Sunday, September 20, 2009

जिनमें निश्छल दर्द हुआ है
उन गीतों ने मुझे छुआ है।

मुख्य-मार्ग में रेलम पेला
पथपर मैं चुप चलूं अकेला
खेल-भूमि पर हार जीत का
कोई खेल न मैंने खेला ।
बहुत हुआ तो चलते चलते
कांस-फूल को गोद लिया है।

फिसलन हैं ,कंकर पत्थर हैं
मेरे घर गीले पथ पर हैं
भव्य-भवन झूठे सपने हैं
अपने तो चूते छप्पर हैं।
छल प्रपंच के उजले चेहरे
निर्मल मन में धूल धुआं है।
मंगली हैं मेरे सब छाले
दिए नहीं मन्नत के बाले
मेरी नहीं सगाई जमती
कोई सगुन न मेरे पाले
हाथों कष्टों की रेखाएं
सर पर मां की बांझ दुआ है।


फिर भी मैं हंसता गाता हूं
जिधर हवा जाती जाता हूं
दिल में जो भी भाव उपजते
गलियों में लेकर आता हूं
बोया बीज न फसल उगाई
खुले खेत भी कहां लुआ है।
080909

Thursday, September 3, 2009

राष्ट्र-ऋषि नहीं कहलाएंगे शिक्षक



चाणक्य के देश में शिक्षक दुखी है ,अपमानित है और राजनीति का मोहरा है। वह पीर ,बावर्ची और खर है। खर यानी गधा। उस पर कुछ भी लाद दो वह चुपचाप चलता चला जाता है। आजादी के बाद से गरिमा ,मर्यादा और राष्ट्र-निर्माता के छद्म को ढोते-ढोते वह अपना चेहरा राजनीति के धुंधलके में कहीं खो चुका है। वह जान चुका है कि शिक्षकों के साथ राजनीति प्रतिशोध ले रही है। फिर कोई चाणक्य राजनीति के सिंहासन को अपनी मुट्ठी में न ले ले ,ऐसे प्रशानिक विधान बनाए जा रहे हैं।
आजादी के बाद इस देश में शिक्षकों को राष्ट्रपति बनाया गया। एक राजनैतिक चिंतक ने राष्ट्र को दार्शनिक-राजा द्वारा संचालित किये जाने की बात की थी। डाॅ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन् जैसे प्रोफेसर को राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद पर बैठाकर भारत ने जैसे अपनी राजनैतिक पवित्रता प्रस्तुत की। राष्ट्रपति राधा कृष्णन् के जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाए जाने से जैसे शिक्षकों और गुरुओं के प्रति राष्ट्र ने अपनी श्रद्धा समर्पित कर दी। लेकिन पंचायती राज्य ,जनभागीदारी और छात्र संघ चुनाव के माध्यम से शिक्षकों को उनकी स्थिति बता दी गई कि तुम राष्ट्र निर्माता नहीं हो ,सब्बरवाल हो।
शिक्षक राजनीति की तरफ बहुतायत से गए हैं। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी शिक्षक हुए है। भारत के मध्यप्रदेश में दर्शनशास्त्र में स्वर्णपदक प्राप्त मुख्यमंत्री पदस्थ हैं। शिक्षामंत्रालय में भी महाविद्यालयीन शिक्षिका मंत्राणी होकर आई हैं। शिक्षा क्षेत्र में नये-नये प्रयोग वे इन दिनों कर रही है। स्कूल शिक्षा और तकनीकी शिक्षा को भी वही संभाल रही हैं। वे शिक्षकों को देखकर शब्दों की भीगी ओढनियां हवा में उड़ाने लगती हैं कि छींटें शिक्षकों पर पड़ें और वे गदगद हो जाएं। मुख्यमंत्री भी लगातार अपने दार्शनिक स्वर्णपदक को रगड़ रगड़कर शब्दों के जिन्न पैदा कर रहे हैं। एक तरह से शब्दों का मायाजाल रचकर वे प्रदेश को नये स्वप्नलोक में पहुंचा रहे हंै। उनके मूल राजनैतिक दल में मंसूबों और नीयत के खतरे मंडरा रहे हैं। जलती हुई फुलझड़ी के तिनगों की तरह कद्दावर नेता टूटकर बिखर रहे रहे हंै और मुख्यमंत्री अपने दर्शनशास्त्र के तर्कवाक्यों से प्रदेश में नयी क्रांति का शब्दव्यूह रचे जा रहे है। शिक्षकों को लुभाने के लिए उन्होंने एक नया शब्दास्त्र फेंका है। शिक्षिका से मंत्राणी हुई उनकी सहयोगी ने शिक्षक दिवस पर शिक्ष्कांे और गुरुजियों को राष्ट्र-ऋषि की उपाधि से सम्मानित करने की घोषणा की है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने अध्यापकों को शिक्षाकर्मी कहकर अपमानित किया था। फलस्वरूप वे निर्वाचन में अप्रत्याशित पराजय से पराभूत होकर आत्मनिर्वासन के महात्याग और संकल्पों की पैन्टिंग बनाने में लगे हैं। पराजित होकर देश की जनता को लुभाने का अंदाज कलयुगी है। कलयुग के प्रारंभ में दो दो राजकुमारों ने चरमोत्कर्ष के क्षणों में सत्ता का त्याग किया था। वह वास्तविक आत्मसाक्षात्कार का वीतराग था। सात्विक जनकल्याण का मार्ग था। उन्हीं सिद्धार्थ और वर्धमान के इस देश में भीषण नरसंहार के बाद आत्मग्लानि से बैरागी बननेवाले राजा अशोक भी दार्शनिक दृष्टांत हैं। दूसरी ओर शिक्षकों द्वारा वर्तमान मुख्यमंत्री ने अपने पहले दौर में उन्हें फिर अध्यापक बनाया और अब राष्ट्र-ऋषि कहकर वह उन्हें सर्वोच्च सम्मान देने का राजनैतिक भ्रम खड़ा कर रहे हैं। दूसरी ओर महाविद्यालयीन शिक्षकों को अभी तक छटवां वेतनमान यह दार्शनिक सरकार घोषित नहीं कर पायी है। देना तो दूर। जबकि केन्द्र सरकार की विश्वविद्यालय अनुदान आयोंग की सिफारिश पर केंन्द्र सरकार नया वेतनमान की अस्सी प्रतिशत अंशदान दे चुकी है। ऐसे दोहरी नीतियों के चलते राष्ट्रऋषि का खिताब शिक्षक कैसे स्वीकार करें ? शिक्षकों ने इस सम्मान को अपना अपमान माना है ,छल समझा है।
क्यों मान रहे हैं शिक्षक राष्ट्र-ऋषि के खिताब को अपना अपमान ? हमारे पूजनीय पुराणों में निरंकुश और दुराचारी राजाओं ने ऋषियों का सतत् अपमान किया। उनके आश्रमों पर हड्डियां और मांसफेंका। उन्हें पकड़कर मारा पीटा। क्यों ? क्योंकि शिक्षक धर्म और नैतिकता पर आधारित एक सामाजिक समाज का निर्माण चाहते थे। असामाजिक तत्वों को इससे खतरा था। आतंक और अत्याचार पर टिका हुआ उनका राज्य ध्वस्त होता था। उन्होंने ऋषियों को जिन्दा भी जलाया। शिक्षक कुराजाओं के राज्य में अपना हश्र देख चुके हैं। पुराणों और पुरखों की दुहाई देने वाले पुरोधाओं के पिछलग्गू राजाओं द्वारा अब कौन ऋषि कहलाना चाहेगा ? क्या ऋषि कहकर तुम भविष्य के तमाम अत्याचारों को विधिक स्वरूप देने की फिराक में हो ? यही पूछ रहा है शिक्षक।
अब सरकार सकते में है। वसिष्ठ से दुर्वासा हुए शिक्षकों को कैसे मनाए। राजनैतिक दांव का वह कौनसा पांसा फेंके कि शिक्षक चारोंखानों चित्त। शिक्षक दिवस को अभी दो दिन बाकी हैं।
ग़ालिब के शब्दों में -
थी हवा गर्म की ग़ालिब के उड़ेंगे पुरजे ,
देखने हम भी गए थे पै तमाशा न हुआ ।

मित्रों ! आप क्या सोचते हैं ? क्या होगा शिक्षक दिवस पर ? दार्शनिक सरकार शिक्षकों के दर्द को समझेगी या तमाशा होगा ? 03.09.09

Tuesday, September 1, 2009

तोता उड़ गया



और आखिर अपनी आदत के मुताबिक मेरे पड़ौसी का तोता उड़ गया। उसके उड़ जाने की उम्मीद बिल्कुल नहीं थी। वह दिन भर खुले हुए दरवाजों के भीतर एक चाौखट पर बैठा रहता था। दोनों तरफ खुले हुए दरवाजे के बाहर जाने की उसने कभी कोशिश नहीं की। एक बार हाथों से जरूर उड़ा था। पड़ौसी की लड़की के हाथों में उसके नाखून गड़ गए थे। वह घबराई तो घबराहट में तोते ने उड़ान भर ली। वह उड़ान अनभ्यस्त थी। थोडी दूर पर ही खत्म हो गई। तोता स्वेच्छा से पकड़ में आ गया।
तोते या पक्षी की उड़ान या तो घबराने पर होती है या बहुत खुश होने पर। जानवरों के पास दौड़ पड़ने का हुनर होता है , पक्षियों के पास उड़ने का। पशुओं के पिल्ले या शावक खुशियों में कुलांचे भरते हैं। आनंद में जोर से चीखते हैं और भारी दुख पड़ने पर भी चीखते हैं। पक्षी भी कूकते हैं या उड़ते हैं। इस बार भी तोता किसी बात से घबराया होगा। पड़ौसी की पत्नी शासकीय प्रवास पर है। एक कारण यह भी हो सकता है। हो सकता है घर में सबसे ज्यादा वह उन्हें ही चाहता रहा हो। जैसा कि प्रायः होता है कि स्त्री ही घरेलू मामलों में चाहत और लगाव का प्रतीक होती है।
दूसरा बड़ा जगजाहिर कारण यह है कि लाख पिजरों के सुख के बावजूद ; लगाव ,प्रेम ,लाड़ और देखभाल के बावजूद तोते अपनी पक्षीगत उड़ान पर निकल जाते हैं। हर पक्षी का यह स्वभाव है कि वह आकाश में स्वच्छंद उड़े। चील और बाजों के भय के बावजूद वह उड़ान भरे। तोते को चूंकि प्यार से पाला पोसा जाता है क्योंकि वह मनुष्यों की बोली की नकल कर लेता है। मम्मी तो बोलता ही बोलता है। बाकी के शब्द भी वह दोतराता है। ऐं ऐं की टें टें तो दिन भर करता रहता है। हंसता है ,छोटे छोटे वाक्य बोल लेता है। चिढ़ाता भी है। मैने अपने तोते को लड़की की छींक के बाद छींकते देखा सुना है। लड़की को भाई या मां की सच्ची झूठी डांट पड़ती है तो उसे हंसते देखा है। तोते कमाल के मनोरंजक पालतू पक्षी हैं। लेकिन वे इन सब के बावजूद किसी घर के होकर नहीं रह जाते। मौका मिलते ही उड़ जाते हैं। उनके इसी स्वभाव के कारण तोतों को बेईमान कहा गया है। मगर इस बेईमानी के बाद भी उसे पालना लोग छोड़ते नहीं। उसे अनुकूल बातें सिखाना नहीं छोड़ते। उसे हिफाजत से पिंजरे में रखना नहीं छोड़ते। मनुष्य कहना चाहता है कि हजार धोकों के बावजूद विश्वास और आशा वह नहीं छोड़ेगा।
एक होता है कबूतर । वह केवल गुटरगूं करता है। उसे बहुत कम लोग पालते हैं। वह लौटकर आता है। दिन भर इधर उधर उड़ता है और शाम होते ही अपने दड़बे में लौट आता है। पालनेवाले उसे पहचानते हैं और वह पालनेवालों को । पालनहार के घर को भी कबूतर पहचानते हैं। उसके उड़ने का कभी खतरा नहीं । इसलिए वह पिंजरे में नहीं होता। वह कभी संदेश लेकर जाता भी था और आता भी था।
कबूतर शांति और निष्ठा के प्रतीक हैं। केनेडी और नेहरू उन्हें आकाश में उड़ाते थे कि वही शांति और निष्ठाएं आकाश की ऊंचाइयों से फिर जमीन पर आएं।

इतिहास में एक कहानी है कि दो प्रेमी राजा रानी बगीचे में दो पक्षियों से खेल रहे हैं। किसी काम से राजा थोड़ी देर के लिए कहीं जाता है और पक्षियों को वह रानी के हाथों में दे जाता है। लौटता है तो देखता है कि रानी के हाथ में एक ही पक्षी है। राजा पूछता है एक कहां गया ?
रानी कहती है उड़ गया। राजा पूछता है -कैसे ? रानी दूसरा हवा में उछालकर कहती है- ऐसे। जिस फिल्म में मैंने यह शाट देखा था उसमें प्रेयसी के हाथ में कबूतर थे। मगर कबूतरों और तोतों के चरित्रों का विश्लेषण करनेपर साफ पता चलता है कि यह शाट निर्देशक ने अपनी टेक और रिटेक की सुविधा की दृष्टि से किया है। तोते एक बार उड़े तो उड़ेही उड़े। कबूतर दुबारा लौटेंगे और उन्हें वापस उनके मालिकों को दिया जा सकेगा। तोतों के साथ रिस्क और अनावश्यक समय की बर्बादी है। कितने रिटेक होंगे उस हिसाब से तोते रखने होंगे। जबकि दो कबूतरों से काम निकल जाएगा और वे मूलधन की तरह वापस आएंगे। ब्याज में किराया तो मिल ही रहा है। तोते तो किसी प्रोजेक्ट की निश्चित असफलता से डूबनेवाली लागत भी हैं और चूंकि लोन लेकर प्रोजेक्ट लांच किए जाते हैं इसलिए ब्याज भी डूबता है। अस्तु , हाथों से जो उड़े वो तोते ही थे ;कबूतर नहीं। इसलिए तोता उड़ना मुहावरा है सब कुछ के नष्ट हो जाने का।
ेबच्चों के सामान्यज्ञान और सतर्कता से संबंधित एक मासूम सा खेल है। जमीन पर बच्चों से हाथ रखकर कहा जाता है- तोता उड़ , चिड़िया उड़ , कबूतर उड़ , चील उड़ , तीतर उड़ , बटेर उड़ ,बगुला उड़ आदि। बच्चे हर बार हाथ जमीन से उठाकर उड़ने का समर्थन करते हैं। इसी बीच खेल का संचालक भैंस उड़ /हाथी उड़ /गैंडा उड़ का अप्रत्यासित पासा फेंकता है और प्रायः एक दो हाथ उड़ने के सकेत में अभ्यासवशात उठ जाते हैं। वे बच्चे फाउल हो जाते हैं या आउट हो जाते हैं। उन्हें दंड देना पड़ता है। वे सतर्क बच्चे नहीं हैं जो न उड़नेवालों को भी उड़ा देता है। इस खेल से उड़ने और नाउड़नेवालों की अच्छी पहचान हो जाती है। लेकिन मित्रों ! यह जिन्दगी है। लाख सिखाने के बाद भी बहुत कुछ अनसीखा रह ही जाता है।
इसलिए पुरखों के जमाने से यह बात हम सुनते आएं हैं कि तोते उड़ गए। तोते उड़ गए यानी सारा किया धरा मिट्टी में मिल गया। अच्छे दिनों के साथी की उम्मीद में जिसे पाला पोसा ,जिसकी हर बात का ध्यान रखा ,अंत में वही उड़ गया। धोका ,विश्वासघात तुम्हारे साथ हुआ ,मगर चलो जरा तोते से पूछें कि वह क्यों उड़ा।
लोग घर और जीवनसाथी के बिना जिन्दगी बेकार समझते हैं। फिर एक तोता भरा पूरा परिवार और आराम की जिन्दगी छोड़कर मुंह फेरकर क्यों उड़ जाता है ? अगर आजादी ही प्राकृतिक है तो मनुष्य पिंजरे क्यों बनाता है ? अपने लिए और उड़ जानेवालों के लिए। लौटकर घर और दड़बों तक आनेवाले ,केवल गुटरगूं करनेवाले कबूतरों से ज्यादा प्यार उन तोतों को क्यों मिलता है ,जो बोलते तो मीठा हैं ,मगर एक दिन ऐसे उड़ जाते हैं कि जैसे कभी वास्ता ही नहीं था। 31.09.09