Thursday, September 30, 2010

और मेरा आगे निकल जाना

पड़े रह जाना तीन लेखकों का
फुटपाथ पर
और मेरा आगे निकल जाना


तीन लेखक फुटपाथ पर पड़े हैं। सोचता हूं कि उन्हें उठा लूं। मगर मेरी खुद की हालत खस्ता है। लोग देख रहें है कि मैं भी फुटपाथ पर खड़ा हुआ हूं। फुटपाथ के साथ मैं इस कदर तदाकार हो चुका हूं कि उससे मेरा तादात्म्य स्थापित हो चुका है। संतों ने इसे ही पहुंची हुई स्थिति कहा है। मगर मैं संतों को कहां ढूंढूं कि वे मेरी इस स्थिति को देख सकें। फलस्वरूप मैं मनमारे फुटपाथ पर खड़ा बेचैनी से उसका इंतजार कर रहा हूं। मेरे हाव भाव से ही लग रहा है कि मैं जिसका इंतजार कर रहा हूं उसके लिए किसी भी स्थिति से गुजर सकता हूं। उसे देखकर मैं बावरा सा दौड़ सकता हूं ,बिना यह सोचे कि पागलों की तरह दौड़नवाली गाड़ियों के नीचे आ भी सकता हूं। यही आदर्श लगाव और प्रतीक्षा है।
मैं जब अपनी बेसब्री नहीं संभाल पाता तो पास खड़े एक अजनबी से पूछता हूं:‘‘ वह कब आएगी।‘‘
अजनबी उपेक्षा से कहता है:‘‘ वह आधा घंटा बाद आएगी। मैं भी उसका इंतजार कर रहा हूं।‘‘
मैं समझ जाता हूं कि एक तो यही प्रतियोगिता में है जिसे पछाड़कर मुझे उस तक पहुंचना है।
मैं तनाव में आ जाता हूं। ध्यान बंटाने के लिए फिर उन तीन लेखकों की तरफ देखने लगता हूं जो फुटपाथ पर पड़े हुए हंै। उनके सिर पर खड़ा एक उठाईगीर जैसा आदमी मुझसे पूछता है:‘‘ क्या सोच रहे हो ?’’
‘‘ सोचता हूं इन्हें उठा लूं !?‘‘
‘‘ तो उठा लो ,किसने रोका है ? ये पड़े ही इसलिए हैं कि कोई तो इन्हें उठाए।‘‘
आखिर मैं हिम्मत करता हूं और तीनों को एक साथ उठा लेता हूं। तीनों इस कदर मेरे हाथ में आ जाते हैं जैसे घर से निकाले गए वे बच्चे जिन्हें कोई दयालु पालनहार मिल गया हो। उन्हें हाथ में लेकर मैं फिर सड़क की तरफ देखता हूं कि शायद वह आ जाए , शायद किसी की नजर मुझ पर पड़ जाए और उसे पता चल जाए कि मैंने कितना बड़ा काम किया है। यानी फुटपाथ पर पड़े तीन लेखकों को मैंने उठा लिया हैं। मगर गिरे हुए लेखकों को देखने की फुर्सत किसे है ? अगर मैं किसी लड़की को उठाता...........फालतू की बात कर रहा हूं मैं ! लड़की गिरती भी नहीं कि उसे उठाने कितने ही लोग लपक पड़ते ?मुझे तो अवसर ही नहीं मिलता।
मैं अंदर ही अंदर अपनी उत्साह से भरी गलत सोच से शर्मिंदा हो जाता हूं। झेंप मिटाने के लिए फिर इधर-उधर देखता हूं। मैं इस समय भरी-दोपहर मून-लाइट के ठीक सामनेवाले फुटपाथ पर हूं। यह सड़क जो सामने से सर्र-सर्र भागी जा रही है ,वह पागलखाने होते हुए डिफेंस की तरफ जाती है। मैं चाहता तो कह सकता था कि यह सड़क रिजर्व बैंक या लाइफ इंशुरेंस होकर डिफेंस की तरफ जाती है। मगर मेरी हालत ऐसी नहीं है कि मैं रिजर्व-बैंक या लाइफ-इशुरेंस के बारे में सोच भी सकूं। मेरा रिजर्व बैंक और लाइफ इंशुरेंस तो डिफेंस रोड में रहनेवाला वह व्यक्ति है ,जिससे मदद मिलने की उम्मीद अंसभव है , मगर है तो। अंसभव होने पर भी उम्मीद की साख प्रजातंत्र में बहुत ऊंची है। मदद मिली तो कुछ मिलेगा ही , नहीं मिली तो पास से क्या गया ? सोचेंगे ,घूमने निकले थे। मैं महान साम्यवादियों का तुच्छ-सा लक्ष्यबिंदु हूं । मुझसे ही प्रेरित होकर उन्होंने कहा था ,‘‘पाने के लिए पूरी दुनिया, खोने के लिए कुछ भी नहीं। यही सर्वहारा की क्रांति है।’
यह विचार आते ही मैं फिर प्रगतिशील हो जाता हूं। उठाए गए लेखकों को दुर्गति से उठाकर संघर्ष के रास्ते पर धकेलने की कार्ययोजना बनाने लगता हूं। तभी लेखकों के सर पर खड़ा उठाईगीर बोलता हैः‘‘ देख क्या रहे हो.....ये तीनों बड़े महान लेखक हैं।‘‘
‘‘ तो फुटपाथ पर क्यों पड़े हैं ?‘‘ आदतन मैंने शंका की।
'‘यही दुनिया की रीत है...हर महान आदमी को पहले फुटपाथ पर पड़ना होता है फिर वह सुपर स्टार होता है।’’
मुझे हंसी आ गई। वह फिल्मी लोगों के बारे में कह रहा था। मैंने फिल्मी पत्रिकाएं पढ़ीं हैं।
‘‘हंसते क्या हो ? इन्हें अपने घर में रखोगे तो तुम्हारी इज्जत बढ़ जाएगी।‘‘ वह बोला और तरतीब से रखे गए किताबों के ढेर पर कपड़ा मारने लगा।
मैंने किताबों पर नजर डाली और उन लेखकों के नाम पढ़े जो सड़क पर पड़े थे । आगे चलकर यही मेरी इज्जत बढ़ानेवाले थे। उनमें एक का नाम था हरिशंकर ,दूसरा शरद था और तीसरा रवीन्द्रनाथ। तीनों नाम कुछ जाने-पहचाने से लगे। रवीन्द्रनाथ टैगोर को कौन नहीं जानता... जन गण मन अधिनायक वाले। शरद चंद्र को भी लोग जानते ही होंगे...देवदास वाले। तीसरा नाम मुझे ठीक से याद नहीं आ रहा था...हरिशंकर या हरिश्चंद्र ....। एक भारतेंदु हरिश्चंद्र का हास्य प्रहसन ’अंधेरनगरी ,चौपट राजा ’ बचपने में हमने पढ़ा था। मुझे वह नाटक याद आया तो हंसी आ गई। आदमी बोला:‘‘ देखा ,अभी तुमने सिर्फ नाम ही पढा़ है और तुम्हारी हंसी छूट गई। बड़े कार्टून लेखक हैं ये......घर ले जाकर पढ़ोगे तो हंसते हंसते तुमको बड़ा मजा आएगा।’’
‘‘ डुप्लीकेट तो नहीं हैं।‘‘ मैंने उन कार्टून लेखकों के नाम ठीक से देखते हुए प्रश्न किया। आजकल सेम नाम से डुप्लीकेट माल बहुत बिकता है। मेरा अनुमान सही था। भारतेन्दु हरिश्चंद्र से मिलता जुलता नाम हरिशंकर परसाई था। शरदचंद्र बंधोपाध्याय के नाम की नकल पर शरद जोशी छपा हुआ था। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के नाम की कापी करते हुए रवीन्द्रनाथ त्यागी लिखा हुआ था। अच्छा ,तभी वह जल्दबाजी कर रहा था कि मैं बिन देखे उठाऊं और चल दूं। मगर मैंने भी घास नहीं छीली !
प्रगट में मैं उस फुटपाथिये से कुछ नहीं बोला। मूर्खों से क्या उलझना। मैंने तय कर लिया था कि डुप्लीकेटों के चक्कर में मैं नहीं आउंगा। फिर भी समय काटने के लिए यूहीं पन्ने उलटने पलटने लगा।
पढ़ते पढ़ते मुझे फिर बौद्धिक गुस्सा आया। गधों को शीर्षक रखना भी नहीं आया। एक ही शीर्षक दिए थे तीनों को..‘ मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएं ’। एक यदि धोके से हिट हो जाए तो लोग शीर्षक देखकर ही दूसरी और फिर तीसरी ले जाएं।
परन्तु नकल में उनकी अकल की दाद देनी पड़ेगी। भारतेंदु हरिश्चंद्र का नाटक तो था ही हास्य व्यंग्य का। शरद बाबू ने भी देवदास में सामंतवादियों ,उनकी संतानों और समाज के ठाकुरों पर जी भर कर व्यंग्य किया है। इसी प्रकार बीस तीस सालों से रवीन्द्रनाथ जैसे गंभीर लेखक की रचना जनगणमन को भी विद्वानों ने सम्राट् जार्ज पंचम की स्तुति के बहाने उनपर व्यंग्य किया जाना सिद्ध कर दिया है। यानी मूलतः ‘ जनगणमन ’ एक नोबल प्राइज विनर सटायर है। इतने भारी और महान लेखकों की नकल पर इन तीन लेखकों को फुटपाथ पर बेचा जा रहा है।
‘‘तो ले रहे हो ? आधी कीमत पर !‘‘ फुटपाथिये ने कहा।
मैंने सोचा ‘देखो...कितनी हड़बड़ी है इसको नकल बेचने की..अब तो नहीं ही लूंगा जा...’
इसके पहले कि मैं कोई जवाब देता मेरे साथ खड़े रकीब ने मुझे बताया:‘‘ आ गई , चलो‘‘
मैंने देखा कि डिफेंस की ओर जानेवाली बस आ गई थी। मैंने उठाए हुए लेखकों को वही फुटपाथ पर डाला और लपका।
आपने देखा कि किस तरह महान लेखक फुटपाथ पर पड़े रह गए और मैं आगे बढ़ गया।
240709


समर्पण: एक बहुत महत्वपूर्ण रचना उपेक्षित हो रही थी। मेरी प्रिय रचनाओं में से यह एक है। आपकी भी यह प्रिय बने इस सद्भावना से इसे पूर्ण संकोच , संपूर्ण नादानी और व्यापक विनम्रता के साथ आपके हाथों में सौंप रहा हूं। कृपया प्यार से इसे देखें और औरों को भी दिखाएं। अब यह आपकी है।
जिन मित्रों को पढ़कर गुस्सा आए वे कृपा पूर्वक इसे ‘एक गधे की आत्मकथा’ समझ लें। जिन्हें मजा आए वे अपनी बौद्धिक उपलब्धि मानकर इसे हरिशंकर परसाई जी या शरद जोशी जी की रचना मान लें। मान लेने में क्या जाता है? वैसे भी जहीं भर को पनाह देनेवाले जहांपनाहों ! मैंने आपकी खुशी के लिए ही यह ‘राग-दरबारी’ गाया है। मैं तो अदना लोक-सेवक हूं आपका।

Wednesday, September 15, 2010

चुहिया बनाम छछूंदर



डायरी 24.7.10

कल रात एक मोटे चूहे का एनकाउंटर किया। मारा नहीं ,बदहवास करके बाहर का रास्ता खोल दिया ताकि वह सुरक्षित जा सके।
हमारी यही परम्परा है। हम मानवीयता की दृष्टि से दुश्मनों को या अपराधियों को लानत मलामत करके बाहर जाने का सुरक्षित रास्ता दिखा देते हैं। बहुत ही शातिर हुआ तो देश निकाला दे देते हैं। आतंकवादियों तक को हम कहते हैं कि जाओ , अब दुबारा मत आना। इस तरह की शैली को आजकल ‘समझौता एक्सप्रेस’ कहा जाता है। मैंने चूहे को इसी एक्सप्रेस में बाहर भेज दिया और कहा कि नापाक ! अब दुबारा मेरे घर में मत घुसना। क्या करें , इतनी कठोरता भी हम नहीं बरतते यानी उसे घर से नहीं निकालते अगर वह केवल मटर गस्ती करता और हमारा मनोरंजन करता रहता। अगर वह सब्जियों के उतारे हुए छिलके कुतरता या उसके लिए डाले गए रोटी के टुकड़े खाकर संतुष्ट हो जाता। मगर वह तो कपड़े तक कुतरने लगा था जिसमें कोई स्वाद नहीं होता ना ही कोई विटामिन या प्रोटीन ही होता। अब ये तो कोई शराफत नहीं थी! जिस घर में रह रहे हो उसी में छेद कर रहे हो!? आखि़र तुम चूहे हो ,कोई आदमी थोड़े ही हो। चूहे को ऐसा करना शोभा नहीं देता।
हालांकि शुरू शुरू में वह सात्विक प्रवृत्ति का मालूम पड़ता था। पत्नी रामायण पाठ करती तो वह आसपास मंडराया करता। पत्नी समझती सुधर रहा है। रामायण के प्रति उसकी श्रद्धा बढ़ने लगी। एक दिन उसने रामायण की जिल्द का कोना कुतर लिया। यह बर्दास्त के बाहर था। पत्नी की श्रद्धा रामायण से तो कम न हुई लेकिन चूहे की औकात समझ आ गई जो रामायण सुनकर भी संत नहीं हो पाया था। मैंने सुना है कि कई आदमी मरते समय यह ग्रंथ सुनकर स्वर्ग पहुंच गए। यह कमबख्त चूहा हमारे घर में ही घूमता रहा। नहीं , मतलब .....यूं ... हमारा घर हमारे लिए स्वर्ग से कम नहीं है। चूहे के लिए भी स्वर्ग ही होगा तभी तो वह टिका हुआ है। इस बात पर देखो ,जितना सोचो उतना चूहे के पक्ष में जाता है ; इसलिए मैंने सोचना छोड़कर पत्नी की ‘चूहा मुक्ति योजना’ पर अमल का रास्ता खोजना शुरू कर दिया।
चूहा हमारे सोचने से बेपरवाह था। जब सब सो जाया करते थे तब वह ‘नाइट वाचमैन’ की तरह चुपचाप दबे पांव निकलता और वही जानता है कि किन-किन चीजों पर अपनी थूथनी आज़माता। कभी कुछ कुतरा हुआ मिलता ,कभी कुछ। वह जैसे जानबूझकर हमें आतंकित करने का प्रयास कर रहा था। खाद्य-अखाद्य सब पर थूथनी मार रहा था।
टमाटर कुतरा , चलो खाने की चीज है। चप्पल क्यों कुतरा ? मैं फिर सज्जनतापूर्वक चूहे से पूछना चाहता हूं -‘क्या तुम आदमी हो ? चप्पल तो तुम्हारे खाने की चीज़ नही है।’
आलू कुतरा तो हम शांत रहे कि चलो खाने की चीज़ कुतरा। साड़ी क्यों कुतरा ? यह चूहे की हरकत तो नहीं है ? ऐसे गंदे काम तो ‘विलेन’ करते हैं , दुश्शासन जैसे आदमी करते हैं।
शिमला मिर्च कुतरी तो हमें बुरा जरूर लगा ,पर उतना नहीं लगा कि चलो भाई चूहा है। पर 'डव' साबुन कुतर डाली...चूहा क्या खुद को कैटरीना कैफ या एंजेलिना जोली समझता है ....हीरोइन बनना चाहता है?
परन्तु चूहा हीरोइन कैसे बन सकता है ? चूहा तो पुल्लिंग है , पुरुषवाची है। चूहा का स्त्रीलिंग चुहिया है। अब कैसे पता चले कि कौन चूहा है ,कौन चुहिया !! क्या उन्हें आइना दिखाएं ?..इसका आशय समझ लें।
आचार्य रजनीश ओशो ने एक कथा बुनी कि एक दार्शनिक के पास शिष्यों ने समस्या रखी: गुरुदेव बताएं कि कैसे पता चले कि कोई मक्खी स्त्री है या पुरुष। दार्शनिक ने कहा - उन्हें आइना दिखाओ। आइना देखे ,मटके और उड़ जाए तो पुरुष । और आइने से चिपक के घंटों बैठे तो समझो स्त्री। अगर यह तार्किक-प्रमाण स्वीकार कर लिया जाए तो निश्चित रूप से यह पुरुष चूहा है। ड्रेसिंग टेबल के आइने के पास वह कभी नहीं दिखा।
मैंने अधिकतर लोगों को पुरुषों के लिए चूहा शब्द का इस्तेमाल करते ही सुना है। मगर सबसे सच्चा प्रमाण मेरी पत्नी है। वह सभी चूहों को पुरुष मानती है। उसकी नजर में चुहिया केवल छछूंदर है। वह छछूंदर को ही चुहिया कहती है। दोनों की शारीरिक बनावट में अंतर हैं। चूहा गोल मटोल होता है। छछूंदर ....पत्नी के शब्दों में चुहिया ,... आगे के पैरों और पीछे के पैरों के बीच लम्बी होती है।
एक कहावत है कि जहां छछूंदर होती है वहां चूहे और सांप नहीं आते। इस दृष्टि से 'चूहों का नीतिशास्त्र' आदमियों से बेहतर है। आदमी रूपी चूहे या सांप तो वहीं मंडराते हैं जहां स्त्री रूपी छछूंदर ..पत्नी के शब्दों में .चुहिया होती है। यानी चूहों की दुनिया शरीफों की दुनिया है। तभी शरीफ आदमी को आदमी लोग चूहा कहते हैं। इसलिए जहां चूहे होते हैं ,वहां सांप आ जाते हैं। चूहे बिल बनाते हैं और सांप उन्हीं रास्तों से शरीफ चूहों तक पहुंच जाते हैं, उन्हे अपना शिकार बनाते हैं। विश्वास के रास्ते पर ही विश्वासघात के सांप दिल पर मार करते हैं।
बहरहाल ,छछूंदर जहां होती हैं ,वहां सांप नहीं होते ; यह एक उत्साहवर्धक सूचना है। सूरदास को जब पहले पहल यह सूचना मिली तो वे गा उठे थे-‘ भई गति सांप छछूंदर जैसी’। मेरे अंदर का सूरदास भी गा उठा। यह तो एक तीर से दो शिकार करने जैसा उपकरण मिल गया था। सोच रहा हूं छछूंदरों को बुलाने के उपायों पर विचार किया जाए। एक साथ दो फायदे उठाए जाएं- सांपों को भी दूर रखा जाए और चूहों को भी। जिन्दगी इन दो प्राणियों से घिरी न रहे इसका कितना सुन्दर उपाय हाथ लगा है। छछूंदर की एक खासियत है ,जो हमें अपने अनुभव से समझ आई है ,वह यह कि वह बहुत नमकहलाल किस्म की होती है। दिन भर घर के कोने कोने में दौड़ती रहती है। जितना खाती है उतना दौड़ दौड़कर वह घर के कोने कोने की चौकसी करती है कि किसी कोने से सांप या चूहा न आ जाए। उसकी इसी प्रवृति के कारण पत्नी उसे चुहिया कहती है। अब पत्नी के मन की पत्नी जाने। (सुना है और कोई नहीं जानता। ईश्वर नामक सर्वज्ञ भी नहीं। नोट करें कि इस रहस्य को ,जिसे सब जानते हैं ,मैं गोपनीयता की दृष्टि से ‘कोष्ठक’ में दे रहा हूं।)
परन्तु ,छछूंदर में एक ही बुरी बात है कि वह हर कोने में खाया पिया पचाकर निकालती रहती है। इससे घर बदबूदार हो जाता है। हमको चूहों और सांपों से भरी सुरक्षित जिन्दगी चाहिए तो बदबू बर्दास्त करनी पड़ेगी। देखिए प्रकृति के भी कितने कठोर नियम है। इसीलिए शायद समझदार और प्रेक्टीकल लोग बदबूदार जिन्दगी को स्वीकार करते हुए दौड़े जा रहे हैं , खूब खा रहे हैं....खूब कर रहें हैं(भागमभाग)... और हर कोने में बदबू फैला रहे हैं। कुलमिलाकर छछूंदर यानी पत्नी के शब्दों में चुहिया , हमारा वर्तमान आदर्श है।
एक और बात। जितना खाती है छछूंदर ,उतना दौड़ती है और उतनी जल्दी मर भी जाती है। सुना है मुफ्त का सूंटने और खानेवाले भी ब्लड प्रेशर , ब्रेन हैमरेज , शुगर , हार्टअटैक नामक इम्पोर्टेड इंगलिश बीमारियों से मर जाते हैं। हालांकि 'राष्ट्रीयता' नामक देशी बीमारी भी है। इस बीमारी का यह लक्षण है कि जिसे होती है वह बात बेबात दंगे फैलाया करता है। दंगों में फैलानेवाले तो नहीं मरते ,मासूम लोग मर जाते हैं। इसलिए बुद्धिमान लोग कहते हैं , बीमारी चाहे देशी हो या इम्पोर्टेड ..जहां तक बने , बचे रहो। यही कारण है कि चूहे से बचने के हम बहुत से उपाय करते रहे। पिंजरा रखा। कैक रखा , काला पावडर सफेद आटे में मिलाकर रखा। मगर चूहे से हम घिरे रहे। चूहे को हम किसी भी उपाय से घेर नहीं पाए। किसी चूहदानी में उसे फंसा नहीं पाए। मगर...

एक रात की बात है। पत्नी किचन समेटकर बैठकखाने में आराम से बैठकर टीवी देखने आ गई। नियमानुसार आधे घंटे में पानी पीने किचन में गई। चूहे को पता ही नहीं था कि आम भारतीय स्वास्थ्य-सतर्क व्यक्ति खाना खाने के आधा घंटे बाद पानी भी पीता है। वह समझा कि खाने के साथ ही पानी को भी निपटा दिया गया होगा। यहीं वह फंस गया। फंस क्या गया घिर गया साहब!
पत्नी ने किचन के दरवाजे पर सैनिक की तरह डटकर मुझे आवाज दी... ‘‘पति नामक प्राणी ! आइये...वह किचन में है...’’ वह यानी चूहा ..मैं तुरंत लपका। पत्नी के हाथ में फूलझाड़ू थी। फूलझाड़ू को कौन नहीं जानता ? पत्नियां तो अवश्य। कुछ नब्बे प्रतिशत पति भी इसे पहचानते हैं। मैंने भी लपककर खरेटा उठा लिया। खरेटा झाड़ू का पुल्लिंग है। यह मोटी सीकों से बनता है। इसका उपयोग पत्नियां प्रायः कम करती हैं। जब कोई कचरा बहुत मोटा , भारी और अड़ियल होता है ,तब पत्नियों को खरेटा का इस्तेमाल करना होता है। आप समझ ही गए होंगे कि खरेटा मैंने क्यों उठाया। मोटा अड़ियल शत्रु हमारी घेरेबंदी में आया था। किचन मे रखी क्राकरी , बर्तन , खाने पीने की सामग्रियों के डिब्बों को बचाते हुए हम पूरे सुरक्षात्मक आक्रमण के मूड में आ गए। इधर मैं खरेटे से कोंच रहा था। पत्नी उधर चीखकर और उछलकर खुद को डरा रही थी। स्त्री जब डरकर चीखती है तो हमलावर अपने आप डर जाता है। पत्नी चीखकर उछलती तो चूहा घबराकर मेरी तरफ भागता। मानो मैं उसे बचाने खड़ा था। मैं इत्मीनान से उस पर खरेटे का वार करता जो कभी उस पर नहीं पड़ता। आखि़र वह दौड़-दौड़कर और पत्नी की चीखों से घबराकर अधमरा हो गया। घबराहट में वह यह भी नहीं देख पाया कि बाहर निकलने के लिए हमने किचन के कोर्टयार्डवाला दरवाजा खोल रखा है। जब वह बिल्कुल डगमगाने लगा और दौड़ने लायक भी नहीं रहा तो मैंने उसे खरेटे से बाहर उलीचना शुरू कर दिया। पांच छः बार खरेटे से उछालने पर उसे आंगन तक पहुंचा दिया गया। गिरता पड़ता चलकर वह अंधेरे में गुम हो गया।
‘‘अब वह इतना पिट चुका है कि दुबारा नहीं आएगा।’’ मैंने बुरी तरह हांफते हुए दीवान पर बैठते हुए कहा। पत्नी की सांसे भी उखड़ी हुई थी इसलिए वह केवल सिर हिलाकर रह गई।
यह था एक शुद्ध भारतीय चूहे का विशुद्ध भारतीय एन्काउन्टर।
इस घटना के दसेक दिन बाद , यानी इन पंक्तियों को अंतिम रूप देने तक एक विलायती समाचार छपा। मैं पढ़कर हैरान रह गया कि यार! ब्रिटिश चूहे तक स्मार्ट होते हैं कि वे चीनियों को चूना लगाकर ड्रेन पाइप से निकल जाएं। कि ब्रिटिश ड्रेन पाइप से ही क्यों भागते हैं......आई मीन ब्रिटिश चूहे !!!
लीजिए , आप भी पढ़िये और हो सके तो हैरान हो जाइये.........

एक समाचार: चूहे ने रेस्त्रां मालिक को मुश्किल में डाला !गाना चूहे का रेस्त्रां में परोसे जानेवाले सॉस में डुबकी और मिलना रेस्त्रां मालिक को अदालत की घुड़की । पस्त हो गई हिम्मत ,चुकानी पड़ी लापरवाही की किम्मत।
बात ब्रिटेन में स्थित एक चीनी रेस्त्रां की है। रेस्त्रां की रसोई में चूहे अक्सर उछल कूद मचाते रहते हैं। लेकिन उस दिन चूूहों की इस मस्ती को रेस्त्रां का निरीहक्षण करने आए स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी ने देख लिया। चूहा तो निकल गया अपने रास्ते, गाज गिरी रेस्त्रां के मालिक पर। उसे तीस हजार पाउंड ( करीब 21 लाख रुपये) के जुर्माने के साथ आठ महीने जेल की निलंबित-सजा भी भुगतनी होगी। स्वास्थ्य अधिकारी लंदन के ‘क्वीन्सवे’ में स्थित चीनी रेस्त्रां ‘केम टोंग’ का औचक निरीक्षण करने आए। जैसे ही वह रसोई में पहुंचे , उन्होंने देखा कि पूरी रसोई गंदी पड़ी है। कॉकरोच के अंडे और झींगा मछली के टुकड़े यहां वहां बिखरे हैं। एक चूहा तो ग्राहकों को परोसे जानेवाले सॉस के कटोरे में कूदकर निकला और ड्रेन पाइप के रास्ते बाहर चला गया। अधिकारियों ने इसका फोटो खींच लिया। (एजेन्सी.)