Monday, November 23, 2009

वनस्पतियों का सौदर्यशास्त्र

उर्फ रसिक पुष्पवृक्ष और रस-केन्द्र सुन्दरियां

हमारे आंगन में फूले गुलाब और इठलाते डहलियों की कई प्रजातियां दूर से लोगों को आकर्षित करती रही हैं। पीले डहलिया भ्रमणार्थी रमणियों को विचलित कर देती और वे गुलाब के भ्रम में उन्हें देखने आ जाया करती। हमारे पड़ोस में एक नमकमिर्ची-पूर्णा थी। वह जुबान की काली थी। अगर वह आपके स्वास्थ्य की तारीफ कर दे तो आप बीमार पड़ जाएं। हमारे आंगन और बाड़ी में पत्नी अभिरुचि और प्रेम के कारण लहराते हुए गुलाब ,डहलिया ,सेवंती, गेंदे ,अनार ,अंगूर , चीकू , पालक , मैथी , बड़ी तुअर आदि की वह ‘मुंह में कुछ और दिल में कुछ’ के अंदाज में तारीफ करके उन्हें नज़र लगा चुकी है। उसकी तारीफ़ों से पत्नी को आजकल भय होने लगा है। हमेशा खिली रहनेवाली फुलवारी आजकल उदास हो गई है।
एक दिन पड़ोसन आई और झूठी सहानुभूति जताते हुए बोली:‘‘ अरे तुम्हारे आंगन को क्या हो गया भाभी ?’’ तो भरी बैठी पत्नी ने दुखी स्वर में कहा-‘‘ पता नहीं किस डायन की नजर लग कई पुन्नो ! कुछ दिनों से पनप ही नहीं रही हैं।’’ पड़ोसन समझ गई कि पोल खुल चुकी है। अब पड़ोसन नहीं आती और पत्नी नये सिरे से बगिया की संभाल में लग गई है।
पहले मुझे इस तरह की बातों पर यकीन नहीं होता था और लगता था कि यह सब बोड़मबत्तीसी है। पर उस दिन बच्ची ने कोई फिल्म देखी थी और मुझे बताया था:‘‘ पता है पापा ! जापान या हांगकांग में कहीं पेड़ काटते नहीं ।’’
‘‘गुड वेरी गुड, इकोलाजी के महत्त्व का ज्ञान है उन्हें।’’ मैंने पर्यावरण प्रेम प्रदर्शित करते हुए कहा।
‘‘ आंहां.. नहीं ! दरअसल वे जिस पेड़ के आसपास इकट्ठे होकर उसे बहुत भला बुरा कहते हैं। सुबह तक वह पेड़ अपने-आप सूख जाता है।’’ बच्ची ने कहा।
मैं दंग रह गया। चुप्पी लगी रह गई मुझे। मैं सोच के भूंसे में धंस गया था और सच्चाई की सूई को ढूंढने लग गया था। बच्ची ने चाइल्ड साइकोलाजी कीे अंधी परत को खोलने की पहल की थी। किसी बच्चों की फिल्म से उसने यह संवाद या सूत्र सुना था और बड़ों के द्वारा कमजोर बच्चों को दिए जानेवाले उलाहनों को इस तरह खारिज किया था। वह कहना चाहती थी कि जब पेड़ पौधे गाली दिये जाने से सूख जाते हैं तो बच्चे , जिन्हें ईश्वर ने शायद वनस्पतियों से ज्यादा संवेदनशाील बनाया हैं , उन पर आपके दुव्र्यवहार का कितना बुरा असर होता होगा ? यह आशय है इस सूत्र का।
अभिभावको को बच्चों की परवरिस की तालीम थी इसमें। ‘‘मैंने यथासंभव बच्चों को प्यार से रखा है और उन्हें अपनी बात कहने की आजादी बख्शी है ,इस ‘‘आत्म-आश्वासन’’ के साथ मैं वनस्पतियों की संवेदनशीलता की ओर उन्मुख हो गया था।
वनस्पतियों से बातें करने और वनस्पतियों को सुनाने के कई टोटकों , औषधिविज्ञान में उसके घटित चमत्कारों और विश्वासों की चर्चा मैं कई बार कर चुका हूं। इस बार मैं सुन्दरियों के कमाल को खंगालकर आया हूं।
जिस औरत की ब्याजस्तुति से वनस्पतियां मर जाती हैं ,मैं उस खड़ूस औरत की तरफ से अपना ध्यान खींचकर उन सुन्दरियों की ओर खिंच आया हूं जिन्हें कुछ वनस्पतिमिजाज शायर ‘ फूलों की रानी’ और ‘बहारों की मलिका’ कहा करते हैं। स्त्रियों को हम सहजाकर्षण का केन्द्र कहा करते हैं। दबे छुपे उनके अनिन्द्य सौन्दर्य का ध्यान और रूपपान किया करते हैं। किन्तु यह लम्पटपना नहीं है। लुच्चई भी नहीं है। कुदरत ने हमारे जीवन को सौन्दर्य का वरदान स्त्रियों के रूप में ही दिया है।
क्षमा करें ,यह मैं नहीं कह रहा , हमारे बुजुर्ग कहा करते हैं। आपको याद होगी यह कहावत ‘बिन घरनी घर भूत का डेरा।’ यह तो मैंने नहीं कहा। ‘‘यस्य नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’’ यह भी संस्कृत की सुभाषित है। नारियों को सम्मान देने और उनकी देखभाल के कोमल सिद्धांत सैकड़ों हैं। उन्हें प्रकृति ने कोमल बनाया है मगर उनके बिना प्रकृति का गुजारा नहीं है। स्त्रियों की सुरक्षा के लिए पुरुष रूपी स्तम्भ भी हैं। मैंने सुना है स्त्रियां बेलाएं हैं और पुरुष तना है , जिसपर चढ़कर वह आकाश को छूती है। मैंने यह भी सुना है कि प्रत्येक सफल पुरुष के पीछे एक महिला है। इसलिए ‘भिक्षुक-कवि’ निराला वर मांगते हैं, ‘वर दे वीणावादिनी वरदे!’
प्रकृति की फुलवारी भी स्त्रियों से ही खिली खिली है। संस्कृत के कवि राजशेखर अपनी कृति काव्यमीमांसा के तेरहवें अध्याय में प्रकृति के पुष्पवति होने के लिए अनेक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं-
कुरबक कुचाघात क्र्रीड़ारसेन वियुज्यसे
बकुलविटपिन् स्मर्तव्यं ते मुखासव सेचनम्
चरणघटनाशून्यो यस्यस्य अशोक सशोकताम्
इतिनिजपुरत्यागे यस्य द्विषां जगदुः स्त्रियः।।
- अर्थात् कुरबक झकुचाघात और क्र्रीडा़रस से ; बकुल मुखासव के सिंचन से , कुल्ला करके पुलकने से , जिसके पास कोई नहीं जाता ऐसा अशोक ,संसार की ऐसी स्त्रियों के चरणस्पर्श से पुष्पित हो जाता है जिन्होंने अपना घर त्याग दिया है।क्ष् शायद इसीलिए कि अशोक खिल उठे, रावण ने घर से बिलगाकर सीता को अशोकवाटिका में रखा था और फलस्वरूप हनुमान ने उसमें लाल-लाल फूल देखे थे ...‘जनु अशोक अंगार’...
मुखमदिरया पादन्यासैर्विलास विलोकितैः
बकुलविटपी रक्ताशोकस्तथ तिलकद्रुमः।।
जलनिधि तटीकांताराणां क्रमात्ककुभां जये
झटितिगमिता यद्वग्र्याभिर्विकासमहोत्सवः
-अर्थात् बकुल ,रक्त-अशोक ,तिलकद्रुम क्रमशः मुखमदिरा , पादन्यास व विलासावलोकन से ,झटितगामिनी स्त्रियों के कारण समुद्र के किनारे की शोभायमान झााड़ियां पुष्पवति हो जाती हैं।
आलिंगितः कुरबकस्तिलको न दुष्टो
नो ताडितश्च सुदृशां चरणैः अशोकः
सिक्तो न वक्त्रमधुना बकुलश्च
चैत्रे चित्रं तथापि भवति प्रसवाकीर्णः ।
-‘तथापि भवति’ अर्थात् समय न होने पर भी आलिंगन ,स्पर्श , अवलोकन ,मधुरसंभाषण से ही क्रमशः कुरबक , तिलक ,अशोक ,बकुल दोहद प्राप्त करते हैं । शब्दशः कहें तो प्रसवाकीर्ण हो जाते हैं। दोहद का अर्थ पुष्पित होना या फलोत्सुक होना है, अन्य शब्दों में कहें तो उम्मीद से होना है।
यह संस्कृत साहित्य है जो वनस्पतियों को आश्रय बनाकर स्त्रियों के द्वारा समाज को सुन्दरता के देय का बखान कर रहा है। मगर हिन्दी साहित्य को भी पीछे नहीं रहने दिया गया है। ‘हिन्दी साहित्य की भूमिका’ में पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी , कवि-प्रसिद्धियांे के माध्यम से ऐसे ही रसिक-पौधों और वनस्पतियों का अनुसंधान करते हैं जो आशिक मिज़ाज़ पुरुषों की भांति सुन्दरियों को देखते ही या स्पर्श पाकर या अन्यान्य स्त्री-संसर्ग से खिल उठते हैं। मैं संकल्पवान और दृढ़-प्रतिज्ञ परुष-पुरुषों से केवल निवेदन ही कर सकता हूं कि ज़रा प्रकृति और स्त्रियों के अतर्संबंधों का अनुसंधान मात्र तो करके देखें । अनुसंधान करते रहना चाहिए क्योंकि राजशेखर काव्यमीमांसा के अधिकारी की ‘मूल-अर्हता’ अनुसंधान ही मानते हैं। वे कहते हैं, ‘जो कवि अनुसंधान नहीं करता उसके गुण भी दोष हो जाते हैं और जो सावधान रहता है उसके दोष भी गुण हो जाते हैं।’ तो सावधान होकर सुन्दरियों के वानस्पतिक-अवदान का अनुसंधान करें। साहित्य के अवगाहन और निमज्जन के पश्चात् हजारीप्रसाद जी ने कुछ अनुसंधान- अवदान दिए हैं ,जिन पर मैंने अपनी आदत के अनुसार तड़का लगाए हैं। आप भी ज़रा उनपर गौर फर्माएं और स्त्री विमर्श की इक्कीसवीं सदी में स्त्रियों के महत्त्व को समझते हुए ,उनके पास उस-उस उद्देश्य से जाएं।
1. प्रत्येक संभ्रांत महापुरुष के भवन के द्वार के अभिरक्षक ‘अशोक’ का स्त्री-प्रेम देखिए कि वह सुन्दरियों के पदाघात से ,उनके लात खाकर खिल जाता है, उसमें पुष्प आ जाते हैं।
2. कर्णिकार जिसे अमलतास या आरग्वध भी कहते हैं ,वह थोड़ा सामन्ती किस्म का है। उस विलास-वैभवी कर्णिकार (अमलतास) के आगे अगर स्त्रियां नृत्य करें तो वह पुष्पित हो जाता है।
3. कुरबक जो झिंटी,कटसरैया या पियावासा के नाम से जाना जाता है ,वह जरा ज्यादा लोभी है। उस व्यभिचारी वृक्ष का यदि स्त्रियां आलिंगन करें तो वह पुष्पित हो जाता है।
4. चंपक अथवा चंपा नाम का सुन्दर और कोमल पौधा ,जो नामधारियों ,शीर्षककारों और संवादशिल्पियों की प्रायः पसन्द है , अपेक्षाकृत शालीन और संस्कारित-श्रेणी का है। यह शिष्ट चंपा रमणियों के पटुमृदुहास से ,दबी छुपी मुस्कान से ही पुष्पित हो जाता है।
5. तिलक या पुन्नाग नाम का यह वृक्ष इतना शर्मिला और संवेदनशील है कि सुन्दरियों के वीक्षणमात्र से ,केवल नजर पड़ने से कुसुमित हो जाता है। दूसरे शब्दों में , प्रथम दृष्टिपात से ही इसे कुछ-कुछ हो जाता है।
6. नमेरु या सुरपुन्नाग नाम का यह वृक्ष ,जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है ‘सुर’ का प्रेमी है, संगीत का शौकीन है। सुन्दरियां यदि इसके आगे बैठकर गाएं तो वह खिल जाता है।
7. प्रियंगु नाम का यह वृक्ष मन ही मन पता नहीं कैसे कैसे ख्यालों में खोया रहता है कि स्त्रियों के स्पर्शमात्र से विकसित हो उठता है। छुआ लगते ही मस्त हो जाता है। प्रियंगु नाम ही है उसका। प्रिया के अंग लगने की तड़प लिए वह दुनिया में जैसे आया है।
8. मंदार पौधा जिसे अंग्रजी में कोरल ट्री कहते हैं ,बड़ा भोला-भाला और सीधा-सादा है। यह रमणियों के नर्मवाक्य से ,ज़रा-सा मीठा-मीठा बोलने से पुष्पित हो जाता है। इसीलिए तो औघड़- बड़दानी आशुतोष भोलेनाथ का यह प्रिय है। ‘मंदारमाला कुलतालकाये’ यही है। इसे ही अर्क और धत्तूर कहते हैं। धत्तूर और धतूरा में जातिसाम्य हो सकता है ,मगर है दोनों अलग।
9. सहकार ,रसाल और आम तो रसों का राजा है। विश्व में उसके स्वाद और रस का डंका पीटा जाता है। यह सफल और कूटनीतिज्ञ जानते हैं किससे कान फुंकवाता है। हर सम्राटृ की भांति इसके कान भी स्त्री ही फूंकती है। कवि प्रसिद्धि है कि सुन्दरियों के मुंह की हवा पाकर सहकार तरु या आम का वृक्ष कुसुमित हो जाता है। पता नहीं एसे क्या पट्टी पढ़ाती हैं कि केवल मुंह की हवा से वह फूल जातस है ! वैसे आम स्वनामधन्य वृक्ष है। अर्थात् आम लोगों का वृक्ष। एकअमराई का भी समय था जब पुरुष स्त्रियों के लिए आम के पेड़ की टहनियों से झूला बांधते थे और अमराई खिलखिला उठती थी। आम पुरुष भी है और स्त्री भी। अर्द्धनारीश्वर है यह। वृक्ष भी है और लता भी। मेरे उपवन में जो नारीरूप बड़ी बड़ी पत्तियोंवाला आम्र-गुल्म है ,उसकी बेलाकार टहनियों और तने को सहारा देने के लिए हमें मोटी बल्ली का उपयोग करना पड़ा। कालिदास के सामने भी यही समस्या आई होगी ,तभी उनके नाटकों में सहकार-लता का वर्णन मिलता है।
10. बकुल या वकुल ,जिसे मौलसिरी (मौलश्री) भी कहते हैं ,ज़रा शरारत पसन्द है। पंडितजी बताते हैं कि सुन्दरियों की मुखमदिरा से सिंचकर बकुल पुष्प कुसुमित हो जाता है। वे जरा शिष्टता से कहते हैं। दरअसल स्त्रियां अगर कुल्ला करके इसके ऊपर पुलक (थूक) दें तो यह ‘पुलकित’ हो जाता है, खिल जाता है। किसी फिल्म में नायक ने पानी पीकर किसी नायिका पर पुलका (थूका) था और पैसा कमाने की दृष्टि से आयोजकों के कहने से उस काम को कई कई बार स्टेज शो आयोजित कर लड़कियों पर किया गया था। टीवी देखने वाली स्त्रियां चिल्लाती थीं ‘छीः’। भई ये अंदाज़ बेचने के लिए थोड़े हैं। यह तो सहज-सगाई है। एक फिल्म में भी एक प्रसिद्ध नायक की बेटी को नायिका बनाने के लिए यही टोटका आजमाया गया था। मगर सब व्यर्थ। सुना है दोनों फिल्में फलाप हो गईं। इसलिए सावधान ,भावनाओं के मक्खन को बाजार में मत बेचो। वह खट्टा हो जाएगा। फूल हमारी भावनाओं के पुष्प हैं और स्त्रियां इस फुलवारी की मालिन। दोनों के नम्र और शालीन उपादान का हमें सम्मान करना चाहिए और सुगंधित हो सकने का प्रयास करना चाहिए।
इति सुमन-सुन्दरी वार्ता ।
221109

Wednesday, November 18, 2009

खाने की टेबल पर मां और बीवी का मसाला

एक वो भी मसालेदार विज्ञापन था कि आफिस से लौटा हुआ आदमी घर में घुसते ही हवा सूंघता था और बीवी से पूछता था,‘‘ मां आई है क्या ?’’
बीवी मुस्कुराकर मसालों को धन्यवाद देती थी। इसका मतलब कि अब मां खाने में नहीं महकेगी। उसका स्थान अब मसालों ने ले लिया है। इस तरह मसालों की नई खपत ने कम से कम किचन से मां के महत्व को खत्म कर दिया। मां का स्थान अब अमुक कम्पनी के मसाले ने ले लिया। पर उससे पत्नी का भी महत्व कम हो गया । पत्नी के स्थान पर कामवाली बाई या कोई भी बाई आराम से खाने को स्वादिष्ट बना सकती है। आप अगर बाई की कोई खास जरूरत किचन में नहीं समझते हों तो आप खुद भी उस खास कम्पनी के खास मसाले का उपयोग कर एक साथ मां ,बीवी और बाई की कमी को पूरा कर सकते हैं। (सीरियल वाले या फिल्म वाले इस समय मुझे थैंक्यू कह सकते हैं। मैंने उन्हें एक नया टाइटिल सुझाया है ‘मां ,बीवी और बाई। विज्ञापनवाले भी चाहें तो इसका लाभ उठा सकते हैं।)
अभी-अभी एक नया विज्ञापन आया है। टेबिल सजी हुई है। मां भी है ,बीवी भी और खानेवाला वह कमाउ पूत भी जिसे खुश करने लिए खाना बना है। वही खाना बाकी लोगों के खाने के लिए बना है। खाने के टेबिल पर भी एक ही खाना दो अवतारों में दिखाई देता है। खैर ,आगे के दृश्य में क्लाइमैक्स पैदा करते हुए मसालेदार खाने में कमाउ पूत की प्रतिक्रिया का तड़का लगाया जाता है। कमाउ पूत झिझकते हुए अपनी पत्नी से कहता है,‘‘ आज तुमने तो मां से भी अच्छा खाना बनाया है।’’ यहां बुद्धिमान कैमरा स्वयमेव पत्नी पर चला जाता है- वह एक लट संवारती है और कभी सास और कभी पति की तरफ देखती है,मतलब सास से ‘सारी ,यू आर फिनिस्ड नाव’और पति से ’ ‘थैंक यू ! तुम खुश हुए न ?’
अब कैमरा मां पर पलटता है। मां के चेहरे पर ऐसे भाव हैं जैसे कभी उमा के या अभी कुछ दिनों पहले वसुन्धरा के चेहरे पर थे। सत्ता छिन जाने के भाव। राजनीति वाणिज्य का नकाब ओढकर खाने की टेबल पर घुस आई है। मुझे लगता है अब यह गाना बजेगा, ‘‘अब चाहे मां रूठे या बाबा , मैंने अपनी चाल तो चलदी।’’ मगर गाने के स्थान पर विज्ञापन में इस स्थान पर एक आकाशवाणी गूंजती है ,‘‘ अब जो सच है , वो सच है।’’
यानी मसाला सच है। नमक-मिर्च का युग बीत चुका है । सभी नमक-मिर्च लगाने लगे तो मसालों ने अपने को लांच कर दिया। वे पूरी मुस्तैदी से स्थापित हो चुके हैं। इसी का नतीजा है कि अमुक कम्पनी के मसाले सदी के शताब्दी पुरुष या महानायक हो गये। कमाल मसाले का जितना है उससे ज्यादा विज्ञापन का है। यह एक ऐसा टीमवर्क है जिसमें पता लगाना मुश्किल है कि विज्ञापन में मसाला है या मसाले में विज्ञापन है। यही होना भी चाहिए। यहां पर मैं राधा और कृष्ण का उदाहरण विनम्रता पूर्वक देने की अनुमति चाहता हूं। दोनों ने एक दूसरे को इतना मैंनेज किया कि राधा कृष्ण दिखने लगी और कृष्ण राधा दिखाई देने लगे। विज्ञापन में मसाले का प्रयोग उसी अनन्याश्रित प्रगाढ़ता का परिचायक है।
अस्तु , कवि पहली पंक्ति में आंख फाड़कर पूछता है, ‘सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है!’
दूसरे पद में उनका कौतुहल मुंह के अंदर उंगली डालकर बुदबुदाता है ,‘‘ नारी ही कि सारी है कि सारी ही कि नारी है ?’’
अंत में टीवी रूपी कवि पूछता है कि हे मूर्ख उपभोक्ता ! क्या तूने कभी सोचा है कि विज्ञापन मसाले के लिए बने हैं या मसाला विज्ञापन के लिए बना है ? नहीं सोचा है तो खाने के पहले सोच । फिर तेरी आ ही गई है तो खा मर.
-अरे कांच के पर्दे ,हास्यास्प्रदी ,10.11.09

Thursday, November 12, 2009

पग: द ब्रांड एम्बेसेडर




बच्चे स्कूल ना जाने के बहाने ढूंढते हैं। स्कूल जाना ही पड़ा तो टीचर के एक्सीडेन्ट में मर जाने की कल्पना करते है।वास्तव में...शोक सभा के बाद घर जाकर सचिन तेन्दुलकर या शाहरुख बनने की भावना उनमें प्रबल होती है। हमने अपनी आने वाली पीढ़ी को खेल-खेल में कितना भविष्यगामी बना दिया है।
इधर एक दूसरा ही बच्चा है जो आजकल लाइट में है। यह बच्चा अपनी मां की उम्र की मिस रोजी के ना आने से चिन्तित है। वह उसमें अपनी मां देखता होगा। पता चलता है कि मिस रोजी आज बहुत उदास है क्योंकि उसका कुत्ता मर गया है। वह आज स्कूल नहीं आएगी। यानी छुट्टी। अब कायदे से बच्चे को घर जाकर सचिन या शाहरुख बनने की कोशिश करनी चाहिए थी। मगर यह उल्टी ही खोपड़ी का बच्चा है जो अपनी प्यारी टीचर मिस रोजी को खुश करना चाहता है। यह प्रेरणा उसे राजू नाम से लोकप्रिय जोकर राजकपूर से नहीे मिली है जो अपने बचपन में ऐसी ही किसी रोजी को प्यार कर बैठता है और उसे सेन्सर नाम की मजेदार संस्था के सौजन्य से नहाते हुए देखता है। उस राजू की बजाय यह बच्चा शाहरुख से प्रभावित है जो एक अद्वितीय फिल्म में अंकल की उम्र का होने के बावजूद पता नहीं किस यूनिवर्सिटी के नियम के तहत अपने से बहुत छोटी उम्र के बच्चों की क्लास में भर्ती हो जाता है और एक आवश्यक आयु और सौन्दर्य वर्ग की टीचर से अनिवार्य रूपसे प्यार करने लगता है।
यह बच्चा बहुत छोटा है और टीचर आंखों को अच्छा लगने की तमाम आवश्यताओं से परिपूर्ण है। बच्चा अपनी किताबें फाड़कर उसकी गेंद बनाकर टीचर की गोद में डाल देता है। टीचर उसे फेंकती है तो वह कुत्ते की तरह दौड़कर उठाता है ...बिल्कुल कुत्ते की तरह एक पैर उपर करके .. और मुंह में दबाकर मिस के पास लौट आता है। पानी पड़ा हुआ है। कीचड़ मचा हुआ है। टीचर अपनी खूबसूरत उदासी और उतनी ही खूबसूरत शाल ओढ़कर बैठी है। बच्चे के कपड़े सफेद झक....और वह उन कपड़ों की परवाह किये बगैर ,कीचड़ में लिथड़ता हुआ मिस को खुश करने के लिए कुत्ते की भूमिका में परफेक्शन ला रहा है। बच्चे की कोशिश कामयाब होती है। टीचर उस कीचड़ में लिपटे हुए बच्चे के अंदर की उजली भावना को देख लेती है। काश यह काम हमारी सरकारें कर लेतीं तो...खैर जो नहीं हुआ उसका क्या जिक्र ? एक साफ-सुथरे बच्चे ने कीचड़ में लिथड़कर मरे हुए कुत्ते का स्थान ले लिया है। यह कीचड़ धोनेवाली साबुन या डिटजेन्ट का विज्ञापन है।
मगर जो कुत्ता हमारा लक्ष्य है वह मरा नहीं है। वह इस बच्चे से ज्यादा पारिश्रमिक पाता है और एक कम्पनी का ब्रांड एम्बेसेडर है। वह कुत्ता पग है। हथेली में आ जाए इतना छोटा। वह कुत्ता एक विज्ञापन में स्कूल जाती बच्ची के मौजे ढूंढकर लाता है। यह कुत्ता समय पर न सोने वाले बच्चे की मदद पुंगी बजाकर आनेवाले खतरे और फिर चले जानेवाले खतरे की सूचना देता है। यह एम्बेसेडर कुता ण्क बच्ची के साथ बागवानी कर रहा है। फूलों के पौधे रौप रहा है। वह गड्ढे कर राह है ओर बच्ची उन गड्ढों में पौधे रौप रही हैं। इस विज्ञापनी और एक खास कम्पनी के लिए एक खास ब्रांड के लिए पता नही कितने लाख की एम्बेसेडरी करने वाले इस पग जाति के कुत्ते से बच्चों को प्यार हो गया है। एक छोटी बच्ची उसे ला देने की जिद करने लगी है। उसके मध्यमवर्गी पिता ने कहीं से उसकी कीमत पता की है। वह सबसे महंगा कुत्ता है। एक सप्ताह के नवजात पिल्ले की कीमत करीब पचास से पचहत्तर हजार रुपये है। मध्यमवर्गीय पिता ने शायद इतनी बड़ी रकम एक साथ कभी नहीं देखी। अब वह बच्ची को क्या जवाब दे ? कि यह कुत्ता चाइना मेड है ? कि ऐसे कुत्ते होते ही नहीं ? कि हम गरीब हैं और ऐसे कुत्ते अफोर्ड नहीं कर सकते ? कि हम विज्ञापन में दिखनेवाले इस कुत्ते से गए बीते हैं ?
अरे कांच के पर्दे ! कुछ तो बता ! इतने बड़े-बड़े झूठों में एक तो सच बता जो विज्ञापनों के कीचड़ में कंवल खिला सके। एक पिता अपनी रोती हुई बच्ची को चुप करा सके। जिन्दगी ने हमारे रास्तों में जो गड्ढे खोदे है उनमें एक पौधा ता किसी फूल का लगा सके। वक्त ने हमारी जो जुराबें छुपा दी है उन्हें खोजा जा सके। ऐसा हो सके कि जब मुसीबतें आएं तो यह पग हमारे लिए चेतावनी की पुंगी बजा सके ओर हम सुरक्षित हो जाएं। आखिर कब तक अर्थशास्त्र हमारे साथ ऐसे ही गदागदैय्यल खेलता रहेगा ? हास्यास्प्रदी 101109

Tuesday, November 3, 2009

जीवन की उलटबांसियां

सुबह चाय के साथ चुहल का दौर भी चल रहा था। चाय में मिठास थी और मैं छेड़छाड़ का नमक उसमें डाल रहा था। खिड़की पर तभी एक बिल्ली आकर बोली ,‘मैं आउं ?’
‘ये कहां से आ गई।’ पत्नी ने कहा।
‘बहन से मिलने आई होगी।’ -मैंने कहा।
‘मम्मी आप को बिल्ली कह रहे हैं।’ -पुत्री ने मां को उकसाया।
‘कहावत है न -हमारी बिल्ली हमीं को म्यांउं’ -पत्नी मुस्कुराई।
‘कहावत गलत है। होना था, ‘हमारी बिल्ली हमीं को खाउं’ -मैंने काली मिर्च भी डाल दी
पत्नी आंख निकालकर बोली-‘अब गुर्राउं ?’
‘हमसे क्या पूछती हो , हम तो चूहे हैं’ -यह देखने में था तो समर्पण ,मगर बम था। पुत्री ने मां की वकालत की-‘ पापा अभी गणेशेत्सव गया है। हमने देखा कि एक चूहा भी हाथी को ढो सकता है।’
यह मेरे लिए हाइड्रोजन बम था। मैं चैंककर ,आश्चर्य से पुत्री को देखने लगा। वह हंसते हुए बोली ‘क्या हुआ पापा ,ठीक तो कह रही हूं।’
पत्नी मेरी कैफियत समझ गई। बोली-‘चल हमारा काम खत्म। इनको चारा मिल गया। नास्ता पकाने लगे हैं।’
मैं सचमुच नशे की हालत में डाइनिंग से रीडिंगरूम तक आया। बात निकली है तो अब दूर तक जाएगी और मैं सोच के धागों में बंधा हुआ चुपचाप घिसटता रहूंगा। ‘एक चूहा हाथी को ढोता है।’ अद्भुत बिंब हैं। अनोखे प्रतीक। गणेश-वाहन चूहे की प्रतीक-छाया में मैं चूहा तो दिखाई दे रहा हूं , मगर गुहस्थी के हस्तीवत् गुरुभार को ढो भी रहा हूं। यह बच्ची का काम्प्लीमेंट था। एक चम्मच में उसने दो गुलाब जामुन निकाले थे। मम्मी और पापा दोनों की बातें एक पासंग में थी। एक रत्ती फर्क नहीं।
विसंगतियों के ये प्रतीक और बिंब हमारे मनीषियों और गल्प-जीवियों ने बुने हैं। जीवन को वास्तविकता के गरल की जगह आध्यात्मिकता का मधुपान कराया है । जीवन की विसंगतियों को कैसे अद्भुत ढंग से प्रस्तुत किया है। गणेश जैसे विशालकाय को चूहे की पीठ पर बैठाया है। तुलसीदास ने तभी कहा:‘केशव कहि न जाये का कहिए। देखत तव रचना विचित्र अति, समुझि मनहिं मन रहिए।’
लेकिन मन ही मन रहने या रखनेवाले दिखते कम है, पर हैं जरूर। हम उत्सव मनाते हैं और गणेश को चूहे पर बैठाते हैं। बड़े चूहों पर सवारी करते हैं। इस आध्यात्मिक बिंब की प्रतीकात्मकता को राजनीति अपने ढंग से ले रही है। सामंतांे ने अलग ढंग से लिया। पूंजीपतियों ने अलग। माक्र्सवादियों ने बिल्कुल कहानी पलट दी।
साम्यवाद और पूंजीवाद की द्वंद्वात्मकता पर एक कहानी याद आती है ; जो आजकल एक नेटवर्किंग कंपनी का विज्ञापन बनी हुई है। कहानी का मूल शीर्षक है ‘द पाइड पाइपर आफ हेमलिन’। कहानी समस्या के निदान की पुरानी नेटवर्किंग का चित्रण है। हैमलिन शहर चूहों से परेशान है। एक पाइड पाइपर (शहनाई वादक ) वक्त की नजाकत को समझता है और अपने प्रडक्ट को बेचने के लिए स्वयं को चूहों को पकड़नेवाला (चूहापकड़) कहकर प्रस्तुत करता है और शहनाई बजाता हुआ वह सारे चूहो को संमोहित करके नदी में डुबो भी देता है। यह पूंजीवाद है। धन-संग्रह की एक कला।
साम्यवाद चूहों को संगठित करके क्रांति का हंसिया चलाते हैं ,हथौड़ा पीटते है। जिन्हें सामंतवादी और भव्यतावादी लोग श्रमिक और हीन समझते हंै ,उन्हें उपेक्षित करते है। अपने को सिंह और उन्हें चूहा समझते हैं। साम्यवाद उन्हीं चूहों को संगठित बलों में बदल देता है। शेर और चूहे की कहानी भी यहां पढ़ी जा सकती है जो जाल में फंसे शेर को चूहे द्वारा मुक्त कराना चित्रित करती है।
हर विसंगति अपनी मुक्ति के लिए अलग कहानी बुनती है। मनुष्य की सोच का विरेचन करती है। भारतीय मनीषा ने गणेश के विशालकाय व्यक्तित्व को चूहे के हीनकाय अस्तित्व पर ढोने की कल्पना क्यों की ? समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति की बात करनेवाले घोषपत्रों के साथ इसे मिला कर देखूं या न देखूं। हमारी परम्परा विसंगतियों के बिम्बों और प्रतीकों से भरी पड़ी है। गणेश के पिता शंकर ने देवलोक के जीवों को बचाने के लिए न केवल जहर पिया बल्कि अपने पुत्र के वाहन चूहे के शत्रु नाग को गले से लिपटा लिया। स्वयं बैल पर बैठे और पत्नी को सिंह की सवारी कराई। पति और पत्नी के बीच तो प्रायः तू-तू मैं-मैं होती ही रहती थी , बैल और सिंह केसे निबाहते रहे हांेगे ? बड़े बेटे के वाहन मयूर से अपने कण्ठहार नाग की रक्षा उन्होंने कैसे की होगी ? मोर केे लिए तो सांप का मांस ही प्रिय है। कभी सोचना पड़ता है कि हम ‘समवेत के संगच्ध्वम्’ को स्वीकार करते हैं या जंगलराज की सच्चाई को ?
और फिर कबीर याद आते हैं जो अपनी द्वंद्वात्मकता को रहस्यवाद के मुठिये1 से बुनते हैं। कबीर कहते हैं: एक अचम्भा देखा रे भाई ! ठाढ़ा सिंह चरावै गाई।
पहले पूत पीछे भई माई । चेला के गुर लागै पाई।
जल की मछली तरुवर ब्याई। पकड़ि बिलाई मुरगे खाई।
बैलहिं डारि गूंनी घर आई। कुत्ता को ले गई बिलाई।
तल तरि साखा ऊपरि मूल। बहुत भांति जड़ लागै फूल।
- कबीर की उलटबांसियों के पूरे मिज़ाज़ में ही अचम्भा है। अचम्भा है कि सिंह गायों का पालक बना हुआ है। रक्षक जहां भक्षक बने हुए हैं वहां भक्षकों को रक्षक बनाना आजकल व्यंग्य बन जाता है। प्रजातंत्रीय घोषणापत्रों ने ऐसे व्यंग्य बहुत किये हैं।
- अचम्भा ही है कि पहले बेटे हुए और बाद में माताएं। जीव को माया कहुत बाद में दबोचती है। अगर व्यवसाय या मुद्रा-स्वार्थ का वाणिज्यशास्त्र देखें तो एक समय बाद मां सिर्फ होर्डिंग रह जाती है और पुत्र के पीछे बहुएं (मायायें) राज्य करती है। यह नीति की नहीं अर्थशास्त्र की मजबूरी है।
-अचम्भा ही है कि जल के बिना न रह सकने वाली मछलियां हवा मे अपने बच्चे देती है। बिल्ली को पकड़कर मुरगियां खाने लगती हैं। बैलों के बिना भरे हुए मालवाली गाड़ियां गोदामों में पहुंच जाती हैं। भड़ियाई के लिए प्रसिद्ध बिल्लियां वफादारी के लिए विख्यात कुत्तों को लेकर चम्पत हो जाती हैं। भारतीय पुरुष विदेशी हो जाते हैं।
-अचम्भा ही है कि शाखाएं नीचे तल के नीचे चली गई हैं। भूमिगत हो गई हैं और जड़ों में बहुत प्रकार के फूल-फूले हुए हैं। जड़बुद्धि फल-फूल रहे हैं, ऐसी बातें कहकर बहुत से भारी-भारी विद्वान लोग आहें भरते हैं और फिर भी केवल परिचितों को ,गांठ के पूरों को उछालते रहने से बाज नहीं आते। उन्हें अपने बिलाने का खतरा है। गांठ के पूरे ही उन्हें उबार सकते हैं।
अचम्भा से भरे हुए हैं कबीर। वैसे बहुत दूर और बहुत देर तक चलने के बाद सब कुछ अचम्भा ही लगने लगता है। किस-किस की चर्चा की जा सकती है ? जब जगत के ईश को जल के ऊपर सहसफनी नाग के बिस्तर पर लेटे हुए हम देखते हैं और देखते हैं कि लक्ष्मी उनके पैर चांप रही है तो क्या अचम्भा नहीं होता ? क्या अचम्भा नहीं है कि हम कांटों में गुलाब और कीचड़ में कमल को खिलते देखते रहते हैं। ज़िन्दगी की उलटबांसियों को कहां तक सीधा करने की कोशिश करेंगे हम आप। तस्मात् युद्धाय उत्तिष्ठ धनंजय के भाव से संघर्ष करते रहें।ज्यादा है तो बिल्ले और चूहे यानी टाम और जैरी के कार्टून देखकर मन बहलाते रहें।

1. कपड़ा बुनने के लिए धागे की भरनी।
03/04.11.09 , मंगल-बुध.