Tuesday, July 21, 2009

सदी का महानायक: कुत्ता


इक्कीसवीं सदी में एक नया इतिहास बना है। ओबामा साहब राजनैतिक विश्व में सबसे शक्तिशाली देश के पहले ग़ैर-श्वेत नस्ल के राष्ट्रपति के रूप में सत्तारूढ़ हुए हैं। विद्वान हैं ,उत्साही हैं ,सुलझे हुए हैं और आत्मविश्वास से भरे हुए हैं। हालांकि उनकी विद्वता ,उत्साह ,सुलझाव और आत्मविश्वास की दिशाएं पूरी तरह खुली हुई नहीं हैं। अमेरिका को इसलामिक राष्ट्र और पुतिन को राष्ट्रपति कहकर उन्होंने संकेत जरूर दिया है कि वे किधर जा रहे हैं। पर इतिहास रचनेवाले तो वे हमेशा रहेंगे।
बराक साहब की लोकप्रियता का एक और कारण है । पद पर आकर उन्होंने सबसे पहले जिस प्राणी की खोज की वह एक शानदार जानदार समझदार कुत्ता था। इसके साथ ही मनुष्य समाज का सबसे वफादार दोस्त कुत्ता नामक प्राणी दुनिया भर में फिर चर्चा का विषय बन गया। दुनिया भर के बलागर्स में कुत्ते भी शामिल हुए । उन्होंने न केवल बराक ओबामा को कुªªत्ता जाति को सम्मानित करने के लिए धन्यवाद प्रेषित किये बल्कि अपने-अपने रिज्यूम भी भिजवाए ताकि उनका यथास्थान नियोजन हो सके।
यद्यपि यह पहली बार नहीं हुआ कि कोई कुत्ता सत्ता के गलियारों में इतने शानदार ढंग से प्रविष्ठ हुआ हो। महाभारत काल में महाराज युधिष्ठिर के पास भी एक कुत्ता था जो विश्व इतिहास का पहला महानायक है। महानायक इस अर्थ में कि सारे पंचनायक अपनी अवसान बेला में हिमालय जा रहे थे और उनके साथ सबसे आगे युधिष्ठिर का कुत्ता भी था। एक एक कर सारे नायक और महानायिका भी मार्ग में ध्वस्त हो गए किंतु कुत्ता अपनी संपूर्णता के साथ युधिष्ठिर के साथ खड़ा रहा। वह पहला प्राणि था जो स्वर्ग गया। किताबें कहती हैं कि वह रूपांतरित हुआ। किताबें कभी-कभी लोकहित और लोकधर्म के कारण थोड़ा बहुत रूपांतरण कर लेती हैं। तथापि यह सच है कि वह स्वर्ग गया और महालक्ष्य को प्राप्त करने के कारण महानायक कहलाया।
भारतीय परम्पराओं में कुत्ते एक देवता दत्तात्रेय के भी साथ देखे गए हैं। परन्तु वे वहां आसपास मंडराते चार छर्राें से ज्यादा नहीं है। भगवान भैरव के रूप में भी कुत्ता प्रतिष्ठित हुआ है।
सतयुग की कई कथाओं में कुत्ता एक महत्वपूर्ण उत्कर्ष उपस्थित करता है। कभी किसी राजा की व्रतप्रियता की परीक्षा में वह रोटी खाता है तो कभी कोई ऋषि उसका मांस खाकर तुच्छ जीवन की रक्षा करता है।
त्रेतायुग के रामराज्य में भी एक कुत्ता साधु और कुत्ता के बीच न्याय की वकालत करता है और मुकदमा जीतता है।
द्वापरयुग में अभी महाभारत काल की चर्चा ऊपर हो चुकी है।
कलयुग में कबीर अपने को राम का कुत्ता कहकर एक और क्रांति की थी। उन्होंने कहा‘‘ मैं तो कुत्ता राम का ,मुतिया मेरा नांवुं। गले राम की लेहड़ी ,जित खींचे तित जांवंु।। ‘‘ उनके पीछे आनेवाले रामभक्तिधारा के लोककवि तुलसी ने भी कुत्ते की उपाधि स्वर्ग के राजा इंद्र को प्रदान की थी। उनके ही शब्दों में ‘‘सूख हाड़ि लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज। छीनि लेह जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहिं न लाज ।।‘‘ नारद तप करने बैठे तो स्वभाव के कारण इन्द्र को भय हुआ कि कहीं वे स्वर्ग के राजा तो नहीं बनना चाहते। कहां विधिपुत्र नारद और कहां सुरपति इंद्र। परन्तु मानसिकता का कोई क्या करे ? तो वे घबराए। उनकी घबराहट की तुलना करते हुए कुत्ते का रूपक महाकवि ने खींचा कि जैसे सठ-कुत्ता सिंह को आता देखकर मुहं-दबी सूखी हड्डी लेकर ऐसे दौड़ पड़ता है जैसे सिंह उसकी सूखी हड्डी छीन लेगा। जड़-इंद्र का डर भी ऐसा ही है। तात्पर्य यह कि तुलना के लिए अलंकार-सिद्ध महाकवि तुलसी ने भी कुत्ते को उपमान के रूप में चुना।
प्रसिद्ध उपन्यास सम्राट् प्रेमचंद की कई कहानियों में कुत्ता सहनायक बनकर आया है । ‘पूस की रात‘ अगर आपको याद हो तो हरखू के मित्र के रूप में और हरखू के काम में उससे ज्यादा मुस्तैदी से कुत्ता ही लगा दिखाई देता है। पे्रमचंद कुत्ते से इस कदर प्रभावित थे कि उन्होंने ‘एक कुत्ते की कहानी‘ लिखकर उसका मान बढ़ाया।
प्रसिद्ध आंचलिक कथाकार फणिश्वरनाथ रेणु के उनन्यास ‘परती परिकथा’ में कुत्ते का जो स्थान है वह प्रसिद्ध प्रगतिशील लेखक हरिशंकर परसाई के शब्दों में ही पढ़ना रोमांचक हो सकता है। परसाई लिखते हैं: ‘‘...‘परती परिकथा‘ का नायक है कौन ? आप कहेंगे जित्तन या जितेन्द्र बाबू। मैं नहीं मानता। मैं चार साल से इस पर विचार कर रहा हूं और इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि नायक वह कुत्ता मीत है। इस कुत्ते के चरित्र का लेखक ने अधिक कुशलता से विकास किया है। आरंभ से अंत उसके चरित्र में एक संगति है जो जित्तन के चरित्र में नहीं है।‘‘ अब तो इस बात का कोई काट विश्वसाहित्य में नहीं है क्योंकि विश्वसाहित्य की विश्वसनीयता तो स्वयं हरिशंकर परसाई हैं।
वैसे स्वयं परसाई भी कुत्ते के प्रभव से नहीं बच सके और उन्हें भी कुत्तें के नायकत्व में एक रचना प्रस्तुत करनी पड़ी , ‘एक मध्यमवर्गीय कुत्ता‘ शीर्षक से।
कुलमिलाकर कुत्ता हर क्षेत्र में सफलता पूर्वक अपनी धाक जमाए हुए हुए है। हर प्रतिश्ठित घर के सामने लिखा होता है कुत्ते से सावधान। धार्मिक आध्यात्मिक राजनैतिक सामाजिक साहित्यिक सांस्कृतिक मनोरांजनिक कहां आप कुत्तों से मुक्त हैं। वैसे सच्चाई यही है कि कुत्ते हैं तो हम सुरक्षित हैं। सुरक्षा के मामले में जाएं तो कुत्ता विश्व भर की पुलिस और विश्व भर की सेनाओं में कुत्ता बड़े अधिकारी के पद पर अभिराजित है। जनरंजन के सबसे लोकप्रिय और शक्तिशाली माध्यम फिल्म में भी कुत्ते को ऊंचा स्थान है। वे कई लोकप्रिय फिल्मों में बतौर नायक आए हैं। विदेशों में भी उनके नायकत्व में कई फिल्में बनीं। धर्मेन्द्र के बारे में बताने की जरूरत नहीं है जो जीवन भर कुत्ते का खून पीने की धमकी देते रहे। आजकल के महानायकों को अपने साथी नायकों के नाम से कुत्ते पालने का शौक बढ़ा है। एक नायक ने अपनी प्रेमिका को उपहार में कुत्ता भेंट किया है। 180709
क्रमशः

Saturday, July 4, 2009

राग-दरबारी उर्फ राग-विरुदावली

दाता के गुण गाओ -‘
राग-दरबारी उर्फ राग-विरुदावली

भीषण गर्मी की लू भरी शाम में भी हम इवनिंग वाक करने निकले थे। म्यूजिक प्लेअर में कोई गाायक ‘रागदरबारी ‘ में एक बंदिश गा रहा था -‘दाता के गुण गाओ...‘। गुणगान की बंदिश होने के कारण ही शायद ‘रागदरबारी‘ दरबारियों का राग कहलाता है। हालांकि राजदरबार के एक राजपत्रित दरबारी ने शिक्षा-व्यवस्था और शिक्षा-व्यवसाय के सिर पर तबला बजाते हुए तोड़-मरोड़कर थाट-तोड़ी पर पढ़ा जानेवाला ‘रागदरबारी’ गाया ,जो उतना ही लोकप्रिय हुआ ,जितना मर्मस्थल पर हाथ रखकर गानेवाले पापी गायक स्व. माइकल हुए। वे आज ही स्वर्गीय हुए हैं। उन्हें इन पंक्तियों के लेखक ने कभी सुना नहीं और देखा भी नहीं हैै। पर नाम तो नाम होता है। नाम होता है तो फिर देखने सुनने की क्या जरूरत?
वैसे गाए जानेवाले राग- दरबारी में बिला-शक मिठास बहुत है। यह मिठास सुरों की है या गुणगान की यह तो कोई सुरंदाज़ ही बता सकता है। मेरे जैसे साधारण सुननेवाले तो केवल संगीत की मिठास ग्रहण करते हैं। संगीत के सुर-शास्त्र से उनको क्या लेना देना ? जैसे भोजन बहुत बढ़िया है , इसकी तमीज़ हर खानेवाले को होती है लेकिन पाकशास्त्र का ज्ञान तो पकानेवाले को ही होता है। पकाने से याद आया कि शास्त्रीय संगीत को भी पका हुआ ,पक्का संगीत कहते हैं । शायद इसीलिए बहुत से लोग शास्त्रीय संगीत सुनकर कहते हैं कि क्या पका रहा है यार।
रागों के मामले जब उठे हैं तो बताना लाज़िमी है कि एक होता है ‘बादल-राग‘। ‘बादल-राग‘ को मेरे कुछ मित्र साहित्यिक-राग कहते हैं। उनके अनुसार ‘बादल-राग‘ निराला ने लिखा है। पर मैंने सुना है कि मियां तानसेन के पास भी कोई ‘बादल-राग‘ था जिसे गाने से बादल आ जाते थे। मेरे कुछ नान- म्यूजिकल मित्रों को भी यह पता है। इसलिए पसीना पसीना होकर शाम को घूमते हुए एक ने कहा: ‘‘ मर गए यार सड़ी हुई गर्मी और बीस बाइस घंटों की बिजली कटौती के मारे..अब तो कोई जाए और मानसून को मनाए..उसकी सूनी मांग को मान के सिंदूर से सजाए ..कोई कहीं से मियां तानसेन को लाए और वह आकर बादल राग गाए.....और इतना गाए कि पानी गिर जाए...थोड़ा सा तो चैन आए...‘‘
दूसरे मित्र ने कहा:‘‘ बादल राग से केवल बादल घिरेंगे...पानी गिराने के लिए तो किसी को राग-मल्हार गाना पड़ेगा....सुना है तानसेन का प्रतिद्वंद्वी बैजू बावरा था जो मजे से राग मल्हार में गाता था ..तू गंगा की मौज मैं जमुना की धारा.....अगर कहीं वो मिल जाए तो हमारे गांव में गंगा जमुना बह जाएं.. ‘‘
मैंने उकताकर गर्दन पर बहनेवाले पसीने को पोंछकर कहाः‘‘ यार एक बात बताओ.. क्या तुम्हीं लोगों ने ठेका ले लिया है गंगा जमुना बहाने का....‘‘
‘‘ तो तुम्हीं ले लो ...हम को तो बरसात चाहिए जिससे कि बाइस तेइस घंटों की अंधेरी हवा विहीन रातों से छुटकारा मिल सके...‘‘ बात उनकी अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं थी। हमारे गांव में बिजली की अनिश्चितकालीन कटौती बाइस तेइस घंटे ही की होती है। मैंने बात बदलने के लिए कहा ‘ बिजली की समस्या के लिए भी एक राग है......दीपक राग। सुना है कोई मियां इसे गाते थे तो दीपक जल उठते थेे।‘
‘दीपक तो जल जाएंगे पर उससे जो गर्मी बढ़ेगी तो हम कहां जाएंगे... पहले तो राग मल्हार वाले को बुलवाओ...दीपक की बाद में सोचेंगे।‘ मित्र ने चिढ़कर कहा । इससे तत्काल लाभ यह हुआ कि हमारा खटराग बंद हो गया। दाता के गुण गानेवाले राग-दरबारी की भी कोई ध्वनि अब हमारे कानों में नहीं पड़ रही थी। मगर यह शांति कुछ देर की थी। कहीं दूर से भजनों के गाए जाने की आवाज आ रही थी। अब यह कौन सा राग है? हम तीनों ने एक साथ एक दूसरे का देखा।
‘‘मेरे ख्याल से यह कल्याण राग है...क्योंकि भजन का संबंध कल्याण से होता है...‘‘ मैंने कहा।
‘‘ कल्याण से तो ठीक है ,पर किसके कल्याण से ?‘‘ मित्र ने पूछा।
‘‘ सबके कल्याण से ..‘‘ मैंने कहा । इस पर मित्र ने कहा:‘‘ तुम इतने यकीन से कैसे कह सकते हो कि भजन का संबंध सबके कल्याण से होता है... भजन गानेवालों को तुम जानते हो ?‘‘मित्र ने पूछा।
‘‘ इसमें जानने की क्या जरूरत ...भजन तो ईश्वर का गुणगान है ,प्रार्थना है...सबके साथ मिलकर गाई जा रही है इसलिए जाहिरन सबके हित और कल्याण के लिए गाई जा रही है...‘‘ मैंने तर्क रखा। मित्र ने मेरे तर्कों पर झाड़ू मारते हुए कहा ‘‘ लीपापोती मत करो...तुम नहीं जानते ..भजन की नीति...? यह वही लोग है जो मंदिरों में भजन करते हैं और फिर शराफत की आड़ में बेईमानियां भी करते हंै।‘‘
‘‘ तुम तो राग भीम पलासी अलापने लगे...भीम की तरह भजनगीरों को पटखनी देने लगे ..बात क्या है ?‘‘
‘‘ मै इस समय राग में हूं..सभी पर मुझे आज राग आ रहा है....‘‘
‘‘ लेकिन तुम राग कहां कर रहे हो ,तुम तो गुस्सा कर रहे हो ...?‘‘
‘‘ मराठी में गुस्सा को ही राग कहते हैं...‘‘
‘‘ मगर गुस्सा किस बात का... मराठों की मायानगरी मुम्बई में तो झमाझम बारिश हो रही है.... ‘‘
‘‘ इसी बात का तो गुस्सा है ...आज अगर मैं मुम्बई में होता तो बारिश में भीग रहा होता । राग बिहाग और मल्हार छेड़ रहा होता..यहां तो तपिश के मारे जान निकली जा रही है..चारों तरफ राग रुदाली की बेसुरी ताने खिंची हुई है.... राग नहीं होगा मुझे ?‘‘
गर्मी के जिस असर के बारे में मैं सुना करता था वह मित्र पर शायद हो गया था। मैं चुप रहा ।लेकिन तभी एक ऐलान हमारे कानों में सुनाई पड़ा:‘‘ नागरिक बंधुओं ! मानसून के बिलंब के चलते और नदी के जल संग्रहण केन्द्र में पानी के अभाव में नगर पालिका द्वारा प्रदान किया जाने वाला पानी अब एक दिन की आड़ में केवल एक समय ही किया जाएगा। सम्माननीय नागरिकों को होने वाली असुविधा के लिए हमें खेद है।‘‘
ऐलान सुनकर मित्र भड़क उठे। कसमसाकर बोले:‘‘ ये देखो मक्कारी राग....चुनाव नजदीक है ...शहर का बिजली और पानी के लिए तरसाकर नेताओं के महलों तक जाने के लिए सड़कों और नालियों का काम जोर और शोर से कर रहे हैं... सारा पानी वहां झोंक रहे हैं ....कांक्रीट की सड़कें और नालियां बनाने में ...और नागरिको को उल्लू समझते हुए खेद व्यक्त कर रहे हैं...‘‘
‘‘ नई.. लेकिन मौसम विभाग ने भी तो अकाल और सूखा की भयानक संभावना व्यक्त की है...‘‘
‘‘ कब व्यक्त की है ? अब जब पानी नहीं गिर रहा है.... पहले क्यों नहीं की जब पानी को सुरक्षित किया जा सकता था और उसके लिए योजनाएं बनाई जा सकती थी... सड़कों के लिए अनुमति रोकी जा सकती थी... बेवकूफ समझते हैं जनता को ?... ये सब साले सरकारी खटराग हैं... इनमें सिर्फ झूठ और फरेब के बादल घिरते हैं और हरे भरे जंगल धू धू करते हैं...‘‘
मैं समझ गया कि मित्र के दिल में जो तांडव-राग मचल रहा है वह मेरे किए शांत नहीं होगा । इसलिए मौका मिलते ही मैंने कहा: ‘‘ आज तो बहुत देर घूम लिए ..घर में लोग चिंता कर रहे होंगे...चलें ?‘‘ और मित्र के उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना मैं घर की ओर चल पड़ा।

27.06.09