Thursday, January 31, 2013

औरत की जात, ( भाग 1)


           दुष्यंतकुमार ने अपनी एक स्वाभिमानी ग़ज़ल में प्रकृति के ‘कार्य कारण संबंधों’ पर हमारे व्यावहारिक कयासों का चित्रण करते हुए लिखा है-
                  कल रात जो फ़ाके में मरा, उसके बारे में,
                  सभी कहतें हैं कि ‘ऐसा नही ऐसा’ हुआ होगा।
                        ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दोहरा हुआ होगा,
                        मैं सजदे में नहीं था आपको धोका हुआ होगा।
          इन दिनों हम बलात्कार के, अपनी अपनी समझ के अनुसार, कारणों के अनुमानों की बौद्धिक चर्चा में व्यस्त हैं और ऐसा समझा जा सकता है कि एक ज़रूरी सामाजिक सरोकार में अपनी हिस्सेदारी कर रहे हैं। ये सवाल हम उन लोगों से कर रहे हैं जो ऐसे प्रकरणों में न तो कभी उलझे और ना ही कभी ऐसे मामलों के चस्मदीद गवाह ही रहे। यह भी विश्वास किया जा सकता है कि इस दिशा में उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा। जबकि जो बलात्कार में जाने अनजाने और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्षतः जुड़े रहे हैं, वे चुपचाप अपना काम कर रहे हैं और इस विषय में वर्षों से कानूनी कवायद कर रहे हैं।
           मैं रक्षा, सुरक्षा और विघि व्यस्था के साथ संलग्न अधिकारियों का ही जिक्र कर रहा हूं। हमारे देश में ही क्या पूरे विश्व में सामूहिक बलात्कार के आपराधिक और राजसत्तात्मक प्रकरण सदियों से घटते रहें हैं और घट रहे है। क्या कारण है जब आक्रमणकारी आततायी किसी देश पर या समूह पर सामूहिक हमला करते हैं तो वे बच्चों, बूढ़ों और वयस्क पुरुषों को तो हलाक कर देते हैं, लेकिन स्त्री के साथ दुष्कर्म के नये नये वहशियाना तरीके ईजाद करते रहते हैं? ऐसा उन देशों की स्त्रियों के साथ भी होता है जो बुर्के और पर्दों में रहती हैं, वहां भी जहां उन्हें देवी की तरह पूजा जाता है और उन देशों में भी होता है, जहां आज़ादी की हर किस्म का औरतें खुले आम उपभोग करती हैं। इसका अर्थ यह है कि बंधन और मुक्ति की हवा का इस कार्य या दुष्कर्म से कोई सीधा संबंध नहीं है। जो बलात्कार कर रहा है वही बता सकता है कि क्यों उसने ऐसा किया और इससे उसके किस उद्देश्य की पूर्ति हुई है? परिस्थितियों की पड़ताल के साथ साथ अपराधियों के मानसिक विश्लेषण का जिम्मेदार प्रयास अत्यंत आवश्यक है।
         जो चीजें सामान्य परिस्थियों में प्राप्त नहीं होती उनकी प्राप्ति के लिए लूट की जाती है, ऐसा समझा गया है। काम से क्रोध उत्पन्न होता है इसका ‘प्रतीत्समुत्पाद’ गीता में कृष्ण ने अर्जुन को बताया है और बुद्ध ने भी अपने अनुयायियों से कहा है।
          गीता कहती है-
                 ध्यायतो विषयान् पुंसः संगस्तेषूपजायते,
                 संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोेभिजायते।
                 क्रोधात् भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः
                 स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणस्यसि। 62-63/ अध्याय 2
        ‘कारणकार्य’ का निर्धारण करते हुए कृष्ण/गीताकार कहते हैं कि विषयों का ध्यान करने से उसकी आसक्ति होती है, आसक्ति से काम का जन्म होता है, काम में ही क्रोध संलग्न होता है। क्रोध के अविजित सम्मोहन से स्मृति-विभ्रम होता है, अच्छे बुरे का ज्ञान लुप्त हो जाता है, इस प्रकार स्मृति विभ्रम से बुद्धि नष्ट हो जाती हे और बुद्धि नष्ट होते ही व्यक्ति अपने पथ से भटक जाता है।
            अपराध-शास्त्र का जिन्हें ज्ञान है और जो उसको आजीविका बनाकर चलते हैं, उनसे पूछा जाना चाहिए कि अगर अपराध के कारणों का अध्ययन और विश्लेषण हो चुका है और एक सुनियोजित संस्थान ही उस पर काम कर रहा है तो क्या कारण हे कि अपराध या दुष्कर्म निरन्तर घट रहे हैं? जिनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे अपराध को रोकेंगे, वे ही उसे बढ़ावा दे रहे हैं। कानून तोड़नेवाले कानून जानने वालों की सहायता ले रहे हैं, कानून बनानेवालों को ‘बना’ रहे हैं। जिन स्थानों पर सुरक्षा मिल सकती है, उन स्थानों से व्यक्ति क्या पा रहा है? इसका विश्लेषण कौन करेगा?
          भारत की राजधानी दिल्ली अपराधों का दुर्ग बन गई है। ‘चिराग तले अंधेरा’ को चरितार्थ करती हुई, भारत में कानून बनानेवाले कारखानों से ही चीखों की आवाजं़े आ रही हैं। कोई लड़की तंदूर में भूनी जाती है तो किसी महिला पत्रकार को सुबह के पहले पहर में मार दिया जाता है। महिला राष्ट्रपति, महिला प्रधानमंत्री, राष्ट्रीय राजनैतिक दल की महिला अध्यक्ष, महिला लोकसभाध्यक्ष, महिला मुख्यमंत्री, महिला न्यायविदों, महिला उच्च सुरक्षा अधिकारियों आदि से सुसज्जित दिल्ली में ही एक महिला सामूहिक बलात्कार का न केवल शिकार होती है बल्कि ‘काम’ के क्रूरतम और जघन्य शारीरिक उत्पीड़न और अत्याचार के परिणाम स्वरूप अंततः दम तोड़ देती है। पहली बार ऐसे जघन्य अपराध की देशव्यापि प्रतिक्रिया होती है। क्यों? यह सवाल भी है और जवाब भी। हम जागे हैं पहली बार या हमारे जागने के भी निहितार्थ हैं? ये सवाल अपनी जगह मजबूती से खड़े हैं। हम अभी भी ईमानदार हुए हैं, इस पर संदेह क्यों किया जा रहा है? फास्ट ट्रेक न्यायालयों से क्या हम पूरी तरह आश्वस्त हो गए हैं? पहले से मौजूद बलात्कार और दुष्कर्म विरोधी कानूनों के बावजूद दण्ड विधान की कठोर व्यवस्था बनाने पर हम जोर दे रहे हैं। मूल कारण और समस्या इतने हंगामों के बावजूद अभी भी हमारी चिंता और चिन्तन से अलग थलग पडी हुई है।
           अपराध को औद्योगीकरण की सन्तान कहा गया है। बलात्कार को शरीर के खुले विज्ञापनों और शरीर पर आधारित उद्योगों को को कारण माना जा रहा हैं जितना लोभ ओर लालच हम हम जगा रहे हैं उतनी पूर्ति और आसान पूर्ति तो कतई संभव नहीं है। ऐसे उत्पाद के औचित्य पर चर्चा होनी चाहिए जो समाज के लिए बड़ी मात्रा में आवश्यक नहीं है। कुछ लोगों के मुनाफे के लिए उपभोक्ताओं को अंधेरों में डालनेवालों को अपराधी क्यों नहीं समझना चाहिए? शराब पीने को केवल हानिकारक कहने और शराब के ठेकों की खुलेआम नीलामी, अपराध की किस संस्था की तरफ़ इशारा करती है? यह बताना क्या यहां जरूरी है। इस देश को जिस क्षण सुरक्षा के आंतरिक और बाह्य आक्रमणों से निपटनें की तैयारी करनी चाहिए, वह युवराजों को स्थापित करने की कवायद में लगा है। कमजोर क्षणों में लपकने की मुद्रा में संलग्न सिंहासन के लोभियों से हम किस तरह उम्मीद करें?
          बलात्कार से जुड़ी घटनाओं की इस देश में कब कमी रही है? किसी गांव में बाहुबलियों का दल किसी समूह पर सामूहिक हमला करता है और औरतों के साथ दुष्कर्म करता है। किसी स्त्री को सामूहिक बलात्कार के बाद नंगा घुमाया जाता है। दिल्ली की घटना के तत्काल बाद लगातार दिल्ली आरे मुम्बई में ऐसी घटनाएं रोजमर्रा की प्रक्रिया की तरह घटती हंै। बूढ़े कामुक और मानसिक विक्षिप्त पुरुष दस साल से लेकर चार साल की बच्चियों को बलात्कार का शिकार बनाते हैं। सामूहिक बलात्कार एक जैसे उद्देश्य के लिए एक समय में संगठित गिरोह के द्वारा हो रहा है। भारत के कोने कोने में हो रहा है ओर देश अन्य घटनाओं की भांति इसे दर्शक भाव से देख रहा है, क्योंकि कानून ओर पुलिस इस पर काम करेगी, ऐसा हमारा विश्वास है। फिर घटना जिस पर घटी है वह जाने, हम क्यों अपनी नींद ख्राब करें?
           हमारी नींद को लम्बा समय हो गया है। हम अभी और सोना चाहते हैं। अच्छे स्वास्थ्य  लिए के सोना जरूरी है। जागना होता तो हम महाभारत काल में ही जाग गए होते। धर्म की रक्षा के लिए जिस काल को जाना गया है, उसी काल में सिंहासन के सामने सामूहिक स्त्री अपमान का खेल खेला गया ओर युद्ध धुरन्धर योद्धा भी शांत बैठे रहे। जिन्हें अंधा बताया गया है वे तो उस सामूहिक दुराचार को नहीं देख सके पर जो देख सकते थे, वे भी अंधे बने रहे। वह कौन सा धर्म था जिसने सत्ताधीशों को अपने ही परिवार की कुलवधु के सामूहिक अपमान का अधिकार दिया? 'परम शक्ति' का प्रतीक 'पुराण पुरुष' केवल वस्त्र बढ़ाकर अपने देवत्व से मुक्त हो जाता है। अगर उसी समय कोई कठोर कार्यवाही हो जाती तो ‘यत्र नारियस्तु पूजयंते, रमंते तत्र देवताः’ यह वाक्यांश भाषणों में शोभा के लिए बोला गया केवल एक श्लोक नहीं रहता, महामंत्र हो जाता।      
          इसी ‘दुष्कर्म-कथा’ को आधार बनाकर प्रसिद्ध महिला लेखिका महाश्वेतादेवी ने एक कहानी लिखी। इस कहानी में अधिकारों की लड़ाई लड़नेवाली एक युवती को पुलिस वांटेड घोषित करती है और शिकंजें में कसने की कवायद में जब वह उसे पकड़ लेती है तो उसके साथ निरन्तर सामूहिक बलात्कार करती हे। उसकी वीभत्सता का चित्र वैसा ही है जैसा दिल्ली की युवती का है। महाश्वेतादेवी की उस युवती ने फिर कपड़ा पहनना स्वीकार नहीं किया। उसका सवाल था, ‘इतना होने के बाद अब कपड़े की क्या जरूरत?’ मरते दम तक उसने अपना यह वस्त्र-विरोध जारी रखा। महाश्वेता अपनी इस पीड़िता का नाम द्रोपदी ही रखती है। क्योंकि कानून के नाम पर यहां पुलिस रूपी कुरुपुत्रों ने यह दुष्कर्म किया है इसलिए।
        रक्षकों के भक्षक बनने का यह पहला मामला नहीं हे। शर्मिला अभी भी सेना के विरोध में दो दसकांे से यह लड़ाई पूर्वांचल मिजोरम में पूरे क्षेत्र के लिए अकेली लड़ रही है।
        हमारे पड़ोसी देशों में स्त्री के साथ यही किया गया। अभी हाल ही में ईरान में अचानक एक गिरोह एक पार्टी में एकत्र संभ्रांत महिलाओं पर टूट पड़ा और खुला सामूहिक बलात्कार कई समूहों में बंटकर एक ही स्थान पर किया गया। ‘नैतिकता की स्थापना के लिए’ अनेक स्त्रियों को दिए गए इस ‘अनैतिक दण्ड’ को किस श्रेणी में रखा जाए? स्त्रियों के साथ बलात्कार की क्रूरता को हमारे ऐन पश्चिमी देशों में ‘धर्म’ माना गया है। मुल्लाओं और उलेमाओं ने उतनी ही ‘धार्मिकता’? की भावना से कहा कि गलती उन सभी महिलाओं की थी क्योंकि जिन महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ उन सभी ने आपत्तिजनक परिधान पहने थै। सामूहिक बलात्कार की शिकार एक महिला तो गर्भवती थी ओर प्रसव के अंतिम समय में थी। यानी बलात्कार का एक कारण आपत्तिजनक परिधान भी है !?
              लेकिन वहां भी औरतें जागती है और लड़ती हैं। इसका किस्सा पिछले दसक में सामने आया। पड़ोसी पश्चिमी देश में एक औरत को सारे गांव के सामने गांव के बाहु-बलियों ने सामूहिक रूप से बलात्कार का शिकार बनाया। पड़ोसी देश में वह पीड़ित अशिक्षित महिला वर्षों कानून की लड़ाई लड़ती है और जीतती है। पड़ोसी राष्ट्र की न्यायपालिका उसे मानहानि का मुआवजा दिलवाती हे, जिससे वह एक स्कूल खोलती हे जिसमें महिलाओं को शिक्षित करने का काम वह अब भी कर रही है। मध्य भारत के एक अखबार ने महीनों इस कथा को धारावाहिक रूप से प्रस्तुत किया। भारत को इस धारावाहिक सच्ची कथा से शिक्षा लेनी चाहिए और  महाश्वेता देवी की कहानी  जिसे अंग्रेजी में ‘ब्रेस्ट स्टोरीज’ के नाम से संकलित किया है, से भी सचेत होना चाहिए।
             जब ऐसे अपराधों के निदान की बात की जाती है तो कुछ सुझाव भी सामने आते हैं जो इस प्रकार है- ‘कठोरतम कानून बनें, त्वरित न्याय हो, सशस्त्र महिला पुलिस की संख्या में वृद्धि हो, अपनी सेवाओं में लापरवाही बरतने वाले पुलिस कर्मियों का निलंबन हो, संवेदनशील और सार्वजनिक स्थानों में सी.सी. टी वी कैमरे हों, न्यायिक प्रक्रिया में अविलम्ब सुधार अपरिहार्य है, अपराधियों को दंड तो मिले ही साथ ही उस भयंकर दंड का इतना प्रचार हो कि सबको पता चल सके।  महिलाओं की आत्मनिर्भरता, साहस और कोई ऐसा प्रशिक्षण उनको मिलना चाहिए कि छोटे खतरे का सामना वो स्वयं कर सकें, विदेशों की भांति उनके पास मिर्च का पावडर या ऐसे कुछ अन्य आत्म रक्षा के साधन अवश्य होने चाहियें. मातापिता को भी ऐसी परिस्थिति में लड़की को संरक्षण अवश्य प्रदान करना चाहिए, ऐसे अपराधी का केस कोई अधिवक्ता न लड़े।’ ये सुझाव ब्लाग लेखक एन.एस. बाघेला के हैं। इन सुझाावों के साथ बाघेला का कहते हैं ‘ल्ेकिन पतन समाज के सभी क्षेत्रों में है, आज महिलाएं भी निहित स्वार्थों के वशीभूत होकर या चर्चित होने के लिए कभी कभी मिथ्या आरोप लगती हैं, ऐसी परिस्थिति में उनको भी सजा मिलनी चाहिए। केवल दिल्ली में ही भारत नहीं बसता, सुरक्षा प्रबंध सर्वत्र होने चाहियें।’ कुछ लोग ‘बलात्कारियों को फांसी या कठोर सजा’ देने की मांग कर रहे हैं। उनका मानना हे कि अगर ऐसे अपराधियों सजा मिलती है तो सारे देश के असमाजिक तत्व भयभीत होंगे। लेकिन एक भय भी व्यक्त किया जा रहा है कि कहीं इस कानून का दुरूपयोग - दहेज उत्पीडन कानून, हरिजन एक्ट, लेवर एक्ट, टाडा, पोटा, आदि की तरह न हो। सभी को पता है कि आज इन कानूनों के अंतर्गत जितने भी केस चल रहे हैं उनमे से अधिकाँश केस झूठे हैं और उनका असली उद्देश्य केवल दोनों पक्षों से अधिक से अधिक पैसा वसूलने में होता है।
          एक दूसरे लेखक शीतलासिंह ‘बलात्कार कैसे रुके?’ के माध्यम से लिखते हैं ‘अब दिल्ली की पीड़ित छात्रा की मृत्यु के बाद जो भी प्रतिक्रियाएं और विरोध हो रहे हैं, उन सबमें अभियुक्तों को कड़ा दण्ड देने की मांग हो रही है। लेकिन यह इस प्रश्न का जवाब नहीं है कि कडे़ दण्ड से ही इस दुष्कर्म से मुक्ति हो सकती है। इसलिए इसे समाप्त करना हो तो कुछ ऐसे उपाय ढूंढने पड़ेंगे जिनसे भविष्य में आन्दोलनों की जरूरत भी न पड़े और अपराधी भी इससे विलग रहने में ही अपना कल्याण मानें।’
 वे समाज के एक छिपे पहलू को उजागर करते हुए लिखते हैं ‘ 47 प्रतिशत बलात्कार के मामलों में तो लड़की के घर, परिवार, रिश्तेदार के लोग ही शामिल पाये जाते हैं, इनके लिए जो सामाजिक, नैतिक मानदण्ड बनाये गये हैं उनको तोड़ने की इच्छा किन कारणों से होती है और उसे कैसे रोका जाय, इसका उपाय केवल दण्ड की सीमा बढ़ाना ही नहीं है। जब बाप के खिलाफ भी बेटियों द्वारा दुष्कर्म की शिकायतें दर्ज कराई जायें और पदों पर बैठे लोगों को भी इसके लिए दोषी ठहराया जाये तब यह कहना उचित नहीं होगा कि केवल गुण्डे, दरिंदे ही नहीं, ऐसे लोग जिनकी अपराध में रुचि है, वे भी इसके मूल कारण हैं। पदों और स्थितियों का लाभ उठाने वालों को कैसे रोका जाये, यह भी मुख्य प्रश्न है। विभिन्न प्रकार का लालच देकर या उनमें सामाजिक रूप से स्थापित करने की भावना पैदा करके उससे पीछे हटने वालों के साथ क्या किया जाये।
सबसे बड़ी शिकायत तो यह है कि अपराधों के नियमन, नियंत्रण और पंजीयन की जिम्मेदारी जिन संस्थानों के पास है, पुलिस और सुरक्षाबलों के लोगों के भी तो इसमें अग्रणी होने की शिकायत मिलती है। कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में जहां सेना को विशेष अधिकार दिया गया है, उसके खिलाफ भी तो शिकायतें कम नहीं हैं। लेखक लिखते हैं, ‘यह दुष्कर्म सृष्टि के आरम्भकाल से ही अस्तित्व में है। गौतम की पत्नी अहित्या के साथ भी देवताओं के राजा इन्द्र दुष्कर्म करते हैं। अहिल्या को ऋषि का शाप भोगना पड़ता है। जब हम समाज को समता के आदर्श और सिध्दान्त पर आधारित मानदण्डों के अनुसार बनाना चाहते हैं तब हम यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि महिलाएं सदैव किसी संरक्षण में ही रहें। एक वयस्क कन्या माता-पिता के अधीन, वयस्क अपने पति के अधीन और बुढ़ापे में वह अपने बच्चों के अधीन क्यों रहे? अधीनता की यह कल्पना और लोकतांत्रिक मान्यता यह दोनों ही समान दृष्टिकोण के परिचायक नहीं हैं।’ वे एक सुझाव देते हैं ‘दुराचार के आरोपियों को चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार बनने से रोकने के लिए भी कोई प्रतिबंधात्मक व्यवस्था होनी चाहिए। ऐसे लोग जीतकर संसद और विधान मंडलों में भी पहुंचते हैं तो उन्हें हटाने के लिए भी कोई व्यवस्था होनी चाहिए।’
         बलात्कार के कारणों में समाज के बिगड़ने का एक कारण ओर प्रस्तुत किया जाता है कि टीवी और फिल्मों के कारण अश्लीलता का प्रचार और प्रसार हुआ है। विज्ञापनों और कुछ नृत्य के सीरियलों में नग्नता को उभरा गया हैं। विदेशी तर्ज पर जो सीरियल बने हैं उनमें भी अश्लील साइटों की गर्हित महिलाओं को पेश किया गया है। अपनी बेटी को लेकर आपत्तिजनक फिल्म बनानेवाले तथाकथित बोल्ड निर्माता ने अपनी बेटी के साथ अश्लील साइट की इस महिला से संपर्क किया और उसे लेकर फिल्म भी बनाई। इससे इस देश के बच्चों, नाबालिगों और युवाओं में अश्लील साइटों के प्रति आकर्षण बनाने की जिम्मदारी किस पर होगी? ऐसे समय धन्यवाद के पात्र हैं वे लोग जिन्होंने दोबारा दूसरी अश्लील एकट्रेस के आने पर रोक लगा दी। इस तरह के सीरियल और साइट बंद होने चाहिए। यह आचार संहिता की ओर इशारा है। लेकिन हमारे देश में पहले से ही आचार-संहिताओं की कमी नहीं है। हमारे देश में ऐसे मंदिर हैं जिनमें यौन मुद्राएं अंकित है और उन्हें श्रेष्ठ कलात्मक कृतियों का स्थान प्राप्त है। इन्हें अश्लील कहनेवाले दकियानूसी ओर कलाविहीन कहे जाते हैं। ऐसी संस्कृति की वकालत करनेवालों से क्या कहें?
         एक अजीबो गरीब सुझाव भी सामने आया है। कुछ लोगों का मानना है कि लाइसेंस्ड वेश्यावृत्ति की परम्परा पुनः आरंभ की जानी चाहिए। यानी जो सुंदर है उसे सार्वजनिक बना दिया जाय। क्या इस मूर्खतापूर्ण स्त्री विरोधी प्रावधान से बलात्कार की घटनाएं कम हो जायेंगे? क्या वेश्यावृति को प्राकृतिक मानकर उसे राष्ट्रीय कर्म मान लिया जाये ।तो वैवाहिक संस्थाओं का क्या होगा? परिवार कहां जाएंगे? यह तो ऐसी बात हुई कि शराब छुपकर पीनेवालों के लिए गलीगली में शराबखाने खोल दिये जायें। शराब पीना खराब है कहने वाले राजस्व के लिए शराब के ठेके देते हैं। क्या वेश्यावृत्ति को लाइसेंस देकर राजस्व कमाने की लालसा घृणित नहीं है? ययातियों के इस देश में राजस्व आधारित विचारधारा से मुक्त होकर ही गंदी फिल्में, विज्ञापन, अश्लील प्रकरण, उत्तेजना बढ़ाने वाले उत्पादों पर रोक लग सकती है। इसे संभव बनाना होगा।
        ठसी प्रकरण में आध्यात्मिकता को उत्पाद के रूप में बेचनेवाले एक सर्वाधिक धनी ‘उत्पाद मालिक’ का कहना है कि वोट दो और आध्यात्मिक राजनैताओं को जिताओ। ऐसे लोगों को जिताओ जो अध्यात्म पर भरोसा करते हो। पर क्या अध्यात्म और धर्म के उत्पादों का संस्थान चलानेवाले दुष्कृत्य नही करते? एक बापू पर तो ऐसे कई मामले हैं। इसी नैतिक देश में कई सरस्वती महाराज रंगे हाथों पकड़े गए हैं।
        हमारी इच्छा है कि संसद को स्वच्छ होना चाहिए और मंत्री भी विदेशों से अश्लीलता आयात न करें जैसा कि पिछले सालों में हमने देखा कि एक केन्द्रीय मंत्री पकड़े गए थे जिनके पास कई अश्लील सीडीज़ थीं। संसद के चलते सत्र में कतिपय सांसद अपने मोबाइल में अश्लील वीडियो देखते पाये गए। इसी धर्म और नैतिकता प्रधान प्रजातांत्रिक देश में कई सांसदों को महिलाओ पर यौनाचार के आपराधिक मामलों में पकड़ा गया है। अर्थात् संसद का शुद्धिकरण हो तो देश में सुधार संभव है।
          आज भी इस देश में प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक स्वच्छ और स्वस्थ शिक्षा जरूरी है। आर्थिक सामाजिक उच्चता और निम्नता से भरे भेदभाव विहीन समाज के निर्माण हेतु नई नीतियों की आवश्यता है। व्यावसायिक न्यायायिक और दण्ड विधान के स्थान पर जनता के हित और कल्याण के लिए कार्यरत मुक्त-न्यायालयों की आवश्यकता है। पद के मद के स्थान पर ‘पन’ के ‘प्रण’ की आवश्यकता है।
          कुल मिलाकर संपूर्ण आमूलचूल परिवर्तन, धर्मनिरपेक्ष संपूर्ण-क्रांति की आवश्यकता है। हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई धर्मों के स्थान पर मनुष्य-धर्म की स्थापना की आवश्यकता है। सत्य तो यह है कि जिस स्त्री पर बलात्कार होता है वह धर्म नहीं, शरीर होती है। स्त्रीत्व तो हर धर्म की स्त्री की अमूल्य निधि है। अतः स्त्री-रक्षा विश्वधर्म हो, जाति धर्म नहीं। जाति, समाज और धर्म में बांटकर स्त्री कभी सुरक्षित नहीं रही है, यह अध्ययन बताते हैं।