Saturday, February 27, 2010

सभी परिन्दे उड़ जाते हैं पेड़ खड़ा रह जाता है।

नैनपुर की पहचान उमाशंकर के साथ होती है। नैनपुर के सबसे बड़े भूखण्ड के वे स्वामी थे। स्कूल , कारखाने, गोदाम , बिल्डिंग , बैंक भवन ,जीवनबीमा भवन सब उनके थे। सबसे ज्यादा लोग उनके थे । अमीर उनके थे गरीब उनके थे। सभी विभागों के अधिकारी उनके थे। छोटे बड़े कर्मचारी उनके थे।

वे अपने एक मित्र के इलाज के सिलसिले में मुबई गए थे। एक होटल में कमरा बुक करा रहे थे। फोन पर बात करते हुए वे एक खराब लिफ्ट के टूटे हुए बाटम से नीच गिर गए।
उनके न रहने की खबर नगर को मिली और सब स्तब्ध रह गए।



हमने सीखा है सलीक़ा तुम्हीं से जीने का।
दर्द सहने की अदा ,ढंग ज़ख़्म सीने का ।
हादसों और करिश्मों से भरी दुनिया में,
मौत दरवाज़ा खुला छोड़ती है ज़ीने का।।
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रखी तुमने बुनियाद , जब ज़िन्दगी की।
अदा हमने सीखी है , तब जिन्दगी की।
वो मुस्काते आना , वो मुस्काते जाना,
तुम्हें आंखें ढूंढेगी , अब ज़िन्दगी की।।

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इस मिट्टी का चलन निराला , गिनगिन बोते अनगिन पाते।
बीच सड़क का नगर ज़िन्दगी , कितने आते कितने जाते।
पत्थर होकर रह जाते हैं , शिलालेख लिखवानेवाले ,
अमिट वही चेहरे होते जो दिल पर छाप छोड़कर जाते ।।

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भीड़ भाड़ से भरा रास्ता यहीं पड़ा रह जाता है।
सभी परिन्दे उड़ जाते हैं पेड़ खड़ा रह जाता है।
कहने को तेरी मेरी है , दुनिया झूठी माया है ,
महल अटारी सोना ज़ेवर यहीं धरा रह जाता है।


दिनांक 27.02.10

Thursday, February 25, 2010

भटा-भात और ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा




श्रीमान भटा को कौन नहीं जानता। भटाप्रसाद आलूलाल के कनिष्ठ और गोभीरानी के ज्येष्ठ भ्राताश्री हंै। शाकाहार करनेवालों की परम्परा में जैसे अध्यात्म के त्रिदेव हंै, वैसे ही सब्जी में यही तीन देवता प्रसिद्ध हैं। भटे के बारे में कुछ और बातें कहने के पहले भटे पर एक कवितानुमा गद्य या गद्यनुमा कविता या कवितानुमा तुकबाज़ी पढ़ें। कवि कहता है-

जैसे जुल्फों को घटा कहते हैं ,
जैसे जूड़े को जटा कहते हैं ,
जैसे पीढ़े को पटा कहते हैं ,
वैसे ही बैंगन को भटा कहते हैं ।

जैसे ऊंट की करबट होती है
वैसे बैंगन की एक थाली होती है
ऊंट की करबट को लोग नहीं जानते
बैंगन की फितरत को थाली तक नहीं जानती।

कहते हैं बैंगन यानी भटा बादी होता है
इसकी एलर्जी होती है
किसी को सूजन होती है
किसी को खुजली होती है
सुना है भटा खाकर जो करते हंै यात्रा
वो भटक जाते हैं
हालांकि ऐसा सुनकर
भटा-प्रेमियों के मुंह लटक जाते हैं

यानी भटे के कई रूप है ,कई रंग है
सब्जियों के राजा आलू के वह संग है ,अंतरंग है
यूं तो गोभीरानी का भी भटा साथ निभाता है
परन्तु कभी कभी गुरुदेव रवीन्द्र की तरह
अकेला ही पतीली में पक जाता है
कुलमिलाकर ,
जैसे छायावाद में प्रसाद ,निराला और महादेवी हैं
वैसे ही सब्ज़ियों में आलू ,भटा और गोभी हैं।

मित्रों ! आज सुबह सुबह एक प्रसिद्ध अखबार में एक कविता पढ़ ली। आजकल कविता लिखना सरल है। गुलजार और जावेद को पढ़ते हुए एक मीडियामैन प्रसून जोशी ने कविता लिखी और ‘अंधेरे से डरता हूं मां’ कहते हुए उजालों की दुनिया में चले गए। (मजाक है पी जे , बुरा न मानना।)
वैसे अंधेरों से बहुत सी चीजें और बहुत सी बातंे आजकल उज़ालों में चली आई हैं। जो काम दीपक बुझाकर होते थे ,अब स्पाट लाइट में होते हैं। बहुत सी आस्थाएं जो हमारे जीने का आधार थीं ,अंधेरे की बातें कहलाती हैं। वैज्ञानिक भाषा में उन्हें अंधविश्वास कहा जाता है। अब चूंकि हम विज्ञान के युग में रहे हैं ,इसलिए वैज्ञानिक संस्थापनाओं को मानना हमारी मज़बूरी है।
विज्ञान बहुत दिनों से खानसामे की तरह हमारे खानपान के पीछे पड़ा है। पीने के लिए नए नए ड्रिंक्स और खाने के लिए फास्ट फूड वह हमारे दस्तरक्ष्वान पर धर रहा है। जितने हम व्यस्त हो रहे हैं उतना विज्ञान इन्स्टेंट हो रहा है। विज्ञान हमें कहीं नहीं छोड़ रहा है, कहीं का नहीं छोड़ रहा है।
इधर बहुत दिनों से वह हमारी सब्जियों में लोकप्रिय और सर्वसुलभ भटे के पीछे पड़ा है। पहले तो लगता था कि जिस भटे की वह बात कर रहा है , वह कोई अमेरिकन होगा ,कोई खुफ़िया आतंकवादी होगा। श्वेतपुष्पी गाजरघास की शक्ल में हमारे पशुओं और इंसानों का कोई दुश्मन होगा। मगर आज जो अख़बार में फोटो देखी तो मैं स्तब्ध रहा गया। यह तो वही भटा है जिसे कल शाम ही बड़े चाव से मैं खरीद लाया हूं। आज ही बीवी ने जिससे भरवा बैंगन या दूसरे शब्दों में खड़ा भटा बनाया है। उफ ! गेंहूं बदले ,चांवल बदले ,अब सब्जी भी गिरगिट की तरह रंग बदल बैठी। बुजुर्गों ने सच ही कहा था - थाली के बैंगन का कोई भरोसा नहीं। कभी भी वह पाली बदल सकता है।
संक्षेपीकरण के इस युग में बीटी भटा बहुत दिनों तक मेरी समझ के परे रहा। फुलफार्म को जाननेवाले पूर्ण लोगों को ढूंढता रहा। पर कहते हैं न किताबों से अच्छा कोई दोस्त नहीं। इसलिए किताब के अंडाणु के रूप में विख्यात अखबार में आज यह पता चला कि बीटी यानी कीटाणुओं का शत्रुघ्न। बीटी ही किसी फसल या बीज को जीएम बनाता है।
जी ? जीएम से क्या आशय है ?
जी हां, मैं भी सुबह सुबह फंस गया था। जीएम यानी ‘जनरल मैनेजर’ बोल बैठा। तब बीवी ने हंसकर बताया -‘‘ सो रहे हैं श्रीमान ! मोबाइल और एसएमएस के दौर में जो नई भाषा विकसित हुई है , उसके मुताबिक यह जीएम....गुडमार्निंग का शार्ट फार्म है।’’
‘अरे तेरे की !’ मैंने माथे पर हाथ मारा। हालांकि जीएम यहां न यह मुख्य प्रबंधक है ,न गुडमार्निंग है। यहां वह वंश-सुधार या अनुवांशिक-परिसंवर्धन के अर्थ में आया है। वैज्ञानिक शब्द है-जेनेटिकल माडीफिकेशन।
अब कुछ स्वास्थ्यवादी लोग सवाल उठा रहे हैं कि यह साधारण से ‘जीएम’ हुआ भटा हमारे खाने लायक है भी या नहीं ? भविष्य में यह हमारे लिए क्या क्या खतरे पैदा करेगा ? यह हमारी ज़मीन को दूसरी फ़सले उगाने लायक छोड़ेगा भी या नहीं ? आदि आदि।
देशवासी मित्रों ! सिंथेटिक दूध जब बाजारवादियों ने हमें पीने के लिए दिया था ,तब भी यही हल्ला मचा था। मैं अपने लिए कहता हूं कि ‘यह मुंह और मसूर की दाल’ यानी साब! मैं क्या कहूं , जब सरकारें शराब को बुरा कहती हंै और लीगली लाइसेंस देती हैं ,तब सिन्थेटिक दूध ,सिंथेटिक मावा , इंस्टेंट फूड और बीटी भटा के लौकी आदि के लिए क्या विरोध करना ? हमारे पेट बहुत ताक़तवर हैं। यह सब पचा जाते हैं। टायर और नौसादर से बनी शराब, कास्टिक सोडा से बने मावा और दूध, चर्बी और डामर से बना हुआ घी........इन सबको हम यूं पचा लेते हैं ,जैसे नगरपालिका द्वारा मुहैया कराया हुआ अशोधित पानी।
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा नीति के नाम पर सब कुछ का सौदा करनेवालों ! तुम हमारी क्या परीक्षा लेते हो ? हम उस शंकर के भक्त हैं जो दुनियाभर की रक्षा के लिए विष गटक लेते हैं। हम उस देश की जनता हैं , जहां मीरा जैसी दीवानी जानबूझकर ज़हर पी जाती है ? तुम हमें चूहा मानकर प्रयोग करते रहो , हम तुम्हारे साथ हैं। आनेवाली पीढ़ी के लिए हम कोई भी परीक्षा देने के लिए तत्पर हैं।
भारत में एक कहावत है,‘घी कहां गया ? खिचड़ी में। खिचड़ी कहां गई ? भाई के पेट में।’ हमारा यह भाईचारा विश्व प्रसिद्ध है। तुम चिन्ता न करो। ‘‘हां आया ! बस। चार लाइनें और ..’’

मित्रों! माफ़ करना। पत्नी खाने के लिए आवाज़ दे रही है। आज जैसा कि मैंने बताया कि चटपटी ग्रेवी से ठसाठस भरा हुआ भरवा बैंगन या खड़ा भटा बना हैं। ग्रेवी की पतीली का ढक्कन खुल चुका है और असहनीय बेचैनी मुझे हो रही है। आप आ सकते तो आप भी आते क्योंकि जीभ आपकी भी रसीली हो रही है और अदरक का स्वाद आपको भी पता है।
ओहो ! यह भात का ढक्कन खुला। स्वादिष्ट सुगन्ध किसी पागल हवा के साथ मेरी नाक को मदहोश कर रही है। मुझे कोई भय भटे के पास जाने से नहीं रोक सकता। हमारे बुजुर्ग कहते हंै-‘जीवन भर कमाए और भटा भात कभी न खाए।’ मैं अभी खाउंगा। पुरखों की आत्मा को शांति पहुंचाउंगा।
और आखि़री बात। मैं यह नहीं मानता कि भटा खाकर अगर आज कहीं जाउंगा तो भटक जाउंगा। मैं तो मानता हूं कि भटकूंगा तब भी वास्को डी गामा की तरह कोई नया ‘न्यू-ज़ील-लैंड ’ (न्यूजीलैंड) अवश्य खोज लूंगा।बाई..सी यू..
दि. 21.02.10,

Monday, February 22, 2010

स्वयंवरों का देश

वैश्विक बाजारवाद में संस्कृतियों और परंपराओं को बदला नहीं जाता। उनको उत्पाद की तरह बेचा जाने लगता है। उपभोक्ता इसमें सीधे नहीं जुड़ता है किन्तु अप्रत्यक्ष रूप से उसकी जेबें ढीली हो जाती हैं। मंहगाई इसका साइड इफेक्ट है। मंहगाई एक अनिवार्य घटना है जिसे उपभोक्ता रोक नहीं सकता ,केवल भुगत सकता है। बाजार में उपलब्ध उत्पाद वे चुम्बकीय उपकरण हैं जो अबाध रूप से उपभोक्ताओं के अतिगोपित-अंटियों तक जाते हैं और दुर्निर्वार्यतः मुद्राएं खींच ले आते हंै। सर्वोच्च न्यायालय के पास भी इसकी काट नहीं है। हमें केवल आश्चर्यचकित होने का अधिकार है कि कटघरे में किसी भी व्यक्ति को खड़ा कर सकने की वैधानिक क्षमता और प्रभुता रखनेवाला राष्ट्रीय न्यायालय भी अपने को वैधानिक ऋचाओं के कटघरें में कैद पाता है।
प्रजातंत्र में चुनाव एक अनिवार्य सह ऐच्छिक स्वयंवर है। नागरिकों का मौलिक अधिकार है कि वे अपने मनपसंद पार्षद, पंच, सरपंच, विधायक,सांसद का वरण करें। फिर भूल जाएं कि उन्होंने किसका वरण किया है। उनके सारे अधिकार अब अधिग्रहित हो चुके हैं। महिने पंद्रह दिनों में मिट जानेवाले दाग की तरह उनके सारे अधिकार अदृश्य हो चुके हंै। उनके खाली हाथों में खिलौनेनुमा कत्र्तव्य रह गए हैं। कत्र्तव्य यानी भविष्य के जीवन बीमा का वह निवेश जिसमें अगर आय है तो कर में कुछ प्रतिशत की छूट तथा मरने के बाद थोड़े-बहुत जोखिम-भुगतान का जीते जी स्वप्न देखने की राहत मिलती है।
प्रजातंत्र की प्रजा मुझे कभी कभी उस निरीह पत्नी की तरह लगती है जो विधिवत् सात फेरे लेती है और अच्छे जीवन के झांसे में आकर जीवन भर शराबी-जुआड़ी पति की बेपरपाही , अभाव , अलगाव ,बलात् सन्तान आदि प्राप्त कर लेती है। भोजन के बदले जिसे गालियां , लात ,घूंसे और गम खना पड़ता है। बिजली ,पानी और मकान के नाम पर उसे जीवन भर अनहोनियों के झटके-सदमें , आंसू और एकांतवास मिलते हंै। एक स्वयंवर यह भी है जिसे जनता ने राजी खुशी से स्वयंवरित किया है।
कुछ वर्ष पहले तक हम स्वयंवर के रूप में दाम्पत्य का अर्थ ग्रहण करते थे। हमारी स्मुतियों में वह जमाना भी आता था जब पिता गाय के प्रतियप में उपलब्ध सुपुत्रियों को किसी जांचे परखे विष्वसनीय क्षूंटे में बांध आता था और कहता था कि जितने छूट खूंटा पक्ष प्रदान करे उस सीमा में अपने गायत्व को निभाना और अपने को धन्य समझना। अधिकार की बात मत करना केवल कत्र्तव्य ही तेरी पूंजी है। स्त्री-विमर्श के इस दौर में यह भी एक बहस का मुद्दा है कि जो भाग्य से मिल गया उसे स्त्री ने कैसे वरध कर लिया। यह मुद्दा अब उठाया जा रहा है जब माताएं परिवार में महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका निभा रही हैं, योग्य कन्याएं कोर्ट मैरेज कर रही हैं और विवाह एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका है। स्थापित आलोचक ,विद्वान और चिंतकों का मत है कि इतिहास को याद रखना बेहद जरूरी है क्योंकि यही वह बावड़ी है जिससे होकर भविष्य का भूमिगत मार्ग खुली हवा में खुलता है।
कहने की जरूरत नहीं है कि यह स्वयंवर की सदी है। अगर लड़के और लड़कियों को एक दूसरे को दिखाकर पसंद करने की व्यवस्था की जा रही है तो वह सवयंवर की पूर्वपीठिका है। समारोह तो सब तय हो जाने के बाद होगा। हर पिता राजा जनक या राजा द्रुपद नहीं होता कि वह देश देशान्तर के योग्य राजाओं को एक निश्चित तिथि में आमंत्रित करे और किसी एक विधा में सभी एकत्रितों की परीक्षा ले। जो योग्यतम हो उसे पुत्री के वर के रूप से सार्वजनिक रूप से चुन ले।
यहां यह उल्लेखनीय है कि उन दोनों घटनाओं में पूर्व घोषित निर्धारित विधा में कोई भी विशिष्टतः आमंत्रित राजा योग्य सिद्ध नहीं हो पाया। पहली विधा में कोई भी धनुर्धर धनुष नहीं उठा पाया तो दूसरी विधा में आमंत्रित तीरंदाजों में एक भी तीसमारखां सही निशाने पर तीर नहीं चला पाया। दोनों स्वयंवरों में तीसरा व्यक्ति वरणीय सिद्ध हुआ जिसकी चर्चा ही नहीं थी।
पहले स्वयंवर में किसी अन्य परियोजना में निकले दो राजकुमार कौतुहल वश स्वयंवर में अपने प्रबंधक कोच के साथ पहुंचते हैं। तात्कालिक परिस्थितियों में संयोगवश प्रतियोगी बन कर बड़ा राजकुमार जीत जाता है। दूसरे स्वयंवर में अज्ञातवास भोगते राजकुमार अपने मेंटर के कहने पर पहुंच जाते हैं और जीतता यद्यपि एक है किंतु एक की जीत में सबकी जीत होती है।
रामायणकाल और महाभारतकाल की इन घटनाओं के पीछे जो भी राजनैतिक धार्मिक लक्ष्य छुपे हैं ,यहां उनकी व्याख्या आवश्यक नहीं है। यहां उद्देश्य स्वयंवरों की परंपरा को याद करना है , जो हमारी स्मृति की धरोहरें हैं।
रामायण और महाभारतकाल में घटित इन स्वयंवरों की नियति यह है कि घोषित रूप से कन्या और कुमार को पता नहीं है कि वही एक दूसरे के होंगे। अगर ऐसा होता तो स्वयंवर की जरूरत ही क्या थी ? जहां दोनों को पता है कि उन दोनों ने एक दूसरे का वरण कर लिया है ,वहां गंदर्भ विवाह हो जाते हैं। रुक्म की बाधा के बावजूद कृष्ण के साथ रुक्मिनी भाग जाती है और अर्जुन को सुभद्रा भगा ले जाती है।
इससे आग आते हैं तो इतिहास में एक और राजपूत स्वयंवर का दृष्टांत हमें मिलता है। राजपूत राजकुमारी संयोगिता का स्वयंवर रचा गया है। संयोगिता के भाई जयचंद के विरोध के कारण पृथ्वीराज को नहीं बुलवाया गया है। उसके पुतले को द्वारपाल बनाकर खड़ा कर दिया गया है ताकि पृथ्वीराज अपने को अपमानित किया जा सके। संयोगिता चूंकि पृथ्वीराज को चाहती है इसलिए वरमाला वह पृथ्वीराज के गले में ही डालती है। पुतला पूर्व नियोजित रूप से पृथ्वीराज में बदल जाता है जो संयोगिता को उठा ले जाता है। हुआ यहां भी स्वयंवर ही है। मगर जयचंद बावजूद इसके युद्ध करता है किन्तु जीत पृथ्वीराज की ही होती है।
मैं आज तक नहीं समझ पाया कि स्वयंवर में आमंत्रण और आयोजन क्यों ? स्वयंवर भी योग्य में से योग्य का चुनाव क्यों ? पसंद स्वयंवर क्यों नहीं ?
आश्चर्य यही है कि इन घटनाओं को उतना महत्व नहीं मिलता जिसमें कन्या और कुमार एक दूसरे को पसंद कर लेते हैं और सामाजिक या पारिवारिक अवरोधों-विरोधांे की परवाह किए बिना विवाह कर लेते हंै। कृष्ण-रुक्मिनी और सुभद्रा-अर्जुन प्रकरणों से ज्यादा सीता और द्रौपदी स्वयंवर लोकोत्सव के विषय हैं। कोर्ट मैरेज और मंदिर विवाह के स्थान पर फिजूल खर्ची की प्रदर्शनप्रियता पर आधारित दाम्पत्य को सामाजिक मान्यता मिल रही है। ऐसे विवाह भविष्य की भूमि में मंहगाई के बीज आरोपित करते हैं और जीवनभर मंहगाई के नाम पर रोते हैं। यह मंहगाई तुम्हारी स्वयंवरा है ,इसे वैसे ही गले लगाइये जैसे लाखों फूंककर लायी हुई परिणीता को आप गले लगाते हैं। मैं समझता हूं कि हर फिजूलख़र्च महंगाई की तरफ उठा हुआ एक कदम है। फिर आपने तो सात फेरों में लगभग उन्चास कदम उठाए ही हैं।
स्वयंवरों के समकालीन घृणित और गर्हित चरण के रूप में साल भर पहले राखी के स्वयंवर का बाजारीकरण हुआ। इन दिनों सफल राजनैतिक पिता का भटका हुआ पुत्र राहुल इस वैश्विक बाजारवाद के उत्पाद स्वयंवर में उपकरण बना हुआ है।
मेरी दृष्टि में राखी और राहुल किसी भी स्वयंवर की पात्रता नहीं रखते। जिनके मन में सैकड़ों लड़के और लड़कियों हों ,एकाधिक साथियों के साथ जिनकी निभ ही नही पायी हो ,जो स्त्रीत्व और पुरुषत्व को केवल उपभोग और बाजारवाद की वस्तु मानते हों ,उनका कैसा स्वयंवर ? वहां कैसा स्वयंवर जहां भावनात्मक पवित्रता ही नहीं है ? जहां सीरियल प्राॅफिट और बेनेफिट चैनल की मार्केटिंग हो रही हो , वहां हम अपने टीवी सेट खोलकर क्या कर रहे हैं ? शायद हम मंहगाई के बीज बो रहे हैं। राखियों और राहुलों की ,उनके प्रायोजकों की तिजौरियां भर रहे हैं। विवाह जैसी पवित्र गृहस्थी को बाजारू बना रहे हैं। अपने जिस्म की नुमाइश के बल पर लोकप्रियता और धन कमानेवालों को स्वयंवर में खड़ा करने से बड़ी अश्लीलता मुझे दूसरी नहीं दिखाई देती।
क्या हमारा इतना भी नैतिक कत्र्तव्य नहीं है कि कम से कम अपने घरों से मंहगाई की दिशा में एक भी बीज न जाने दें ?
हम मनोरंजन के नाम पर अपने को लुटने की भूमिका से बचाएं। फूहड़ता और बकवास को उलीचकर अपने घरों को अपवित्र न करें। अपने चिंतन और अपनी चाहत को सही दिशा प्रदान करें।
यह संभव है। हम कर सकते हैं। गलत हाथों में अपनी गाढ़ी कमाई को जाने से रोक सकते हैं। स्लो पाइजन के रूप में हमारे ही घर आनेवाली मंहगाई और तंगहाली को निरस्त कर सकते हैं।

. 18.02.10

Monday, February 15, 2010

मंथरा का दर्शनशास्त्र

रामचरित मानस में कथित तौर पर कैकैयी की दासी मंथरा कहती है: ‘कोइ नृप हो हमहुं का हानी’। यही है मंथरा का दर्शनशास्त्र ?
हम देखते है अनुसचिवीय या सचिवीय संततियों का भी यही दर्शनशास्त्र है। या यूं कहें कि मंथरा का जो दर्शनशास्त्र था वह उसके पुत्रों का भी दर्शनशास्त्र है।
कहीं लिखा नहीं है कि मंथरा के भी पुत्र हुए और आगे उन्होंने मंथरा-नीति का विधिवत एवं सुदृढ़ संचालन किया। यह लिखने की जरूरत भी नहीं थी और ना है। लिखी हुई चीज़ें अक्सर बेकार हो जाती हैं।
भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा संविधान है और लिखा हुआ है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा नीतिविशेषज्ञ और सदाचार का विश्वगुरू है। इसके पास जितना लिखित वांग्मय है उतना दुनिया के किसी देश के पास नहीं है। हम इस सब लिखे हुए को कितना मानते हैं?
ब्रिटिश संविधान लिखा हुआ नहीं है। परम्परा और मान्यताओं के पहिओं पर चल रहा है और आज भी गतिमय है। सारी दुनिया यह बात मानती है।
बात मानने की है। लिखने-पढ़ने की नहीं है।
दासीपुत्र विदुर कोई बूकर शूकर को नहीं जानता था। उसने कोई बेस्टसेलर नहीं दिया मगर उसकी नीतियों को द्वापर से अब तक मान्यता प्राप्त है।
मंथरा को भी लिखने की जरूरत नहीं थी कि मेरी परम्परा को निम्नलिखित पुत्र ढोयेंगे। मगर हम सब जानते हैं कि जो उन नीतियों को न केवल ढो रहे हैं बल्कि परिष्कृत कर रहे हैं वे मंथरापुत्र नहीं तो और कौन हंै ?
मंथरा का जिक्र रामकाल में किया गया है। वह कहती है और बड़ी साफ़गोई के साथ अपनी रानी से कहती है कि ‘कोउ नृप हो हमहुं का हानी ?’
स्वामित्व के बदलने से दासत्व में बदलाव नहीं आता। दास का काम है वह बोलना जो स्वामी को भी अपने हित का लगे। मगर कहने में अपने हिस्से के लाभ का बड़ा हिस्सा अपनी तरफ़ खिसकाता रहे।
आज क्या हो रहा है ? राम के नाम पर शासन करनेवालों को यह बात समझ में आती है कि राम ने कहां कहां भूल की और कहां कहां विस्तार को विकसित किया। प्रतिनिध्यात्मक राज्य की शुरुआत राजा के प्रतिनिधि होकर भरत ने की। विभीषण को और सुग्रीव को उनके राज्य का राजा बनाया जो राम को अपना स्वामी मानते रहे।
मंथरा भरत को दांव पर लगाकर मुख्य सचिव होने में ही जिन्दगी का लाभ देख रही थी। भरत ने उसकी कोशिशें नाकामयाब कर दीं। दशरथ भी प्रकारान्तर से मंथरा नीति को पलटने में जिम्मेदार ठहरे और राम भी। मगर भरत ने मंथरानीति को पनपने नहीं दिया।
आज प्रतिनिधि हंै मगर मंथराओं के आगे घुटनों के बल चल रहे हैं। वे भरत नहीं हो सकते क्यांेकि भरत होकर क्या मिलेगा वे जानते हैं।
जमाना तेजी का है और जल्दी जल्दी लाभ कमाने का है। नयी नीतियां गढ़ने की बजाय पिछले को पुनसर््थापित करने का है। पिछला यानी ज्यादा लाभकारी। भरत के घाटे का सौदावाला पिछला नहीं। मंथरा के वंशज आज भरत को विस्थापित करने में सफल हो गए हैं। अच्छे दर्शनशास्त्री राज्य-प्रतिनिधि भी इस बात को नहीं समझ रहे हैं।
समझ रहे हैं तो शायद वे राम को विस्थापित करना चाहते हैं और स्वर्ग तक स्वर्णमंडित साढ़ी के निर्माण की तथ्यात्मकता के आगे नतशिर हैं। मंथरा नीति के संरक्षक बनने में अपने हिस्से के स्वर्णभंडार को बढ़ता देख रहे हैं। दरअसल मंथरा एक प्रवृत्ति है जो रामायणकाल में उभरकर सामने आई। यह प्रवृत्ति पहले देवताओं में आई। तुलसीदास ने कुचाली देवताओं के एक वर्ग की खोज करते हुए लिखा है कि स्वर्ण सिंहासन पर राम के बैठने से कुचाली देवताओं को अस्तित्व का खतरा लगने लगा। उत्तम और श्रेष्ठ के आने से खोखले और नकली व्यक्तियों में खलबली मच जाती है। अपने उखड़कर फिंकने की आशंका से वे नवीन प्रतिभा को जमने न देने की कोशिशों में लग जाते हैं। बांसुरी के आगे लंपटों की सीटियों की कलई खुल जाएगी इस पूर्वाभास से बांसों के जंगल में आग लगा दी जाती है। न रहेगा बांस ,न बजेगी बांसुरी। देवताओं के राजा इंद्र के इन्हीं प्रयासों से पूरा पुराण वांग्यमय पुरा पड़ा है। उनके ही गण या अनुचर देवता हैं। सो वे पहंुचे बुद्धि की देवी सरस्वती के पास कि विधि का विधान बदल दो। हम बड़ी विपत्ति में हैं। हे माता ! ऐसा करो कि राम को राज्य छोड़कर बनवास हो जाए-
बिपति हमारि बिलोकि बड़ि , मातु करिअ सोइ आजु।
राम जाहि बनि राजु तजि , होइ सकल सुरकाजु।।
यह तुलसी की कल्पना है कि देवताओं का अंतिम काम है राम जैसोें को विस्थापित करना। इस प्रकार राम वनवास के शिलान्यास का पहला पत्थर देवताओं ने रखा। शिव की बहन सरस्वती देवताओं के बारे में सोचने लगी कि बताओ ये देवता हैं! इसी को कहते हैं -ऊंची दूकान ,फीका पकवान। देवताओं की संज्ञा और दैत्यों की सोच। तुलसी ने सरस्वती के विचारों को शब्दों का लिबास पहनाते हुए लिखा है
ऊंच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराई विभूति।।
अब ज़रा किसानों के नाम से निकले करोड़ों रुपयों के क़ाग़ज़ी जादू से बननेवाले महलों में रहनेवालों की तुलना देवताओं से और तुलसी के इस बीज वाक्य से कर देखिए। यही सोच मंथरा तक पहुंची। रानी कैकई की दासी मंथरा इन्हीं देवताओं की नानी ,दादी, मां ,मौसी या बहन-बेटी दिखाई देती है यहां। इसीलिए सरस्वती ने उसे देवताओं के काम का माध्यम बनाया। तुलसी ने प्रमाणित करते हुए लिखा है - नामु मंथरा मंदमति ,चेरी कैकइ केरि।
अजस पेटारी ताहि करि ,गई गिरा मति फेरि।।
सरस्वती ने मंथरा की मति फेरी तो राम वनवास का दूसरा पत्थर उसने रखा। मंथरा ने कैकई से कहा - दुइ बरदान भूप सन थाती। मागहु आजु जुड़ावहु छाती।
सुतहि राजु रामहि बनवासू। देहु लेहु सब सवति हुलासू।।
मंथरा के मंत्रपूत पत्थरों के ऊपर रानी कैकई ने तीसरा और अंतिम पत्थर रखा। उसने राजा दशरथ से कहा - हे प्राणप्रिय! मेरे मन को अच्छा लगे वह करो। यानी ‘ देहु एक बर भरतहिं टीका।’ भरत के राज तिलक के बाद दूसरा वर यह दीजिए कि विशेष रूप से तपस्वी वेश में और सारी इच्छाओं को पूरी तरह त्यागकर राम चैदह बरस के लिए बनवासी हो जाएं। तुलसी के शब्दों में ‘ तापस बेस बिसेसि उदासी। चैदह बरस राम बनबासी।’
मैं देख रहा हूं कि अपने को स्थापित करने के लिए उत्तम को विस्थापित करने की परम्परा पुरानी है। देवताआंे को लगा कि राम स्थापित हुए तो देवताओं को कौन पूछेगा ? मंथरा को लगा कि कैकई के पुत्र के स्थान पर ‘ सवति ’ कौसल्या के पुत्र राजा बन गए तो मंथरा के ब्रेड बटर और क्रीम में अंतर पड़ेगा। सब सचिव अपने अपने लाभ के सम्मोहन-केन्द्र या लक्ष्य को पहचानते हैं।
मंथरा के तर्क उसके दर्शनशास्त्र के बीजक हैं। तुलसीदास ने भरपूर मजे़ के साथ मंथरा के संवाद गढ़े हैं। इन संवादों को पढ़कर तुलसी के यथार्थमूलक मानव मनोविज्ञान का साफ़ पता चलता है। वे बड़ी सूक्ष्मता से चित्रित करते हैं कि चालाक व्यक्ति लोभ और लालच को संदेह की चासनी में कुछ इस तरहपकाते है कि सिर्फ अपने हित का ख्याल मीठा लगता है और दूसरे सिर्फ चींटे दिखाई देने लगते हैं जो कभी भी उसके हाथ के मीठे को लपकने की फ़िराक़ में तैयार हों। वह तथ्यों को इस प्रकार उठाकर मंथरा ने यही किया। कैकई को पराठें की तरह दोनों तरफ़ मक्खन लगालगाकर सेंका। मंथरा का दर्शन अलगाव के सूत्रों से बुनी इुई चिक है जो सच्चाई को नेपथ्य में डाल देती है। मंच पर सिर्फ अविश्वास ,संदेह और अंतहीन तर्कों
के वाग्जाल ही नाटक के प्रमुख पात्रों के रूप में दिखाई देते हैं।
मंथरा ने राजा दशरथ और अन्य रानियों के प्रेम को चिकनी-चुपड़ी और अपनी कुटिलता को सदाशयता बताया। आजकल अलगाववादी और मतलबपरस्त भी यही करते हैं। जीवनबीमा वालों की तरह वह भी भविष्य को आशंकित करते हुए अपनी पालिसी बेचती हुई कहती है कि मैं भी अब ठकुरसुहाती कहूंगी या मौन रहूंगी। ‘हमहुं कहब अब ठकुरसुहाती। नाहिं तैं मौन रहब दिन राती।’
अपनी सदाशयता को स्थापित करने के लिए वह कितना शक्तिशाली तुरुप चलती है यह देखकर हैरानी भी होती है और तुलसी की वांग्माया पर ‘वाह वाह, क्या बात है’ कहने का मन करता है। तुलसी ने कितनी बारीकी से मंथरा के आंतरिक क्षोभ को सदाशय का तड़का लगाया है ,इसे देखा जाए। मंथरा मासूम बनकर कह रही है कि अरी रानी , राजा कोई भी बने हम दासों का क्या है ? हमें कोई दासी से रानी तो नहीं न बनाएगा।’
यही है मंथरा के दर्शन का सबसे शक्तिशाली महावाक्य। इसी पर मंथरा की संतति लगातार लोकसेवा के नाम पर शासन कर रही हैं और सत्ता को भोग कर रही है। जनता के प्रतिनिधि राजपुरुष तो वे मजदूर मक्खियां हैं जो विभिन्न मुद्दों और समस्याओं का मकरंद इकट्टा करती हैं तथा उनके निदानों के शहद पर तैरने का मज़ा उनके अधिकारी करते रहते हैं। छूछा छत्ता जनता को मिलता है जिसे पकाकर वह मोम निकालती है और ठण्ड में जब चमड़ी फटती है तो घावों पर उसे लगाती है। होशियार अधिकारियों का मूलमंत्र मंथरा का यही तर्क है ‘कोई नृप हो हमहूं का हानी । चेरि छांड़ि अब होब कि रानी।’
वह निष्कलंक प्रेम और चरित्र पर अनुभव की छैनी छनते हुए कहती है कि पहले थे पर अब वे दिन गए जब प्रेम अपरिवर्तित रहता था। अनुभव कहता है कि समय बीतते ही प्रियजन भी शत्रु हो जाते हैं। प्रथम रहे, अब ते दिन बीते। समउ फिरें रिपु होहिं पिरीते।’
वह यहां सूरज का दृष्टांत प्रस्तुत करती है- ‘भानु कमलकुल पोसनि हारा। बिनु जल जारि करई सोइ छारा।’ अर्थात् जो सूर्य पानी रहने पर कमल को खिलने में पूरी मदद करता है , वही पानी न रहने पर कमलों को जला डालता है। इसलिए पानी बचाओ। भविष्य के लिए बुद्धिमत्तापूर्वक निग्रह करो ,संग्रह करो , नियोजन करो। अपनी भलाई के लिए अपना हिस्सा सुरक्षित करो। मंथरावादी यही कर रहे हैं।
लोहार का वार करती हुई मंथरा रानी से कहती है कि सब कुछ मुझसे मत पूछो। अपनी बुद्धि का भी उपयोग करो क्योंकि पशु तक अपना भला बुरा पहचानते हैं।’लोककवि तुलसी ने कितनी तन्मयता से यह पंक्तियां गढ़ी हैं -‘ का पूंछहुं तुम्ह अबहूं न जाना। निज हित अनहित पसु पहिचाना।’
मानस के लोकमंच पर खड़े होकर सूत्रधार तुलसी बताते है कि कितने धैर्य के साथ ,कितनी चतुराई के साथ ,कितनी कितनी बनावट और कपट से मंथरा तर्कों को बुनती है कि किसी तरह अलगाव, फूट, विरोध और वैमनस्य बढ़े। उनका सूत्र संवाद सुनिये -‘ रचि पचि कोटिक कुटिलपन ,कीन्हेसि कपट प्रबोध। कहिसि कथा सत सवति कै ,जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु।’(अयो. दो. 18)
यह मंथरा-बुद्धि का तर्क-कौशल्य ही है कि कैकेयी जैसी प्रबुद्धियां भी अंततः उसके फरेब में आ जाती हैं। पहले जो कैकेयी मंथरा के नकारात्मक दुष्टिकोण का मजाक उड़ाती है ,अंततः मंथरा के तर्कतंतुओं और वाग्जाल में वह लिपट जाती है , मंथरा-युक्तियों का शिकार हो जाती है। पहले रानी कैकेयी दोहा 14 में कहती है- ‘काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि। तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरत मातु मुसुकानि।’ फिर दोहा 16 में यही रानी मंथरा के वशवर्ती हो जाती है-‘‘गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि। सुरमाया बस बैरिनिहि सुहृद जानि पतिआनि।’’
कमाल यह है कि मंथराबुद्धि केवल प्रतीति ही नहीं भरती बल्कि अपनी योजनाओं का गुलाम भी बनाती है। यही कारण है कि कैकेयी जैसी राजविदुषी मंथरा के सामने संकल्प लेती है कि तेरे कहने पर मैं कुएं में गिर सकती हूं। पति और पुत्र को छोड़ सकती हूं। तू मेरे आनेवाले भीषण दुख को देख रही है तो अरीे मंथरादेवी मैं तेरे हित का क्यों नहीं करूंगी।’’ दोहा 21 पढं़े कृपया -‘‘ परउं कूप तुअ बचन पर , सकउं पूत पति त्यागि। कहसि मोर दुखु देखि बड़ ,कस न करब हित लागि।’’ आगे के दोहे में तुलसीदास ने कैकेयी की दीन हीन परवशत्व का चित्रण करते हुए लिख है-‘‘ कुबड़ी मंथरा ने कैकेयी को अपने कथनोें का दास बना लिया। कैकेयी के हृदय रूपी सान पत्थर पर मंथरा ने अपने कपट की छूरी को तेज़ किया। अब रानी उसके सम्मोहन में उसी प्रकार आ गई है जैसे बूचड़खाने का बलिपशु अपनी मृत्यु को भूलकर हरे हरे घास को निश्चिंत होकर चरता रहता है।’’ कुटिल बधिक खिलापिला कर मारते हैं क्योंकि वे अपने लक्ष्य के शरीर को नहीं बल्कि उसके दिलदिमाग को अपने अधीन बनाते है। मंथरादर्शन यही है।
हालांकि यहां तो तुलसीदास ने बड़ा यथार्थ और वास्तविक चित्र खींचा है किन्तु बाद में अपने पूर्व कथन ‘‘ होहिहे वही जो राम रचि राखा ’’ का पालन करते हुए भरत के माध्यम से षड़यंत्र को तो सफल कर दिया लेकिन मंथरा की होनी और कैकेयी की पुरौनी पर पानी फेर दिया। उन्होंने रामलीला देखने बैठे निठल्ले दर्शकों के मनोविनोद के लिए सुखांत नाटकीयता की रचना की। भरत के मुंह से रानी को लज्जित करवाया और शत्रुघ्न से बड़ी निर्ममता के साथ मंथरा को पिटवाया।
मंथरा की दुदर्शा से आज की व्यवस्था से दुखी और भुक्तभोगी भारतीयों को अंतरिम राहत मिल सकती है इसलिए तुलसी का वह दुष्य भी देखें।
मानस-महानाट्य में मंथरा मनोवृत्ति के परिणाम या क्लाइमैक्स का चित्र तुलसी खींचते हैं-भरत ने अपनी मां को खूब खरी खोटी सुनाई। पापिनी कहा। कहा, ‘जन्म होते ही मार क्यों नहीं डाला।‘ ‘राम बनवास मांगते मुंह में कीड़े क्यों नहीं पड़ गए’ कहा।’
तभी आनेवाले सुदिन की कल्पना में सजी संवरी कुबड़ी मंथरा वहां आई। वसन भूषण और अपनी सफलता की चमक में चमचमाती मंथरा को क्या पता था कि भरत ने अपनी भड़ास मां पर निकाल ली है लेकिन शत्रुघ्न तो भरे बैठे है। ‘कपटी ,कुचाली ,कुबड़ी को साज श्रृंगार किये आते देखा तो शत्रुघ्न के भरभरातेे हुए सीने में जैसे घी पड़ गया। झपटकर उसने उसकी कूबड़ का निशाना बनाकर जमकर लात मारा। कुबड़ी चीखते हुए मुंह के बल गिर पड़ी। उसका कुबड़ टूट गया। माथा फूट गया। दांत बिखर गए। मुंह से खून बहने लगा। मगर तब भी वह कुलच्छिनी देवताओं को भला बुरा कहने लगी कि मैंने तो वही किया जो देवताओं को मंजूर था। अच्छा करने का यह अच्छा परिणाम मुझे मिला। अब तो शत्रुघ्न और बिफर गए। लात खाकर भी बड़बड़ानेवाली के झौंटे पकड़कर वे उसे खींच खींचकर धुनने लगे। दयानिधान भरत ने भाई को रोका और उस दुष्टा को छुड़वाया।’’
मानस-महानाट्य के इस दृष्य से दर्शक खुश हुए। उन्होंने तालियां बजायीं।
मगर जिस प्रकार रावण के मर जाने से उत्सवधर्मी लोग रावण को जला जलाकर उसे जीवित रखते हैं , उसी प्रकार यद्यपि रामचरित महानाट्य से मंथरा गायब हो गई मगर वह प्रवृत्ति के रूप में अपनी दुष्ट संतति के सीनों पर धंसकर बैठ गई है। अब कोई शत्रुघ्न उसके झौंटे नहीं खींच सकता। वह सत्ता के साथ है। राजपुरुषों की अधिष्ठात्री है। लोभी ,लालची और विलासियों की कुलदेवी है। वह अमर हो गई है।
डाॅ. रा. रामकुमार ।
27.02.10 /30.01.2010