पेश किया जिस अंदाज़ में अमर ने किया था.-‘‘ये बेबी शकीला है..ये बेबी फरीदा है ..ये बेबी फातिमा है और मैं हूं बेबी इंदिरा .ये तमाम मेरी हमगीर हैं...’’
सबने नजदीक से देखा कि छरहरी लड़की ज़रा सांवली थी लेकिन उसके नाक नक्श काफ़ी तीखे थे। उसकी हंसी चमचमाती हुई बिजली थी जिसमें गीले इंद्रधनुषी रंग बिखरे पड़ रहे थे। उसके दांतों में अभी-अभी पजाकर सान पर धार बनाए गए चाकू की चमकार थी। उसने इन्हें तस्वीर बनते देखकर कहा -‘‘आइए...उस्तादजी के पास रियाज़ के लिए चलें।

इतना कहकर सारी परियां फरफराती हुई यूं सीढ़ियों पर उड़ती हुई चली गर्हं, जैसे वे जन्नत आबाद करने जा रहीं हों। कम से कम रमजू को ऐसा ही लगा। अमर का कंधा पकड़कर कर उसने कहा-‘अम्मू भाई! मेरे को ऐसा लग रा हे कि परियां जन्नत को आबाद करने को उड़ी जा रहीं हों।’
‘चलो हम बी जन्नत का नजारा करें।’ अलतू ने बेसब्र होकर कहा तो सब ऊपर उस्ताद जी को ढूंढने बढ़े। जहां से साजों के बजने की आवाज़ें आ रही थी उसी ओर बढ़ने पर उन्होंने पाया कि वे संगीत के कारखाने में पहुंच गए हैं। उस्ताद जी के सजे हुए दरबार में तबला, सारंगी, ढोलक, मंजीरे, खड़ताल वगैरह अपनी अपनी बानगियां दिखा रहे थे। वे सब परियां सर पर ओढ़नियां लेकर पैर मोड़कर बैठ गई जैसे .. जैसे किसी शून्य को छोटे उ की मात्रा लगा दी हो.... अमर अंदर ही अंदर हंसा..
उनके आने से केवल तबलावाले, ढोलकवाले, मंजीरे और खड़तालवाले असर में आए .. उस्ताद आंख मूंदें सारंगी में ‘ऊं ईं आं’ कर रहे थे ... और अमर ने ... और रमजान ने ... और शफीक ने... .और अल्ताफ   ने .. पहले एक दूसरे की तरफ देखा और फिर ... कोने की तरफ जहां एक भोंपू, अपनी पूंछ के अंतिम सिरे को कटोरे की तरह गांठ बांधकर पूंछ की नोंक को एक घूमती हुई थाली (अंग्रेजी की डिस्क) पर टिकाकर गाना गा रहा था .. ‘कौन आया मेरे, मन के द्वारे, पायल की, झनकार लिये...’ अमर हैरान रह गया कि इस जिन्न जैसे दिखनेवाले दुमदार भोंपू को कैसे दिखा कि कोई आया ..
 तभी तबलेबाले ने एक हाथ उठाकर उन्हें बैठने के लिए कहा और तबड़ तबड़ उंगलियां नचाने लगा।
वे बैठ जरूर गये लेकिन अमर की आंखें कोने के गाते हुए जिन्न की तरफ से न हटी जो ऊपर से एक भौंपू था और सांप की तरह बलखाकर नीचे आया तो उसकी दुम घूमती थाली पर खड़ें कटोरे के ऊपर टिक गई। भौंपू के साथ साथ एक और कोई गा रहे थे जो उस्ताद के ठीक बगल में बैठे  थे... आखिर उन्होंने लम्बा खींचकर कहा - ‘कौऽऽऽन आऽऽया? और चुप हो गए  ..... ठण्डी आंखों से इन्हें देखते रहे।
  एक आदमी कोने पर गया और गाते हुए जिन्न की  दुम क्टोरी सहित उठायी और उसे एक टेढ़ी उंगली के जैसी खूंटी पर टांग आया जो घूमती हुई थाली के एक किनारे ठुंकी हुई थी। अमर के लिए वह एकदम नई चीज थी, उसकी नजर वहां से हट ही नहीं रही थी।
उस्ताद ने कहा: 'म्यां, वह गिरामोफून है, वह हमारा भी उस्ताद है .. वही सब सिखाता है हमें.. हां इन्दू बानो, कौन हैं वो नन्हें उस्ताद जो।’
सांवली छरहरी लड़की ने कहा: ‘ये अम्मू मियां हैं .. सुबह सुबह यही गाया करते हैं ..’
अमर सकपका कर बोला: ‘नहीं, मेरी मां गाती है तो मैं भी गा देता हूं..’
उस्ताद मुस्कुराए और बोले: ‘मियां जो मां का शागिर्द होता है न ..उस पर अल्लाह की भी नहीं चलती, वह कुदरती हुनरमंद होता है .. मां को याद कर के कुछ गाओ ..’
अमर ने इंदिरा की तरफ देखा। उसने गाओ का इशारा किया। अमर ने इशारे से पूछा कौन सा। इंदिरा ने फुसफुसाकर कहा: ‘सुबहवाला’
अमर के मुंह से निकला: ‘ओ मां!’
लोग हंस पड़े। उस्ताद ने कहा: ‘इरशाद!’
इंदिरा ने फुसफुसाकर कहा: ‘गाओऽऽ!!’

घबराकर अमर ने आंख बंदकर ली! मां को याद किया। मां का हंसता हुआ चेहरा सामने था। अमर अक्सर दूघ के ऊपर पड़ी मलाई को उंगली से हलके से छूकर गुदगुदाता था और मां से पूछता था:‘‘मां मैं मलाई खा लूं!’’ फिर मां की तरफ देखता था। मां हंसकर सिर हिलाती थी, जिसका मतलब होता था:‘‘हां, खा ले।’’ मां अक्सर बोलने की बजाय सिर हिलाती थी और उसके मतलब अमर समझ जाता था। इस बार भी समझ गया। मां ने बंद आंखों के अंदर हंसकर जैसे कहा:‘‘हां, गा दे!’’
अमर के होंठ मुस्कुरा पड़े। फिर उसने गाना याद किया कि कैसे, कहां और क्यों मां ने उसे वह गाना सुनाया था।

तेज बरसात थी। वे गायकोठे की छप्पर के नीचे थे। पानी बहुत देर से गिर रहा था। कोठे के आसपास पानी नदी की तरह बह रहा था। छप्पर के नीचे मां एक नारियल-बूच की रस्सी से बनी झुलंगी खाट पर उसे लेकर  बैठी थी। कोठे के किनारे से पानी धारों धार बह रहा था। छप्पर से भी पानी अंदर छलक रहा था। अमर को ऐसा लगता था छप्पर के ऊपर कोई छुपकर उसपर छींटे मार रहा है। कोई क्या, वही होगी उसकी हमउम्र मेघा गुरट्टी .. मामाजी की लड़की ... जब जब वह आती या जब जब मां के साथ उसके घर जाते तो वह चुपके से उसे किसी भी तरह उकसाकर चली जाती ताकि अमर हरकत में आए, उसे गुरट्टी कहकर चिल्लाए.. गुरट्टी इसलिए कि वह गोरी चिट्टी थी .. अमर गेंहुआ .. वही गुरट्टी (गोरी चिट्टी का संक्षिप्त) जब पानी लेकर चलती तो चुपके से अमर पर छींटे मार देती और सीधी बन जाती।
अमर चिल्लाता ‘‘मारूंगा गुरट्टी!’’
वह कहती:‘‘ देखो न बुआ, मैंने कुछ नहीं किया .. ये जबरदस्ती!’’
तब मामी मेघा को ही कहती:‘‘ हां तू बहुत सीधी है!’’
मेघा तब ‘‘अगर सीधी नहीं हूं तो लो ..’’ ऐसा कहकर अमर पर पूरा गिलास उलटकर भाग जाती।
अमर उसके पीछे दौड़ता -‘‘ठहर गुरट्टी!’’

अमर याद की तेज धाराओं पर तैर ही रहा था कि तभी फिर एक फुहार छप्पर से अमर पर आई। अमर छप्पर की तरफ देखकर जोर से चिल्लाया -‘‘मारूंगा गुरट्टी!’’
मां हंस पड़ी। उसके सिर पर हाथ फेर कर बोली:‘‘बहन की याद आ रही है? मामा के घर जाना है?’’
अमर झेंप गया। ‘‘नहीं, छप्पर से पानी आया न तो ...’’
उसने फिर कोठे के बाहर देखा। पानी और तेजी से बह रहा था। लगता था, बाढ़ आ गईं। फिर उसने उस खाट के नीचे देखा। पानी पैरों को छूने की कोशिश कर रहा था। वह चिल्लाया:‘‘मां! खाट के नीचे पानी!!’’
मां ने निश्चिन्तता से कहा:‘‘नदी पर नाव तुझे अच्छी लगती है न, ले नदी खुद तेरे पास आ गई. ...’’
‘‘और .. नाव?’’‘
‘ये है न अपनी खाट!’’ ऐसा कहकर मां छप-छप पांव ऐसे चलाने लगी जैसे  चप्पू चला रही हो .. अमर ने भी पांव हिलाया पर उसके पैर अभी पानी तक नहीं पहुंचे थे। मां के पांव टखने तक डूबे हुए थे।
घबराकर अमर ने कहा-‘‘मां! नाविक कहां गया....अपने साथ कोई नहीं है, नाव डूब गई तो?’’
‘‘अपने साथ अपना नाविक है न, तुझे नहीं दिख रहा! आंख बंद कर के मेरी छाती से लग जा। वो तुझे दिख जायेगा।’’ फिर मां पैर को पतवार की तरह छप छप चलाकर गाने लगी-‘‘ मोकोे कहांऽऽआं, ढूंढेऽ रेऽऽ बंदे, मैं तो तेरेऽ पाऽऽस में.ऽ...’’
अमर की जब आंख खुली तो बारिश बंद हो चुकी थी। केवल छप्पर से पानी झर रहा था...झरर झरर झरझर

तड़तड़ तड़तड़ तड़तड़
तालियां गूंज उठीं।
अमर की आंख झपझपाकर खुल गईं।




                  ----लेखक के बाल उपन्यास ‘अलिफ जबर पै’ से,