Tuesday, May 26, 2009

साहित्य में अफ़सरवाद

उद्योग-नगरी के साहित्य क्लब में तब अध्यक्ष कोई बड़ा अधिकारी होता था और सचिव भी एक छोटा अफसर होता था। ये अफसर प्रायः प्रबंधक-वर्गीय होते थे। डाॅक्टर और इंजीनियर कार्यकारिणी में रखे जाते थे। टीचर्स ,इस्टेट और सैफ्टी इंस्पेक्टर वगैरह सदस्य हुआ करते थे। अध्यक्ष और सचिव पद पर बैठे पदाधिकारी अपनी शक्ति लगााकर महाप्रबंक जैसी मूल्यवान हस्तियों को तलुवों से पकड़कर ले आते थे और तालियां बजाकर अपने हाथ साफ कर लेते थे। उन दिनों मैं प्रबंधन में नया था और अफसर नहीं था। मेरे जैसांे की रचनाएं सराही तो जाती थीं मगर ’अधिकारी-सम्मान’ नहीं दिया जाता था।
एक दिन मैं प्रशासनिक सेवा के लिए चुन लिया गया। अचानक जैसे सब कुछ बदल गया। मैं अब उपेक्षणीय से सम्माननीय हो गया। मेरी रचनाओं में वज़न आ गया। जबकि राजधानी की प्रशासनिक अकादमी के लिए मुझे उद्योग-नगरी से विदा होना था , तब मेरे सम्मान में साहित्य क्लब में विशेष आयोजन किया गया। अध्यक्ष , सचिव और कार्यकारिधी के पदाधिकारीगण फूलमालाओं की तरह बात बात में गले लगने लगे।विदाई में जो रचनाएं मुझे पढ़नी थीं , उसे रिकार्ड करने का इंतज़ाम स्वयं अध्यक्षरूपी अधिकारी ने की थी। ये वही अधिकारी थे जो मेरी रचना पाठ के समय माथे पर यूं हाथ रखकर बैठे होते थे मानो उनकी इज्जत लूटी जा रही हो।
तभी मुझे साहित्य में अफसर होने का अर्थ बेहद नज़दीक से समझ में आया। निरंतर नीचा दिखाने का प्रयास करनेवाली तोपें सलामियां दे रहीं थीं। ये साहित्य को सलाम नहीं था बल्कि अफ़सर को कोर्निशें थीं। मुझे जैसे दिव्य-दृष्टि मिल गई। साहित्य का इतिहास मुझे आर पार दिखाई देने लगा। किसी मित्र ने मेरी समीक्षा-दृष्टि को कभी ‘एक्स-रे‘ कहा था। अफ्सरों द्वारा की गई उपेक्षाओं की मार से पीड़ित और कुंठित मुझ ‘ज्ञानीनाम अग्रगण्यम्‘ हनुमान को तब वह बात व्यंग्य की कालीमाता का खूनी-खडग प्रतीत हुई थी। वर्ना आज मैं नामवर होता। ‘हुए नामवर बेनिशां कैसे कैसे‘ के निराशावादी गानों के बावजूद मैं आलोचनावादी खेमे का सिपहसालार होता। खैर ,जो हुआ सो हुआ , ऐसी असफलता में तुलसी सहायता करते हैं कि ‘होहिहे वही जो राम रचि राखा‘।
आज लगा कि अफ़सर होना ब्रह्म-देव का सर्वोत्कृष्ट वरदान है। जिन रवीन्द्रनाथ टैगोर , रामचंद्र शुक्ल , महावीर प्रसाद द्विवेदी , सूर्यकांत त्रिपाठी , जयशंकर प्रसाद ,मुंशी प्रेमचंद , सुमित्रा नंदन पंत वगैरह के नामों को दुहराते दलराते मैं नहीं थका करता था ,अचानक वहां आई.सी.एस अधिकारी विलियम थैकरे , आर. व्ही. रसैल. मैकाले मेरे आदर्श बन गए. भारतीय आई.ए.एस. अध् िाकारियों में स्थापित कवि अशोक वाजपेयी, श्रीकांत वर्मा , सुदीप बैनर्जी , भारतीय आई.ए.एस. अधिकारियों में स्थापित व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल, रामावतार त्यागी ,अजात शत्रु ,डाॅ.देवेन्द्र वर्मा ,भारतीय आई.ए.एस. अधिकारियों में स्थापित जनसंपर्क एवं साक्षरता लेखक डाॅ. सुशील त्रिवेदी , रघुराज सिंह , नए भारत के प्रमुख दलित-विमर्श में स्थापित दलित आई.ए.एस. कवि और लेखक ओमप्रकाश मेहरा ,रमेश थेटे , डाॅ. धर्मवीर , राम मेश्राम आदि अनेक प्रशानिक अधिकारी स्थापित हो गए। इनमें कुछ बैंक अधिकारी ,कुछ प्रसिद्ध राजनेताओं के भतीजे भांजे और रिश्तेदार आ गए। जिन डायरियों में राजधानी के गलियारों में जगमगाते साहित्यकारों के पते थे ,जो सचिवालय के अवर सचिवों को ‘श्रद्धेय‘ कहकर चिरौरियां करते थे और वांछित लाभ प्राप्त करते थे , उनके स्थान पर उन साहित्यकारों के नाम आ गये जिन्हें पदेन श्रद्धेय होने का गौरव हासिल था।
‘‘ आपका भविष्य बहुत ब्राइट है साहब। आप तो संस्कृति विभाग के लिए ट्राई मारना। से।कड़ों टुटपुंजिए साहित्यकार और साहित्यिक संस्थाएं आपकी कृपा पाने के लिए लाइन लगाएंगी। सैंकड़ोंप्रकाशक आपकी रचनाओं के संकलन छापकर धन्य हो जाएंगे। कमीशनों की बाढ़ आ जाएगी और वे समीक्षक जो गैर-अफ़सरों के संकलनों को हाथ भी नहीं लगाते ,अब आपके घर के बाहर हाथ बांधे और कलम खोले दांत निपोरते खड़े रहेंगे। कहेंगे:‘ सर , लाइए ..समीक्षा कर दूं।...कुछ रेडीमेड समीक्षाएं भी आपको सौंपे जाते हैं..जब जहां जैसी जरूरत हो , इस्तेमाल कर लीजिएगा।‘‘ मेरे एक परमशुभचिंतक टाइप साहित्यकार ने मुझे सलाह दी। वे इसी प्रकार की सलाहें दे देकर प्रमोट हुए थे। अपने से बड़े अधिकारियों को ऐसी सलाहें देकर खुष रखने का उनको वर्षों का अनुभव था।सरकारी अकादमी के खाते से उन्होंने सैकड़ों अधिकारियों की किताबें छपती देखी थीं।
शिक्षक से जन-संपर्क अधिकारी बने एक अस्पष्ट कवि के दो-चार कविता संग्रह उन्होंने मुझे दिखाए। उनकी समीक्षा ऐसे साहित्यकारों ने की थीं जो प्रतिबद्ध किस्म के खड़ूस माने जाते थे।क्लर्क से प्रबंधक हुए एक उपन्यासकार और कवि की किताबों की समीक्षा लिखनेवाले अवकाशप्राप्त शिक्षक तथा बैंक के एक खजांची साहित्यकार का परिचय कराते हुए वे मुस्कुराए:‘‘सर ये स्थापित समीक्षक हैं। एक अनियतकालीन लघुपत्रिका के संपादक हैं और सचिवालय में उदीयमान प्रशासनिक साहित्यकारों की तलाश हेतु राजधानी में प्रायः प्रवासित रहते हैं। इनकी लघुपत्रिका का वर्तमान और भविष्य सचिवालय के दान पर टिका हुआ है।‘‘ फिर धीरे से बोले:‘‘ बहुत से प्रशासनिक अधिकारियों के लिए तो ये छद्मलेखन भी करते हैं।‘‘
‘‘ अच्छा !‘‘ अफसर बनने के बाद मुझे साहित्य में अवसर ही अवसर दिखाई देने लगे।साहित्य में अफ़सरवाद देखकर मेरे अंदर सुप्त हो गया साहित्य का कीड़ा कुलबुलाने लगा।मेरे हाथ में वषों से वह कलम थी जिसे ताकतवर होने का यश प्राप्त था ,किन्तु जिसे वास्तव में साहित्य की ताक़त कहते हैं , उसकी वास्तविकता आज मेरे समक्ष खुली थी।

150309,रविवार ,रात 10 बजे .

बंजारे दिन

बंजारे दिन घूम घूम औज़ार बनाते हैं ।

बच्चों को लकड़ी के घोड़े ,लकड़फोड़ को कुल्हाड़ी।
चिमटा ,कलछी ,चाकू ,हंसिया ,जो चाहे आंगन-बाड़ी।
तवा बनाते हैं ,कैंची में धार लगाते हैं ।
बंजारे दिन....

सुबह सुहानी ,शाम नशीली ,उनके भी डेरे आती ।
छौंकी हुई रात गुदड़ी पर सपनों को घेरे लाती।
भोर-पंखेरू उन्हें राग-मल्हार सुनाते हैं ।
बंजारे दिन....

सड़कें ,रौनक ,महल ,मंडियां , साख तुम्हारी हैं।
वे चल दिए बुझाकर चूल्हे ,राख तुम्हारी है ।
वे कब किसकी धरती पर अधिकार जताते हैं ?
बंजारे दिन....
26050923.

Sunday, May 24, 2009

Dogs are natural and original .

Dear Yuddhu,
Dogs are coincidently loved and cared by Maneka Gandhi too. ‘Too’ is indicating what you better know.Yes,you and so many others the international human being love , keep dogs and care for dogs.Beyond the gender the worldwide dogs species are being loved by both men and women. Why ? The answer is easy.
There are some reasons why dogs are loved so universally :
1. Dog please to see a friend dog . Not a single instance noticed so far that a dog stabbed a friend dog to get his property, position, girl- friend, spouce, land etc.A dog never decieve a friend or believer or followers.
2. Dogs love the old-ones as well as the youngers.They never bark ,bite or leave abondoned a man who got old , weak, of no-use.
3. Dogs don’t make an issue of the name.They never fight to get name and fame. They don’t mind surnames, caste and creed. They never combate about province, language and veg-non-veg.
4. Dogs love the place they live.They never migrate to get better future, money and position.They never change their party and policies.
5. Dogs don’t ever attack over other dogs to show political power and to obtain political existance.Dogs are free from nationalities and they believe in true universality.
6. Dogs don’t sing, act, write, recite, decorate themselves with clothes, colours, caps, threades, other community marks or else for breads and butter.
7. Dogs never molest oppsite sex . The believe in making love first and make affactionate efforts accordingly.They never involve in group rape for caste , community , country sake.
But some attitutes they have earned as they are living in civilian areas among men :
1. Dogs bark when they are afraid of position ,whenever they see a better dog in their jurisdiction.
2. Dogs are fond of getting breads free and they like to lick the leggs of donars.
3. They bark for owner, attack for owner, they do whatever asked to do by owners. They are devoted slaves to the owner.
4. Dogs are vegeterian if an owner is vegetarian. They follow only that language which is delivered or commanded by owner.
5. They can be punished ,tamed and can be kept for intertainment and safety. They can be sold and purchased when they are babies.
6. A owner is god-father to Dogs. Pet dogs never revolt agaist an owner. Owner can bitterly beat them, bark over them, they never rply or argue.
7. Dogs love the band and the name given by owner. They don’t analyse the meaning of the name . They never criticise ever if the name is misfit or uncommon. they think not about the pattern old or new. They don’t believe in fashon.
Dear son Yudhisthir !
let me know whether I am right or wrong. Please reply soon that what you think about a dog.

Yours . mutiya.
The Dog -Your father -Dharma.

Saturday, May 16, 2009

कुमार गंधर्व का ’गंधर्व-पुत्र ’ मुकुल शिवपुत्र

जन्म तो खैर हो जाता है मगर जीने के अर्थ निरंतर विकसित होते रहते हैं। पहुंचे हूए लोगों को देखता हूं तो सोचता हूं किसने या किस-किसने इन्हें यहां पहुंचाया ? आगे बढ़ने का प्रयास और अपने होने का स्फोट करने की चेष्टा सभी करते हैं। मगर ध्यान सबकी तरफ सबका नहीं जाता ।
जंगल मैं मोर नाचता है कौन देखता है । जो देखता है अगर वह आकर गांव या शहर को यह देखना न बताए तो गांव को या शहर को कैसे पता चले कि मोर नाचता भी है। भालू को बांधकर या घोड़े को साघकर भी लोग नचाते हैं । मगर मोर तो स्वयमेव नाचता हैं। अपनी धुन में। जब मन मैं मौज आई तब। मैंने तो खैर नहीं देखा कि बंदर की तरह या तोतों की तरह या लोटन कबूतरों की भांति वह मनुष्य की गिरफ्त मैं पड़ा है और नाच रहा है। मोर अपने कोई कन्सर्ट भी नहीं करता कि उसको पहचान मिले और शान ,शौकत ,शोहरत और दौलत बढ़े। वह ऐसा कुछ नहीं करता कि लोगों का ध्यान कुछ नही ंतो उस हटकर किए गए के लिए उसकी तरफ हो जाए।
प्रतिभाशाली लोग अक्सर कुछ न कुछ निराला करते रहते हैं। या यूं कहें कि उनसे कुछ न कुछ निराला होते रहता हैं। सूर्यकांत त्रिपाठी भी प्रतिभाशाली थे किंतु व्यक्तिगत जीवन में साधारण से हटकर थे। कई घटनाओं के समुच्चय ने उन्हें निराला बना दिया। उपेन्द्रनाथ अश्क बहुत पहुचे हुए उपन्यासकार थे और आखिर में उन्होंने परचून की दूकान खोल ली। आजीविका के लिए यह कोई अनहोनी घटना तो नहीं थी। लोगों ने इसे हटकर बताना चाहा। जैसे साहित्य या कविता से जिनका संबंध है वे कुछ काम-धाम नहीं करते। जयशंकर प्रसाद तंबाकू बेचते थे। प्रेमचंद प्रेस में काम करते थे। यह तो आधुनिक काल की बात है। मध्यकाल में तो कबीर कपड़ा बुनते थे , रायदास या रैदास जूते गांठतेें थे ,नामदेव कंपड़ा सिलते थे , सगना मांस बेचते थे। आजीविका के लिए कुछ तो करोगे। मास्टरी करो , कलेक्टरी करों , डाॅक्टरी करो , इंजीनियरी करो। वह तुम्हारी अपनी क्षमता है। कला और लेखन के लिए पुजारियों या साहूकारों की तरह को नेटवर्क नही होता कि घर में बैठे रहो और तुम्हारा नेटवर्क तुम्हें पैसा पहंुचाता रहे। लेखन में प्रायः पैसा नहीं है। मन में मोर बैठा हो तो आप जंगल में तुलसीदास की तरह स्वातः सुखाय नाचिए या फिर अपना प्रोजेक्ट बनाइये ,मैनेजमेंट फंटा अपनाइये और बेस्ट-सेलर के तौर पर मीडिया में छा जाइये। घर बैठे पैसा कमाइये। लेखन में भी अकूत दौलत है। परन्तु वह व्यावसायिक बुद्धि और मैनेजमेंट फंडा की बात है।अश्क के सिलसिले में परसाई की प्रतिक्रिया इसलिए व्यावहारिक तौर पर लेखको की जिम्मेदारी और महत्वाकांक्षाओं के बीच आत्मूुल्यांकन पर आधारित थी। अभी एक शायर जौनपुरी के पुस्तैनी काम बीड़ी बनाने को लेकर समाचार हाई-लाइट हुआ है। चुनाव के दौरान एक नगरपालिका अध्यक्ष के पुस्तैनी काम जूते गांठना हाइ-लाइट हुआ था। कवि लेखक को क्या काम करना चाहिए और नहीं करना चाहिए इसके कोई मापदंड नहीं हैं। कवि या लेखक या शायर किय प्रकार के ना्ररिक हैं यह भी कहीं उल्लेखित नहीं हैं। कलेक्टर अगर लेखक है तो वह श्रीलाल शुक्ल , अशोक बाजपेयी ,श्रीकांत वर्मा ,रामावतार त्यागी है। वर्ना वह प्रेमचंद है ,निराला है, परसाई है , अश्क है , जौनपुरी है। समाज इस फेर में नहीं पड़ता कि तुम किस हाल में हो। तुम छप सक रहे हो , अपने संकलन निकाल पा रहे हो और हम तक पहंुचा रहे हो , मतलब तुम हो।
यह बात बड़े गर्व और बहुत उपेक्षा के साथ कलावर्गीय और साधारण जीविकाधर्मियों के बीच कही जाती है कि कलाकार अपने स्वाभिमान के कारण प्रचलित मानदंडांे में कभी बंधता नहीं है। चारों और छद्मकलाकारों और व्यापारवादी ,प्रचारवादी ,अवसरवादी ,नक्काल लेखकों और तथाकथित साहित्य-प्रबंधन की साजिशों से घिरा व्यक्तित्व निखरने की बजाय बिखरते चला जाता है। कभी-कभीकोई-कोई प्रतिभाशाली गणितज्ञ ,साहित्यकार, महिला पत्रकार , या कभी कोई प्रतिभाशाली गायक विक्षिप्त होकर सड़कों पर जनरंजन के तौर पर देखा जाने लगता है। हमारी चैकसी ऐसी है कि घट जाता है तब तफसीस होती है। कोई घटना घटे ही नहीं ऐसी व्यवस्था अभी भी नहीं है। घटेगा तभी दिखेगा और तभी व्यवस्था की सक्रियता भी दिखाई देगी। यह नीति है , राजनीति है या कूटनीति है। जो भी है यही हमारा वास्तविक सत्य है जो खुला हुआ है। एक यही सत्य है जिसे सब जानते है ,जो कीलित नहीं है।
हाल ही में ’कुमार गंदर्भ का बेटा होशंगाबाद में मिला ’ शीर्षक से एक अखबार में साधारण-सा पुर्जीनुमा समाचार आया। दूसरे दिन उसी अखबार में फोटो सहित ’प्रख्यात गायक मुकुल शिवपुत्र के पुनर्वास की कोशिश ’ शीर्षक से समाचार आया और मुकुल शिवपुत्र को न जाननेवालों को पता चला कि अवसाद और शराब के नशे में गुमनाकल का जीवन बितानेवाले प्रख्यात गायक शिवपुत्र के गरिमामय पुनर्वास की मध्यप्रदेश में उच्चस्तर पर प्रयास किये जा रहे हैं। मध्यप्रदेश में किसी संगीत अकादमी या केन्द्र में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिए जाने का प्रस्ताव है। लेकिन मुकुल के मित्र कहते हैं कि बेहद स्वाभिमानी इस इस गाायक को व्यवस्था के अनुकूल ढालना असंभव है। घर , पुरस्कार या पैसा उन्हें अगर बांध सकता तो वह भीेपाल , दिल्ली अथवा मुंबई में रहकर मनचाहा पैसा कमा सकते थे।
दूसरी और, ग्वालियर घराने से संबद्ध ,मुलतः देवास निवासी ,खयाल गायकी के बेजोड़ कलाकार ,मुकुल शिवपुत्र के करीबी मित्रों के हवाले से मुकुल नशे के इतने बुरे आदी नहीं थे। उन्होंने छः छः महीने शराब को हाथ भी नहीं लगाया। डाॅक्टर कहते हैं कि मुकुल डिप्रेशन के शिेकार हैं और उन्हें इलाज की जरूरत है।
तीसरे दिन समाचार आया कि कई संगठनों ने मुकुल शिवपुत्र की सहायता की पेषकश की है। इसी के साथ कुकुल का एक सार्थक, स्वस्थ और साहित्यिक बयान प्रकाशित किया गया है जिाका शीर्षक है:’’ आत्मीयता से मिला संबल ’’ यह बयान मुकुल के हस्ताक्षर से जारी किया गया है - ’’ जिस तरह किसी के भी जीवन में घटती हैं ,उसी तरह कलाकार के जीवन में भी कुछ अनहोनी घटनाएं घट जाती है। ऐसे समय में व्यक्ति के रूप में सभी को अपने समाज से संवेदना की आशा रहती है। मैं हार्दिक रूप् से कलाप्रेमीजनों के साथ ही समाज और सरकार के प्रति कृतज्ञता का अनुभव कर रहा हूं , जो मेरी सृजनशीलता के प्रति सच्चे मन से चिंतित हैं। यह आत्मीयता मुझे नया संबल दे रही हैं। मेरे प्रति सबका विष्वास मुझे आनेवाले समय में और अधिक उर्जावान होने की शक्ति दे रहा है। ’’
इस कृतज्ञ ,समर्थ और सार्थक टिप्पणी को पढ़कर लगता है कि एक दिन पूर्व उठाए गए मीडिया के इन प्रश्नों में दम है कि मुकुल शिवपुुत्र क्या नशे के शिकार हैं अथवा उनकी इस हालत के पीछे कोई दूसरा कारण जिम्मेदार है। या फिर यह एक कलाकार की मन की मौज है। इन सारे सवालो पर अभी पर्दा ही पड़ा है।
कलाकार मौजी होता है यह बहुत अधिक प्रचाारित प्रसाारित रूमानियत है। इसी के चलते मूडी और अश्लील-बुद्धि-सम्पन्न एम .एफ.हुसैन अरब-खरबपति हो गए हैं। मगर मुकुल के ’वोट आॅफ थैंक्स’ या कष्तज्ञता ज्ञापन ने एक नया ही वैज्ञानिक अनुसंधान प्रस्तुत किया है। गोस्वामी तुलसीदास ने तो कहा था -’’ को अस जनमा है जग माही । पद पाए जाको मद नाही ।’’ मुकुल ने यह मनोविज्ञान दिया है कि पद पाकर मद और प्रमाद ,अवसाद और कुण्ठा-ग्रस्त व्यक्ति भी स्वस्थ हो जाते हैं।
150509

Tuesday, May 12, 2009

चिकनी खाल के रसीले रहस्य

नींऊंड़ा ,नींमुड़ा ,नींबुड़ा:
चिकनी खाल के रसीले रहस्य

मेरे ख्याल से प्रातः-भ्रमण का स्वास्थ्य से चाहे जितना संबंध हो , मस्तिष्क से कहीं ज्यादा है। ताज़ा हवा में ताज़ा विचारों के साथ घूमते हुए ठंडी हवा कितना कुछ दे जाती है ,उसका पता सुबह-सुबह टहलकर घर लौटे हुए आदमी के चेहरे और उत्साह से चल जाता है।
मैं भी उस दिन अपने चेहरे पर उत्साह और विचारों का नये पतेवाला लिफ़ाफ़ा बनकर लौटा था। पत्नी बगिया में पानी दे रही थी । पत्नी को घेरकर मीठी-नीम , पोदीना ,मोंगरे , भटे , इकट्ठी दुृकट्ठी पत्तियोंवाला नगोड़ा नींबुड़ा यानी नीबू वगैरह खड़े थे। नीबू में भरपूर निंबोड़ियां झूल रही थी। ऐसे लग रह था जैसे पत्नी के माथे पर पसीने की चमकदार बूंदों से हंस-हंसकर कुछ बतिया रही हों। मैं कुतूहल के साथ बगिया में घुस गया और ठीक निंबुड़ियों की झूलती डाली के पास खड़ा हो गया । पत्नी ने चेतावनी दी:‘‘ सम्हलकर , नींबू में कांटे होते हैं।‘‘
मैं ठिठक गया। रसीली वनस्पतियों में कांटे ? मैं सोचने लगा कि और कौन कौन से फलदार पेड़ हैं जिनमें कांटे होते हैं! ऐसे फल जो मुझे पसंद है...और ऐसे फूल जो फूलों के राजा हैं.. और ऐसी सब्जियां जिनकी रोज रसोई पकती है और उन सबमें कांटे या कंटेदार रोयंे होते हैं। मुझे सोचता देख पत्नी ने टोका:‘‘ होने लगी कविता ,पकने लगा साहित्य.?’’
मैंने हंसकर कहा:‘‘ पकेगा जो भी ,तुम्हारे निंबुड़े के रस को निचोड़े बिना उनमें स्वाद तो आने से रहा ....लाओ दो एक निंबुड़ियां तोड़ लूं।’’
’’ नहीं ...अभी कच्ची हैं... रस नहीं पड़ा है.. ’’ पत्नी ने वर्जना की।
’’ तुम्हें कैसे पता कि रस नहीं हैं... आई मीन ..कैसे पता चलता है कि रस है या नहीं है ?’’ मैंने जिज्ञासा की।
पत्नी ने कहा:‘‘ नींबू की खाल देखो.. अभी खुरदुरी है... जब यह चिकनी होने लगे तो समझना चाहिए उसमें रस पड़ रहा है।’’
’’ अच्छा ! वनस्पतियां भी तभी रसीली होती हैं जब उनकी खाल चिकनी होती है ?’’ मेरे मुंह से निकल तो गया पर मैं सच कहता हूं यह अकस्मात् ,स्वभाववशात् हो गया था ,ऐसा कोई इरादा नहीं था । परन्तु पत्नी बिफर पड़ी:‘‘ सुबह सुबह तो दिमाग़ दुरुस्त रखा करो....कुछ भी कह जाते हो...जाओ चेंज करो , मैं चाय बनाकर लाती हूं।’’
मैंने सकपकाकर निंबुड़े की झूमती हुई डालियों को देखा और दिमाग में झूलते हुए विचारों को संभाले हुए कमरे में चला आया। यह भी अजीब संयोग था कि उसी दिन अखबार में पचपन-प्लस स्वप्नसंुदरी और चिरयौवना तारिका का संसदीय बयान छपा था:‘‘ मैं बिहार जाकर देखना चाहती हूं कि सड़कें मेरे गालों की तरह चिकनी हुई हैं या नहीं।’’
कहने की जरूरत नहीं है कि बुढ़ज्ञपे मंे भी ताज़गी की चमक से भरे ललिआए गालोंवाले एक भूतपूर्व बिहारी मुख्यमंत्री ने केन्द्रीयमंत्री के रूप में कभी कहा था कि वे बिहार की सड़को को स्वप्नसुंदरी के गालों की तरह चिकना बनाएंगे।’’ यह भी चिकनी परत वालों की रसीली चुटकी थी। तारिका सांसद का बयान भी रसीला था। पत्नी सही कहती है कि जब खाल चिकनी होती है तो उसमें रस पड़ने लगता है। दोनों राजनीति-जीवियों ने यह सिद्ध कर दिया है। हालांकि राजनीति कांटे बोने ,उगाने , बांटने और हटाने की जगह है , इसे सब जानते हैं। यह भी सबको पता है कि तारिकाओं के जीवन में पग-पगपर कांटे होते हैं। यही कांटें शायद उनके जीवन को रसीला बनाते हैं।
मनुष्य जिस प्रकृति का अंग वह प्रकृति अद्भुत है। कांटे हों या फूल...उनसे हमारे संघर्षों को बल मिलता है। इसीलिए हमारे आदर्शों में पुष्पवावटिका भी है और कंटीला वनवास भी। कांटेदार खट्टी मीठी बेरों से हमारे यहां आतिथ्य गौरवांवित होता है तो जंगली संजीवनी से पुनर्जीवन मिलता है। प्रकृति में बसंत भी होते हैं और पतझर भी। यह अद्भुत संयोग है कि बसंत में फूल खिलते हैं तो पेड़ नंगे हो जाते हैं।पत्ते झड़ जाते है। गर्मी जैसे जैसे तेज होती है तो पेड़ों पर भरपूर हरियाली छा जाती है। यानी कुदरत का कोई भी काम इकतरफा नहीं है....धूप है तो छांव भी है। कांटे हैं तो फूलों का राजा गुलाब भी है ,खुश्बू है। कांटे हैं तो नींबुड़ा में रस है ,चटखार है। इतना कुछ देने के बाद भी प्रकृति जीवंत कितनी है ? कांटे आते है तो खिली पड़ती है। फूलती है तो फलती भी है। विनम्र ऐसी कि फलने लगती है तो झुकी पड़ती है। जिन पेड़ों पर न फल हैं ,न फूल वे तने खड़े हैं। सागौन और सरई प्रशासनिक अधिकारी हैं ...उन्हें झुकाना जुर्म हैं ,उन्हें काटना जुूर्म। विलाश के मामलों में उनकी कटाई छंटाई सरकारी इजाजत के साथ की जा सकती है। फलदार वृक्ष तो आम आदमी है , जमीन से जुड़ा आदमी , सरल और सीधा आदमी... आम और अमरूद और सेव और संतरें और नीबू.... फले जा रहे हैं और झुके जा रहे हैं..... 2006 की एक ग़ज़ल का एक शेर ज़हन में उभरता है , जसे कुछ ऐसा है-
फलने लगता है तो झुक जाता है ,
पेड़ गर आदमी होता तो अकड़ जाता।
कुदरत और आदमी यहीं अलग हो जाते हैं। कुदरत झुकती है ,आदमी अकड़ता है। यूं तो आदमी प्रकृति का एक हिस्सा है। प्रकृति के अंदर आदमी है , आदमी के अंदर प्रकुति क्यों नहीं आती ?
नहीं नहीं ,आती तो है।प्रकृति कवियों के अंदर अनायास आती है। मेरे एक परिचित वयोवृद्ध कवि थे...स्व. केशव पांडे। धर्मयुग के कवि। इस्पात नगरी में एक कोमल आदमी... हंसी से भरा हुआ उनका चेहरा...। इस्पात भवन में हम प्रायः रोज मिलते थे। उन्हें हृदयाघात हो गया। पता नहीं जिनके हृदय कोमल होते हैं , प्रायः उन्हें हृदयाघात क्यों होता है ? केशव पांडे के कोमल हृदय में प्रकुति बसी हुई थी । एक दिन लंच में नीबू निचोड़ते हुए मुझे ऐ कविता सुनाई थी....
मित्र !
ये अफसर , ये नेता
हमें नीबू सा निचोड़ लेते हैं
दोपहर के भेजन में ।
मैं बस अवाक्। न आह भर सका ,न वाह कर सका। वे अनुभवी थे। कविता के प्रभाव को जानते थे । मुस्कुराकर बोले:‘‘ इसी में तो मजा है। मित्र , हम अपने को निचोड़कर अपना लंच स्वादिस्ट बनाते हैं ...चलो लंच करें।’’
तबसे मैं देख रहा हूं कि रोज प्रकृति कवियों के अंदर घुसती है और कविता के गवाक्षों से झांकती है। आलेखांे में प्रकृति अपनी द्वंद्वात्मकता , अपना द्वैतवाद उलीच रही है..संभावनाओं को भी , विडम्बनाओं को भी। गीतों में ग़ज़लों में दर्द कराह रहे हैं तो जिन्दगी गुनगुना रही है। कहानियों में करुणा रिस रही है तो आनंद भी झर रहा है।नगमों में नजाकतें इठला रही हैं तो रसीली चटपटी नींबुड़ियां झूम रही है।
नहीं , नींबू मेरे ज़हन से अभी उतरा नहीं है। उसका दिमाग मे चढ़ गया है और वह मेरे सर पर चढ़ गया है। नशा बनकर। जबकि यही सरचढ़ा नींबू कइयों के नशे उतार देता है। यही नींबुड़ा स्वाद को बढ़ाता है तो घमंड को और मद को उतार देता है। गर्मी चढ़ी हो तो नींबू का पानी उतार दे। यह नींबुड़ा जीरा और संेधा नमक के साथ गठबंधनकर सर पर चढ़कर बेहाल कर देने वाली गैस को मिनटों में उतार देता है।
उतारने को तो नींबू भूत भी उतारता है ,और दीठ भी ,नजर भी। सर पर चढ़ी भावों की देवी भी नींबू का उतारा मांगती है। नई खरीदी हुई गाड़ी के पहिए के नीचे नींबू को कुचल दो तो गाड़ी की बलाएं उतर जाती हैं। अपने अस्तित्व को , अपने को निचोड़कर केवल नींबू यानी प्यार में पुकारा गया नींबूड़ा दूसरों की बलाएं उतारता है। यही नहीं भव्य भवनों , दूकानों के सामने मिर्ची के साथ लटके हुए नींबू को देखो...कितने मजे से उनकी चैकसी में पैबस्त हैं ,तैनात हैं।
नींबू के कारनामों और करामातों की फेहरिस्त लम्बी है। वह स्वस्थों को स्वस्थ रखता है तो बीमारों को स्वस्थ करता है। खाली पेट सुबह-सुबह लेने से चर्बी गलने लगती है ,मोटापा छंटता है , रक्त-संसचार सुधरता है , रक्त-चाप सामान्य होता है।
कुलमिलाकर नींबू एक जीवित कविता है ,जिसमें रस है और ऊर्जा भी। नींबू के एक गिलास पानी से मैंने कविता को नहाकर बाहर निकलते देखा है। मेरे मित्र की पत्नी ने बिस्तर पर पड़े हुए पति को नींबू पानी का गिलास थमाते हुए ताना मारा था:‘‘ दिन चढ़े तक ऐसे पड़े हैं जैसे रात मे चढ़ाकर सोये हों।’’
मित्र ने इत्मीनान से नींबू-पानी पिया और पत्नी का हाथ पकड़कर यह शेर सुनाया:
दांव खेला ही नहीं है , तो चुकारा क्यों हो ?
रात जब पी ही नहीं है , तो उतारा क्यों हो ?

चाय पीकर मैं चुपचाप नींबू के पौधे के पास खड़ा हो गया हूं। मैं उसकी बलाएं उतार रहा हूं और अपने सर ले रहा हूं। मुझे याद है कि लगातार चार सालों तक नींबू पर न फूल खिले , न फल आए। तब किसी ने टोटका दिया था कि इतवार बुधवार नींबू के पास खड़े होकर घुड़को कि इस बंझेड़े को काट डालूंगा..क्योंकि यह फलता फूलता ही नहीं। ऐसा एक दो बार कहने से वह फलेगा भी और फूलेगा भी। मैंने इस टोटके को आजमाकर देखने में कोई बुराई नहीं समझी ,क्योंकि इसमें अपना फायदा था। सचमुच नींबू उस घुड़की के बाद फूला भी और देखो कैसे झमाझम फल रहा है। किंतु , किसी कार्यालय में काम अटका हो ,कोई कोशिश फलीभूत न हो रही हो और ऐसे धमकाओ कि काट डालूंगा अगर इस बार काम नहीं हुआ तो। क्या काम फलीभूत होगा ? उलटे मुसीबत खड़ी हो जाएगी। रासुका लगेगा सो अलग। यह तो नींबू है जिसे धमकाने का बुरा नहीं लगता। जरूरतमंदांे के दर्द को वह समझता है।
आखिर मैंने ग्लानि और कृतज्ञता से कांटों की परवाह किये बिना ,नींबू के फलदार वृक्ष की टहनी को चूमा और कहा:‘‘ झूठी मूठी धमकी को दिल से मत लगाना यार ,जब निचोड़ूं तो निचुड़ जाना ।’’

डाॅ. रामार्य

Friday, May 8, 2009

मैं कबीर तू लोई !

तू जाने या मैं जानूं यह और न जाने कोई ।
होते होते हो ही गए हम , मैं कबीर तू लोई !

खुद ने खुद को धोया-पोंछा , खुद सिंगार किया है ।
जो भी जैसा सामने आया , फल स्वीकार किया है ।
रोने को मन किया मगर हम किसके आगे रोते ?
हमने संयम नहीं वरन् खुद पर अधिकार किया है ।।
अपनी पूनम ने कितनी रातों की कालिख धोई !
तू जाने या मैं जानूं यह और न जाने कोई !

कष्टों के कांटों की सूई लेकर सिलते पल-छिन !
हम अपने मन को बहलाने ,चलते कंकर गिन-गिन !
हुई हथेली लाल समय के बंजर खनते खनते,
मेंहदी कितनी रची देखते रहे हमीं तुम दिन-दिन !!
क्या ग्लानी ,क्या क्षोभ हमें , क्यों करे कोई दिलजोई ?
तू जाने या मै जानूं ,यह और न जाने कोई !!

बड़े मजे से उड़े जा रहे , पंछी हैं दिन अपने ।
हवा ,मेघ ,आकाश ,प्रकृति, सच है या हैं सपने ?
धरती-सागर ,आंगन-बाड़ी ,पार-द्वार हैं अद्भुत ,
खट्टे-मीठे ,रस-नीरस सब स्वाद मिल गए चखने ।।
मुक्ति-युक्ति की ,तुष्टि-तृप्ति की उपज हमीं ने बोई !
होते होते हो ही गए हम ,मैं कबीर तू लोई !!





9 मई ,2009, बुद्ध-पूर्णिमा ,शनिवार ,
वैवाहिक-वर्षगांठ पर पत्नी को
उपहार-स्वरूप
गीत.

Thursday, May 7, 2009

जूतों की महायात्रा: शास्त्रयुग से शस्त्रयुग तक

रामायणकाल मे शास्त्र पोषित सम्राट् राम की कहानी में एक युगान्तर तब घटित हुआ जब अयोध्या के राजा भरत ने आग्रह किया था कि आपका अधिकार है आप राजा बनें। शास्त्रीय नैतिकता और मर्यादा को कठोर व्यावहारिकता में बदल देनेवाले राम ने नियति से प्राप्त वनवास को वरेण्य मानकर भरत का आग्रह अस्वीकृत कर दिया था। तब भरत ने राम कीह खड़ाऊ मांग ली और सर पर रख्कर लौट आए। राजसिंहासन पर उन खड़ाउओं को स्थापित कर वे पगतिनिधि राज्य की भांति राजकाज देखने लगे और कुटिया में कुशों के आसन पर पतस्वी जीवन बिजाने लगे। ऐसा आदर्श और कहीं दिखाई नहीं देता कि भाग्य से प्राप्त राज्य को गर्हित मानकर उसके पारंपरिक वास्तविक अधिकारी की वस्तु मानते हुए राजा तपस्वी हो जाए। आज तो राज्य और राज्य सिंहासन के लिए मारकाट ,छीना झपटी और षड़यंत्रों की बाढ़ सी आ गई है। हालांकि भारत के महाभारत-काल में इसका सूत्रपात हो गया था। कितना अंतर है - रामकाल की उन खड़ाउओं में और आज जो फेंकी जा रही हैं उनमें।
अध्यात्म के क्षेत्र में भी गुरु की खडाऊ का पूजन भारतीय मनीषा की अपनी मौलिक साधना है। हमारे देश मंे केवल शास्त्रों की ही पूजा नहीं होती , शस्त्रों की भी होती है और शास्त्रों के पिर्माणकत्र्ता गुरुओं की चरण पादुका उर्फ खड़ाऊ उर्फ जूतों की भी। संतों की परंपरा में तो जूते गांठनेवाले संत रविदास या रैदास का समादर भी इसी देश में संभव हुआ। इतना ही नहीं राजपूताने की महारानी मीरांबाई अपने राजसी वैभव को छोड़कर उनकी चरणरज लेकर संन्यासिनी हो गई।
दूसरी ओर अपने आराध्य और श्रद्धेय के जूते सरपर धारण करने वाले देश में दूसरों को जूतों की नोंक पर रखने के अहंकार-घोषणा यत्र-तत्र-सर्वत्र सुनाई देती है। आज के घोषणापत्रों में अपने विचारों के अलावा दूसरों को जूता दिखाने की खुली गर्जनाएं गूंज रही हैं। अपने विकास कार्यक्रमों की बजाय देसरों के सत्यानाश की ललकारों पर उनको भविष्य दिखाई दे रहा है। श्रद्धा की चरणपादुकाएं ,खड़ाऊ या जूते आक्रोश , प्रतिहिंसा और कलुषित मनोविकारों में रूपायित हो गए। यह हमारी मानसिकता का विकास है या अधोपतन ?
इतिहास के पन्नों में संभवतः 2009 ‘जूता वर्ष’ के रूप में जाना जाए। विश्व की सबसे बड़ी ताकत के रूप में सर्वमान्य अमेरिका के निवृत्तमान राष्ट्रपति जार्ज बुश पर बगदाद के एक पत्रकार ने साम्राज्यवाद के विरोध में अपना जूता चलाया था। जूते या तो समाज और राजनीति में या घर और संसद में चलते रहे हैं। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी राष्ट्राध्यक्ष पर चलनेवाला यह पहला जूता था।सारा विश्व सकते मंे आ गया। इसे आंतरिक अव्यवसथा और युद्धाक्रांत देश की , दमन के विरुद्ध अभिव्यक्ति कहा गया। ताकतवर बंदूकों के शिकंजे में दबे प्रचारतंत्र द्वारा ईजाइ किया गया सूचना और संचार का , मासकम्युनिकेशन का नया तरीका था , अपेक्षाकृत नया असत्र था। अब ‘ जूता ’ समर्थों के खिलाफ अपनी बात कहने का नया वैश्विक-उपकरण बन गया।
ऐसा नहीं है कि यह गुस्सा साम्राज्यवाद , विश्पूंजीवाद और मुद्राबाजार के एकमात्र अधिनायक राष्ट्र तक ही सीमित रहा। कुछ दिनों बाद चीन के प्रधानमंत्री वेन जिआबाओ पर भी उनकी आक्सफोर्ड यात्रा के दौरान फेंका गया।
सन 2009 भारत का चुनावी वर्ष भी है। दिल्ली सहित कुछ महŸवपूर्ण राज्यों की विधानसभा के चुनाव परिणामों ने लोकसभा के चुनावों को हड़बड़ा दिया है। शायद इसी का नतीजा था कि गृहमंत्री पी.चिदम्बरम् पर चुनावी दौर की शुरुआत पर ही पत्रकार-वात्र्ता के दौरान एक पत्रकार ने जूता फेंका। वैश्विक संघटनाओं का यह भारतीयकरण था। भारत की यही विडम्बना है कि वह सर्वौत्तम का सृजन करता है और भौंडा , और वीभत्स का अनुकरण घटिया का अनुकरध करता है। पी. चिदम्बर पर फेंके गए पहले भारतीय जूते की गूंज दूर तक हुई। बुश पर जूता फेंकनेवाले बगदाददी पत्रकार का हश्र बुरा हुआ, जेल हुई। हमारी भारतीय परम्परा क्षमाशील है। ईसामसीह से हमने यह गुण लिया है। गृहमंत्री ने इसका पालन करते हुए भारतीय पत्रकार को क्षमा कर दिया और पत्रकार ने भी खेद व्यक्त करते हुए कहा: ‘‘ मेरा उद्देश्य नुकसान पहुंचाना नहीं ,ध्यानाकर्षण था। मैंने हीरो बनने के लिए यह नहीं किया बल्कि राष्ट्रीय स्तर तक अपनी बात पहुंचाने के लिए किया। जबकि अकालीदल ने तो जूता फेंकनेवाले पत्रकार जरनैल सिंह को भगतसिंह की उपाधि दे दी।
फिर तो जैसे जूते चलने का मानसून ही आ गया। 8 अप्रेल गुहमंत्री पी. चिदम्बरम् पर हमला अभी हमला ताजा ही था कि 11 अप्रेल सांसद नवीन जिंदल पर एक रिटायर्ड शिक्षक ने जूता फेंका , 17 अप्रेल को देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रक्षेपित लालकृष्ण आडवानी पर पार्टाी काषर््कत्र्ता द्वारा खड़ाª फेंकी गई , 27 अप्रेल को भारत के वत्र्तमान प्रधानमंत्री डाॅ.मनमोहन सिंह पर एक बेरोजगार कम्प्यूटर इंजीनियर ने चप्पल फेंकी ,28 अप्रेल को दोबारा आडवानी पर निर्दलीय उम्मीदवार ने चप्पल फेंकी , और आज 29 अप्रेल को कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी.एस. येदुरप्पा पर एक युवक नेचप्पल फेंकी। इसी बीच सिने जगत के प्रसिद्ध अभिनेता जीतेन्द्र पर भी एक युवक ने चप्पल फेंकी। मजे की बात यह है कि इन सबसे बेपरवाह गुजरात के कलील शहर का नगरपालिका अध्यक्ष मुकेश परमार (भाजपा) अपने कार्यदिवस का काम निपटाकर अपनी पुश्तैनी चप्पल की दूकान पर नियमित मरम्मत और चप्पल निर्माण कर रहंे हैं। मूकेश परमार के दृष्टांत से हिन्दी उर्दू के प्रख्यात लोकप्रिय लेखक कृश्नचंदर की कहानी ‘ जूता ’ का बरबस स्मदण हो आता है. यह कहानी करीब 1965-70 के आसपास उनके कहानी संकलन ‘ जामुन का पेड़ ’ में संकलित थी. हंसी-हंसी में कृश्न चंदर मर्म पर चोट करने पर कभी नहीं चूकजे थे. ‘जूता’ कहानी के माध्यम से उन्होंने समाज की बेरोजगारी , डिग्री धारियों के मोहभंग , पैसों के पीछे भागने की समाज के प्रत्येक वर्ग की मूल्य विहीन लोलुपता पर उन्होंने तीखें कटाक्ष किए हैं. कहानी का प्रारंभ जामुन के पंड़ के नीचे बैठे एक मोची के जूते गांठने के दृष्य से होती है. बातों बातों में पता चलता है कि वह मोची पीछे खडत्रे आलीशान बंगले का मालिक था. उसने समाज के लोगों के चेहरों से पर्दा उठाने के लिए सौ जूते खानेवाले को दस हजार का ईनाम देने की घोषणा कर दी. तीन दिन तक समाज के हर वर्ग के लोग छुपते छुपाते आए और जूते खाकर चले गए. तीसरे दिन वह कंगाल हो गया और वही सामने मोची की दूकान खोल ली. आज अगर यह ईनाम रखा जाए तो घटनाएं बताता हैं कि दस हजार के बदले जूते खाने के लिए लोग अधिकार के साथ आएंगे. पैसा कमाने में शर्म कैसी ? खासकर उस वक्त जब जूते-चप्पल खाने में देश विदेेश मंें लोकप्रियता हासिल हो.
भारत जितना अद्भुत देश है ,उतनी अद्भुत उसकी विरासतें है। साहित्य भी अद्भुत है। आज भी जूते चप्पलॅे फेंकने की घटनाओं पर पत्रकार अगर अपनी बात कह रहे हैं तो चित्रकार अपने कार्टून बना रहे हैं , व्यंग्यकार इसे अपनी दृष्टि से देख रहे हैं तो प्ररूज्ञासनिक अधिकारी बतौर लेखक अपने दिशा निर्देश दे रहे हैं। जहां पी. चिदम्बरम् पर फेंके गए जूते पर पत्रकार गोकुल षर्मा ने उसे ‘लोकतंत्र की निराशा ‘ कहा तो आडवानी पर फेंके गए खड़ाऊ और के विषय में उन्होंने चेताया कि यह भाजपा को चेतावनी है कि कार्यकत्ताओं को नजर अंदाज न करें। आलोक पुराणिक ने ‘ जूता संहिता ‘ बनाने की व्यंग्यात्मक पहल की जा पूर्व प्रशासनिक अधिकारी एम एन बुच ने आक्रोश को कानून की हदें पार न करने की तरबीयत की।
एक व्यंग्य चित्रकार हैं मंजुल । उन्होंने पहले भारतीय जूता कांड पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए ‘मास कम्युनिकेशन इंस्टीट्यूट ’ के छात्रों को जूता फेंकने के हुनर का अभ्यास करते हुए चित्रित किया। वहीं 25 अप्रेल को उनके कार्टून में एक नेता अपने जूतों के , अपनी पत्नी के जूतों के तथा अपने बच्चों के जूतों के नाप और नम्बर बता रहा है। हर जूता प्रकरण के बाद हमारे राजनेता निर्विकार भाव से अपनी बात जारी रखते है। यह अद्भुत समभाव राजनीति की देन है या गीता की ?
यह लेख जब तक लिखा जा रहा है ( 29 अप्रेल ) तब तक लगभग प्रतिदिन जूता किसी बड़े राजनेता पर चल रहा है।येदुरप्पा पर आज की तारीख खत्म हुई हैलेकिन यह अंत नहीं है। 2009 के समाप्त होते होते , चुनाव के बाद सरकार बनते तक और सरकार बनने के बाद संसद में अभी और न जाने कितने जूते चलेंगे कौन जानता है ? इन जूतों को कौन रोक सका है जो रोकेगा ?बस केवल विश्लेषण , लेख , टिप्पणियां ,व्यंग्य ,कार्टून और कविताओं का दौर चलेगा।
यह संयोग ही है केवल कि 2003 के अप्रेल माह में विदेशों की अकादमिक यात्रा से लौटे दो भारतीय विद्वानों ने जब ‘जूतों ’ को संबोधित मेरी कविता ‘ क्रियात्मक और सर्जनात्मक ’ कहा था तब मुझे कहां पता था कि 2009 के अप्रेल को हमें जूतों के इतने कारनामे सुनने पढ़ने को मिलेंगे और वर्ष 2009 ’ जूतों का अभिनंदन वर्ष ’ कहलाएगा ? 2003 की यह कविता जरा 2009 के अप्रेल में देखी जाए..
जूतों !
पहने जाते हो पैरों में,/मगर /हाथों में देखे जाते हो
जूतों ! /सच सच बताओ /यह जुगाड़ कैसे भिड़ाते हो ?
संसद की बदल जाती हैं /सांवैधानिक प्रक्रिया
चलती नहीं आचार संहिता -/जब तुम चलते हो
स्तब्ध है विराट प्रजातंत्र /और दिव्य भारतीय संस्कृति
थ्नकृष्ट
तुम कितने रूप बदलते हो !
आओ , तुम्हें सिर पर धारण करें .........