Thursday, November 15, 2012

विवेकानंद के जीवन दर्शन का साहित्य पर प्रभाव


विवेकानंद के जीवन दर्शन का साहित्य पर प्रभाव

विवेकानंद भारतीय राष्ट्रीय संदर्भों में युवकों के प्रेरणा सा्रेत के रूप में प्रासंगिक रहे हैं। विवेकानंद का नाम भारत के गौरवपूर्ण धार्मिक-अध्यात्म को विश्वस्तर पर प्रशस्त करने के अर्थ में स्थापित हो चुका है। इस तथ्य की चर्चा बहुत कम हुई है कि यह नामकरण ‘विवेकानंद’ उनके 1८९३ में शिकागो (अमेरिका) में विश्व धर्म परिषद में भाग लेने के लिए ही किया गया।
विद्वान भोैतिकवादी पिता और अत्यंत धर्म परायण मां की संतान वीरेश्वर और नरेद्र दत्त ने भारत को नये वैज्ञानिक अर्थ और ऊंचाइयां दी। वे वेदांत के पुरोधा के रूप में वैदिक संस्कृति के नये और प्रगतिशील मानदंडों के उद्गाता बने। इसीलिए अमेरिका की भूमि में बिल्कुल नवीन और ऊर्जवसित कण्ठ से उन्होंने विश्वबंधुत्व का नारा दिया, तथापि हिन्दुत्व की भावभूमि पर बने रहकर। उन्होंने अपने प्रथम परिचयात्मक उद्बोधन में कहा-‘‘मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति दोनों की ही शिक्षा दी है। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरन् समस्त धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान हैं, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया।’’
भारतीय गौरव के प्रति आत्माभिमान से संतृप्त यह युवा 25 वर्ष की आयु में ही संन्यासी हो गया। भारत को संपूर्ण रूपेण जानने की दृष्टि से उसने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की। हरिहर शर्मा के अनुसार-‘‘ भारत भ्रमण के दौरान उन्होंने जो पहला चित्र देखा उससे चिंताक्रांत बन गए। भूखे, प्यासे, कपडे विहीन, घर विहीन भारत की महा दरिद्रता देखी। इस गरीब भारत के दर्शन ने उन्हें द्रवित कर दिया। सारे विश्व को खिलाने वाला भारत आज दरिद्र दयनीय क्यों? यह चिंतन किया। दूसरा चित्र - एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को घर में नहीं आने देता अर्थात् अश्पृश्यता। “आत्मवत सर्व भूतेषु” बाले भारत के अंदर यह कैसा पागलखाना? क्या हो गया मेरे भारत को? तीसरा चित्र- एक ओर पढे-लिखे अहंकारी लोग, अपने मजे में रहनेवाले लोग। दूसरी ओर निरक्षरता। निरक्षरता, अश्पृश्यता, गरीबी, शोषण के दृश्यों ने उन्हें रुदन करा दिया। नरेंद्र से सच्चिदानद फिर विविधानंद बना यह युवा सन्यासी कष्ट दीनता से समरस हो, केवल रोया नहीं, उसने संकल्प लिया कि विश्व नत-मस्तक हो, ऐसा भारत खडा करना है।
भारत की दशा और दिशा का निर्धारण सदा सत्ता के सबल हाथों में रहा है। संभवतः यही सोचकर उन्होंने भारत के तत्कालीन राजाओं से संपर्क किया और अपना उद्देश्य बताया। जो भी उनके संपर्क में आया, उनका हो गया। यही नहीं उन्होंने उनके अभियान को आगे बढ़ाने के लिए आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराई। मैसूर के महाराज रामनाड के अतिरिक्त खेत्री के महाराज भी उनकी सहायता में आगे आए। खेत्री के महाराज के ही प्रस्ताव पर उनका अमेरिका के विश्व धर्म सम्मेलन में ज्ञान प्रकाश हेतु जाना निश्चित हुआ। यात्रा के लिए आर्थिक अधोरंचना की गई और निश्चित हुआ उनका नया नाम-स्वामी विवेकानंद। सभी जानते हैं कि सम्मेलन में अपनी पहली छाप युवा स्वामी विवेकानंद ने कैसी छोड़ी और कैसे भारतीय जीवनदर्शन विश्व में पुनः अग्रणी हुआ।
परन्तु यह सफलता केवल पलक झपकते, किसी चमत्कार के रूप में नहीं मिली। हरिहर शर्मा के अनुसार उनकी संघर्ष गाथा कुछ यूं है-‘‘मुम्बई से जलमार्ग द्वारा पूर्णतः अपरिचित देश अमरीका पहुंचे इस सन्यासी ने क्या कुछ नही सहा? जाकर मालूम हुआ कि सम्मलेन की तिथि दो महीने आगे बढ़ गई है। अनजान स्थान पर जहां भारत की तरह मांग कर भी नही खाया जा सकता था, कैसे वे रहे होंगे, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। कोई गाली देता तो कोई थूकता। निंदा करते इन लोगों के व्यवहार को ‘विवेकी’ होने के कारण सहन करते रहे। इस अपरिचित देश को अपना बनाने आये थे, इसलिए कोई प्रतिरोध नहीं। ऐसे में एक व्यक्ति मिला। उसने पूछा-‘किसको ढूँढते हो’? इन्होने उत्तर दिया -‘ आपको ही।’ विस्मय से उसने पूछा- ‘कोई मित्र है?’ ‘हाँ है ना , आप हैं !’- इन्हांेने उत्तर दिया। आश्चर्य और आनंद से अभिभूत वह व्यक्ति इन्हें अपने घर ले गया। वह अनजान व्यक्ति अमेरिकन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राईट थे। उन्होंने ही परिचय-पत्र देकर विवेकानंद जी को सर्वधर्म सम्मलेन में भेजा।’’
विश्वकोष में इस अद्भुत् घटना के बारे सिर्फ यह कहा जाता है कि एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला, किन्तु उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चकित हो गये। परन्तु हरिहर शर्मा ने जिन तथ्यों को उपलब्ध कराया है उससे तो लगता है कि विवेकानंद का विश्व से परिचय कराने में सहायता प्रोफेसर राईट ने ही की।

साहित्य पर प्रभाव

इसमें संदेह नहीं है कि विवेकानंद का संघर्ष, उनका लक्ष्य के प्रति समर्पण, उनकी संगठन-क्षमता, उनकी अद्वितीय वाग्मिता आज भी भारतीय युवकों के लिए प्रेरक है। इसका कारण यह है कि अत्यंत निष्पक्षता पूर्वक विवेकानंद ने भारतीय समस्याओं का विश्लेषण किया। धर्म, संस्कृति, समाज, जाति एवं वर्ण व्यवस्था, आर्थिक एवं राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में भारत की दुर्दशा का उन्होंने विस्तार से अध्ययन किया और उसके निर्मम निष्कर्ष भी दिए। निर्मम इस अर्थ में कि केवल वे भारतीय धर्म जिसे, आजकल ’हिन्दुत्व’ कहकर उछाला जा रहा है, वे केवल उसका यशोगान ही नहीं करते रहे, वरन उन्होंने बहुत कटु शब्दों में स्वार्थी तत्वों द्वारा फैलाई गई कुरीतियों और अंधविश्वासों पर भी प्रहार किये। उन्होंने देशवासियों का आह्वान करते हुए कहा था, ‘‘नया भारत निकल पड़े मोदी की दूकान से, भड़भूंजे के भाड़ से, कारखाने से, हाट से, बाजार से, निकल पडे झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से।’’ और जनता ने स्वामीजी की पुकार का उत्तर दिया। वह गर्व के साथ निकल पड़ी। गांधीजी को आजादी की लड़ाई में जो जन-समर्थन मिला, वह विवेकानंद के आह्वान का ही फल था। इस प्रकार वे भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम के भी एक प्रमुख प्रेरणा-स्रोत बने। यही कारण है कि तत्कालीन राजनीति और साहित्य पर उनका गहरा प्रभाव पड़ा।
आज हम जिस गीत को भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में गाने लगे हैं, वह एक ऐसे उपन्यास से लिया गया है जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम में संन्यासियों की संगठित संघर्ष की कहानी कहता है। यह उपन्यास ‘आनंद मठ’ बंकिमचंद्र की वह कालजयी रचना है जिसमें ‘वंदे मातरम्’ का समवेत गान कर संन्यासियों ने अपना राष्ट्रप्रेम उद्घाटित ही नहीं किया वरन् संपूर्ण जन जागरण का कार्य भी किया। क्या इस उपन्यास को प्रखर युवा-संन्यासी स्वामी विवेकानंद को किया गया समर्पण नहीं कहा जा सकता? ऐसी कितनी ही साहित्यिक कृतियां हैं जिसमें भारत के धर्म, भारत की सहिष्णुता, भारत का विश्वबंधुत्व और भारत का सबको अपना बना लेने की संस्कृति का उज्ज्वल पक्ष दिखाई देता है। अपनी खोई हुई पहचान को जानने,  अपने आत्म-साक्षात्कार के लिए उद्वेलित करती कितनी ही कालजयी रचनाएं हिन्दी में भी रची गई। प्रसाद के नाटक ‘स्कन्दगुप्त’ के नायक द्वारा जो युद्ध कौशल और नायिका द्वारा जो जन जागरण किया गया वह उसी धर्म और संस्कृति को दर्शाता है जो अंत में राष्ट्रहित में व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर त्याग और संन्यास के शिखर तक पहुंचाने के दृश्य के साथ समाप्त होता है। महादेवी वर्मा का जागरण गीत ‘जाग तुझको दूर जाना’ और निराला की रचनाएं ‘जागो फिर एक बार’, ‘राम की शक्ति पूजा’ आदि में भारतीय धर्म और दर्शन के अंतदर्शन होते हैं। कौन नहीं जानता कि अपनी व्यग्रता के काल में महा्रप्राण निराला, स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित ‘श्रीरामकृष्ण मिशन’ के गेरुआ संन्यासी हो गए थे।  
प्रसिद्ध भारतीय साहित्य के प्रथम नोबलिस्ट गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगौर भी विवेकानंद से प्रभावित थे। उन्होंने कहा था -‘‘यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िए। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएँगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।’’
भारत को विदेशों में प्रतिष्ठा दिलाने में विवेकानंद प्रथम थे। उनसे प्रभावित पश्चिमी लेखक रोमां रोलां का यह कथन रोमांचित करता है-‘‘उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असंभव है। वे जहाँ भी गए, सर्वप्रथम हुए। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी। हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देखकर ठिठककर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा, ‘शिव!’  यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो।’’ या यह कह सकते हैं कि उस व्यक्ति ने विवेकानंद को शिव-रूप में देखा।
  भारतीय धर्म में ‘शिव’ महादेव के रूप में परिगणित हैं। शिव अघोरी थे, इस आधार पर उन्हें दलित देवता के रूप में भी जाना जाता हैं। उपर्युक्त दृष्टांत से विवेकानंद को शिव रूप में स्थापित किया गया है। इसका कारण यह हो सकता कि एक बार विवेकानंद ने कहा था, ‘‘ आनेवाला समय शुद्रों का होगा।’’ हिन्दुत्ववादियों का शूद्रों के प्रति क्या दृष्टिकोण है इसे सभी जानते हैं। वे संस्कृति और धर्म के नाम चार वर्णों का रूप यथावत् रखना चाहते हैं। छुआछूत के आरंभिक संस्कार विवेकानंद में भी थे। चातुर्वर्ण व्यवस्था में प्रत्येक जाति और वर्ण का व्यक्ति दूसरी जाति और वर्ण के व्यक्ति से अस्पृश्यता का भाव रखता है। ऊंच नीच का दृष्टिकोण प्रत्येक जाति में दूसरी जाति के प्रति है, भले ही वह स्वयं उस कृत्रिम व्यवस्था से पीड़ित ही क्यों न हो। ब्राहमण ब्राह्मण से, क्षत्रिय क्षत्रिय से, वैश्य वैश्य से, शूद्र शूद्र से आपस में ही इस दुराचरण में लिप्त थे। इसे देखकर स्वामी विवेकानंद भारत भ्रमण के दौरान क्षुब्ध हुए थे। वे स्वयं कायस्थ थे। अभी पिछले दिनों संस्कृतिवादी राजनीतिक दल के अध्यक्ष द्वारा विवेकानंद और दाउद की तुलनात्मक टिप्पणी पर जमकर हंगामा हुआ। इस पर एक लेखक एक्सकैलिबर स्टीवेंस ने अपने लेख ‘शूद्र विवेकानंद पर चित्पावन बा्रहमण गडकरी का आक्षेप’ में लिखी है-  ‘‘बंगाल में विवेकानंद के नाम पर वोट नहीं मिलते। वर्ण व्यवस्था के मुताबिक कायस्थ शूद्र होते हैं। इस हिसाब से विवेकानंद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और ज्योति बसु तीनों शूद्र हैं। तीनों की भारतीय सवर्ण राजनीति ने क्या गत की है, इतिहास इसका मूक गवाह है। बंगाल में विवेकानंद के नाम पर वोट नहीं मिलते। वर्ण व्यवस्था के मुताबिक कायस्थ शूद्र होते हैं। इस हिसाब से विवेकानंद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और ज्योति बसु तीनों शूद्र हैं। तीनों की भारतीय सवर्ण राजनीति ने क्या गत की है, इतिहास इसका मूक गवाह है। नेताजी और विवेकानंद के नाम पर संघ परिवार हिंदुत्व राष्ट्रवाद का पुनरूत्थान की रणनीति शुरु से बनाये हुए हैं। डॉ. अंबेडकर के खिलाफ सुतीव्र घृणा के बावजूद अनुसूचित वोट के लिए गांधी के मुकाबले अंबेडकर को तरजीह देना भारतीय राजनीति की मजबूरी हो गयी है। विवेकानंद पर बवाल वोट बैंक साधने की कवायद के अलावा कुछ नहीं है।’
इस मिथक को अपने संन्सासी-जीवन में भ्रमण के दौरान स्वामी विवेकानंद ने स्वयं तोड़ा। मध्यप्रदेश सरकार द्वारा स्वामी विवेकानंद की एक सौ पचासवीं जयंती के अवसर पर युद्ध स्तर पर मुहिम चलाया जा रहा है और शैक्षणिक कार्यशालाओं में विवेकानंद साहित्य प्रचुर मात्रा में बांटा जा रहा है। ऐसे ही आयोजन में प्रकाशित वितरित एक पुस्तिका में यह दृष्टांत भी प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है कि भ्रमण के दौरान एक स्थान पर बैठकर चिलम पी रहे एक व्यक्ति के साथ बैठकर चर्चा करने की इच्छा स्वामीजी को हुई। ये उसके पास गए तो ‘परंपरानुसार’ वह इनसे दूर खिसक गया और ‘स्वामी’ से अस्पृश्यता की रीति को निभाने लगा। स्वामीजी ने संवाद स्थापित करने की दृष्टि से उससे चिलम पिलाने का आग्रह किया। उस व्यक्ति ने कहा ‘मैं भंगी हूं महाराज!’ कायस्थ संन्यासी संस्कारवश उसके पास से उठकर आगे बढ़ गए। किन्तु उनके विचारों ने कुछ ही देर में उनको मंथन के आधार पर लौटने का मत दिया। उन्होंने सोचा-‘‘यह मैंने क्या किया? मैं पूरे भारत को छुआछूत जैसी कुरीतियों से दूर कर उसे एक बनाने निका हूं और मैं स्वयं..?’’ फिर वे लौटे और आग्रहपूर्वक उस भंगी के साथ बैठकर उन्होंने चिलम पी। इसके बाद ही उन्होंने भारतीय जाति व्यवस्था और संस्कृति पर अपनी क्रांतिकारी पुस्तकंे लिखीं। इन्हीं पुस्तकंों के आधार पर भारत के क्रांतिकारी दल में उनके विचारों का भरपूर स्वागत किया गया।
भारत के उदारतावादी जानते हैं कि ईश्वरों में शिव, राम, कृष्ण, हनुमान, ऋषि मुनियों में नारद, अगस्त, वेदव्यास, शंकराचार्य आदि ‘संस्कारित होकर’ ब्राह्मण हुए हंै। अन्यथा मनुस्मृति के आधार पर तो सभी देहधारी जन्मना शूद्र ही हैं। (‘जन्मना जायतो शूद्रः, संस्कारात द्विज उच्चते’-मनुस्मृति।)
भारतीय मनीषी और साहित्यकार रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस तथ्य के परिप्रेक्ष्य में ही अश्पृश्यता के विरुद्ध ‘चंडालिनी’ नृत्यनाटिका की रचना की, जिसका देश विदेश में व्यापक पैमाने पर मंचन होता रहा। प्रसिद्ध उपन्यास सम्राट प्रेमचंद ने किसानों और दलितों को केन्द्र में रखकर अपनी कहानियों और उपन्यास लिखे जो हिन्दी साहित्य की धरोहर बने।
समकालीन संदर्भों में विवेकानंद आज भी इस अर्थ में प्रासंगिक हैं। साहित्य के माध्यम से प्रेमचंद, निराला, प्रसाद, महादेवी, अमृतलाल नागर, भगवतीप्रसाद वाजपेयी, सियारामशरण गुप्त आदि के अपृश्यता या छुआछूत पर प्रभावशाली साहित्य लिखने के बावजूद अपनी अस्मिता और वर्चस्व को बनाए रखने के लिए साहित्य जगत में ही जातिवाद और जातीय वैमनस्य यथावत बना हुआ है। दलित लेखन के दो विभाग मिलते हैं। ब्राहमण एवं अन्य लेखकों द्वारा दलित विमर्श पर सहानुभूति पूर्वक लिखा ‘जागृति साहित्य’ और शूद्रों या दलित लेखकांे द्वारा लिखा गया ‘भोगा हुआ दलित साहित्य।’ भारत सरकार द्वारा बिना जातिगत भेदभाव के अंबेडकर पुरस्कार उन समस्त लेखकांे को दिया जाता है जो दलित विमर्श पर लेखन कर रहें हैं। लेकिन इसके बावजूद साहित्यकारों में आंतरिक भाव वही जातिगत अलगाववादी है।
हालांकि ऐसे भी लेखक हैं जो दलित लेखन को अन्य लेखन से विलगाकर नहीं देखते। मध्यप्रदेश साहित्य परिषद द्वारा पाठकमंच को हाल ही में उपलब्ध करायी गई देवेन्द्र दीपक की पुस्तक ‘संत रविदास की रामकहानी’ अनेक अर्थों में प्रासंगिक हैं।
इसका तात्पर्य यह नहीं है कि विवेकानंद ने केवल जातिवाद की बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया। विवेकानंद चाहते तो किसी राजनैतिक संगठन में शामिल होकर ज्वलंत मुद्दों को उछालकर जनता के विग्रह का आनंद लेते रहते। किन्तु उनका सपना तो भारत के खोए हुए आत्मस्वाभिमान और औदात्य का पुनर्जागरण था। इसके लिए भारत के मूल एकात्मिक संस्रोतों का मार्ग पकड़ा। धर्म और संस्कृति का पथ ग्रहण किया। अच्छााइयां इसी मार्ग से आती हैं और अवसरवादी मानसिकता अपने स्वार्थपूर्ति के ईंधन भी इसी में खंगालते हैं। विवेकानंद ने अध्यात्म का मार्ग क्यों पकड़ा और कैसे महात्मा गांधी के उद्देश्यों को उनके चिंतन का रचनात्मक सहयोग मिला इसका उल्लेख पूर्व केन्द्रीय मंत्री जगमोहन जी अपने लेख ‘समाज सेवा, धर्म और राजनीति के संदर्भ में गांधीजी के विचारों में विवेकानंद का प्रभाव’ में किया है। वे लिखते हैं-‘‘1901 में गांधीजी कांग्रेस सम्मेलन में भाग लेने के लिए कोलकाता का दौरा किया। वह इस दौरान विवेकानंद से मिलने गए, जो उस समय वस्तुतः मृत्युशैया पर थे। दोनों के बीच क्या बातचीत हुई, इसका कोई रिकार्ड नहीं है, लेकिन यह आसानी से समझा जा सकता है कि दोनों के बीच अस्पृश्यता के मुद्दे पर अवश्य चर्चा हुई होगी। हाल में जोसेफ लेलील्ड की ‘ग्रेट सोल’ शीर्षक से गांधीजी पर जो पुस्तक प्रकाशित हुई है उसमें लिखा गया है-कोलकाता में हुई मुलाकात के बाद गांधीजी ने अपने भाषणों में जब भी विवेकानंद का जिक्र किया तो अस्पृश्यता की बीमारी का उल्लेख अवश्य हुआ। विवेकानंद और गांधीजी, दोनों के पास शक्तिशाली और मौलिक मस्तिष्क था। दोनों को भारतीय संस्कृति की आत्मिक शक्ति पर अटूट विश्वास था। दोनों व्यावहारिक वेदांत पर भरोसा करते थे और उन्होंने हिंदुत्व को सेवा आधारित जीवन दर्शन के रूप में देखा, जिसमें उच्चतम स्तर की नैतिकता और आदर्श हों। दोनों ने यह सोचा कि आधुनिक व्यक्ति अपने चित्त की वृत्तियों पर बाहरी माध्यमों से जीत हासिल करने की आशा नहीं कर सकता। गांधीजी और विवेकानंद, दोनों का तर्क था कि महान सामाजिक और नैतिक व्यवस्था केवल महान व्यक्तित्वों के कंधों पर ही तैयार की जा सकती है। अगर आपके दिल में कोई शुद्धता, निष्पक्षता और न्याय नहीं होगा तो ये गुण आपके घर में नहीं आ सकते।’  
एक समय था जब राजनीति को धर्म से अलग रखा जाता था। विवेकानंद और महात्मा गांधी के प्रयासों में भी यही दिखाई देता है। लेकिन आज दोनों के बीच का यह अंतर समाप्त हो चुका है। दोनों इस तरह एक दूसरे में मिल गए हैं कि दोनों को अलग करना संभव नहीं है, पहचानना असंभव है कि कहां से धर्म शुरू होता है और कहां से राजनीति।
आज हिन्दुत्व के अर्थ में स्वामी विवेकानंद अत्यधिक प्रासंगिक हो चले हैं। इस संदर्भ में एक लेख के ये अंश बहुत महत्वपूर्ण मालूम पड़ते हैं-‘‘देश में वह हिंदुओं से अधिक घुलते-मिलते नहीं थे। जब उनके आश्रम में एक अनुयायी ने उनसे पूछा कि व्यावहारिक सेवा के लिए रामकृष्ण मिशन की स्थापना का उनका प्रस्ताव संन्यासी परंपरा का निर्वहन कैसे कर पाएगा? तो उन्होंने जवाब दिया- आपकी भक्ति और मुक्ति की कौन परवाह करता है? धार्मिक ग्रंथों में लिखे की किसे चिंता है? अगर मैं अपने देशवासियों को उनके पैरों पर खड़ा कर सका और उन्हें कर्मयोग के लिए प्रेरित कर सका तो मैं हजार नर्क भी भोगने के लिए तैयार हूं। मैं मात्र रामकृष्ण परमहंस या किसी अन्य का अनुयायी नहीं हूं। मैं तो उनका अनुयायी हूं, जो भक्ति और मुक्ति की परवाह किए बिना अनवरत दूसरों की सेवा और सहायता में जुटे रहते हैं।’
इसका अर्थ यह है कि स्वामी विेवेकानंद ने भारत की दिशाहीनता का भरपूर अध्ययन किया था और वे जानते थे कि भारत में सिद्धांतों की तरफ़ किसी का मोह नहीं है। सभी तात्कालिक लाभ का प्रयास करते हैं। इसीलिए सामाजिक उत्थान पर उन्होंने धार्मिक उत्थान से अधिक जोर दिया। उन्होंने भारत के लोगों के आचरण पर क्षुब्ध होकर कहा था-‘‘ मुझे मनुष्य चाहिए। करोड़ों जनसँख्या के जन को देखकर मनुष्य नही लग रहा। जो भारत भक्ति अपनाता है, उसे ही मनुष्य कहने को तत्पर। भारत भक्ति अर्थात क्या? निरक्षर को देखकर उसे सुशिक्षित करने की जिसमें चाह हो, गरीबी को देखकर अपनी संपत्ति बांटने की इच्छा हो, भूखे को घर बुलाकर खाना खिलाने का भाव हो, तो ही देशभक्त। भारत का पुनरुत्थान ऐसे ही मनुष्यों के माध्यम से संभव है।’’
इन शब्दों में विवेकानंद का वास्तविक स्वरूप छुपा हुआ है। एक अन्य संदर्भ में बुद्धिविहीन कर्मकाण्ड और ढोंग में उलझे अपने एक गुरुभाई को फटकारते हुए उन्होंने कहा था कि मूर्तिपूजा से तुम्हारे आराध्य को शांति नहीं मिलेगी। वास्तविकता तो यह है कि ‘‘गरीब को संपन्न, मूर्ख को बुद्धिमान, चांडाल को अपने जैसा बनाना ही भगवान की पूजा है। इससे ही राष्ट्र निर्माण, भारत पुनरुत्थान होगा।’’
वेदांत के अन्य प्रवक्ता श्री अरबिंदो ने विवेकानंद के प्रभाव पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए  भी यही भाव प्रस्तुत किया- ‘भारत को अपने भीतर से समूचे विश्व के लिए भविष्य के पंथ का निर्माण करना है। एक शाश्वत पंथ जिसमें तमाम पंथों, विज्ञान, दर्शन आदि का समावेश होगा और जो मानवता को एक आत्मा में बांधने का काम करेगा। स्पष्ट तौर पर ‘मात्र एक भाषण ने’ ऐसी ज्योति प्रज्ज्वलित की, जिसने पाश्चात्य मानस के अंतर्मन को प्रकाश से आलोकित कर दिया और ऊष्मा से भर दिया।’
लेकिन ऐसे प्रखर भारतीयता के पक्षधर स्वामी विवेकानंद के तमाम प्रयासों का क्या हुआ? भारत में जो हिन्दुत्व के लिए काम कर रहे हैं या उसकी पुनसर्थापना का काम कर रहे हैं और उसमें विवेकानंद को प्रमुखता के साथ जोड़ रहे है, उन्हें इस बात का ध्यान रखना होगा कि वे उनके सपनों का साकार करने के लिए क्या कर रहे हैं? उन्हें समीक्षा करनी होगी कि आज इतने वर्षों बाद, डेढ़ सौ वर्षो बाद भी हमारी मानसिकता कितनी बदली?
भारतीय समकालीन साहित्य के संदर्भ पर ही बात करते हुए एक और लेख की चर्चा करना समीचीन होगा। जवाहरलाल नेहरू विश्वविशालय में समाजशास्त्र के प्राध्यापक डाॅ. अमित कुमार शर्मा का हाल ही में प्रकाशित एक लेख है -‘‘हिन्दुत्व का अर्थ’’। इस लेख में हिन्दुत्व के सीमित अर्थ पर चिंता प्रकट करते हुए वे लिखते हैं-‘‘हिन्दुत्व की अवधारणा में दयानंद, विवेकानंद, तिलक, श्री अरविंद और सावरकर के बाद एक भी नया शब्द किसी ने नहीं जोड़ा है।......वैचारिक शून्यता को विचारधारा कहकर कब तक उधार की गाड़ी चलाई जाएगी? उदार हिन्दुत्व, सांस्कृतिक राष्टवाद, एकात्व मानववाद, मुस्लिम अविद्वेष, पंथ निरपेक्षता आदि कोरे कामचलाउ शब्द हैं जिनका अर्थ बीसवीं सदी के सामाजिक संदर्भों पर निर्भर था। इक्कीसवी सदी के आधुनिक भारत को परिभाषित करने में ये शब्द समर्थ नहीं हैं। किसी सफल राजनीतिक दल के पीछे कोई लौह आबद्ध विचारधारा हो यह आवश्यक नहीं है। खासकर लोकतांत्रिक व्यवस्था में। गुलाम भारत और विभाजन के तरफ़ बढ़ते भारत में तो कई विचारधाराएं जरूरी थीं, लेकिन अब समय और परिस्थिति बदल चुकी हैं। अब युगानुकूल विचारधारा चाहिए।’’
हिन्दू धर्म के विषय में उनका अपना मत है- ‘‘हिन्दू धर्म सृष्टि के साथ तादात्म्य पर बल देने वाला धर्म है।’’ इसके पक्ष में वे आगे लिखते हैं -‘‘ हिन्दू जीवन दर्शन विशेष रूप से किसी सीधी राह की बात नहीं सोचता, वह जीवन की जटिलताओं की अच्छी तरह ध्यान में रखते हुए ही लम्बी और घुमावदार राह की परिकल्पना करता है। हिन्दू धर्म में गुरू की कल्पना परित्राता के रूप में नहीं है, नेत्र उन्मीलक के रूप में है। वह राह चलना नहीं सिखाता, राह पहचानना सिखाता है। चलना तो आदमी को स्वयं होता है। रामकुष्ण परम हंस और आनंद कुमार स्वामी इसी किस्म के हिन्दू धर्म गुरु हैं जिनकी सिखावन आज भी प्रासंगिक है।’’
विवेकानंद का नाम उन्होंने स्पष्टतः नहीं लिया है लेकिन रामकृष्ण परमहंस कहकर वे यह इंगित अवश्य करते हैं कि संदर्भ विवेकानंद ही हैं। इसीलिए निष्कर्ष में वे विवेकानंद की तरह ही चिंतित स्वरों में कहते हैं -‘‘ हिन्दू जीवनदर्शन के व्यवहार और सिद्धांत में बहुत अंतर आ गया है। इसी से हिन्दू समाज के अंग्रेजीदां लोग कोरे काम चलाउ शब्दों से अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को परिभाषित करने लगे हैं। इससे किसी का कल्याण नहीं हो सकता। हिन्दुत्व में जिनकी अब भी आस्था है, उन्हें उपरोक्त मुद्दों पर विचार करना  चाहिए।’’
कुलमिलाकर गेंद ले देकर हिन्दुत्ववादियों के घेरे में ही डाली जा रही है। इसमें कोई संदेह हैं भी नहीं कि आज जब हम स्वामी विवेकानंद के जीवन दर्शन और उनके विचारों से आंदोलित साहित्य की बात करते हैं तो हमारे हिस्से में यह सिद्ध करने का उत्तरदायित्व स्वमेव आ जाता है कि हम व्यावहारिक दृष्टि से किन धारणाओं का सामाजिकीकरण करें? किन ऐसे सिद्धांतों पर ज़ोर डाले जिससे विवेकानंद के सपनों का भारत मूर्त रूप ले सके। इस बात पर भी गौर करे कि विवेकानंद ने क्यों कहा था कि ‘‘उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ। अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक रुको नहीं जब तक कि लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।’’ सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण उनका यह कथन है जो उन्होंने जीवन के अंतिम दिन शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या करते समय कहा ‘‘एक और विवेकानंद चाहिए, यह समझने के लिए कि इस विवेकानंद ने अब तक क्या किया है।’’
हमारा अभियान अब यहीं से आरंभ होना चाहिए। स्वामी विवेकानंद की स्मृति तभी सार्थक भी होगीजब हम विवेकानंद के चिंतन को समझे, उसी दिशा में सोचे और उन मानदंडों पर काम करना अनवरत जारी रखें।





 डाॅ.रा.रामकुमार,
    एसोसियेट प्रोफेसर,
    हिन्दी विभाग,
    शासकीय जटाशंकर त्रिवेदी स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
बालाघाट. म. प्र. 481001.

मो.न. 9893993403
  ई मेल:  rkramarya@gmail.com,

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