Thursday, April 24, 2014

टोपी :



 राजनीति का मुहावरा या मुहावरे की राजनीति?

बनारस में भगवा टोपी पहननेवालों से पत्रकार ने ये पूछकर कि क्या ‘आपके’ सबसे प्रबल शत्रु की टोपी की नकल करते हुए अपनी टोपी पहनी है?’ टोपी को पुनः चर्चित कर दिया है।।
भगवा कार्यकत्र्ताओं ने जो उत्तर दिया वह बड़ा अटपटा था। उन्होंने अपने वर्तमान शत्रु या प्रतिद्वंद्वी का श्रेय खारिज करते हुए अपने दूसरे ‘ऐतिहासिक शत्रुया प्रतिद्वंद्वी की देन उसे बताया। ‘राष्ट्रपिता’ के रूप में ख्यात गांधी के नाम से ‘एक टोपी’ सत्तर अस्सी के दशक में लोकप्रिय थी, जो  उनके पुरानी विचारधारा वाले प्रायः वयोवृद्ध अनुयायियों ने याद रखा किन्तु नयी लहर के अनुयायियों ने उपेक्षित कर दिया।
आप और बाप के बीच का यह द्वंद्व एक को अस्वीकार करने और दूसरे की लोकप्रियता का लाभ लेने का उपक्रम लगता है। मगर यह भी लगता है कि कार्यकर्ताओं को टोपी के इतिहास का पता नहीं है। उनके प्रायोजित प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को भी इतिहास का कहां पता है? बिहार में विश्वविद्यापीठ आदि अनेक विषयों में इतिहासविषयक भूलें की हैं, अज्ञानता जाहिर की है।
उनके समर्थित दलों और संगठनों में टोपियां ‘दिल्ली में लोकप्रिय हुई टोपी’ के पहले से भी पहनी जाती है।
कांग्रेस के पुरखे एम. के. गांधी उर्फ ‘महात्मा गांधी’ या ‘बापू’ के नाम से विख्यात हुई ‘गांधी टोपी’ का इतिहास भी रोमांचक है। भारत में भारतीय स्वाभिामान की लड़ाई लड़नेवाले एम.के.गांधी को अंग्रेजों की जेलों में यह अनुभव हुआ कि भारतीयों के लिए जेल प्रशासन ने एक विशेष प्रकार की टोपी निर्धारित कर रखी हैं। स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा गांधी ने बाद में उसे अपने संगठन की टोपी बना ली। यही बाद में गांधी टोपी कहलायी।
सुभाषचंद्र बोस की टोपी सैनिक टोपी थी। पूर्व जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की भी अपनी टोपी रही है। बजरंगियों की अपनी टोपी है। समाजवादी दल की अपनी टोपी रही है।
पिछले वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय योग एवं आयुर्वेदिक दवा उद्योग के संस्थापक ने स्वाभिमान और स्वदेशी विचाारधारा को मार्केटिंग की रणनीति के अंतर्गत जब भ्रष्टाचार और विदेशी धन को जन-आंदोलन के रूप में जिन जागृति का कार्यक्रम आरंभ किया और सांप्रदायिक तथा धार्मिक संस्थानों-राजनैतिक दलो को साथ मिलाया तब अवसर देखकर पुराने गांधीवादी सैनिक अन्ना भी मैदान में उतर आए। उनका अनुमान था कि कांग्रेस उनके हर प्रस्ताव पर अमल करेगी और इस तरह वे तीसरे गांधी के रूप में ख्यात हो जाएंगे।
पर परिस्थियां ऐसी नहीं हैं। गांधी के राजनैतिक मानस पुत्रों से एक गांधी नहीं संभलता वे दूसरे और तीसरे गांधी को कहां संभाल पायेंगे? उनके साथ सत्ता की चोट खाए अनेक आई ए एस, आई पी एस, सेना अधिकारी, एडवोकेट आदि जुड़ गए।
उन्होंने जब राजनैतिक दल बनाने की घोषणा की तो पहले गांधी बापू, दूसरे गांधी जयप्रकाश नारायण की तरह तीसरे गांधी अन्ना ने भी राजनीति के समानांतर चलकर किंग मेकर की भूमिका में आने में ही चतुराई समझी। नये भ्रष्टाचार विरोधी राजनैतिक दल का संबंध और जुड़ाव तीसरे गांधी से है यह बताने के लिए उन्होंने अन्ना की गांधी टोपी को सिर पर पहन लिया। यहां यह उल्लेखनीय है कि नये दल से धीरे धीरे दूरियां बनाते हुए अन्ना ने एक और प्रयास किया और सत्ता दल की एक इकाई तृणमूल के माध्यम से पुनः लोकप्रिय होने का प्रयास किया। सत्ता तृणमूल को मूल से हटाना चाहती है ताकि वह ऐसा बरगद न बन जाए का वर्तमान वंशवृक्ष उसके नीचे दब जाए। अतः अन्ना सार्वजनिक रूप से घोषणा करने के बावजूद मुलायम सिंह की तरह तृणमूल से कट गए।
यहां यह उल्लेखनीय है कि नये दल से धीरे धीरे दूरियां बनाते हुए अन्ना ने एक और प्रयास किया और सत्ता दल की एक इकाई तृणमूल के माध्यम से पुनः लोकप्रिय होने का प्रयास किया। सत्ता तृणमूल को मूल से हटाना चाहती है ताकि वह ऐसा बरगद न बन जाए का वर्तमान वंशवृक्ष उसके नीचे दब जाए। अतः अन्ना सार्वजनिक रूप से घोषणा करने के बावजूद मुलायम सिंह की तरह तृणमूल से कट गए।
बहरहाल पिछले विधानसभा चुनावों में दिल्ली में नयी टोपी आम आदमी ने एक नया इतिहास रचा। न बनाने, बनाने और बना कर मिट जाने का। संसदीय चुनावों में जो टोपियों की बहार आयी है वह इसी कारण से है इसे सभी जानते हैं और मीडियावाले भी। राजनैतिक दलों को उल्टे सीधे तर्कों से नकारने का कूटनीतिक विशेषाधिकार प्राप्त है। पर क्या फर्क पड़ता है। जाननेवाले तो सब जानते हैं।
टोपी पहनाना, टोपी उतारना, इसकी टोपी उसके सिर रखना (इसकी टोपी उसके सर) आदि मुहावरों को अब अलग से समझााने की जरूरत नहीं है। इसी के समानांतर एक और मुहावरा है जो राजनैतिक दृष्टि से बहुत उपयुक्त है, वह है पगड़ी उछालना। इसके बिना तो राजनैतिक चुनावी अभियान शुरू ही नहीं होता। शेष सारे मुद्दे तो कहने के लिए हैं एक यही लक्ष्य राजनैतिक दल लेक चलते हैं किन किन की पगड़ी उछालेंगे तो अपनी सलामत रहेगी।
क्या जनता यही सब सुनने और देखने के लिए एकत्र होती है? क्या हमारी सामाजिक मूल प्रवृत्ति यही है कि दो विरोधियों की आपसी गुत्थम गुत्थी, गाली गलौज, निंदा और चरित्र हत्या की नयी नयी कहानियां सुनें और तालियां बजाएं? क्या हमारे समाज के भीतर भी यही सब व्यवस्था है और ऐसे ही मुंहफट और छुतहा को सम्मान दिया जाता है जो दूसरों की पगड़ी उछालता फिरता है या टोपी उतारता रहता है?
सच्चाइयों का इतिहास यह है कि पगड़ी या टोपी पहनाना एक धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था हुआ करती थी। यज्ञोपवीत के साथ सम्मान सूचक पगड़ी पहनायी जाती रही है। विवाह में पागा या पगड़ी का विशेष स्थान रहा है। अब दूल्हे बनी बनाई टोपी या टोपीनुमा पगड़ी पहन लेते हैं। वैसे यहां भी मुहावरा पगड़ी पहनाने या टोपी पहनाने का प्रयोग किया जा सकता है। बिगड़ैल अथवा लापरवाह लड़के लड़की के लिए मां बाप रिश्तेदार या समाज के लोग यही राय देते हैं कि शादी करदो तो अक्ल ठिकाने आ जाएगी। मतलब जिम्मेदारी आ जाएगी। और लड़के या लड़की को टोपी पहना दी जाती है। इस तरह के विवाह जो  अक्ल ठिकाने लगाने के लिए किये जाते हैं उनमें पागा नहीं पहनाया जाता या हाथ पीले नहीं होते बल्कि टोपी पहनायी जाती है। होता वही है कि हाथ पीले होते हैं पागा या टोपी पहनायी जाती है पर आशय इसी मुहावरे के आसपास घूमता है।
पगड़ी, गमछा और टोपी कुटुम्ब के व्यक्ति के मरने पर भी जीवितों के सर पर रखी- पहनायी जाती है कि अब सब आप लोगों की जिम्मेदारी है। या यह कि हमारी सहानुभूति आपके साथ है।
धार्मिक आध्यात्मिक क्षेत्र में पगड़ी या टोपी का अलग महत्व है। सबसे पहले तो धार्मिक आयोजनों में शामिल होने के लिए अधिकांश समुदायों में टोपी अदब और श्रद्धा के प्रतीक के रूप में पहनी जाती है। यहां टोपी पहनी जाती है। न पहनायी जाती है, न उतारी या उछाली जाती है।
राजा महाराजों में टोपी यानी मुकुट पहनाकर सत्ता का हस्तांतरण नये उत्तराधिकारी को किया जाता था। अब कुर्सी हस्तांतरित होती है। टोपी अब सीट के नीचे आ गई है।
बस अब मन भर गया। थोड़ा कहा बहुत समझियेगा।
पुनश्च - जाते जाते एक आखिरी बात। अब तो प्रत्यक्षतः टोपी और पगड़ी रही नहीं। उसके भाव के रूप में इज्जत रह गई है। मगर सावधान वह अपने ही हाथ में है। दूसरे के हाथ में उसे न जाने दें। यानी आपको कोई टोपी न पहना सके। कोई आपकी पगड़ी न उछाल सके। मनोजकुमार गोस्वामी उर्फ मि. भारत की फिल्म शहीद का यह गीत जो प्राण पर फिल्माया गया था, गुनगुनाइए-
‘पगड़ी सम्हाल जट्टा.. पगड़ी सम्हाल ओए....’’ दि. 25.04014

Sunday, April 20, 2014

किन्नर






बात कोई साल भर पहले की है।
मैं शाम की गाड़ी से नैनपुर से बालाघाट लौट रहा हूं। जंगल की रमणीय वादियों का लुत्फ़ लेता हुआ मैं इस कदर खुश हूं जैसे हवाएं अपनी नरम और ठण्डी हथेलियों से मेरा दुलार कर रहीं हों।
नगरवाड़ा से नैरोगेज पैसेन्जर आगे बढ़ी। मैंने देखा कि डिब्बे में एक किन्नर चढ़ गया है। उसकी उम्र कोई बीस पच्चीस की होगी। पुता हुआ चेहरा, लिपस्टिक और मुड़े निचुड़े से सलवार कुर्तें में उसने अपने को आकर्षक बनाने का भरपूर प्रयास किया है। स्लिम होने से इस प्रयास में वह काफ़ी हद तक सफल भी है।
उसने अपने बाल संवारे और अपने बाएं हाथ की उंगलियों में दस दस कि नोट फंसाकर प्रति व्यक्ति दस के हिसाब से वसूली करने लगा। यहां मुझे गरम हवा का पहला झौंका लगा।
अक्सर किन्नर किसी त्यौहार के बाद साल में एक दो बार घर घर उगाही, जिसे सांस्कृतिक तौर पर बिरत कहते हैं, में निकलते हैं। किन्तु पिछले अनेक सालों से ब्राडगेज में पैसों की वसूली का यह जबरिया खेल शुरू हो गया था। हफ्ता वसूली पहले ठेकेदारों के नाम पर हुआ। फिर ठेकेदारों के स्थान पर उनके नुमाइंदे ये काम करने लगे। बाद में उनकी तर्ज पर गुण्डों ने धौंस के दम पर यह काम किया और जैसा कि सुनते हैं और फिल्मों में देखते हैं कि सुरक्षा के नाम पर पुलिसवालों ने हफ्ता वसूलना शुरू किया।
बड़े शहरों से यह बीमारी छोटे कस्बों में फैली और सारा देश इसकी गिरफ्त में आ गया।
किन्नरों का जीवन भी समाज के इसी देय पर चलत रहा है। इस देश में कमजोरों, निर्धनों, दरिद्रों, भिक्षुकों, असहाय, अपाहिजों, वक्त के मारों और प्रकृति के मारों का समाज ऐसे ही मदद कर पुण्य कमाते रहा है।
किन्नर वह स्त्री अथवा पुरुष जिस पर प्रकृति ने पूरा योगदान नहीं किया है। अंधे, लंगड़े, लूले, कोढ़ी, अविकसित हाथ पैरों आदि के साथ साथ अद्धविकसित या अविकसित मनमस्तिष्क वाले लोगों की भांति किन्नर भी विकलांग कोटि के ‘व्यक्ति’ हैं।
कहते हैं प्रकृति किसी को अधूरा या अनाथ नहीं छोड़ती। जिन्हें विकलांग बनाती हैं, उन्हें कोई ना कोई हुनर वह अवश्य दे देती है। ऐसे अनेक उदाहरण समाज में देखने मिल जाते हैं।
किन्नरों ने नाच गाकर समाज की सहानुभूति और दानवृत्ति के माध्यम से अपनी रोजी रोटी चलानी शुरू कर दी। पहले पहले समाज के साथ इनका रवैया बड़ा उत्सववादी रहा। जब जब किसी के घर खुशी का माहौल बनता ये बधाइयां देते और उपहार पाते। शादी विवाह, जन्म के प्रसंग, दीपावली होली आदि के प्रसंगों में लोग हंसी खुशी इन्हें पैसे कपड़े इत्यादि देकर अपनी संभ्राति का परिचय देते।
परन्तु परम्परा और मानवीयता को अक्सर लोभ और मुनाफ़े के लिए कुछ नकारात्मक और नकारा लोगों ने अपना अधिकार समझ लिया तथा जबरिया वसूली को अपना धंधा बना लिया। बाहुबलियों और नकारा लोगों ने मानव-दयालुता को कमाई का जरिया बना लिया और उन्होंने इन ‘विशेष व्यक्तियों (special person ) के माध्यम से अपना नेटवर्क चलाना आरंभ कर दिया। समाज की दया-वर्ग के सरदार हो गए और अपने अपने क्षेत्र हो गए।
पिछले बीस तीस सालों में किन्नरों का संगठन लगातार गतिशील हुआ है। समाज के कतिपय भाव भीरू और धर्मभीरू लोगों ने किन्नरों के बारे में यह धारणा बना रखी है कि यदि इनका दिल दुखाया तो ये श्राप दे देंगे, जो खाली नहीं जाएगा।
इसी भयादोहन के कारण ये हावी हैं। मैं देख रहा था कि बिना ना नुकुर के हर पुरुष चुपचाप दस दस के नोट उस किन्नर को दे रहा था। वह किन्नर स्त्रियों से वसूली नहीं कर रहा था। वह हर युवा पुरुष से हंसी मजाक कर रहा था और रुपये लेकर हाथों में सजा रहा था।
मैंने अपने बगल बैठे लोगों से पूछा:-‘‘आज क्या है? यह किस बात के पैसे ले रहा है?’’
‘‘रोज का काम है साब! हम तो रोज ही देखते हैं।’
‘‘ये अकेला है या टीम है इनकी।’’
‘‘अकेला है। बालाघाट का है। नैनपुर कमाने जाता है। लौटते में उगाही। आना जाना फ्री। ’
‘‘कोई कुछ कहता नहीं?’’
‘‘कौन इनके मुंह लगे? बड़ी ग्रदी गंदी बातें कहते हैं साब! कौन सुने और मन खराब करे।’’
मैंने अनुमान लगाया कि आठ दस डब्बे तो ट्रेन में होते ही है। हर डिब्बे में तीस चालीस पुरुष होते ही होगे। चलिये पच्चीस मान लेते हैं। यानी ढाई सौ रुपये प्रति डिब्बे के हिसाब से दस डिब्बे के ढाई हजार रुपये। यह केवल नैनपुर से बालाघाट के बीच की कमाई है, एक तरफ की, एक ट्रिप की।  यह काम बिना रेलवे कर्मचारियों और आर पीएफ की मिली भगत के संभव नहीं है।
मैंने तय कर लिया कि मैं इसकी तह तक जाउंगा। मेरे साथ उसकी हुज्जत हुई। उसने मेरे साथ बदतमीजी की और अश्लील बातें कही। पर मैं डटा रहा। मैंने उससे कुछ तार्किक बातें जिसका उसने गालियां देकर गला घोंटना चाहा। मगर मेरी बातें कुछ लोगों की समझ में आई और उन्होंने मेरा साथ दिया। इससे उसका साहस कम हुआ।
वह चला तो गया मगर दूर खड़ा बड़बड़ाता रहा। गालियां भी देता रहा। किसी ने उससे बहस नहीं की ना उसे रोका। मुझे लगा अगले स्टेशन में वह अपनी टीम के लोगों को लाएगा। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ।
मैंने दूसरे दिन एक पत्रकार को ये बाते बताईं और उसे हिसाब समझाया। मुझे उम्मीद तो नहीं थी कि इसका कुछ परिणाम निकलेगा मगर दूसरी बार जब मैं फिर सफर में गया तो वह किन्नर नजर नहीं आया। मैंने लोगों से पूछा कि आजकल वह किन्नर नहीं आता क्या? पता चला कि कुछ दिनों से वह दिखाई नहीं दे रहा हैं।
यह मेरे लिए सुखद था। हर यात्री जो नैनपुर से बालाघाट के पन्द्रह रुपये किराया देता है, उसकी यात्रा पच्चीस रुपये प्रति ट्रिप हो गई थी। उसने राहत की सांस ली होगी। मैंने गालियां खाई, मेरे साथ बदसलूकी हुई उसका जो दुख हुआ वह आज राहत बनकर लौट आया था।

आज ही समाचार-पत्र में एक समाचार पढ़ा -‘‘किन्नर परेशान करें तो डायल करें 18002330473’’ यह समाचार अहमदाबाद का है। यह टोलफ्री नम्बर आरपीएफ की ओर से है। आर पी एफ की सीनियर डीएसपी सुमति शांडिल्य ने कहा कि ट्रेन में मुसाफिरों को किन्नरों द्वारा परेशान किए जाने की शिकायत रोजाना मिलती है। विशेषकर अहमदाबाद, मेहसाणा और मुम्बई रूट पर। यात्रियों से जबरदस्ती पैसों की मांग करना और अश्लील हरकतें कई बार विवाद को बढ़ा देती हैं किन्तु जब तक आरपीएफ पहुंचता है वे भाग जाते हैं। इसलिए यह टोल फ्री नम्बर पर समय रहते सूचना मिलती है तो समय रहते किन्नरों को पकड़ा जा सकता है।
यह समाचार सुखद है। उम्मीद है आरपीएफ और रेलवे कर्मचारी अपने यात्रियों के हित में मुस्तैदी से इस योजना को क्रियान्वित करेगे और किन्नरों से भी आशा की जा सकती है कि जिस समाज ने भावनात्मकता के कारण उसकी मदद का बीड़ा उठा रखा है उसके साथ वे बदसलूक़ी नहीं करेंगे।


दिनांक: 20.04.14, रविवार

Tuesday, April 15, 2014

मोरारी बापू का अहिंसा आन्दोलन


मोरारी बापू राम कथा के सबसे अधिक सुने और चाहे जानेवाले कथा-गायक हैं। निम्बार्क पंथ से उनका संबंध है और काले टीके के साथ काली कंबली उनकी पहचान है। पर यह काला टीका और काली कंबली उनकी शुभ्रता को कम नहीं करती बल्कि अधिक उजागर कर देती है। उनके परिधान में जो शुभ्रता है, वह उन्हें धार्मिक उन्माद से परे एक सौहार्द्र पूर्ण भक्ति आंदोलन का साधक और प्रवर्तक बना देती है।
बापू राम के समन्वयवादी स्वरूप के गायक हैं। यही वह बीज है जिसे महात्मा गांधी ने धर्म की मिट्टी में बोया और उससे अहिंसा की फसल ली। बापू इसी परम्परा को सर्वत्र बिखेरते चलते हैं। यद्यपि उन्होंने रामकथा का गुरुमंत्र अपने दादा से प्राप्त किया किन्तु रामकथा गायन में रामभक्त हनुमान उनके मार्गदर्शक परम गुरु और संरक्षक हैं। हनुमान जयंती के अवसर पर प्रत्येक वर्ष वे अस्मिता पर्व का आयोजन करते हैं और साहित्य, संगीत, नृत्य, गायन, अभिनय आदि विविध कला क्षेत्रों के शीर्ष व्यक्तित्वों को आमंत्रित कर उनकी प्रतिभा का प्रदर्शन करते है और उनका सम्मान करते हैं। इस आयोजन में मोरारी बापू केवल उत्सवधर्मिता नहीं दिखाते बल्कि उनकी वैचारिकता और चिन्तन के दर्शन भी सहज ही हो जाते हैं। वे निस्संदेह केवल प्रवचनकत्र्ता का धर्म नहीं निभाते बल्कि स्वयं अपनी कथ्य या विचारधारा पर नया क्रांतिकारी कदम उठाकर दिखाते हैं।
इस बार भी उन्होंने ऐसा ही किया। चारों तरफ़ जब अपनी अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए मार काट उठापटक और हिंसात्मक गतिविधियां, धार्मिक अपराधीकरण का उन्माद अपने चरम पर है वहीं मोरारी बापू अपने आराध्यों के हाथों से हिन्सा के सारे अस्त्र छीनकर उनमें लालित्य और प्रेम के उपकरण थमा रहे हैं। हनुमान जयंति के आयोजन की समाप्ति पर अपना प्रबोधन देते हुए मोरारी बापू ने एक उद्घोषणा की कि वे सर्वसमर्थ हनुमान को उनके जन्मदिन पर कुछ भेंट करना चाहते हैं। उनसे कुछ लेना भी चाहते हैं। भरत ने अपने भ्राता और आराध्य से उनकी चरण पादुकाएं ली थीं। मोरारी बापू ने हनुमान से उनका प्रिय शस्त्र मुदगर, उनकी गदा लेली। कुछ चैंकानेवाले अंदाज में। जहां तूम्बा होता है वहां मुदगर या गदा के प्रहारक गोलक था और जो मुख्य दण्ड होता है वह सितार थी। यह निश्चित रूप उनकी अहिंसा दृष्टि का रोमांचक पहलू था जिसे सभी उपस्थित समुदाय ने उमंग के साथ स्वीकार किया।
बापू ने कहा कि जो गदा हनुमान जी के दायें पक्ष में रखी हुई वह अत्यधिक भारी है और उसे हटाने में समय और श्रम लगेगा अतः अभी प्रतीकात्मक गदा को हटाया गया है किन्तु अगले दिन हनुमान जी सितार के साथ दिखेंगे गदा के साथ नहीं। यह मोरारी बापू के व्यक्तित्व का आंतरिक पक्ष था जिसमें उनके जीवन के तीन सूत्र सत्य, प्रेम और करुणा के की झलक आज दिखाई दी।
निश्चित रूप से बापू अपनी कथाओं और अपने आयोजनों में इस देश की धर्मप्राण किन्तु सहिष्णु स्नेहिल जनता को एक उदात्त और उदार दृष्टि दे रहे हैं। केवल पुरातन का पृष्ठपोषण ही नहीं कर रहे बल्कि जिस सहअस्तित्वपूर्ण सौहार्द्र के वातारण का सपना वे कर रहे, उसे साकार भी करते चल रहे हैं।
उन्हीं के माध्यम से पता चला कि पिछली कथाओं में उन्होंने अपने आराध्य राम के हाथों से तीर और धनुष तथा कंधे से धनुष उतार दिया था। प्रेम देवो भव का नारा देने वाला अहिंसा का गायक अपने इष्ट के पास अस्त्र और शस्त्र कैसे देख सकता है। भारत की संस्कृति और परम्परा ने तो महाभारत के सूत्रधार श्रीकृष्ण के हाथों से चक्र और अस्त्र शस्त्र पहले ही हटा दिये थे और प्रेम की धुन बजानेवाली बांसुरी वहां थमा दी थी।
बापू ने इस रोमांचक और क्रांतिकारी अवसर पर एक और सपने की घोषणा की कि  रणभूमि में अर्जुन की ध्वजा में बैठे हनुमान जी को उतारकर धरा पर लाना है। रामकथा के सतत श्रोता और संरक्षक का युद्ध की पताका में बैठने का क्या औचित्य? बापू की इस अहिंसा दृष्टि का भी अभिनंदन।

दि. 15.04.14, हनुमान जयंती, मंगलवार

Monday, April 14, 2014


3.पूर्वकथा 2.
मृत्युंजय का अर्थ शाब्दिक दृष्टि से मृ्त्यु पर जय प्राप्त करना हो सकता है।
केवल महादेव या शिव ने इस असंभव को संभव कर दिखाया था ऐसी आस्थामूलक कहानी हम सुनते आ रहे हैं। वह श्मशान में रहते हैं। ऐसी जगह रहने के कारण उस बस्ती के बाकी नागरिक भूत, पिशाच, प्रेत, जिन्न वगैरह उनके मित्र, सखा, संबंधी आदि हो गए होंगे। इसमें आश्चर्य कैसा?
भाई युक्तेश राठौर तो स्वर्गवासी हुए, किन्तु उनके सौजन्य से हम ऐसी ही जगह पहुंच गए हैं। परन्तु कोई हमें मृत्युंजय नहीं कहेगा। हम यहां कोई बसने थोड़े ही आए हैैं। युक्तेश भाई की शेष देह को फूंकने आए हैं। शंकर महाकाल के लिए राख उपलब्ध कराने। 
इसे ही कहते है- मृत्युंजय साधना, जो हमने तीन चरणों में पार करनी है। दो हो गए, यह तीसरी और अंतिम है।
इसके बाद होगी आनंद-साधना। वहां न दुख है न क्लेश। न भय है घबराहट। बस अखंड मौज है। पर इस तीसरे के बाद। तीसरे चरण के बाद....पहले चरण में भाई जी मरे, शवयात्रा की तैयारी हुई, दूसरे में उनकी अरथी निकली यानी शवयात्रा और उसके संभावित फायदे।
तीसरा यह दाहकर्म, यह अग्निसंस्कार, अब जहां वे राख हो जाएंगे...
लीजिए, प्रस्तुत है ‘शवगाथा’ का यह अंतिम पुष्प.... 3. मृत्युंजय घाट।

3 मृत्युंजय घाट

इस तरह शालीनता से चलते हुए हम मृत्युंजय घाट के रमणीय पर्यावरण से घिरे परिसर में प्रविष्ट हुए। बैनगंगा के किनारे बने बागीचे में महाकाल म्त्युंजय की भव्य चित्ताकर्षक प्रतिमा और शिवलिंग तथा बैठे हुए नंदी (बैल) सहित विराजमान है। तरह तरह के फूल खिले हुए हंै। माली पाइप से पानी सींच रहा है। काफी बड़े क्षेत्र में फैले इस घाट को दूर से देखकर सागौन-उद्यान का आभास होता है। कतार में ऊगे हुए सागौन के पेड़ सुस्मिता सेन, युक्तामुखी, दीपिका पादुकोण, मौली दवे आदि लंबी उर्वसियों की तरह खड़े दिखाई दे रहे हैं। अप्रेल महीने ने उन पेड़ों से पत्ते इस तरह छीन लिए है, जैसे मार्च के बजट रूपी दुश्शासन ने आम लोगों की तरह निरीह द्रौपदी के तन से कपड़े। हालांकि विश्वसुंदरियां के लिए अप्रेल या बजट का बहाना कोई अर्थ नहीं रखता क्योंकि विश्वसुन्दरी बनने के रास्ते में, सुना है, एक राउंड कपड़े उतारने का भी होता है। यह और बात है कि जीतने के लिए उतारे गए ये कपड़े बाद में पैसों के लिए उतरते रहते हैं।
मैं विश्वसुंदरियों से ध्यान से हटाता हूं तो ध्यान आता है कि कपड़े तो मरे हुए व्यक्ति के भी उतर जाते हैं। गीता में कहा गया है-वासांसि जीर्णाणि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णानि अन्यानि संयाति नवानि देही। 22.2.35
( हिन्दी रू वस्त्र पुराने बदलकर, नये पहनते लोग।
  काया जर्जर छोड़कर, अन्य ग्रहण सुनियोग।)
कबीर ने भी कहा - जो पहिरा सौ फाटिसी, नाव धरया सो जाई।
    कबिरा सोई तत्त गहि, जो गुर दिया बताई।।
पहरे हुए कपड़े पुराने होते और फटते ही है। फट जाने पर बदल लेने की परम्परा भी पुरानी है।
केंचुली या कांचुलिया की तरह भी कबीर ने आवरण उतारने की बात कही और समझाई है। कहते हैं कबीर
कबीर काहां गरबियौ, देही देखि सुरंग।
बीछड़िया मिलिबौ नहीं, ज्यूं कांचली भुवंग।
राठौर भाई उतारी हुई कांचली की तरह पड़े हैं। कांचली उतारनेवाला चला गया है। मैं पड़े हुए शव को देखता हूं जो अपे्रल में भी श्वेतवस्त्र धारण किए हुए है। इस श्वेतवस्त्र को हिन्दी में शवस्त्राण और उर्दू में कफन कहते हैं।
श्वेतवस्त्रावृत्त शव को कंक्रीट के बने तीन दाह-मंडपों में से एक के नीचे छाया में रख दिया गया है। शवयात्री भी तीनों मंडपों में, जहां छाया मिली वहां जाकर खड़े हुए हैं। घाट से लगी हुई बस्ती में रेखा का कोई भक्त जोर जोर से ‘उमराव जान’ का यह भजन बजा रहा है-
इस अंजुमन में आपको आना है बार बार।
दीवारोदर को गौर से पहचान लीजिए।
दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए।
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए।
‘जान’ ले लेने वाला यह भजन इस माहौल को गरिमा और अर्थ प्रदान कर रहा है। मैं देख रहा हूं - कुछ लोग गोबर के उपले (कंडों) से ‘चिता’ बनाने लगे हैं। उपले या कंडों की संख्या ढाई तीन हजार से ऊपर होगी। कांक्रीट के तीन मंडपों में से प्रत्येक में तीन-तीन दाह-स्थल हैं। पहले मंडप के पहले दाहस्थल पर हमारा शव रखा हुआ है। हमारा शव से मतलब हम जिस शव को हम लेकर आए हैं, वह रखा हुआ है। इस शव के पास लकड़ी का ढेर नहीं है। केवल उपले ही उपले हैं। लकड़ी का ढेर किसी दूसरे मंडप के नीचे लगा है। कोई दूसरा शव भी आनेवाला होगा। एक मंडप के नीचे उपलो की राख, उठावने की प्रतीक्षा में है।
मैं लकड़ियों के ढेर को देखता हूं। वे सब टाल से खरीदी हुई जलाऊ लकड़ियां हैं। उनमें चंदन की एक भी लकड़ी नहीं है। मुझे लगता है इन लकड़ियों को देखकर सागौन के पेड़ कुलीनता के गर्व से भर रहे होंगे। सागौन की लकड़ियां इमारती कहलाती हैं और भारत सरकार ने उनका राष्ट्रीयकरण किया हुआ है।  कोई भी उन्हें न तो काट सकता है न जला सकता है। जलाए जानेवाली जगह में सागौन का प्लान्टेशन किस प्लान से किया गया है? क्या यह बताने के लिए कि बनना है तो सागौन के पेड़ बनो ताकि कोई तुम्हें न काट सके, न जला सके। वाह! मृत्युंजय घाट की यह अमृत-कल्पना मुझे प्रभावित करती है। मैं सोचता हूं अगर आदमी भी सागौन का पेड़ होता तो मृत्यु उसे काट नहीं सकती। कोई उसे फिर कैसे जलाता? नैनं दहति पावकः का नियम फिर आत्मा के साथ साथ शरीर को भी लागू होता।
पर जीवन ध्रुव सत्य है तो मृत्यु भी ध्रुुव सत्य है। ऐसा सोचकर, मरे हुए की चिता-निर्माण के अंतराल को पाटने के लिए मैं भी एक मंडप के नीचे छाया टटोलकर बैठ गया। और भी लोग बैठे थे। सब शहर के नामी गिरामी लोग थे। वे सब जिन्दा थे और शहर के मरे हुए नामी गिरामी लोगों की म्त्यु-प्रसिद्धियों की चर्चा कर रहे थे। किस किस कांड में कौन कौन था और किस किस प्रकार गया, इसका इतिहास-पाठ कर रहे थे। मेरे लिए यह सब रोचक था क्योंकि मैं कह चुका हूं कि शहर में मैं नया हूं।
सभी प्रकार की म्त्यु और सभी प्रकार से मरनेवालो की कथा का समापन संभव नहीं जान पड़ रहा था। हरि कथा की भांति म्त्यु कथा भी अनंत होती जा रही थी कि चिता धू धू कर जलने लगी। हम लोग उठकर चिता के कुछ दूर खड़े हो गए। सबने कंडे के छोटे छोटे टुकड़े उठा लिये थे। जलती हुई चिता पर समय आनेपर फेंकेंगे। जहां लकड़ी सेें जलाने की प्रथा है वहां लकड़ी के तिनके उठाकर हथेली में रख लेते हैं।इन तिनकों को ‘पंचलकड़ी’ कहते हैं। पंचों ने मिलकर जलाया का सामाजिक भाव इस प्रथा में जुड़ा हुआ है। हमारे हाथों में कंडे के टुकड़े ‘पंचकंड’े के रूप में थे। हाथ में कंडे लेने ही से तो कहीं ‘हथकंडे’ शब्द नहीं बना? मेरे भाषाविद् को मरघट में भी भाषा की व्युत्पत्ति सूझी। मैंने झट उधर से ध्यान हटाया और जलती हुई चिता पर लगा दिया। कबीर ने ऐसी ही किसी चिता को जलते देखकर लिखा था-
हाड़ जले जस लाकड़ी, केस जले जस घास।
  सब जग जलता देखकर हुआ कबीर उदास।।
कबीर संवेदनशील थे। कभी हंसते थे, कभी रोते थे, कभी उदास होते थे। वे मरघट में जलते हुए मुर्दे को देखकर भी कविता लिखते थे। इसलिए कहते हैं कि अद्भुत थे कबीर।
अंत्येष्टि की क्रिया का अंतिम दृश्य उपस्थित हो गया है। जिस बांस से अर्थी बनी थी उसके एक बांस को ऐंचवेंचकर खींचकर निकाल लिया गया है। उसके एक सिरे को फाड़ लिया गया और उसमें एक लोटा फंसाकर बांध दिया। उसमें शुद्ध घी यानी देसी घी भर दिया गया। देशी घी इस समय चार सौ रुपये किलो चल रहा है। एक किलो घी लोटे में आ गया होगा। जो अपने होते है, वे मरने वाले के पीछे पैसों की गिनती नहीं करते। मैं शवयात्री हूं और बाहरी हूं, इसलिए घी का रेट मुझे याद आ सकता है।
घी ठीक जलते हुए मुर्दे के सिर के ऊपर उड़ेल दिया गया। यह कपाल क्रिया है। इसके साथ ही अंत्येष्टि क्रिया के समस्त कर्म पूरे हो गए। अब शवयात्री जाकर बैन गंगा में  नहा सकते हैं। इसे गंगास्नान कहते हैं। यानी अभी तक का जो दायित्व था, वह हमने पूरा किया और गंगा नहा लिया। किसी शवयात्री ने ही दायित्व-मुक्ति के लिए ‘गंगा नहा लेना’ मुहावरा बनाया होगा।
मैंने बैनगंगा की तरफ देखा। नंगे और लंबे सागौन के पेड़ों के पीछे बैनगंगा बहुत ही दुबली और छरहरी दिखाई दे रही थी। जगह जगह चट्टानें चेहरे की हड्डियों की तरह उभर आयीं थीं। दूर तक रेत पिचके हुए पेट से चिपकी हुई पीली खाल की तरह लग रही थी। उनमें से भी चट्टानों के सिरे उभरकर निकली हुई पसलियों की तरह दिख रहे थे। धार धार बहता हुआ पानी मुझे रोती हुई बैनगंगा के आंसुओं के रेलों की तरह लगा। किन्तु एक रसिक की तरह करुणा की मूर्ति गौरांग बैनगंगा मुझे अच्ठी लगी। जैसे कालिदास के मुंह से व्याघ्र वाण से बिंधे क्रौंच पक्षी को देखकर कविता निकली थी, वही हालत मेरी हुई। यह मुक्तक सहसा मेरे मन में बह निकला-
      चलाचल, चल चल सदा कहती हुई अच्छी लगी।
छरहरी सी इक नदी बहती हुई अच्छी लगी।
सारे पत्ते झर गए पीपल समूचा ठूँठ था,
छाँह चुटकी भर सही, रहती हुई अच्छी लगी। (26.04.12)

उधर एक आदमी सभी शवयात्रियों को एकत्रकर शोक व्याख्यान देने लग गया था। वह लच्छेदार शैली में राठौर भाई के चले जाने से स्तब्ध था। यह आदमी सोलह साल के लड़के के मरने पर भी स्तब्ध हो जाता है और सौ साल के उम्रदराज के मरने पर भी। उसे हमेशा लगता है कि हम सोच भी नहीं सकते थे कि फलां हमें इस तरह छोड़कर चले जाएंगे। पता नहीं वह किस तरह से छोड़कर चले जाने की प्रतीक्षा में रहता है। शोक व्याख्यान उसका पेशा है। व्याख्यान में वह कविताएं भी सुना रहा है जो इतनी तोड़ मरोड़ दी गई कि दौड़ दौड़कर चिता में कूद कूद कर कह रही हैं- ‘लौट आओ राठौर भाई, वर्ना यह आदमी हमारी जाने और क्या दुर्गत करे।’
वक्ता जब जी भर कर बोल लिया तो कुछ भूतपूर्व विधायक, नगरपालिका अध्यक्ष, पार्षद, प्रसिद्ध व्याापारी आदि भी बोले। बाकी सब घर जाने को उतावले थे। धूप अलग चढ़ रही थी। सब धीरे धीेरे ‘बस करो बस करो’ कह रहे थे। पर होनी को कौन रोक सकता है। वह अपनी करके ही रुकती है।
आखिर एक मिनट का मौन रखकर जेल से छूटे कैदियों की तरह सब घर की तरफ भागे। इस भगदड़ में किसी को गंगा नहाने का होश ही नहीं रहा। या सोचा होगा हमेशा नहाते हैं, आज नहीं ही सही।
मैंने देखा कि इस सब से बेखबर धूप सर पर चढ़ चुकी थी। हम अनियंत्रित गति से घर लौटने लगे। बड़ी जल्दी भूल गए कि अभी श्मशान से लौट ही रहे हैं और गली-गली से होकर गुजर रहे हैं। जरा संभलकर चलें। इति....(केवल इस आलेख की।)


अगले आकर्षण हैं-
1. बाल की खाल
2. सूर्य का गणितीय वाणिज्यिक अनुष्ठान। (डायरी से)
3. तुम मुझे यू भुला न पाओगे। (डायरी से)
4. भगवान होने की सुविधा और असुविधा, आदमी की दुविधा (डायरी से)