Monday, August 12, 2013

और अंतिम रस है- वात्सल्य-रस:



बाल कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान के विशेष संदर्भ में 
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कभी कभी और प्रायः सोचता हूं कि मीठा अंत में क्यों परोसा जाता है? समारोह का अध्यक्ष आख़री में क्यों बोलता है? प्रथम विजेता की घोषणा अंत में ही क्यों की जाती है? सबसे ज्यादा और  प्रभावशाली कवि को बाद में ही क्यों प्रस्तुत किया जाता है? नव-रसों में श्रृंगार को पहला स्थान क्यों दिया गया तथा औचकदन कूद पड़नेवाले वात्सल्य रस को दसवें रस के रूप में क्यों दिया गया?
यदि इन सब सवालों से बचकानापन टपक रहा है तो टपक रहा है। इस बचकानेपन को छोड़ पाना या इससे अलग हो पाना संभव होता तो ‘झांसी की रानी’ के गौरव का गान करनेवाली कवयित्री सुभद्राकुमारी चैहान का मातृत्व कभी ‘कदंब के पेड़’, कोयल, खिलौनेवाला और धूप और पानी जैसे कालजयी बाल-गीतों की तरफ़ नहीं मुड़ा होता।
मेरा बचपन जिस बालगीत को ‘मां की आरती’ की तरह गाकर तृप्त होता रहा है, वह हर बच्चे की तरह मेरा अपना आत्मीय गीत बनकर दिल में रच-पच गया था। यह बहुत बाद में मुझे पता चला कि वह गीत ‘झांसी की रानी’ गानेवाली तथा ‘वीरों का कैसा हो वसंत’ सिखानेवाली स्वतंत्रता-समर की वीरांगना कवयित्री सुभद्राकुमारी चैहान का ही है।
  सुभद्राकुमारी चैहान के पारिवारिक सामाजिक और राष्ट्रीय संस्कार वीरता के थे। उनके बालमन पर भारतीय औदार्य और परहित मुलक धार्मिक नैतिक सिद्धांतों का इतना प्रभाव था कि नौ वर्ष की बाल्यावस्था में उन्हांेने ‘नीम’ जैसे कड़वे पेड़ पर गीत लिखा तो उसमें उदारता, सहिष्णुता, परोपकार आदि के सामाजिक सुगंधित फूल और मीठे फल लद गए।वे अपने पहले गीत में ही उनकी सामाजिक बानगी की देखें-  
नीम
हे नीम! यद्यपि तू कड़ू, नहिं रंच-मात्र मिठास है।
उपकार करना दूसरों का, गुण तिहारे पास है।
नहिं रंच-मात्र सुवास है, नहिं फूलती सुंदर कली।
कड़ुवे फलों अरु फूल में तू सर्वदा फूली-फली।
तू सर्वगुणसंपन्न है, तू जीव-हितकारी बड़ी।
तू दुःखहारी है प्रिये! तू लाभकारी है बड़ी।
$$$
जब तक रहें नभ, चंद्र-तारे सूर्य का परकास हो।
तब तक हमारे देश में तुम सर्वदा फूला करो।
निज वायु शीतल से पथिक-जन का हृदय शीतल करो।
नीम से आरंभ करनेवाली यही बालिका कोयल जैसी मीठी चिड़िया पर भी लिखती है-
कोयल

देखो कोयल काली है पर
मीठी है इसकी बोली
इसने ही तो कूक कूक कर
आमों में मिश्री घोली
$$
कोयल यह मिठास क्या तुमने
अपनी माँ से पायी है?
माँ ने ही क्या तुमको मीठी
बोली यह सिखलायी है?
डाल डाल पर उड़ना गाना
जिसने तुम्हें सिखाया है
‘सबसे मीठे मीठे बोलो’’
यह भी तुम्हें बताया है
बहुत भली हो तुमने माँ की
बात सदा ही है मानी
इसीलिये तो तुम कहलाती
हो सब चिड़ियों की रानी।
अपने अंदर के उभरते रचनाकार के परिमार्जन के लिए ‘कोयल बोलो तो’ तथा ‘एक पुष्प की अभिलाषा’ जैसे स्वतंत्रता और राष्ट्रीयता से भरे गीतो के लिए विख्यात ‘‘एक भारतीय आत्मा’ दादा माखनलाल चतुर्वेदी के पास सुभद्रा जी ने अपने गीत पहुंचाए तो दादा ने उनके अंदर के मातृत्व को पहचान लिया। उन्होंने सलाह दी कि यदि वे अपने मातृत्व को अपनी रचनाओं में उडे़ंलती है तो वे रचनाएं ज्यादा प्रभावशाली होंगी। परिणाम सामने था ‘‘कदंब के पेड़’’ के रूप में जो तत्कालीन बाल पाठ्यक्रमों में सम्मिलित हुआ और बच्चे बच्चे के हृदय में आज भी गूंज रहा है।
यह कदम्ब का पेड़
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे।।
ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली।
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली।।

तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता।
उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता।।
वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता।
अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता।।

बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता।
माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता।।
आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे।
ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे।।

तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता।
और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता।।
तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती।
जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं।।

इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे।
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।।

यह वह गीत है जो आज भी याद दिलाता है कि कोई बच्चा उहापोहों से भरी गहन यमुना के
किनारे खड़ें किसी कदंब पर छुपा बैठा है और अपने गए हुए बचपन को वात्सल्य की बांसुरी
बजाकर मां की तरह बुला रहा है।
मातृत्व सुभद्रा जी अन्यतम पहचान है। यही कारण है उनकी बाल कविताओं में मां सदैव उपस्थित
रहती है। मां से संवाद करती  उपर्युक्त कविता के साथ साथ कोयल में मां की महिमा का वर्णन हम देख
ही आए हैं। बच्चों के बालमन में मां जिस तरह स्थापित होती है उसका अद्भुत चित्रण अत्यंत प्रभावशाली
है-
कोयल यह मिठास क्या तुमने
अपनी माँ से पायी है?
माँ ने ही क्या तुमको मीठी
बोली यह सिखलायी है?
डाल डाल पर उड़ना गाना
जिसने तुम्हें सिखाया है
‘सबसे मीठे मीठे बोलो’’
यह भी तुम्हें बताया है
बहुत भली हो तुमने माँ की
बात सदा ही है मानी
इसीलिये तो तुम कहलाती
हो सब चिड़ियों की रानी।
शिक्षाशास्त्र और मनोविज्ञान में मां को प्रथम गुरु का स्थान प्राप्त है। उसका समर्थन यहां देखा जा सकता है और मां के प्रति सुभद्राजी के आत्मीय आग्रह और लगाव को भी अनुभूत किया जा सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं है केवल कोमल और मीठे कोयल के गीतों में ही मां सिखावन बनी हुई है, जहां बच्चों के प्रिय खिलौनों पर भी सुभद्राकुमारी गीत लिखती है तो मां वहां भी परिदृष्य से अदृष्य नहीं होती। हो भी नहीं सकती क्योंकि बचपन और मातृत्व तो अव्ययी हैं।
खिलौनेवाला कविता में बच्चा मां को संबोधित करते हुए कहता है-

वह देखो माँ आज
खिलौनेवाला फिर से आया है।
कई तरह के सुंदर-सुंदर
नए खिलौने लाया है।

हरा-हरा तोता पिंजड़े में,
गेंद एक पैसे वाली
छोटी सी मोटर गाड़ी है
सर-सर-सर चलने वाली।
सीटी भी है कई तरह की
कई तरह के सुंदर खेल
चाभी भर देने से भक-भक
करती चलने वाली रेल।
गुड़िया भी है बहुत भली-सी
पहने कानों में बाली
छोटा-सा ‘टी सेट’ है
छोटे-छोटे हैं लोटा थाली।

छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं
हैं छोटी-छोटी तलवार
‘नए खिलौने ले लो भैया
जोर-जोर वह रहा पुकार।’

मुन्नू ने गुड़िया ले ली है
मोहन ने मोटर गाड़ी
मचल-मचल सरला कहती है
माँ से लेने को साड़ी
कभी खिलौनेवाला भी माँ
क्या साड़ी ले आता है।
साड़ी तो वह कपड़े वाला
कभी-कभी दे जाता है

अम्मा तुमने तो लाकर के
मुझे दे दिए पैसे चार
कौन खिलौने लेता हूँ मैं
तुम भी मन में करो विचार।

बालमनोविज्ञान का उपयोग करते हुए कवयित्री इस गीत को उद्देश्यमूलक बनाने का उद्यम करती है। बच्चे से वे कहलवाती है-

तुम सोचोगी मैं ले लूँगा।
तोता, बिल्ली, मोटर, रेल
पर माँ, यह मैं कभी न लूँगा
ये तो हैं बच्चों के खेल।

मैं तो तलवार खरीदूँगा माँ
या मैं लूँगा तीर-कमान
जंगल में जा, किसी ताड़का
को मारुँगा राम समान।
और उनका मातृत्व संस्कृति का तड़का लगाना भी नहीं भूलता-
यही रहूँगा, कौशल्या मैं
तुमको यही बनाऊँगा।
तुम कह दोगी वन जाने को
हँसते-हँसते जाऊँगा।
फिर वे सहज ही यथार्थ के धरातल पर आ जाती है और मां के बिना बच्चे के भय को भी रेखांकित करती है, मां के महत्व की स्थापना के साथ साथ-
 पर माँ, बिना तुम्हारे वन में
मैं कैसे रह पाऊँगा।
दिन भर घूमूँगा जंगल में
लौट कहाँ पर आऊँगा।
किससे लूँगा पैसे, रूठूँगा
तो कौन मना लेगा?
कौन प्यार से बिठा गोद में
मनचाही चींजे देगा?

रवीन्द्रनाथ टैगौर की कहानी ‘काबुलीवाला’, भगवतीचरणवर्मा की ‘मिठाईवाला’ और जयशंकर के ‘छोटा जादूगर’ के प्रभाव के बरअक्श सुभद्राजी ने स्वयं ‘हींगवाला’ लिखकर जहां वात्सल्य में राष्ट्र हित को जोड़ा वहीं प्रेमचंद की कहानी ‘‘ईदगाह’ के हमीद के समानान्तर बच्चे के बालमन की सरल महत्वाकांक्षा को शब्द प्रदान किये और वात्सल्य को स्थापित किया।
 मां के महत्व या वात्सल्य को उन्होंने अपनी कविता ‘मेरा बचपन’ में और भी अधिक व्याख्यायित किया है। मा और बेटी के अंतर्संबंधों, युवावस्था के सापेक्ष बचपन के महत्व आदि पर कवयित्री की सतर्क दृष्टि ठहरी हुई है-

मेरा बचपन
बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी
चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?
ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी
रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।
बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे
मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।
झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया
वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।
लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई
$$$
माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है।
आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहनेवाला है
किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।
चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना
आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति।
व्याकुल व्यथा मिटानेवाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति
वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप।
क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?
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मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।
नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी
‘माँ ओ’ कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आयी थी।
कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लायी थी
पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा।
मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा
पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया
मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ।
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ
जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया।
भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया।

भावनाओं के सूक्ष्म और स्वाभाविक चितेरे महाकवि सूरदास के उलाहना-संग्रह ‘भ्रमरगीत’ के समकक्ष ही उनका वात्सल्य-चित्रण चलता है। यही से जो वात्सल्य की मंदाकिनी बही, वह बहती हुई सुभद्रा जी की लेखनी से फूट कर प्लावित हो गई। हम समझ सकते हैं कि कैसे सूरदास और सुभद्रा की दृष्टि से वात्सल्य-रस, राग-भैरवी की भांति संगीत-समारोह की अंतिम प्रस्तुति बनकर स्थापित हो जाता है।


0 डाॅ. रा. रामकुमार, हिन्दी विभाग, शासकीय जटाशंकर स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बालाघाट। म.प्र.।  
             

Monday, August 5, 2013

नागपंचमी

नागपंचमी त्यौहार हमारी ‘सांस्कृतिक विरासतों में एक’ प्रतिनिधि-त्यौहार है। विदेशों में भारत ‘संपेरों के देश’ के रूप में जाना जाता है। ऐनाकोंडा और कोब्रा जैसे ख़तरनाक सांपों को विदेशी महत्व का समझा जाता है लेकिन ‘नागलोक’ को भारत का ही पर्याय माना जाता है। मैं कैसे भूल सकता हूं कि हमारी पाठशालाओं में पहला महत्वपूर्ण आयोजन ‘नागपंचमी’ का ही होता था। हम अपनी पत्थर की स्लेटों पर खड़िया की शलाकाओं से ‘नाग-देवता’ यानी ‘ंिकंग-कोबरा’ की आकृति बनाते थे, जिसमें हमारे अभिभावक योगदान करते थे और फिर उसे हम स्कूलों में ले जाते थे। वहां सारे स्लेटी नागों की सामूहिक पूजा होती थी और हमारे पैसों को इकट्ठा करके बुलवाए गए पानीवाले नारियलों की बलि देकर मीठी चिरौंजी के साथ उसका प्रसाद वितरित किया जाता था। मैंने हमेशा सोचा है और हमेशा सोचता रहूंगा कि नागों की पूजा क्यों? इतने बचपन में क्यों? जबकि विद्या की देवी सरस्वती बतायी जाती हंै और महाविद्यालयों में उसे तब मनाया जाता है, जब वैसी विद्या की आवश्यकता नहीं रहती, जैसी बचपन को चाहिए। महाविद्यालयों में सरस्वती पूजा मौज का त्यौहार है, डिस्को म्यूजिक और चंदे की मौज का त्यौहार। वह पूर्णतः युवकानंद के लिए समर्पित त्यौहार है, जिसमें विद्या का कुछ भी योगदान नहीं है। बच्चों के स्कूलों में भी सांस्कृतिक उत्सव के रूप में उसे युवा शिक्षक-शिक्षिका बच्चों को एकत्र कर मनाते हंै। परन्तु नाग-पंचमी? बच्चों की पाठशालाओं में इसे क्यों मनाया जाता है? विशेष तौर पर ग्रामीण और कस्बाई स्कूलों में इसे धूमधाम से मनाया जाता है। सवाल फिर वही कि क्यों? क्या इसलिए कि भारत की छबि सांपों और संपेरों के देश के रूप में है? हमारे तो प्रतीक और बिंब भी सांप और नाग हैं। भारत के दो प्रतिनिधि राष्ट्रीय सत्तावादी राजनैतिक दलों को राजनीति के समीक्षक ‘एक नागनाथ तो दूसरा सांपनाथ’ के रूप में उल्लेखित करते हैं। साहित्य में सेना से रिटायर्ड एक कवि ने सांपों पर एक कविता लिखी- ‘सांप तुम न सभ्य हुए, न शहरों में रहे, फिर विष कहां पाया? काटना कहां सीखा?’ सापों के देश में यह कविता बहुत प्रसिद्ध हुई। इस कविता से कवि भी एक प्रयोगवादी कवि के रूप में प्रसिद्ध हो गए। अर्थात् सांप किसी देश और उसके प्रयोगधर्मियों की प्रसिद्धि का कारण है। संभवतः यही कारण है कि पाठशालाओं में नाग-पंचमी का उत्सव मनाकर, बच्चों में नागों की पूजा के संस्कार डाले जाते हैं। ग्रामीणी और शहरी इलाक़ों में सांप के विष को झाड़-फूंककर उतारने वालेे ओझा तथा बैगाओं की रैली निकलती है। यह झाड़-फूंक से ठीक हुए लोगों की समापन किस्त होती है। पहलवानों का दंगल भी इसी दिन आयोजित होता है। सांपों और नागों के उत्सव में पहलवानी का क्या औचित्य? बिना हाथ पैर वाले नागों के सामने पहलवानी के दांव-पेंच क्या काम आते होंगे भला? ये बात और है कि भारत जितना सांपों के लिए प्रसिद्ध है, उतना पहलवानों के लिए भी। दारासिंह ने इस कला में विश्व स्तर के कीर्तिमान स्थापित किए। मगर सांप और पहलवानी में कोई समानता नज़र नहीं आती। सांप और पहलवान की सफलताओं का राज़ उनका फुर्तीला होना है। लेकिन एक दूध पीकर अपने देश के लिए कीर्तिमान लाता है। दूसरा दूध पीकर भी विष ही उगलता है। उदाहरणार्थ - प्रेमचंद की प्रसिद्ध कथा ‘मंत्र’ में डा.ॅ चड्ढा के बेटे की कहानी। कहानी तो महाभारत की भी नागों के योगदान पर है। कृष्ण के नाती परीक्षित को तक्षक नाग डसनेवाला है। वेदव्यास परिक्षित के ‘मृत्यु-भय’ को मोक्ष के ‘दिव्य-मनोविज्ञान’ से दूर करने के लिए महाभारत की कथा सुनाते हैं। परिक्षित को आत्मबोघ होता है और वह मृत्यु को वरण करने योग्य हो जाता है। अगर यह सोचकर कि हमारे बच्चों का आगे चलकर कदम-कदम पर तक्षकों से सामना होगा, उन्हें मानसिक रूप से सांपों और नागों के मुक़ाबले तैयार किये जाने के लिए, बचपन की कोरी शिला-पट्टिकाओं पर नागों की आकृतियां बनवाकर नागपंचमी का उत्सव मनाया जा रहा है, तो ठीक है। मगर फिर सवाल अपना फन उठाता है कि ‘नाग-पूजा’ क्यों? अपने अंदर के भय से घबराकर दूसरों पर आक्रमण करनेवाले नागों की पूजा क्यों जो प्रकृति द्वारा आत्मरक्षा के लिए दिए गए ‘हथियार’ का अकारण, अविवेकपूर्वक, बिना सोचे समझे निर्दोषों पर दुरुपयोग करता है। माना कि आतंकवाद, राजनैतिक प्रतिशोध और अपराधवाद, नक्सलवाद, जातिवाद, सांस्कृतिक-संप्रदायवाद, इतिहासवाद, परिवादवाद, सेना और पुलिस का सुरक्षा के नाम पर स्त्रियों पर जुल्म, रुपयों के लिए बिकते न्याय आदि ‘ये सब’ और ‘अन्य अनेक अमानवीय कुकृत्य’ नाग और तक्षकों के प्रतीक हैं, मगर इनसे ‘वोटर-युग’ कीे जंजीरों में जकड़े कमज़ोर बच्चे कैसे लड़ पाएंगे? उन्हें परीक्षित पुत्र जनमेजय के नागयज्ञ की शिक्षा दी जानी चाहिए, जिसमें सारे नाग स्वयमेव आकर भस्म हो जाएं। जनमेजय का ‘नाग-यज्ञ’ एक कथा है, तथ्य नहीं। इसलिए नागपंचमी में नागपूजा सिखाई जाती है। जिनसे जीत नहीं सकत,े उन्हें पूजने लगो। हमारे यहां यही संस्कृति चली आ रही है। यद्यपि नागों की सर्वाधिक उपस्थिति महाभारत-काल में ही हुई है। रामायण काल में संभवतः नागों की संस्कृति उत्पन्न अथवा विकसित नहीं हुई थी। एक दो दृष्टांत ही इस विषय में मिलते है। एक, लक्ष्मण को शेष नाग का अवतार कहा गया है। दूसर,े पाताल-प्रकरण में अहिराज यानी सर्पों के राजा अहिरावण का उल्लेख हुआ है। यहां तक कि हनुमान की मुठभेड़ भी मगरमच्छों की रानी सुरसा से हुई। हनुमान का किसी भयानक नाग से सामना नहीं हुआ। हो भी नहीं सकता था क्योंकि भारतीय पुराणवाद के अनुसार हनुमान स्वयं शंकर के अवतार है। शंकर का कण्ठहार नाग है। बाजुबंद नाग है। जूड़ा का बंधन नाग है। नाग उनके आभूषण हैं। केवल द्वापर में नागों का खूब विकास हुआ। कृष्ण का उनसे अच्छा आमना सामना भी होता रहा। बलभद्र जो उनके बड़े भाई थे, वे स्वयं शेषनाग के अवतार थे। बचपन में एक कालिया नामक काले नाग से उनका संग्राम प्रसिद्ध है। तक्षक और नागयज्ञ का जिक्र हो चुका है। त्रिदेवों में शंकर नागों को गले में डाले घूमते थे तो विष्णु की प्रिय शय्या शेषनाग ही थी। कुलमिलाकर, हमारी संस्कृति ही नाग संस्कृति है। मुझे याद है, मैं जब दसवीं का छात्र था, मेरे एक शिक्षक हुआ करते थे, जो हमें रसायन-शास्त्र और गणित पढ़ाते थे। उनके आतंकवाद से त्रस्त बच्चों ने प्रतिरोध में कुछ किया होगा। उन्होंने एक्स्ट्रा-क्लास के नाम पर सारे बच्चों को घर बुलवाकर एक ही बात कही-‘‘मैं वो नाग हूं, जिसका काटा पानी भी नहीं मांगता।’’ सारे बच्चे समझ गए कि पे्रक्टिकल में आंतरिक वीक्षक के रूप में उन ‘नागराज’ का क्या महत्व है। बच्चों ने उन्हंे तात्कालिक रूप से पूजनीय बना लिया और ‘दोनों’ में दूध पिलाया। दूध पीना और पिलानेवालों को डसना हमारी प्राकृतिक और मनोवैज्ञानिक परम्परा है तथा नागपंचमी का त्यौहार हमारी सांस्कृतिक विरासत। अगले महीने नागपंचमी है। कच्चा दूध नागों को पिलाने और कच्चा नारियल खुद खाने का दिन।

और एक अद्भुत संयोग देखिए। अगला महीना अगस्त है। अगस्त कोई अंग्रेजी महत्व के व्यक्ति रहे होंगे, लेकिन एक ऋषि भी भारत में हुए हैं। उन्होंने विन्ध्याचल का कद छोटा किया था। नागों के मामले में उनके योगदान की कथा मुझे पता नहीं, लेकिन कच्चे घरों में जहां नाग बेखटके आकर आतंक फैला सकते हैं वहां एक पंक्ति लिखी जती है-‘अगस्त मुनी की आन’ अर्थात् तुम्हें अगस्त मुनि की कसम, इससे आग मत बढ़ना। ऐसा माना जाता है, कि हिन्दी पढ़े-लिखे होने से भारतीय नाग, जहां यह लिखा होता है ‘अगस्त मुनि की आन’, उन घरों में प्रवेश नहीं करते। ओह, शायद इसीलिए बच्चों की स्लेटों में नाग होते हैं। वे सरककर बाद में आस्तीनों में चले जाते हैं। जो लोग आस्तीन चढ़ाते हैं, वे शायद अपने अंदर के नागों को सामनेवाले पर छोड़ते हैं कि जा डस ले।
तो कृपया आस्तीनों से सावधान रहें और नागपंचमी की शुभकामनाएं स्वीकार करें। हेल कोबरा!! मंगलवार, 9 जुलाई 2013, प्रातः 9 बजे