Sunday, December 27, 2009

नव वर्ष: किचन के संदर्भ में

किचन में पर्ववत् सन्नाटा है।
मैं चाहता हूं नए वर्ष की सरगर्मी और उत्साह मेरे किचन में भी दिखाई दे।
मैं बार बार किचन में जाता हूं और मिट्टी तेल के पीपे को उलटता पलटता हूं और निराश हो जाता हूं।
मैं जादूगर आनंद या पी सी सरकार होता तो ऐसी निराशा मुझे नहीं होती। मैं एक बार मिट्टी तेल के खाली पीपे को हिलाता और उसे किचन में रखकर बेडरूम में चला जाता। बिस्तर पर पालथी मारकर बीड़ी के चार पांच कश लेता और बुझाकर उसे मिट्टी के एक कुल्हड़ में डाल देता । फिर बड़े इत्मीनान से किचन में घुसता । संजीवकुमार की तरह बांह हिलाकर कमीज की आस्तीनें बिना हाथ लगाए ऊपर सरकाता और झुककर पीपा उठाता । अब पीपा मिट्टी तेल से भरा होता। तालियों की गड़गड़ाहट से किचन भर जाता । ज्यादातर ये तालियां किचन में उपस्थित खाली डिब्बे और पतीलियां , अपने जलने का इंतजार करता स्टोव और केवल बीड़ी पीने के लिए इस्तेमाल की जा रही माचिस की डिबिया ही बजा रही होतीं। किचन में जो मुट्ठी भर भरी भरी सी चीजें होतीं वे अपने आभिजात्य के गर्व में केवल मुंह बनाती या दिखावे के लिए मुस्कुराती। मगर यह तो एक संभावित असंभव कल्पना है। वास्तविकता यह है कि किचन में पूर्ववत् सन्नाटा है।
मैंने फिर सिलिण्डर के नाब को घुमाया और चूल्हे के बर्नर को आन कर लाइटर किटकिटाया। बर्नर ने बिजली विभाग या राजस्व विभाग या किसी भी विभाग के क्लर्क की तरह कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। मैंने फिर सिलिण्डर को हिलाया । फिर वही क्रियाएं दोहराई। इस बार भी कोई जादू नहीं हुआ। किचन तालियों की गड़गड़ाहट से नहीं भरा। मैं आदतन निराश होकर अपने बेडरूम कम स्टडी कम मीटिंग एंड ईटिंग रूम में लौट आया ।
डिप्रेशन और इन्फीरियटी में इस बार मैंने किसी दोस्त की छूटी हुई सिगरेट की डिबिया उठाई और उसमंे संयोग से उपलब्ध सिगरेट निकाली और गरीबों की प्रतिनिधि माचिस से ही जला ली। दो तीन कश लेने के बाद भी मुझे किचन मायूस और असहाय दिखाई दिया।
मैंने ध्यान बंटाने के लिए फिर टेबिल की मदद ली । टेबिल पर नए वर्ष की ग्रीटिंग तह की हुई रखीं हैं। बस पूरे कमरे में केवल ग्रीटिंग हैं जो करीने से रखीे हैं। बाकी सारी चीजें आम भारतीय नागरिकों की तरह बदहवास मायूस और उखड़ी हुई और अपने खास तेवर के साथ बिखरी हुई बेपरवाह सी पड़ी हुई हैं। मैं उन सब को देखकर आदतन शर्मिंदा हो जाता हूं।
नया वर्ष मेरे कमरे में नहीं आया है। किचन ,कमरे और मुझ कमबख्त में वही पुराने वर्ष की उदासी , खामोशी और बासीपन है।
दर असल सब यथावत है ,सनातन धर्म की तरह। वही रोज़मर्रा की तरह कभी यह नहीं , कभी वह नहीं का सिलसिला। उम्मीदों में जीता हुआ किचन। बदले जाने की कल्पना से अछूता दरवाजे पर लटका हुआ शर्मिंदा पर्दा और तिथियों से बेपरवाह मैं। कैलेण्डर मैंने कभी नहीं खरीदा और मेरी रिस्टवाच में डेट नहीं है। समय मैं दूसरों से पूछता हूं क्योंकि घड़ी के बिगड़ने के बाद मैंने उसे डिस्टर्ब नहीं किया। जैसे बिगड़ने के बाद हम अपने अधिकारी को डिस्टर्ब नहीं करते।
मैं इतवार को भी आफिस जाता हूं और चैकीदार के साथ बीड़ी और चाय पीकर लौट आता हूं। खाना मैं क्यों ,कैसे ,कब ,कहां ,क्या और किसलिए खाता हूं ,मुझे कुछ पता नहीं। तनख्वाह कभी एक तारीख को नहीं मिली। डीडीओ अक्सर एक तारीख को हेडक्वार्टर चला जाता है या बीमार पड़ जाता है। पैसा उसकी जेब से नहीं जाता मगर दस्तखत करने के एकमात्र सुख को वह लम्बा खींचकर नीरस ज़िदगी में रस का संचार करता है।उसके हाथ में हस्ताक्षर एक हेंडग्रेनेड की तरह है जिसे वह अक्सर चमकाता रहता है -‘‘खबरदार सालों ! मुझसे डरो । मेरे हाथ में तुम्हें मजा चखाने के लिए हस्ताक्षर है।’’
हम कुछ नहीं कहते। वह उसका मनोरंजन है। वह प्रशासन का आदमी है। उसके खिलाफ शिकायत करनेपर कोई सुनवाई नहीं होती। इसलिए हम भागयवादी हो गए हैं। चमत्कार का इंतजार करनेवाले नामुराद लोग।
मैंने फिर ग्रीटिंग उठा ली। बहुतों की जिन्दगी ऐसे ही कट रही है। खाली बैठे हैं और एक ही चीज को उठा रहे हैं और रख रहे है।
मैंने ग्रीटिंग उठाई तो मुझे उसमें धड़कन सुनाई दी। ग्रीटिंग को देखता हूं तो लगता है बाकी दुनिया में अभी सांस बाकी है। देखो कितनी बढ़िया ग्रीटिंग इन्होंने भेजी है। कैसे बढ़िया बढिया फूल , कैसे बढ़िया चेहरे , हंसमुंख और खाते पीते से। सोचता हूं ..इनके किचन में मिट्टी तेल तो जरूर होगा । शक्कर और बाकी चीजें भी करीने से रखीं होंगी। इस समय वे चाय पी रहे होंगे।
मैं ग्रीटिंग को देखता हूं और चोर निगाहों से अपने किचन को । मैं धीरे से हाथ बढ़ाकर ग्रीटिंग को छूता हूं और बड़ी उम्मीद के साथ टेबिल की दूसरी तरफ़ पड़े राशन कार्ड को उठाता हूं। मगर उस कमबख्त में नए वर्ष की ग्रीटिंग की तरह हसीन धड़कनें नहीं मिलती। हमेशा बंद रहनेवाली राशन-दूकान की तरह उसके अस्तित्व पर खालीपन पसरा हुआ है।
मैं घबराकर राशन कार्ड को रखकर फिर ग्रीटिंग-कार्ड उठा लेता हूं।
देखता हूं ,किसी को मेरे कुवांरेपन को छूने में मजा आ रहा है। उसने श्रीदेवी की तस्वीर भेजी है। मैं श्रीदेवी की बड़ी बड़ी आंखों में जाने क्या देखता हूं कि अचानक किचन की तरफ देखने लगता हूं। शायद मुझे उम्मीद थी कि तस्वीर से निकलकर श्रीदेवी किचन संभाल रही है और मेरे लिए सबसे पहले एक कप चाय तैयार कर रही है।
मगर अफसोस वैसा नहीं होता । किचन में पूर्ववत् सन्नाटा है।

// अमृतसंदेश ,रायपुर में धारावाहिक प्रकाशित अपने व्यंग्य स्तंभ 'नीरक्षीर' 12 जनवरी 1989 . से .साभार //

Friday, December 18, 2009

दो पहियों का फ़र्क़

जीवन में दो का बहुत महत्त्व है। दो आंखें , दो कान , दो हाथ , दो पैर , दो फैफड़े, दो किडनियां आदि और इत्यादि। जिन्हें ज्ञान की कमी नहीं हैं किन्तु समय की कमी है ,जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें जीवन के सूत्र नहीं मालूम, ऐसे लोगों को टीवी देखकर सीखना चाहिए। उसमें सीरियल से विज्ञापन आते हैं जो टीवी को जीवन दान देते हैं। और अधिक गंभीरता से सोचें तो बीवी को भी जीवन प्रदान करते हैं। बहुत ज्यादा गंभीरता से सोचा जा सके तो यहां भी देखिए कि दो का ही महत्त्व है। टीवी और बीवी। गृहस्थी को वास्तविक गृहस्थी का स्वरूप देने में इन दो का ही योगदान है। दोनों के बिना गृहस्थी एकाकी है। एकाकी का अर्थ ही है कि जो दो नहीं हैं।
बात को आगे बढ़ाने पर हम देखते हैं कि दो और दो चार होते है। चार का भी बहुत महत्त्व है क्योंकि वह दो का दूना है। किन्तु हे भारतीय दर्शक! आज जो दो है , वह सबसे पहले चार था। मनुष्य जिसका अंश है , वह विष्णु या नारायण चार हाथोंवाला दिखाई देता है। ब्रह्मा के चार मुंह थे। जिसके लिए हम मारामारी करते हैं, वह लक्ष्मी चार हाथोंवाली है। वैज्ञानिक बताते हैं कि आदमी भी पहले चार पैरोंवाला था। पूर्वजों के रूप में बंदर को बाप माना जाता है। देखा जाता है कि बंदर के ही गुण हममें ज्यादा हैं। बात बात पर खी खी करना, इस डाल से उस डाल पर बिना मतलब के या किसी खास मतलब के उछलकूद करना ,गुलाटी मारना , चाहे बूढ़े ही क्यों न हो जाएं। बूढे़ शब्द से याद आता है कि दरअसल बात मुझे बूढ़े से ही शुरू करनी थी। परन्तु हे कांच-प्रेमियों! मैं क्या करूं ? वहां भी झगड़ा दो और चार का ही है। उर्दू में चूंकि एक मुहावरा है ‘दो चार होना’ और ‘आंखें चार करना’। मैं दावत देता हूं कि आइये ज़रा उस बूढ़े से हम दो-चार हो लें। आंखें चार करने को कौन कहता है ?
मित्रों! आपने चाहे जिस उम्मीद या मजबूरी में टीवी देखी हो , आपने देखा होगा कि एक कार लाल लाइट जलने से सिगनल के इस पार खड़ी है। सिगनल भी मूलतः दो रंग के होते हैं - लाल और हरा। लाल रंग इस समय है और उसके कारण बहती हुई भीड़ खड़ी हो गई। कार उसी भीड़ का हिस्सा है। उसके बग़ल में आकर एक साइकिल खड़ी हो जाती है। साइकिल पर एक बच्चा है। यह आंकड़ा भी दो का बन गया। दो यानी द्वंद्व। बूढ़ा जिस कार में बैठा है उसके चके हैं चार। बूढे ने चार चीजें ऊपरी तौर पर पहन रखी हैं। सूट , बूट , कमीज और टाई। जो लड़का साइकिल पर है उसके पास दो का आंकड़ा है। साईकिल के दो पहिए , पेंट और शर्ट , जूते और मौजे , दो बांह वाली कमीज की दो बाहें। दोनों वाहें आधी मुड़ी हुई है। एक झलक में इतना ही दिखाई देता है। बूढे की नजर कार के बगल में आकर खड़े लड़के पर पड़ती है तो वह लाल पीला हो जाता है। हिकारत से कहता है-‘‘ आ जाते हैं कहां कहां से।’’ यह हिकारत का सिगनल है जिसमें बुजुर्गों ने दो रंग देखे लाल और पीला।कहते हैं , लाल और हरे को ढंग से मिलाने पर जो रंग बनता है वह पीला होता है। बच्चा उन दोनों रंगों से लाल रंग चुराकर उसे आत्मविश्वास से हरा कर लेता है। वह क्या करता है कि दानों चढ़ी हुई बांहों को तो पहले नीचे करता है। बाहों को चढ़ाना आपने सुना होगा ,यह उसका विलोम है। फिर वह जेब से मोड़कर रखी हुई टाई निकालता है। उसे कमीज़ की गरदन पर टाइट करता है और ठाठ से कहता है:‘‘ सिर्फ दो पहियों का फर्क़ है अंकल ! आ जाइन्गे।’’ इसके साथ ही हरी लाइट जलती है और पैडिल पर पैर मारकर बच्चाशान से चला जाता है। अच्छा लगता है। बांहें उतारकर लोगों को
अपनी शान बघारते तो सैकड़ों बार देखा है, बांह उतारकर शान जताते देखना पहली बार हुआ है। वव्वाह! अरे कांच के पर्दे! कभी कभी ही करते हो मगर तुम कमाल जैसा कुछ करते हो।
मगर दो सवाल हैं , जो खड़े हो गए हैं। जिसके जवाब में तुम ‘सवाल ही नहीं उठता’ नहीं कह सकते। क्योंकि ये तो खड़े हो ही गये। पहला , दो चक्के आएंगे कहां से ? दूसरा , आ ही गये तो उन्हें साईकिल में कैसे लगाया जाएगा ? जोश-जोश में क्या तुमने कुछ ज्यादा ही आत्मविश्वास नहीं फेंक दिया ?
मेरे अनुभव में सीधे रास्ते और केवल आत्मविश्वास के बल पर ऐसा तो आज तक घटित नहीं हुआ। जिस चीज़ का यह विज्ञापन है वह सफाई से ताल्लुक रखनेवाला प्रडक्ट है। इसीलिए इतनी सफाई से दो को वह चार बना गया। फिर तो उसे पांच भी कर देना था। मैंने यह गणित भी कांच के रंगीन पर्दे पर घटित होते देखा है। दो और दो पांच। इस नाम से बनी फिल्म में दो हीरो दो हीरोइन थे। पांचवा एक बच्चा था जिसके आसपास कहानी हास्य बुनती रहती है।
यह बच्चा भी हास्य कर रहा है। आजकल हास्य प्रधान विज्ञापन बनाकर दर्शकों का खूब मनोरंजन किया जा रहा है। कीड़े मारने की दवा में दो-चार कीड़े जरूर छोड़ दिए जाते हैं। टेन परसेन्ट का बिजनेस है। अगर जनता को हण्ड्रेड परसेन्ट फायदा हो जाए तो बिजनेस ढप्प हो जाए। बीपी की दवा रोज लेनी पड़ती है। अस्थमा का मरीज रोज इन्हेलर लेता है।
तो मान लेते हैं कि डिटरर्जेन्ट वाले जल्दी दो से चार चके बना लेंगे। डी कंपनी के नाम से जो मशहूर है वह शायद यही डिटर्जेन्ट कंपनी का शार्ट फार्म होगा, जिसमें हाथ हिलाते ही पैसा बरसने लगता है। डिटर्जेन्ट का उपयोग करने वाले तो मलते रहते हैं ..डिटर्जैन्ट मिलाते रहतें हैं, हाथ मलते रहते हैं। धन्धा होता ही ऐसा है। दो के चार न किए तो फायदा ही क्या। वह बच्चा डिटरजेन्ट कम्पनी का होगा। आज अभी धन्धा शुरू किया है। बस कार आने में कितना समय लगता है। इधर जनता बैठी है तैयार कि तुमने विज्ञापन दिखाया और उसने प्रडक्ट खरीदा। हो गए मालामाल। बढ़िया है , अरे कांच के पर्दे ! बढ़िया है।

Wednesday, December 2, 2009

शिल्पा की शादी और खिसिआया हुआ मैं

सुबह रोज की तरह से ज्यादा खराब है। शाल लपेटकर मैं कुहरे में छीजती नुक्कडिया छाबड़ी में फुल चाय के लम्बे गहरे घूंट भर रहा हूं ताकि छाती सिंक जाए। समाने एक टेबल पर टीवी रखा है जो ग्राहको को लुभाने का काम कर रहा है। चााय के घूंट भरकर उसे मैं छाती में महसूस करता हूं और दूसरा घूंट भरने के पहले के अंतराल में टीवी देख लेता हूं। टीवी में शिल्पा की शादी का हो हल्ला है।मैं थोड़ी देर बर्दास्त करता हूं लेकिन जल्दी मेरी चाय कड़वी लगने लगती है। छाबड़ी में टूटी हुई बेंच और गंदा टेबल मुझे बेचैन करने लगते हैं। वे शिल्पा की भव्य शादी के साथ मैच नहीं कर रहे। मैं उठकर घर लौट आता हूं। शिल्पा की शादी मेरे जहन में छूटी हुई चाय की तरह चिपकी चली आती है।
ं मुझे समझ नहीं आता कि मौसम इस बुरी तरह खराब है और शिल्पा की शादी हो रही है ? शिल्पा की शादी होने से मौसम खराब है या मौसम खराब है इसलिए शिल्पा शादी कर रही है ,इस बात से मै पूरी तरह आश्वस्त नहीं हूं। शिल्पा की शादी से वैसे भी मेरा कोई लेना देना नहीं है। हां मौसम खराब होने से है। मौसम की खराबी ने मेरा बजट बिगाड़ दिया है। ठंड बुरी तरह बढ़ गई है और बर्फीली सर्दी में नहाने की औपचारिकता पूरी करने के लिए गरम पानी जरूरी है। गरम पानी के लिए मैंने यह फैसला लिया है कि जो लकड़ियां फर्नीचर की टूट फूट और बगीचे की टूटी झाड़ियों से निकली हैं ,उन्हें जला कर पानी गर्म किया जाए। इससे बजट पर बोझ नहीं पड़ेगा। दवा खाने से बेहतर है कि आवश्यकतानुसार गर्म पानी से नहा लेना चाहिए। यह हमारी बजटीय सावधानी है।
बहरहाल मौसम खराब है और पानी गर्म करने के लिए बगीचे में दो चार ईंटें जमाकर इकानामिक कच्चा चूल्हा बना लिया है। इसमें मैं अधगीली लकड़ियां जलाने की कोशिश कर रहा हूं। आधा ढक्कन मिट्टी तेल डालकर आग भड़काने की कोशिश मैंने की। पर व्यर्थ। शिल्पा की तरह आग की एक छरहरी लम्बी सी लपट दिल्ली और पटना हिलाकर गायब हो गई। सीली लकड़ियां धुंधिया रही हैं। मैं बदले मौसम को कोस रहा हूं । न मौसम बदलता न मुझे आग भड़काने की नाकाम कोशिशें करनी होती। मैंने सुना है , नये नये रूप धरकर अवाम को परेशान कारने वाला कोई फयान नामक अरबी तूफ़ान दक्षिण में आया है और उधर उत्तर वालों ने भी नकली बर्फबारी की है जिससे पूरा हिन्दोस्तान आतंकित हो गया है। पीड़ित और परेशान तो खैर हुआ ही। इसी परेशानी के दौरान मुझे आतंकवाद की नई परिभाषा मिली है। मेरा अपना विचार अब यह हो गया है कि आतंकवाद सिर्फ पश्चिम से भारत में नहीं आ रहा है। वह वाममार्ग से भी आ रहा है और दक्षिणवादी इलाकों से भी। कट्टरवाद और फट्टरवाद की फिलासफी मुझ अंगूठाधारी को नहीं आती। मैं यहां जानबूझकर अंगूठाछाप नहीं कह रहा हूं। मुझपर अंगूठा की छाप नहीं है। अंगूठा मेरे पास है और लाइसेंस बनवाने के लिए दाएं और बाएं हाथ के अंगूठे की छाप इलेक्ट्रानिक-अंगूठा-मशीन पर लगाकर मुझे अंगूठाधारी होने का गर्व प्राप्त होता है। ऐसे छोटे-मोटे गर्व हम कभी भी और कहीं भी प्राप्त कर लेते है। जैसे शिल्पा की शादी हो रही है और देश गर्व कर रहा है कि इतनी महंगी शादी हमारे यहां भी हो सकती है। मेरा भारत महान। अभिषेक की शादी भी बहुत ऐश्वर्यशाली शादी थी। वे हीरे जवाहरात से शादी करते हैं। मैं अब तक एक अदद लड़की से शादी को ही शादी समझे हुए था।
खैर जब जागे तभी सवेरा। मुझे भी गर्व है कि शरीर का मांस सूख गया हैं ,कंकाल पर केवल चमड़ी चिपकी हुई है , लेकिन करोड़ों कमाकर लौटी शिल्पा पर करोड़ों कमाने वाला एक उद्योगपति मोहित हुआ है। मैं यह देखकर सोच रहा हूं कि यह शरीर का नहीं आत्मा का विवाह है। हीरे-जवाहरात और बैंक-बैलेंस का विवाह है। पुअर इंडियनंस के आरोपों के खिलाफ़ राजसी विवाह है। चालीस के बाद का यह आध्यात्मिक और व्यावसायिक व्यावहारिक विवाह है। विवाह जैसी पवित्र संस्था के सम्मान की रक्षा के लिए किया जानेवाला सामाजिक समझौता वाला विवाह है। किसी विद्वान ने विवाह को सामाजिक समझौता कहा है। सच कहा है। विवाह के पूर्वान्ह में कोटे की शक्कर की तरह प्रेम और अपरान्ह में रोज-रोज नल की कतार में जैसे-तैसे पानी भरने जैसा समझौता ही विवाह होता है, मैं हजारों मामलों में देख चुका हूं।
लो ,मैं कहां भटक गया। आंख में धुआं न लगे इस लिए मुंह इधर फिराया तो क्या क्या दिमाग में घुंस गया। बात इतनी सी है कि मेरा चूल्हा नहीं जल रहा है। लकड़ियां बेमौसम की बारिस से गीली हो गई और मैं जैसे तैसे मिट्टी तेल डालकर उन्हें सुलगाने की कोशिश कर रहा हूं। धुआं इतनी मात्रा में है कि वह आग को उठने नहीं दे रहा है। बाहुबलियों का जरूरी चीजों पर कब्जा करना और उन्हें दबाए रखना शायद इसी को कहते हैं। अचानक नाक ,आंख और हवा फूंकने के लिए खोले गए मुंह में ढेर सा धुआं घुस जाने से अकबकाकर मैं उठ जाता हूं। सोचता हूं पानी डालकर चूल्हे को पूरा ठंडा कर दूं। एक दिन नहीं नहाए तो कौन सा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। मगर फिर सोचता हूं आखिरी कोशिश कर देखूं। कार्यालय से चलते वक्त जो अखबार दबा लाया हूं उन्हें ही जलाता हूं। एक कोने में पड़े अखबार मैं उठा लेता हूं और इस आशा से कच्चे चूल्हे की तरफ बढ़ता हूं कि अब फतह मेरी है।
मैंने जो अखबार हाथ में लिया है वह रंगीन चित्रों से भरा है। लालच मेरा हाथ पकड़ लेता है। मूर्ख! रंगीन चित्रोंवाले अखबार को जला देगा तो खाली समय में क्या देखकर खुश होगा। मैं एक बार फिर पूरे अखबार को ललचाई नजरों से देखता हूं। अखबार मंे सजी धजी ,कीमती जेवरातों से लदी-फदी शिल्पा की तस्वीरें हैं। कमाल है , चूल्हा तो जल नहीं रहा है और मैं सुलग उठा हूं। ये अखबारवाले भी सरकार की तरह हमें जलाने पर तुले हुए हैं। तुलें भी क्यों नहीं । राज्य नामक बिल्डिंग के वे चैथे स्तंभ यानी खंभा जो हैं। सरकार नये ये ख्वाब दिखाकर जलाती है और यह चैथा ख्ंाभा रंगीन चित्र दिखाकर जलाता है। मुझे लगता है शिल्पा के चित्र देखूंगा तो और जलूंगा।डिसीजन मेकिंग में अब मैं देरी नहीं करता और फर्र्र से अखबार के टुकड़े करता हूं। मुझे संतोष होता है कि एक झटके में मैंने भव्यता के तिलिस्म के टुकड़े-टुकड़े कर दिये हैं। अब मैं माचिस की एक और तीली जलाता हूं और अखबार के टुकड़े को जलाकर चूल्हें में डाल देता हूं। क्या देखता हूं कि सजी-धजी खिलखिलाती ,कीमती जेवरातों से सजी हुई शिल्पा भरभराकर जल रही है। यह मैं देख नहीं पाता। हाथ बढ़ाकर जलती हुई शिल्पा को चूल्हे से निकाल लेना चाहता हूं। मगर बहुत देर हो चुकी है। जैसे अब लड़की वाले मुझे देखकर कहने लगे हैं कि बस अब बहुत देर हो चुकी है। अब हो गया ,इतनी कट गई तो आगे भी काट ले। शादी क्यों करता है? बेकार किसी अच्छी भली लड़की की जिन्दगी बरबाद करने से क्या मिलेगा ?
मैं थूक निगलता हूं। अखबार का टुकड़ा राख हो गया है। सीली लकड़ियां है कि सिर्फ धुंधियाये जा रही हैं। मैं फिर अखबार फाड़ता हूं। इसमें उन लोगों की तस्वीरें दिखाई देती हैं जो मेहमानों के रूप में शाही-शादी में मौजूद थे। मैं अखबार के उस टुकडे को मरोड़कर गुच्छा बना देता हूं। इस गुच्छे में सारे लोग मुड़ तुड़ गए हैं। मरो। क्या जरूरत थी शादी में जाने की। तुम्हारे घर में खाने को नहीं था क्या? क्या कमी थी तुम्हें? अब भुगतो। सुना है शादी में शामिल आमंत्रित और अनामंत्रितों को कीमती उपहार दिए जाने लगे हैं। लो उपहार। जल गए न मेरे चूल्हे में ?
मगर यह टुकड़ा भी राख हो गया। गीली लकड़ियां और ज्यादा धुंधियाती रहीं। मैं खिसियाकर बाकी अखबार को भी नोंच-नोंच कर चिन्दी-चिन्दी कर देता हूं और चूल्हे में झौंक देता हूं। एक प्लास्टिक की बोतल में जो छटाक भर मिट्टी तेल बच गया था उसे भी उड़ेल देता हूं। बड़ी मुश्किल से यह तेल मैंने जुटाया था। राशन कार्ड में दो लीटर मिट्टी तेल कभी कभी मिल जाता है। वर्ना सारा मिट्टी तेल तो पैट्रोल पंपों में समा जाता है। जनता राशन की दूकानों के सामने कतार बना-बनाकर बुढ़ाती रहती है। दुकान खुलती है और राशन दूकानवाला पहले से लिखा हुआ बोर्ड टां्रग देता है। ‘‘शक्कर नहीं है। मिट्टी तेल नहीं है।’’ रहे भी कैसे ? गोदामों से तेल और शक्कर बाजारों में सीधे पहुंच जाती है। हमारे प्रजातंत्र की जनता अब बुढ़िया गई है ,सठिया गयी है। जब जनता जवान थी तब भी लुटी और अब भी बुढ़ापा बर्बाद कर रही है।
मैंने देखा कि आग थोड़ी सी लकड़ी पर चिपकी सी दिख रही है। अब इस थोड़ी सी आग पर ही भरोसा है। मैं उठकर , हथेलियां रगड़ते हुए , मुफ्त में पसरी हुई धूप में चला जाता हूं। धूप ठंडी है मगर मैं हूं कि ताप रहा हूं।
24.11.09