Friday, June 22, 2012

श्मशान गीता-2




पूर्वकथा- तरह तरह की मनःस्थितियों के चलते चलते अंततः शववाहन में शव को डालकर शवयात्रा शुरू हुई।
              होता क्या है कि जीते जी हमें एक से अधिक शवयात्रा में शामिल होना पड़ता है। शवयात्रा में सभी को शामिल होना चाहिए। जान पहचान का हो ना हो, समय है तो किसी परिचित की शवयात्रा में शामिल हो जाना चाहिए। इससे बहुत कुछ सीखने को मिलता है।
             अच्छा आप कुछ कहना चाहते हैं?
             मानता हूं आपकी बात। इतना फालतू वक्त किसके पास है? अपनों की, अपने पहचान वालों की शवयात्रा में शामिल जोने का वक्त ही नहीं है तो फिर पराए, अनजाने लोगों की शवयात्रा में शामिल कौन बेवकूफ होगा। यह सुझाव मूर्खतापूर्ण है।
              लेकिन देखिए फिर भी कभी शामिल होकर.....सीखना तो जीवन भर चलता है सर! चलिए मैं आपको एक अपरिचित की  वयात्रा में लिए चलता हूं। आपके कीमती समय का ख्याल रखकर बहुत ही संक्षिप्त शवयात्रा में लिवाने आया हूं। मेरे साथ तो चल सकते हैं न.? जल्दी छोड़ दूंगा। ....तो फिर आइए.....


2. माया की गाड़ी

एक मुहावरा है- कोई कंधा देने वाला ना रहा।
           इसी भाव और अभाव पर ‘पानी देनेवाला’ भी एक मुहावरा है।

              इस समय मैं ‘कंधे देने वाले’ मुहावरों को लपकते झपकते शवशायिका यानी ठठरी उर्फ अरथी को कंधा देने की होड़ में मचलते उछलते देख रहा हूं। सारा वातावरण ‘राम नाम सत्त है, सत्त बोलो गत्त है’ के नारे से गुंजायमान है। नारे लगानेवाले सभी लोग सत्यवादी व्यापारी हैं। मैं सत्य का जीवित-दर्शन तो नहीं कर सका, मरा हुआ सत्य मेरे सामने से जा रहा है। चार ही कंधों पर नहीं बल्कि कई कई धक्का मुक्की करते कंधों पर चढ़कर। ‘क्या सत्त की यही गत्त होती है?’ मेरे जिज्ञासु-मन में बिजली चमकने जैसा यह प्रश्न चमका और लुप्त हो गया। मैं अपने पर्यावरण में लौट आया।
वातावरण पर्याप्त मात्रा में सात्विक बन चुका है। लोग युक्तेश भाई के शव को शववाहन तक पहुंचाने के लिए कंधे से कंधा भिड़ाकर सहयोग प्रदान कर रहे हैं।
इस दृश्य का मुझपर बड़ा क्रांतिकारी प्रभाव पड़ता है। मैं बने हुए सात्विक वातावरण की गरिमा बनाए रखने के लिए आवश्यक मात्रा में गंभीर हो जाता हूं और अपने भारतीय भाइयों की वातावरण निर्माण-कला के प्रति कृतज्ञता से भर जाता हूं। सोच रहा हूं ‘‘मैं भी कंधा दे दूं क्या?’’ पर कंधों के दर्द के ख्याल से मैं ऐसा कर नहीं पाता। भले ही व्यक्ति मर गया है उसे क्या पता चलेगा कि मैं स्वस्थ कंधे दे रहा हूं या दर्दीले कंधे। फिर सोचता हूं, दर्द भरे कंधे देकर उसे छलना ठीक नहीं, क्योंकि सत्त बोले गत्त है।
जीवन में मैंने कंधा देनेवाले कई विशेषज्ञ देखे हैं। वे अरथी भी बनाते हैं, कंधा भी देते हैं और दाहस्थल पर चिता भी सजाते हैं। लेकिन जब उनकी बारी आती है तो कई मामले में नगरपालिका से लोगों को बुलाना पड़ता है। हालांकि ऐसा एक दो मामले में ही हुआ है। इसलिए कंधा देेने वालों की मैं बहुत इज्जत करता हूं। भविष्य में ये मेरे काम आ सकते हैं।
‘राम नाम सत्य है’ का नारा शववाहन के पास आकर मौन हो गया।
शव शववाहन पर चढ़ा। अ-रथी अब रथी हो गया है। ठठरी को अरथी भी कहते हैं। चार लोगों के कंधों पर चलने पर भी अरथी इसे क्यों कहते हैं, यह प्रश्न भी कतार में खड़ा है। क्या इस शव या मुर्दे को ‘रथी’ विहीन ‘रथ’ या ‘गाड़ी’ कहने के प्रयास में ‘अरथी’ कहा गया है। यह प्रेरणा लोगों को गीता से मिली होगी। गीता में श्रीकृष्ण ने जिसे ‘माया की गाड़ी’ कहा है, क्या वह गाड़़ी यही शरीर है? आत्मा जिसका रथी है। इसलिए मुर्दा गाड़ी अ-रथी कहलाने लगी। प्रमाण के बिना जिन्हें भरोसा नहीं होता, वे अठारहवें अध्याय के इकसठवें श्लोक में इसे देख सकते हैं। महर्षि वेदव्यास कृष्ण का अर्जुन से संवाद कराते हुए लिखते हैं-  
                     ‘‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृदेशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढ़ानि मायया।’’
अर्थात् हे अर्जुन! ईश्वर सभी भूतों यानी प्राणियों के हृदय में रहता है और माया के यंत्र में चढ़ाकर उसे घुमाता रहता है। जैसे स्कूटर वगैरह में पापा लोग बच्चों को घुमाते रहते है। स्कूटर से लेकर वायुयान तक यंत्र हैं, गाड़ी हैं। होने को तो बैलगाड़ी और हाथ ठेला भी यंत्र हैं। बायोइंजीनियरिंग के हिसाब से शरीर भी यंत्र अर्थात् गाड़ी है, जैसा वेदव्यास कह रहे हैं। इन्हीं बातों के कारण हम कहते हैं कि बायोइंजीनियरिंग भी हमारे शास्त्रों की देन है।
खैर शास्त्रों से लौटें और इस अद्भुत दृश्य को देखें कि जो व्यक्ति जीवन भर माया की गाड़ी में चला, मरने के बाद वह सेवाभावी संस्था की गाड़ी पर सवार होकर जा रहा है।
              दाहभूमी या मरघट दूर है। गरमी का समय है। कंधों पर शव को ढोना मुश्किल है। यहां आकर यह सत्य उजागर होता है कि जीवित को तो ढोना मुश्किल है, मरे हुए को भी ढोने के लिए हम सुविधाएं जुटा लेते हैं। यही बुद्धिमत्ता है। सुविधा जुटा लेने में ही बुद्धिमानी है। जो व्यक्ति अपनी मूर्खता से मर जाता है, मृत्यु उसे भी बुद्धिमानी के वाहन पर चढ़ा लेती है।
लेकिन शववाहन में केवल शव ही नहीं चढ़ा, जो शव को कंधा देते हुए चले थे, वे भी सवार हुए और शेष शवयात्री अपने अपने वाहनों पर सवार होकर मरघट की तरफ चले। मैंने सोचा कि देखो, कितनी अजीब बात है, मरा हुआ तो आखिरी बार मरघट जाता है लेकिन जीवित व्यक्ति बार बार मरघट जाता है।
मेरे देखते देखते ही शवयात्रा वाहन-यात्रा में बदल गई। मैंने भी अपने वाहन के कान उमेठे और उसे एक जोरदार लात लगाई। वह गुर्राने लगा। अब बाईसन रूपी बाइक की पीठ पर चढ़कर मैं भी कतार में लग गया। जैसे घोड़े पर सवार होते ही जनक को तत्वज्ञान हुआ, वैसे ही मेरे कानों में कबीर बोल पड़े-
‘माली आवत देखकर कलियन करीं पुकार।
फूले फूले चुनि लिये, काल्हि हमारी बार।।’
अस्तु, मुर्दा सहित सभी सवार अपनी अपनी गाड़ियों में श्मशानभूमि चले। सभी वाहन बहुत ही अनुशासित ढंग से चल रहे थे। मेरी इस तरह की यह पहली यात्रा थी। हालांकि शव की अगुआई में चलने के अवसर अनेक मिले हैं किन्तु वे सब पैदल यात्राएं थीं। मुझे वाहनों को देखकर लगा था कि घर्राते हुए यूं निकल जाएंगे। पर जिस शालीन रफ़्तार से वाहन चल रहे थे उसकी कल्पना मुझे नहीं थी। यही वाहन अगर किसी शव के पीछे नहीं चलते तो कैसे खतरनाक़ ढंग से दौड़ते। एक दूसरे को पीछे छोड़ जाने की होड़ में कट मारकर आगे निकल भागते। मारकाट करते हुए आगे बढ़ने की हमारी रफ़्तार तब देखते भी नहीं बनती। किन्तु इस समय यूं जाने की बजाय ‘संगच्छत्ध्वम्’ की भावना से सभी धीरे धीरे आगे बढ़ रहे हैं। यही नहीं जो वाहन शवयात्रा में शामिल नहीं है, वे भी साइड से निकलते वक़्त बहुत धीरे से ग़ुज़र रहे हैं। हमारी संस्कृति की यही विशेषता है, हम शव के सम्मान में वाहनों से उतर जाते हैं और पैदल आगे बढ़कर मृत्यु को प्रणाम करते है।
मुझे लगता है, महानगरों या मायानगरों के संवेदनशील स्थानों में रफ़्तार कंट्रोल करने के लिए यातायात विभाग को शववाहन सहित शवयात्रा की व्यवस्था निरन्तर करनी चाहिए।
                                                                                                               
                                                                                                                         दिनांक 26.04.12                                                        
                                                                                                                            क्रमशः 



अगले आकर्षण:
                                       
                                1.  मृत्युंजयघाट,
                                2.  बाल की खाल,
               


Wednesday, June 13, 2012

श्मशान गीता-1




लीगल सूचना:  मृत्यु कोई भयानक हौलनाक चीज नहीं है। कम से कम दूसरों की तो बिल्कुल नहीं। मृत्यु भी एक परिवर्तन है, जिससे हम नहीं डरते। परिवर्तन तो जिन्दगी में एक नया चार्म है। गीता भी यही कहती है। एक जगह रहते हुए ऊब गए हो तो उठो, कपड़े बदलो, कहीं घूम आएं। 
किसी की मृत्यु होती है तो कुछ लोग दाह संस्कार कब्र अब्र की तैयारी करते हैं, कुछ लोग खाली होते हैं तो हंसी मजाक (धीरे धीरे ही सही) करते हैं, समय काटते हैं।
आइए, एक शवयात्रा में आपको भी ले चलें। 
भाई एक शर्त है मगर -सीरियस मत होना। मृत्यु का, यानी कपड़े बदलकर घूमने का चार्म खत्म हो जाएगा। प्लीज....




1. को जाने कंह मारिसी

युक्तेश भाई राठौर नहीं रहे।
युक्तेश भाई राठौर कौन थे, यह मैं भी नहीं जानता। मैं जानता तो वे रहते, ऐसा भी नहीं है। जिनको रहना होता है, वे लाख अपरिचित होने पर भी रहते हैं। जिनको नहीं ही रहना है, उनके लाखों परिचित हो तो भी वे नहीं रह पाते। रहने और नहीं रहने का कोई बीज-गणित नहीं होता। होता तो खैर उसका कोई अंक गणित भी नहीं है। सौ साल रहें या बीच में ही चल दें, यह किसी के संज्ञान में नहीं है। उसका उत्तर कोई किताब नहीं देती। डाॅक्टर कहते हैं बस दो चार दिन और सेवा कर लीजिए, कभी भी जा सकते हैं। कब ? यह नहीं बता सकते। पक्का हालांकि यह भी नहीं है कि चले ही जाएं। जाकर भी कई मामलों में जानेवाले लौट आए हैं। इसीलिए शैलेन्द्र ने गीत लिखा है- ओ जानेवाले हो सके तो लौट के आना।
लौट आनेवाले एक को मैंने जीवित आंखों से देखा है। हट्टा कट्टा। तनदुरुस्त। मीलों मजे से पैदल चलता हुआ। ऐसे जाकर लौट आनेवालों की बंद मुट्ठी में कुछ न कुछ होता है। पत्नी ने सुना था कि एक बुढ़िया लौटी तो उसके हाथ में कोयले का टुकड़ा था। मेरेवाले के हाथों में तांबे का भारतीय सिक्का था। उसी सिक्के से वह बाद में लोगों का भविष्य बताता रहा। अगले और पिछले रहस्य खोलता था। पिछले में मुझे इंटेरेस्ट नहीं था, सब कुछ भोगा हुआ था, अगले की चिन्ता थी। कुछ दिनों के लिए उसने मुझे खुश कर दिया कि मुझे राष्ट्रपति पुरस्कार मिलेगा। आज तक नहीं मिला। अब आगे की उम्मीद नहीं है। मुझे तो शक है वह सही में जाकर लौटा था या वह भी सस्ती लोकप्रियता का एक किस्सा था।
बहरहाल, आने जाने की गणना केवल संभावित होती है। वेंटिंग सीट पर रिजर्वेशन मिल जाता है और कन्फर्म सीटवाले भी कई बार एडजस्टमेंट में जाते है। यात्रा यात्रा है, कुछ भी हो सकता है।
युक्तेश भाई राठौर का रिजर्वेशन कन्फर्म था। वे कोई सामाजिक मंगल-काज निपटाकर अपने शहर लौट रहे थे। निर्धारित बोगी की तरफ बढ़ने की हड़बड़ी में उनका पैर फिसला और वे गिर पड़े। गिर क्या पड़े, दुनिया से उठ गए। हार्ट अटैक या हार्ट फेल इसी तरह का कुछ घटा। सब सुनी हुई बता रहे है। पर टेक्नीकली ऐसे मौके पर जो भी होता है, उससे वे चल बसे यानी नहीं रहे।
चल बसना और नहीं रहना में विरोधाभास होते हुए भी अर्थ एक है। हर विरोधाभास में कबीर याद आते है। यहां दो वजहें हैं उनके याद आने की। राठौर भाई चल बसे और नहीं रहे, एक। दूसरी यह कि वे परदेश में जाकर नहीं रहे और चल बसे। ऐसे मौके कबीर के समय में भी आते रहे होंगे, तभी उन्होंने लिखा है-
कबीर काहे गरबसी, काल गहे कर केस।
को जाने कंह मारिसी, कै घरि कै परदेस।।
जीवन में, जीवन का और जीवन से जुड़ी अथवा जीवन में मिली चीजों का गर्व या घमंड नहीं करना चाहिए। कबीर कहते हैं कि तुम्हें पता है या नहीं, तुम देख पा रहे हो या नहीं, तुम्हारी आंखों पर भ्रम की पट्टी बंधी है या माया का चश्मा चढ़ा है, पर समझ लो तुम्हें बालों से पकड़कर काल खड़ा हुआ है। बिना टिकट चलनेवाले या अन्य मुसाफिर की जेब काटनेवाले या किसी की नजर उठाकर चीजें ले उड़नेवाले चोर उचक्के उठाईगीरों के बाल पकड़कर जैसे पकड़नेवाले सिपाही या आम नागरिक खड़े होते हैं, ठीक वैसा ही तुम्हें धर लिया गया है, तुम हो किस फेर में। कोई नहीं जानता कि ये अब तुम्हें तुम्हारे घर ले जाकर मारेंगे या थाने में ले जाकर उधेड़ेंगे। तुम्हारे ही शहर में कूटेंगे या दूसरे शहर में ले जाकर धुनेंगे। जब नीचे का यह हाल है कि किसी को पता नहीं वह कहां पीटा जाएगा तो भाई ऊपरवाले की मर्जी को तुम कहां जान पाओगे। तो सम्हलकर चलो। ये सोचकर चलो कि कोई निरन्तर तुम्हें बालों से पकड़कर चल रहा है, जहां चूकोगे वहीं पलीटने या पटीलने लगेगा। युक्तेश भाई को देख ही रहे हो, कहां जाकर पिटे।
युक्तेश भाई राठौर उर्फ गुजराती भाई का घर मध्यप्रदेश में है और छत्तीसगढ़ की राजधानी में उनका पैर फिसला था। शाम की घटना है। परदेश में उनके साथ उनकी बूढ़ी पत्नी थी। अकेली वह घबराई होगी, लेकिन स्त्रियों को इतनी तीव्रगति से हार्ट अटैक नहीं होता। फिर कुछ लोग तो छोड़ने आए ही होंगे। प्लेटफार्म में छोड़ने आनेवालों की भूमिका यहां समझ में आती है। संकट में काम आनेवाले बाकी समय में केवल भीड़ कहलाते हैं। पर इससे उनका महत्व कम नहीं हो जाता। वे अस्पताल, पुलिस थाना और चीरघर में सुविधा के अनुपात में मामले निपटा सकते हैं। हालांकि कुछ लोगों का ऐसे समय जरूरी काम निकल आता है।
इसी समय यानी मुसीबत में कानून भी जाग जाता है। बाकी समय सोते रहता है। वह उस चैकीदार की तरह है जो ड्यूटी के समय सोता है और घटना हो जाने के बाद अपना मेहताना बढ़वा लेता है कि साहब रात में खतरे बढ़ गए हैं। हम और आप कानून और गृहमंत्रालय के सौन्दर्यशास्त्र से भली भांति परिचित है। इसलिए यहां की बात यही छोड़ते हैं और आगे बढ़ते हंै।
होता यह है कि पड़ोस में रहनेवाले शांतिभाई पटेल मुझे बताते हंै कि मोहल्ले के युक्तेशभाई राठौर नहीं रहे। कैसे नहीं रहे उसका तो पक्का पता नहीं पर कहते हैं कि लौटते हुए रेलवे-स्टेशन में हार्ट-अटैक से मर गए।
  चूंकि मैं राठौर भाई को नहीं जानता तो जानकारी लेता हूं कि कहां रहते थे, कैसे थे, उम्र कितनी थी? उम्र तो खैर हो चुकी थी। पैंसठ सत्तर के बीच के थे। सीनियर सिटीजन थे। अपने घर से तीसरा घर उन्हीं का था। इतने पास थे और मैं नहीं जानता था उसका एक सीधा सा कारण है। मैं अभी अभी इस मोहल्ले में आया हूं। पड़ोसी अच्छा है। पड़ोस भी अच्छा है। कुछ लोग तो मिलकर गए। राठौर भाई सीनियर सिटीजन थे इसलिए नहीं आए। शहरों में ऐसा होता है। कुछ मिलते हैं, कुछ नहीं मिलते। राठौर नहीं मिले पर आदमी अच्छे थे। कल सुबह उनका उठावना है। रात में उनकी बाडी आ जाएगी।
सुबह आठ बजे खबर मिलती है कि जिस देह को आत्मा छोड़ गई है, वह अपना पोस्टमार्टम कराकर घर लौट आई है ताकि विधि विधान से मरघट जा सके। तैयारी चल रही है। आधेक घंटे में शवयान में  मृत्युंजयघाट के लिए निकलेगी। परिचित लोग एकत्र हो चुके हैं। समाज के टांक, गांधी, पटेल, शाह, ठक्कर वगैरह। मोहल्ले के लालवानी और मूलचंदानी वगैरह, भाटिया और बग्गा वगैरह, जैन और अग्रवाल वगैरह, सोनी और राव वगैरह मृतक राठौर भाई के घर के सामने पूरी गली में बिखरकर खड़े थे। शव वाहन गली के उस छोर में था।
जिस छोर में शववाहन खड़ा था वही से जो गली अंदर मुड़ती थी, उसी के मोड़ में राठौर भवन था। यानी राठौर भवन गली में था।
              अचानक मुझे कबीर याद आए। उनके समय में भी गलियां होती थीं और उन दिनों लोग भी गलियों में रहते थे। समानता यह भी है कि वे मरते भी थे। उनके लिए कबीर ने लिखा है-
                                                     काल खड़ा सिर ऊपरे, जाग विराने मीत।
                                                     जाका घर है गैल में सो कस सोय निचीत।
 यानी जिसका घर गेल यानी गली में है वो कैसे निश्चिंत होकर सो सकता है। कबीर की दृष्टि मानना पड़ेगा, बड़ी पैनी थी और कालजयी भी।
       खैर,गली के उस छोर पर ,  जहां शववाहन था, वही श्मसान का सीधा रास्ता था। गली जिधर मुड़ती थी और उधर से कहीं नहीं जाती थी, वहां मेरा घर था। था गली में ही। वहां जितने खड़े थे सब किसी न किसी गली में रहते थे। गली में रहनेवाला एक व्यक्ति गुजर गया तो तो विभिन्न गलियों में रहने वाले खिंचे चले आए।
 यथासमय मैं घर से निकलकर शवयात्रियों में विलीन हो जाता हूं। ऐसी कई यात्राओं में मैं विलीन होता रहा हूं। इस मोहल्ले की यह पहली यात्रा है। जिन्दगी रही तो ऐसे अवसर बार-बार आते रहेंगे। क्योंकि जीवन है तो मृत्यु भी है। जीना है, तो मरना लगा हुआ है। मरे तो फिर कहीं न कहीं जीने की ड्यूटी लगेगी। गीता में कविकुल पितामह वेदव्यास लिखते हैं-   जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
                                                            तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।। 27.2.38

अर्थात् - जन्म हुआ तो  मृत्यु   सुनिश्चित, मृत्यु सत्य तो जन्म सुसत्य।
जब अनिवार्य जन्म मृत्यु है, तब तो शोक है व्यर्थ, असत्य।।
 
                   मुझे इतना समझ में आता है कि इसका शोक नहीं करना चाहिए। ओशो तो मृत्यु का उत्सव मनाते थे। यहां ओशो का आनंदयोग किसी के पास नहीं था, अतः सब खामोश दर्शक बने खड़े थे। परिचित आते तो घटना का सुना सुनाया वर्णन होने लगता। पक्का कोई नहीं जानता था। पर सभी ज्ञानी थे। वहीं खड़े खड़े मुझे पता चला कि मृत्यु कैसे कहां किस प्रकार घटित हो सकती है। शहर में कैसे कैसे लोग चलते फिरते मर गए। खाना खाकर पान खाने निकले कोई डम्पर उड़ाकर चला गया। सड़क के किनारे किनारे चल रहे थे कोई गाड़ी बहकी और ले उड़ी। मौत का कोई ठिकाना नहीं कब कहां से आ जाए। कहां आ जाए इसका भी पता नहीं है। कहां ले जाए इसका भी पता नहीं था। अब राठौर भाई को देखो। मौत कहां छत्तीसगढ़ ले गई। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भोपाल जाकर दुर्घटनाग्रस्त हो गए। बच गए लेकिन ऐसा बचना भी किस काम का।
पास में ही कोई पचहत्तर साल के सीनियर खड़े थे। इस बात से उत्साहित होकर बोले-‘‘अब हमीं को देख लो। यहीं ...जहां वह शव वाहन खड़ा है, वहीं खाना खाकर टहल रहे थे.. एक मोटर साइकलवाला ठोंककर चला गया...चार साल से किसी काम के नहीं रह गए..चल रहे हैं घिसटघिसटकर...दोनों पैरों में राड पड़ी है और कमर बिना बेल्ट के सीधी नहीं होती। ठोंकनेवाला आज भी बाइक उड़ाता फिर रहा है। यहां गलती किसी की, भुगत कोई रहा है। इससे अच्छा तो यह ..राठौर ...गिरा तो चला ही गया..ऐसा जाना अच्छा...हंसते खेलते चले गए...घिसटती जिन्दगी से तो मौत भली।’’
हार्टअटैक को सबसे अच्छी मौत के रूप में सभी ने स्वीकार किया। गाड़ी से टकराकर, छत से गिरकर, एक्सीडेंट में पिसकर, आग में जलकर मरना जरा रिस्की है। बच गए तो घिसटते रहो। हार्ट अटैक में ना बचे तो सोने में सुहागा। बच गए तो डरे डरे रहो। पानी में डूब मरना भी अच्छा।
‘‘मगर क्या करें कि आख़रीवाला हार्ट अटैक हो ?’’ किसी ने पूछ लिया।
               इस पर सब ख़ामोश हो गये।
                दूसरे पल सब इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि बेकार है सोचना। मौत भी अपने हाथ में नहीं है। ऊपरवाले ने यह पासवर्ड भी अपने पास रखा हुआ है। जब जिसकी आएगी, तभी जाएगा। जैसी लिखी है, वैसे जाएगा। उसने सारे नेटवर्क लाक कर रखे हैं। बिना पासवर्ड के आप अपनी फाइल भी नहीं खोल सकते। इसलिए हम उसके मोहताज हैं। वह हमारा नहीं।
तब तक राठौर भाई का शव निकलकर शववाहन की ओर चला।
मतलब,  लोग ठठरी उर्फ अरथी  को कंधा देकर शववाहन की ओर ले चले।
शवयात्रा शुरु हुई।

दिनांक 26.04.12
                                                                                               क्रमशः


शब्दार्थ 


1. अ.  ठठरी- बांस की बल्लियों और ठठार यानी घास के ढेर से बनने के कारण शवशाविका को ठठरी कहते हैं।
  आ. अर्थी- अब जो काया निरर्थक हो गई है और अर्थशास्त्र के अर्थ-साधन से भी उसका लेनदेन ना होने पर भी उस मुर्दे को  ढोनेवाली ठठरी को ‘अर्थी’ क्यो कहते हैं, कोई अच्छा अर्थी यानी अर्थ-शास्त्री या अर्थ-विशेषज्ञ ही बता सकता है।
  इ. अरथी - चार लोगों के कंधों पर चलने पर भी अ-रथी इसे क्यों कहते हैं, यह प्रश्न भी कतार में खड़ा है। क्या इस शव या मुर्दे को ‘रथी’ विहीन ‘रथ’ या ‘गाड़ी’ कहने के प्रयास में ‘अरथी’ कहा गया है। यह प्रेरणा लोगों को गीता से मिली होगी। गीता में श्रीकृष्ण ने जिसे ‘माया की गाड़ी’ कहा है, क्या वह श्गाड़ीश् यही शरीर है? आत्मा जिसका रथी है। इसलिए शवशायिका मुर्दे का शयनयान ‘अरथी’ कहलाने लगा।  

गीता में कृष्ण के माध्यम से अर्जुन को समझ प्राप्त कराने के लिए वेदव्यास लिखते हैं-
‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृदेशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढ़ानि मायया।’’ गीता.18.61
अर्थात् हे अर्जुन! ईश्वर सभी भूतों यानी प्राणियों के हृदय में रहता है और ‘माया के यंत्र’ अर्थात् माया की गाड़ी में चढ़ाकर उसे घुमाता रहता है।



अगले आकर्षण :

                        1.  को जाने कंहं मारिसी,,
                2.  माया की गाड़ी,        
                              3.  मृत्युंजयघाट,
                                 4.  बाल की खाल


चलते चलते - 
एक रियलिटी शो में किसी बच्चे ने मिथुन दादा चक्रवर्ती की किसी बंगाली फिलम का संवाद सुनाया - ‘मारोबे एइखोने, पोरबे शोवोशोयोने।’ अर्थात् मारूंगा यहां, गिरेगा शवशयन यानी श्मशान में।
इससे पता चलता है कि बंगाली में श्मशान को ‘शवशयन’ कहते हैं। ऐसी जगह जहां शव शयन करते हैं। इसी शब्द से श्मशान बना।